अंग 1062

अंग
1062
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਕਰਤਾ ਕਰੇ ਸੁ ਨਿਹਚਉ ਹੋਵੈ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦੇ ਹਉਮੈ ਖੋਵੈ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਕਿਸੈ ਦੇ ਵਡਿਆਈ ਨਾਮੋ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਦਾ ॥੫॥
ਗੁਰ ਸੇਵੇ ਜੇਵਡੁ ਹੋਰੁ ਲਾਹਾ ਨਾਹੀ ॥
ਨਾਮੁ ਮੰਨਿ ਵਸੈ ਨਾਮੋ ਸਾਲਾਹੀ ॥
ਨਾਮੋ ਨਾਮੁ ਸਦਾ ਸੁਖਦਾਤਾ ਨਾਮੋ ਲਾਹਾ ਪਾਇਦਾ ॥੬॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਸਭ ਦੁਖੁ ਸੰਸਾਰਾ ॥
ਬਹੁ ਕਰਮ ਕਮਾਵਹਿ ਵਧਹਿ ਵਿਕਾਰਾ ॥
ਨਾਮੁ ਨ ਸੇਵਹਿ ਕਿਉ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਦੁਖੁ ਪਾਇਦਾ ॥੭॥
ਆਪਿ ਕਰੇ ਤੈ ਆਪਿ ਕਰਾਏ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਕਿਸੈ ਬੁਝਾਏ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵਹਿ ਸੇ ਬੰਧਨ ਤੋੜਹਿ ਮੁਕਤੀ ਕੈ ਘਰਿ ਪਾਇਦਾ ॥੮॥
ਗਣਤ ਗਣੈ ਸੋ ਜਲੈ ਸੰਸਾਰਾ ॥
ਸਹਸਾ ਮੂਲਿ ਨ ਚੁਕੈ ਵਿਕਾਰਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਸੁ ਗਣਤ ਚੁਕਾਏ ਸਚੇ ਸਚਿ ਸਮਾਇਦਾ ॥੯॥
ਜੇ ਸਚੁ ਦੇਇ ਤ ਪਾਏ ਕੋਈ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਪਰਗਟੁ ਹੋਈ ॥
ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਸਾਲਾਹੇ ਰੰਗਿ ਰਾਤਾ ਗੁਰ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਸੁਖੁ ਪਾਇਦਾ ॥੧੦॥
ਜਪੁ ਤਪੁ ਸੰਜਮੁ ਨਾਮੁ ਪਿਆਰਾ ॥
ਕਿਲਵਿਖ ਕਾਟੇ ਕਾਟਣਹਾਰਾ ॥
ਹਰਿ ਕੈ ਨਾਮਿ ਤਨੁ ਮਨੁ ਸੀਤਲੁ ਹੋਆ ਸਹਜੇ ਸਹਜਿ ਸਮਾਇਦਾ ॥੧੧॥
ਅੰਤਰਿ ਲੋਭੁ ਮਨਿ ਮੈਲੈ ਮਲੁ ਲਾਏ ॥
ਮੈਲੇ ਕਰਮ ਕਰੇ ਦੁਖੁ ਪਾਏ ॥
ਕੂੜੋ ਕੂੜੁ ਕਰੇ ਵਾਪਾਰਾ ਕੂੜੁ ਬੋਲਿ ਦੁਖੁ ਪਾਇਦਾ ॥੧੨॥
ਨਿਰਮਲ ਬਾਣੀ ਕੋ ਮੰਨਿ ਵਸਾਏ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਸਹਸਾ ਜਾਏ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਭਾਣੈ ਚਲੈ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਨਾਮੁ ਚੇਤਿ ਸੁਖੁ ਪਾਇਦਾ ॥੧੩॥
ਆਪਿ ਸਿਰੰਦਾ ਸਚਾ ਸੋਈ ॥
ਆਪਿ ਉਪਾਇ ਖਪਾਏ ਸੋਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਸੁ ਸਦਾ ਸਲਾਹੇ ਮਿਲਿ ਸਾਚੇ ਸੁਖੁ ਪਾਇਦਾ ॥੧੪॥
ਅਨੇਕ ਜਤਨ ਕਰੇ ਇੰਦ੍ਰੀ ਵਸਿ ਨ ਹੋਈ ॥
ਕਾਮਿ ਕਰੋਧਿ ਜਲੈ ਸਭੁ ਕੋਈ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵੇ ਮਨੁ ਵਸਿ ਆਵੈ ਮਨ ਮਾਰੇ ਮਨਹਿ ਸਮਾਇਦਾ ॥੧੫॥
ਮੇਰਾ ਤੇਰਾ ਤੁਧੁ ਆਪੇ ਕੀਆ ॥
ਸਭਿ ਤੇਰੇ ਜੰਤ ਤੇਰੇ ਸਭਿ ਜੀਆ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿ ਸਦਾ ਤੂ ਗੁਰਮਤੀ ਮੰਨਿ ਵਸਾਇਦਾ ॥੧੬॥੪॥੧੮॥
करता करे सु निहचउ होवै ॥
गुर कै सबदे हउमै खोवै ॥
गुर परसादी किसै दे वडिआई नामो नामु धिआइदा ॥५॥
गुर सेवे जेवडु होरु लाहा नाही ॥
नामु मंनि वसै नामो सालाही ॥
नामो नामु सदा सुखदाता नामो लाहा पाइदा ॥६॥
बिनु नावै सभ दुखु संसारा ॥
बहु करम कमावहि वधहि विकारा ॥
नामु न सेवहि किउ सुखु पाईऐ बिनु नावै दुखु पाइदा ॥७॥
आपि करे तै आपि कराए ॥
गुर परसादी किसै बुझाए ॥
गुरमुखि होवहि से बंधन तोड़हि मुकती कै घरि पाइदा ॥८॥
गणत गणै सो जलै संसारा ॥
सहसा मूलि न चुकै विकारा ॥
गुरमुखि होवै सु गणत चुकाए सचे सचि समाइदा ॥९॥
जे सचु देइ त पाए कोई ॥
गुर परसादी परगटु होई ॥
सचु नामु सालाहे रंगि राता गुर किरपा ते सुखु पाइदा ॥१०॥
जपु तपु संजमु नामु पिआरा ॥
किलविख काटे काटणहारा ॥
हरि कै नामि तनु मनु सीतलु होआ सहजे सहजि समाइदा ॥११॥
अंतरि लोभु मनि मैलै मलु लाए ॥
मैले करम करे दुखु पाए ॥
कूड़ो कूड़ु करे वापारा कूड़ु बोलि दुखु पाइदा ॥१२॥
निरमल बाणी को मंनि वसाए ॥
गुर परसादी सहसा जाए ॥
गुर कै भाणै चलै दिनु राती नामु चेति सुखु पाइदा ॥१३॥
आपि सिरंदा सचा सोई ॥
आपि उपाइ खपाए सोई ॥
गुरमुखि होवै सु सदा सलाहे मिलि साचे सुखु पाइदा ॥१४॥
अनेक जतन करे इंद्री वसि न होई ॥
कामि करोधि जलै सभु कोई ॥
सतिगुर सेवे मनु वसि आवै मन मारे मनहि समाइदा ॥१५॥
मेरा तेरा तुधु आपे कीआ ॥
सभि तेरे जंत तेरे सभि जीआ ॥
नानक नामु समालि सदा तू गुरमती मंनि वसाइदा ॥१६॥४॥१८॥

हिन्दी अर्थ: (उस मनुष्य को यह निश्चय हो जाता है कि) जो कुछ परमात्मा करता है वह अवश्य होता है। वह मनुष्य गुरू के शबद की बरकति से (अपने अंदर से) अहंकार दूर कर लेता है। हे भाई ! गुरू की कृपा से (जिस) किसी (विरले मनुष्य) को परमात्मा वडिआई देता है। वह मनुष्य हर वक्त हरी-नाम ही सिमरता है। 5। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ने के बराबर (जगत में) और कोई लाभवंत (कार्य) नहीं। (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ते हैं। उनके) मन में (परमात्मा का) नाम आ बसता है। वे हर वक्त हरी-नाम की सिफत करते हैं। हे भाई ! परमात्मा का नाम ही सदा सुख देने वाला है। हरी-नाम ही (असल) लाभ (है जो) मनुष्य कमाता है। 6। हे भाई ! हरी-नाम से टूटने पर जगत में हर तरफ दुख ही दुख है। (जो मनुष्य नाम भुला के धार्मिक मिथे हुए अन्य) अनेकों कर्म करते हैं (उनके अंदर बल्कि) विकार बढ़ते हैं। हे भाई ! अगर मनुष्य नाम नहीं सिमरते तो आत्मिक आनंद कैसे मिल सकता है। नाम से टूट के मनुष्य दुख ही सहता है। 7। परमात्मा स्वयं ही सब कुछ कर रहा है और (जीवों से) करवा रहा है। हे भाई ! गुरू की कृपा से किसी (विरले) को परमात्मा ये समझ देता है जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहते हैं। वह (अपने अंदर से माया के मोह के) बँधन तोड़ लेते हैं। गुरू उनको उस आत्मिक ठिकाने में रखता है जहाँ उन्हें विकारों से मुक्ति मिली रहती है। 8। हे भाई ! जो मनुष्य हर वक्त माया की गिनतियाँ गिनता रहता है। वह जगत में सदा (तृष्णा की आग में) जलता रहता है। उसका यह व्यर्थ सहम कभी भी समाप्त नहीं होता। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। वह दुनियावी चिंता-फिक्र खत्म किए रहता है। वह हर वक्त सदा कायम रहने वाले परमात्मा की याद में लीन रहता है। 9। पर। हे भाई ! अगर सदा कायम रहने वाला परमात्मा (खुद ही ये बेफिकरी) बख्शे। तब ही कोई मनुष्य इसको प्राप्त करता है। गुरू की कृपा से (प्रभू उसके अंदर) प्रकट हो जाता है। वह मनुष्य गुरू की कृपा से प्रेम-रंग में मस्त रह के सदा-स्थिर हरी-नाम सिमरता है। और आत्मिक आनंद माणता रहता है। 10। हे भाई ! परमात्मा का मीठा नाम (जपना ही) जप है तप है संजम है। (जो मनुष्य नाम जपता है उसके सारे) पाप (पाप) काटने की समर्थता रखने वाला परमात्मा काट देता है। परमात्मा के नाम में जुड़ने की बरकति से उसका तन उसका मन शांत रहता है। वह सदा ही आत्मिक अडोलता में टिका रहता है। 11। हे भाई ! जिस मनुष्य के अंदर (माया का) लालच टिका रहता है (उसका मन हर वक्त मैला रहता है)। मैले मन के कारण वह मनुष्य लालच की और मैल (अपने मन को) लगाता रहता है। (ज्यों-ज्यों लालच के अधीन वह) मैले कर्म करता है। वह (आत्मिक) दुख पाता है। वह सदा नाशवंत पदार्थों के कमाने का धंधा ही करता है। और झूठ बोल-बोल के दुख सहता है। 12। हे भाई ! जो कोई मनुष्य (जीवन को) पवित्र करने वाली (गुर-) बाणी (अपने) मन में बसाता है। गुरू की कृपा से (उसका) सहम दूर हो जाता है। वह मनुष्य दिन-रात गुरू के हुकम में चलता है। हरी-नाम को सिमर के वह आत्मिक आनंद लेता है। 13। हे भाई ! सदा कायम रहने वाला परमात्मा स्वयं ही (जीवों को) पैदा करने वाला है। खुद पैदा करके वह खुद नाश करता है। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है वह सदा परमात्मा की सिफत-सालाह करता है। सदा-स्थिर प्रभू के चरणों में मिल के वह आत्मिक आनंद भोगता है। 14। हे भाई ! (गुरू की शरण पड़े बिना) और अनेकों यतन भी मनुष्य करे तो भी काम-वासना काबू में नहीं आ सकती। (ध्यान से देखें) हरेक जीव काम में क्रोध में जल रहा है। गुरू की शरण पड़ने से ही मन काबू में आता है। अगर मन (विकारों से) रोक लिया जाए तो मनुष्य की अंतरात्मा टिकी रहती है (विकारों की ओर नहीं भटकता)। 15। हे प्रभू ! (जीवों के मन में) मेर-तेर तूने खुद ही पैदा की है। सारे जीव-जंतु तेरे ही पैदा किए हुए हैं। हे नानक ! परमात्मा का नाम सदा याद करता रह। हे भाई ! गुरू की मति पर चलने से (प्रभू अपना नाम मनुष्य के) मन में बसाता है। 16। 4। 18।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਦਾਤਾ ਅਗਮ ਅਥਾਹਾ ॥
ਓਸੁ ਤਿਲੁ ਨ ਤਮਾਇ ਵੇਪਰਵਾਹਾ ॥
ਤਿਸ ਨੋ ਅਪੜਿ ਨ ਸਕੈ ਕੋਈ ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਇਦਾ ॥੧॥
ਜੋ ਕਿਛੁ ਕਰੈ ਸੁ ਨਿਹਚਉ ਹੋਈ ॥
ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਦਾਤਾ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਨਾਮ ਦਾਨੁ ਕਰੇ ਸੋ ਪਾਏ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਮੇਲਾਇਦਾ ॥੨॥
ਚਉਦਹ ਭਵਣ ਤੇਰੇ ਹਟਨਾਲੇ ॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਦਿਖਾਏ ਅੰਤਰਿ ਨਾਲੇ ॥
ਨਾਵੈ ਕਾ ਵਾਪਾਰੀ ਹੋਵੈ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਕੋ ਪਾਇਦਾ ॥੩॥
मारू महला ३ ॥
हरि जीउ दाता अगम अथाहा ॥
ओसु तिलु न तमाइ वेपरवाहा ॥
तिस नो अपड़ि न सकै कोई आपे मेलि मिलाइदा ॥१॥
जो किछु करै सु निहचउ होई ॥
तिसु बिनु दाता अवरु न कोई ॥
जिस नो नाम दानु करे सो पाए गुर सबदी मेलाइदा ॥२॥
चउदह भवण तेरे हटनाले ॥
सतिगुरि दिखाए अंतरि नाले ॥
नावै का वापारी होवै गुर सबदी को पाइदा ॥३॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला ३॥ हे भाई ! परमात्मा सब पदार्थ देने वाला है। अपहुँच है। बहुत ही गहरा (मानो बेअंत खजानों वाला समुंद्र) है। (वह सबको दातें दिए जाता है। पर) उस बेपरवाह को रक्ती भर भी कोई लालच नहीं। कोई जीव (अपने उद्यम से) उस परमात्मा तक पहुँच नहीं सकता। वह स्वयं ही (जीव को गुरू से) मिला के अपने साथ मिलाता है। 1। हे भाई ! (वह परमात्मा) जो कुछ करता है। वह जरूर होता है। उसके बिना कोई और कुछ देने योग्य नहीं। हे भाई ! जिस मनुष्य को परमात्मा नाम की दाति देता है। वह हरी-नाम प्राप्त कर लेता है। (उसको) गुरू के शबद में जोड़ के (अपने साथ) मिला लेता है। 2। हे प्रभू ! ये चौदह लोक तेरे बाजार हैं (जहाँ तेरे पैदा किए हुए बेअंत जीव तेरी बताई हुई कार कर रहे हैं। यह सारा जगत तेरा ही स्वरूप है)। जिस मनुष्य को गुरू ने तेरा यह सर्व-व्यापक स्वरूप उसके अंदर बसता ही दिखा दिया है। वह मनुष्य तेरे नाम का वणजारा बन जाता है। (ये दाति) जो कोई प्राप्त करता है। गुरू के शबद से ही (प्राप्त करता है)। 3।

संदर्भ: यह अंग 1062 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।

Sarojini Nagar की hagling के बीच कोई unexpected calm।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 46 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1062” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1063 →, पीछे का: ← अंग 1061

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।