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अंग 993

अंग
993
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
रागु मारू महला 1 घरु 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अहिनिसि जागै नीद न सोवै ॥
सो जाणै जिसु वेदन होवै ॥
प्रेम के कान लगे तन भीतरि वैदु कि जाणै कारी जीउ ॥1॥
जिस नो साचा सिफती लाए ॥ गुरमुखि विरले किसै बुझाए ॥
अंम्रित की सार सोई जाणै जि अंम्रित का वापारी जीउ ॥1॥ रहाउ ॥
पिर सेती धन प्रेमु रचाए ॥
गुर कै सबदि तथा चितु लाए ॥
सहज सेती धन खरी सुहेली त्रिसना तिखा निवारी जीउ ॥2॥
सहसा तोड़े भरमु चुकाए ॥
सहजे सिफती धणखु चड़ाए ॥
गुर कै सबदि मरै मनु मारे सुंदरि जोगाधारी जीउ ॥3॥
हउमै जलिआ मनहु विसारे ॥
जम पुरि वजहि खड़ग करारे ॥
अब कै कहिऐ नामु न मिलई तू सहु जीअड़े भारी जीउ ॥4॥
माइआ ममता पवहि खिआली ॥
जम पुरि फासहिगा जम जाली ॥
हेत के बंधन तोड़ि न साकहि ता जमु करे खुआरी जीउ ॥5॥
ना हउ करता ना मै कीआ ॥
अंम्रितु नामु सतिगुरि दीआ ॥
जिसु तू देहि तिसै किआ चारा नानक सरणि तुमारी जीउ ॥6॥1॥12॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: रागु मारू महला 1 घरु 5 सतिगुर प्रसादि॥ नाम-अमृत का व्यापारी जीव दिन-रात सचेत रहता है। वह माया के मोह की नींद में सोता नहीं। नाम-अमृत की कद्र जानता भी वही मनुष्य है जिसके अंदर परमात्मा से विछोड़े के अहिसास की तड़प हो। जिस के शरीर में प्रभू-प्रेम के तीर लगे हों। शारीरिक रोगों का इलाज करने वाला व्यक्ति बिरह-रोग का इलाज नहीं जानता। 1। सदा कायम रहने वाला परमात्मा अपनी सिफत सालाह में जिस किसी विरले व्यक्ति को गुरू के माध्यम से जोड़ता है और सिफत सालाह की कद्र समझाता है। आत्मिक जीवन देने वाली सिफत सालाह की कद्र वही व्यक्ति समझता है क्योंकि वह इस नाम-अमृत का व्यापारी बन जाता है। 1। रहाउ। जैसे स्त्री (अपना आपा अर्थात स्वै वार के) अपने पति से प्यार करती है। वैसे ही जो जीव-स्त्री गुरू के शबद में चित्त जोड़ती है। वह जीव-स्त्री आत्मिक अडोलता में टिक के बहुत सुखी हो जाती है। वह (अपने अंदर से) माया की तृष्णा माया की प्यास दूर कर लेती है। 2। जो जीव-स्त्री अडोलता में टिक के परमात्मा की सिफत-सालाह का धनुष (बाण) कसती है (उसकी सहायता से अपने अंदर से) सहम-डर समाप्त कर लेती है माया वाली भटकना खत्म करती है। वह गुरू शबद में जुड़ के (स्वैभाव को) मारती है अपने मन को वश में रखती है वह जीव-स्त्री प्रभू-मिलाप के आसरे वाली हो जाती है (भाव। प्रभू-चरणों का मिलाप उसके जीवन का आसरा बन जाता है)। 3। जो जीव अहंकार में जला रह के (आत्मिक जीवन के अंकुर को जला के) परमात्मा को अपने मन से भुला देता है उसको जम के शहर में करारे खड़ग बजते हैं (भाव। इतने आत्मिक कलेश होते हैं। मानो। तलवारों की जोरदार चोटें बज रही हों)। उस वक्त (जब मार पड़ रही होती है) तरले लेने से नाम (सिमरन का मौका) नहीं मिलता। (हे जीव ! अगर आप सारी उम्र इतना गाफिल रहा है तो) वह बड़ा दुख (अब) सहता रह (उस बहुत बड़े कष्ट से आपको कोई निकाल नहीं सकता)। 4। हे जीव ! अगर आप अब माया की ममता के ख्यालों में ही पड़ा रहेगा (अगर आप सारी उम्र माया जोड़ने के आहरों में ही रहेगा। तो आखिर) जम की नगरी में जम के जाल में फंसेगा। (उस वक्त) आप मोह के बँधन नहीं तोड़ पाएगा। (तभी तो) तब ही जमराज आपकी बेइज्जती करेगा। 5। (पर। हे प्रभू ! आपकी माया के मुकाबले में मैं बेचारा क्या चीज हूँ। माया के बँधनों से बचने के लिए) ना ही मैं अब कुछ कर रहा हॅूँ। ना ही इससे पहले कुछ कर पाया हूँ। मुझे तो सतिगुरू ने (मेहर करके) आपका आत्मिक जीवन देने वाला नाम बख्शा है। जिसको आप (गुरू के द्वारा अपना अमृत-नाम) देता है उसको कोई और तदबीर करने की आवश्यक्ता ही नहीं रह जाती। हे नानक ! (प्रभू दर पर अरदास कर और कह- हे प्रभू !) मैं आपकी शरण आया हॅूँ। 6। 1। 12।
मारू महला 3 घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जह बैसालहि तह बैसा सुआमी जह भेजहि तह जावा ॥
सभ नगरी महि एको राजा सभे पवितु हहि थावा ॥1॥
बाबा देहि वसा सच गावा ॥
जा ते सहजे सहजि समावा ॥1॥ रहाउ ॥
बुरा भला किछु आपस ते जानिआ एई सगल विकारा ॥
इहु फुरमाइआ खसम का होआ वरतै इहु संसारा ॥2॥
इंद्री धातु सबल कहीअत है इंद्री किस ते होई ॥
आपे खेल करै सभि करता ऐसा बूझै कोई ॥3॥
गुर परसादी एक लिव लागी दुबिधा तदे बिनासी ॥
जो तिसु भाणा सो सति करि मानिआ काटी जम की फासी ॥4॥
भणति नानकु लेखा मागै कवना जा चूका मनि अभिमाना ॥
तासु तासु धरम राइ जपतु है पए सचे की सरना ॥5॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 3 घरु 1 सतिगुर प्रसादि॥ हे प्रभू ! (जब मैं आत्मिक अडोलता में लीन रहूँगा। तब) जहाँ आप मुझे बैठाएगा मैं वहीं बैठा रहूँगा। जहाँ आप मुझे भेजेगा मैं वहीं जाऊँगा (भाव। मैं हर वक्त आपकी रजा में रहूँगा)। हे स्वामी ! सारी सृष्टि में मुझे आप ही एक पातशाह (दिखेगा। आपकी व्यापकता के कारण धरती के) सारी ही जगहें मुझे पवित्र लगेंगी। 1। हे प्रभू ! आप (मुझे ये दान) दे कि मैं आपकी साध-संगति में टिका रहॅूँ। जिसकी बरकति से मैं सदा आत्मिक अडोलता में लीन रहूँ। 1। रहाउ। हे भाई ! अहंकार के कारण मनुष्य किसी को बुरा और किसी को अच्छा समझता है। ये अहंकार ही सारे विकारों का मूल बनती है। (साध-संगति की बरकति से आत्मिक अडोलता में रहने वाले को दिखता है कि) ये भी पति-प्रभू का हुकम ही हो रहा है। ये हुकम ही सारे जगत में बरत रहा है। 2। (हे भाई ! सारी सृष्टि में) ये बात कही जा रही है कि इन्द्रियों की दौड़-भाग बहुत बलवान है; पर (साध-संगति की बरकति से सहज अवस्था में टिका हुआ) कोई विरला मनुष्य ऐसे समझता है कि (काम-वासना आदि वाली) इंद्री भी (परमात्मा के बिना) किसी और से नहीं बनी। (वह यह समझता है कि) सारे करिश्मे करतार स्वयं ही कर रहा है। 3। (हे भाई ! साध-संगति में रह के जब) गुरू की कृपा से एक परमात्मा का प्यार (हृदय में) बन जाता है। तब (मनुष्य के अंदर से) मेर-तेर दूर हो जाती है। जो कुछ परमात्मा को अच्छा लगता है वह मनुष्य उसको ठीक मानता है। और। उसकी आत्मिक मौत वाली फाही काटी जाती है। 4। नानक कहता है- (साध-संगति की बरकति से) जब मनुष्य के मन में (बसता) अहंकार समाप्त हो जाता है तब कोई भी (उससे उसके बुरे कर्मों का) लेखा नहीं माँग सकता (क्योंकि उसके अंदर कोई बुराई रह ही नहीं जाती)। (साध-संगति में रहने वाले व्यक्ति) उस सदा-स्थिर प्रभू की शरण पड़े रहते हैं जिसकी हजूरी में धर्मराज भी कहता रहता है- मैं आपकी शरण हूँ। मैं आपकी शरण हूँ। 5। 1।
मारू महला 3 ॥
आवण जाणा ना थीऐ निज घरि वासा होइ ॥
सचु खजाना बखसिआ आपे जाणै सोइ ॥1॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 3॥ (हे सिमरन का सदका) जनम-मरण (चक्कर) नहीं रहता। अपने असल घर में (प्रभू की हजूरी में) सुरति टिकी रहती है। पर सदा-स्थिर प्रभू का यह नाम-खजाना (उसने स्वयं ही) बख्शा है। वह प्रभू खुद ही जानता है (कि कौन इस दाति के योग्य है)। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रागु मारू महला 1 घरु 5 सतिगुर प्रसादि॥ नाम-अमृत का व्यापारी जीव दिन-रात सचेत रहता है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।