अंग
1016
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਕਲਰ ਖੇਤੀ ਤਰਵਰ ਕੰਠੇ ਬਾਗਾ ਪਹਿਰਹਿ ਕਜਲੁ ਝਰੈ ॥
ਏਹੁ ਸੰਸਾਰੁ ਤਿਸੈ ਕੀ ਕੋਠੀ ਜੋ ਪੈਸੈ ਸੋ ਗਰਬਿ ਜਰੈ ॥੬॥
ਰਯਤਿ ਰਾਜੇ ਕਹਾ ਸਬਾਏ ਦੁਹੁ ਅੰਤਰਿ ਸੋ ਜਾਸੀ ॥
ਕਹਤ ਨਾਨਕੁ ਗੁਰ ਸਚੇ ਕੀ ਪਉੜੀ ਰਹਸੀ ਅਲਖੁ ਨਿਵਾਸੀ ॥੭॥੩॥੧੧॥
ਏਹੁ ਸੰਸਾਰੁ ਤਿਸੈ ਕੀ ਕੋਠੀ ਜੋ ਪੈਸੈ ਸੋ ਗਰਬਿ ਜਰੈ ॥੬॥
ਰਯਤਿ ਰਾਜੇ ਕਹਾ ਸਬਾਏ ਦੁਹੁ ਅੰਤਰਿ ਸੋ ਜਾਸੀ ॥
ਕਹਤ ਨਾਨਕੁ ਗੁਰ ਸਚੇ ਕੀ ਪਉੜੀ ਰਹਸੀ ਅਲਖੁ ਨਿਵਾਸੀ ॥੭॥੩॥੧੧॥
कलर खेती तरवर कंठे बागा पहिरहि कजलु झरै ॥
एहु संसारु तिसै की कोठी जो पैसै सो गरबि जरै ॥६॥
रयति राजे कहा सबाए दुहु अंतरि सो जासी ॥
कहत नानकु गुर सचे की पउड़ी रहसी अलखु निवासी ॥७॥३॥११॥
एहु संसारु तिसै की कोठी जो पैसै सो गरबि जरै ॥६॥
रयति राजे कहा सबाए दुहु अंतरि सो जासी ॥
कहत नानकु गुर सचे की पउड़ी रहसी अलखु निवासी ॥७॥३॥११॥
हिन्दी अर्थ: कलॅर में खेती बीज के फसल की आशा व्यर्थ है। दरिया के किनारे उगे हुए वृक्षों को आसरा बनाना भूल है। जहाँ कालिख़ उड़-उड़ के पड़ती हो वहाँ जो लोग सफेद कपड़े पहनते हैं (और उन पर कालिख़ ना लगने की आस रखते हैं वे भूले हुए हैं। इस तरह) ये जगत तृष्णा की कोठी है इसमें जो फस जाता है (वह निकल नहीं सकता) वह अहंकार में (ग़र्क होता है। उसका आत्मिक जीवन तृष्णा की आग में) जल जाता है। 6। राजे और (राजाओं की) प्रजा -ये सब कहाँ हैं। (सब अपनी-अपनी वारी कूच कर जाते हैं)। इस दुनियां में जो पैदा होता है वह अंत में यहाँ से चला जाता है (पर माया की तृष्णा में फंस के जनम-मरण के चक्कर भी सहता है)। नानक कहता है- जो मनुष्य अभॅुल गुरू की पौड़ी का आसरा लेता है (भाव। जो नाम सिमरता है। और सिमरन की पौड़ी के द्वारा) अलख प्रभू के चरणों में सुरति जोड़े रखता है वह अटॅल आत्मिक जीवन वाला बन जाता है। 7। 3। 11।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੩ ਘਰੁ ੫ ਅਸਟਪਦੀ
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਪ੍ਰੇਮੁ ਮੰਨਿ ਵਸਾਏ ॥
ਸਾਚੈ ਸਬਦਿ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਏ ॥
ਏਹਾ ਵੇਦਨ ਸੋਈ ਜਾਣੈ ਅਵਰੁ ਕਿ ਜਾਣੈ ਕਾਰੀ ਜੀਉ ॥੧॥
ਆਪੇ ਮੇਲੇ ਆਪਿ ਮਿਲਾਏ ॥
ਆਪਣਾ ਪਿਆਰੁ ਆਪੇ ਲਾਏ ॥
ਪ੍ਰੇਮ ਕੀ ਸਾਰ ਸੋਈ ਜਾਣੈ ਜਿਸ ਨੋ ਨਦਰਿ ਤੁਮਾਰੀ ਜੀਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਦਿਬ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਜਾਗੈ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਏ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦਿ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਏ ॥
ਸੋ ਜੋਗੀ ਇਹ ਜੁਗਤਿ ਪਛਾਣੈ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਬੀਚਾਰੀ ਜੀਉ ॥੨॥
ਸੰਜੋਗੀ ਧਨ ਪਿਰ ਮੇਲਾ ਹੋਵੈ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਵਿਚਹੁ ਦੁਰਮਤਿ ਖੋਵੈ ॥
ਰੰਗ ਸਿਉ ਨਿਤ ਰਲੀਆ ਮਾਣੈ ਅਪਣੇ ਕੰਤ ਪਿਆਰੀ ਜੀਉ ॥੩॥
ਸਤਿਗੁਰ ਬਾਝਹੁ ਵੈਦੁ ਨ ਕੋਈ ॥
ਆਪੇ ਆਪਿ ਨਿਰੰਜਨੁ ਸੋਈ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਮਿਲਿਐ ਮਰੈ ਮੰਦਾ ਹੋਵੈ ਗਿਆਨ ਬੀਚਾਰੀ ਜੀਉ ॥੪॥
ਏਹੁ ਸਬਦੁ ਸਾਰੁ ਜਿਸ ਨੋ ਲਾਏ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਭੁਖ ਗਵਾਏ ॥
ਆਪਣ ਲੀਆ ਕਿਛੂ ਨ ਪਾਈਐ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਕਲ ਧਾਰੀ ਜੀਉ ॥੫॥
ਅਗਮ ਨਿਗਮੁ ਸਤਿਗੁਰੂ ਦਿਖਾਇਆ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਅਪਨੈ ਘਰਿ ਆਇਆ ॥
ਅੰਜਨ ਮਾਹਿ ਨਿਰੰਜਨੁ ਜਾਤਾ ਜਿਨ ਕਉ ਨਦਰਿ ਤੁਮਾਰੀ ਜੀਉ ॥੬॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਸੋ ਤਤੁ ਪਾਏ ॥
ਆਪਣਾ ਆਪੁ ਵਿਚਹੁ ਗਵਾਏ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਬਾਝਹੁ ਸਭੁ ਧੰਧੁ ਕਮਾਵੈ ਵੇਖਹੁ ਮਨਿ ਵੀਚਾਰੀ ਜੀਉ ॥੭॥
ਇਕਿ ਭ੍ਰਮਿ ਭੂਲੇ ਫਿਰਹਿ ਅਹੰਕਾਰੀ ॥
ਇਕਨਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਉਮੈ ਮਾਰੀ ॥
ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਰਤੇ ਬੈਰਾਗੀ ਹੋਰਿ ਭਰਮਿ ਭੁਲੇ ਗਾਵਾਰੀ ਜੀਉ ॥੮॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਿਨੀ ਨਾਮੁ ਨ ਪਾਇਆ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਬਿਰਥਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇਆ ॥
ਅਗੈ ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਕੋ ਬੇਲੀ ਨਾਹੀ ਬੂਝੈ ਗੁਰ ਬੀਚਾਰੀ ਜੀਉ ॥੯॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਸਦਾ ਸੁਖਦਾਤਾ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਜੁਗ ਚਾਰੇ ਜਾਤਾ ॥
ਜਿਸੁ ਤੂ ਦੇਵਹਿ ਸੋਈ ਪਾਏ ਨਾਨਕ ਤਤੁ ਬੀਚਾਰੀ ਜੀਉ ॥੧੦॥੧॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਪ੍ਰੇਮੁ ਮੰਨਿ ਵਸਾਏ ॥
ਸਾਚੈ ਸਬਦਿ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਏ ॥
ਏਹਾ ਵੇਦਨ ਸੋਈ ਜਾਣੈ ਅਵਰੁ ਕਿ ਜਾਣੈ ਕਾਰੀ ਜੀਉ ॥੧॥
ਆਪੇ ਮੇਲੇ ਆਪਿ ਮਿਲਾਏ ॥
ਆਪਣਾ ਪਿਆਰੁ ਆਪੇ ਲਾਏ ॥
ਪ੍ਰੇਮ ਕੀ ਸਾਰ ਸੋਈ ਜਾਣੈ ਜਿਸ ਨੋ ਨਦਰਿ ਤੁਮਾਰੀ ਜੀਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਦਿਬ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਜਾਗੈ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਏ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦਿ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਏ ॥
ਸੋ ਜੋਗੀ ਇਹ ਜੁਗਤਿ ਪਛਾਣੈ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਬੀਚਾਰੀ ਜੀਉ ॥੨॥
ਸੰਜੋਗੀ ਧਨ ਪਿਰ ਮੇਲਾ ਹੋਵੈ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਵਿਚਹੁ ਦੁਰਮਤਿ ਖੋਵੈ ॥
ਰੰਗ ਸਿਉ ਨਿਤ ਰਲੀਆ ਮਾਣੈ ਅਪਣੇ ਕੰਤ ਪਿਆਰੀ ਜੀਉ ॥੩॥
ਸਤਿਗੁਰ ਬਾਝਹੁ ਵੈਦੁ ਨ ਕੋਈ ॥
ਆਪੇ ਆਪਿ ਨਿਰੰਜਨੁ ਸੋਈ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਮਿਲਿਐ ਮਰੈ ਮੰਦਾ ਹੋਵੈ ਗਿਆਨ ਬੀਚਾਰੀ ਜੀਉ ॥੪॥
ਏਹੁ ਸਬਦੁ ਸਾਰੁ ਜਿਸ ਨੋ ਲਾਏ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਭੁਖ ਗਵਾਏ ॥
ਆਪਣ ਲੀਆ ਕਿਛੂ ਨ ਪਾਈਐ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਕਲ ਧਾਰੀ ਜੀਉ ॥੫॥
ਅਗਮ ਨਿਗਮੁ ਸਤਿਗੁਰੂ ਦਿਖਾਇਆ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਅਪਨੈ ਘਰਿ ਆਇਆ ॥
ਅੰਜਨ ਮਾਹਿ ਨਿਰੰਜਨੁ ਜਾਤਾ ਜਿਨ ਕਉ ਨਦਰਿ ਤੁਮਾਰੀ ਜੀਉ ॥੬॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਸੋ ਤਤੁ ਪਾਏ ॥
ਆਪਣਾ ਆਪੁ ਵਿਚਹੁ ਗਵਾਏ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਬਾਝਹੁ ਸਭੁ ਧੰਧੁ ਕਮਾਵੈ ਵੇਖਹੁ ਮਨਿ ਵੀਚਾਰੀ ਜੀਉ ॥੭॥
ਇਕਿ ਭ੍ਰਮਿ ਭੂਲੇ ਫਿਰਹਿ ਅਹੰਕਾਰੀ ॥
ਇਕਨਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਉਮੈ ਮਾਰੀ ॥
ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਰਤੇ ਬੈਰਾਗੀ ਹੋਰਿ ਭਰਮਿ ਭੁਲੇ ਗਾਵਾਰੀ ਜੀਉ ॥੮॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਿਨੀ ਨਾਮੁ ਨ ਪਾਇਆ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਬਿਰਥਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇਆ ॥
ਅਗੈ ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਕੋ ਬੇਲੀ ਨਾਹੀ ਬੂਝੈ ਗੁਰ ਬੀਚਾਰੀ ਜੀਉ ॥੯॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਸਦਾ ਸੁਖਦਾਤਾ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਜੁਗ ਚਾਰੇ ਜਾਤਾ ॥
ਜਿਸੁ ਤੂ ਦੇਵਹਿ ਸੋਈ ਪਾਏ ਨਾਨਕ ਤਤੁ ਬੀਚਾਰੀ ਜੀਉ ॥੧੦॥੧॥
मारू महला ३ घरु ५ असटपदी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जिस नो प्रेमु मंनि वसाए ॥
साचै सबदि सहजि सुभाए ॥
एहा वेदन सोई जाणै अवरु कि जाणै कारी जीउ ॥१॥
आपे मेले आपि मिलाए ॥
आपणा पिआरु आपे लाए ॥
प्रेम की सार सोई जाणै जिस नो नदरि तुमारी जीउ ॥१॥ रहाउ ॥
दिब द्रिसटि जागै भरमु चुकाए ॥
गुर परसादि परम पदु पाए ॥
सो जोगी इह जुगति पछाणै गुर कै सबदि बीचारी जीउ ॥२॥
संजोगी धन पिर मेला होवै ॥
गुरमति विचहु दुरमति खोवै ॥
रंग सिउ नित रलीआ माणै अपणे कंत पिआरी जीउ ॥३॥
सतिगुर बाझहु वैदु न कोई ॥
आपे आपि निरंजनु सोई ॥
सतिगुर मिलिऐ मरै मंदा होवै गिआन बीचारी जीउ ॥४॥
एहु सबदु सारु जिस नो लाए ॥
गुरमुखि त्रिसना भुख गवाए ॥
आपण लीआ किछू न पाईऐ करि किरपा कल धारी जीउ ॥५॥
अगम निगमु सतिगुरू दिखाइआ ॥
करि किरपा अपनै घरि आइआ ॥
अंजन माहि निरंजनु जाता जिन कउ नदरि तुमारी जीउ ॥६॥
गुरमुखि होवै सो ततु पाए ॥
आपणा आपु विचहु गवाए ॥
सतिगुर बाझहु सभु धंधु कमावै वेखहु मनि वीचारी जीउ ॥७॥
इकि भ्रमि भूले फिरहि अहंकारी ॥
इकना गुरमुखि हउमै मारी ॥
सचै सबदि रते बैरागी होरि भरमि भुले गावारी जीउ ॥८॥
गुरमुखि जिनी नामु न पाइआ ॥
मनमुखि बिरथा जनमु गवाइआ ॥
अगै विणु नावै को बेली नाही बूझै गुर बीचारी जीउ ॥९॥
अंम्रित नामु सदा सुखदाता ॥
गुरि पूरै जुग चारे जाता ॥
जिसु तू देवहि सोई पाए नानक ततु बीचारी जीउ ॥१०॥१॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जिस नो प्रेमु मंनि वसाए ॥
साचै सबदि सहजि सुभाए ॥
एहा वेदन सोई जाणै अवरु कि जाणै कारी जीउ ॥१॥
आपे मेले आपि मिलाए ॥
आपणा पिआरु आपे लाए ॥
प्रेम की सार सोई जाणै जिस नो नदरि तुमारी जीउ ॥१॥ रहाउ ॥
दिब द्रिसटि जागै भरमु चुकाए ॥
गुर परसादि परम पदु पाए ॥
सो जोगी इह जुगति पछाणै गुर कै सबदि बीचारी जीउ ॥२॥
संजोगी धन पिर मेला होवै ॥
गुरमति विचहु दुरमति खोवै ॥
रंग सिउ नित रलीआ माणै अपणे कंत पिआरी जीउ ॥३॥
सतिगुर बाझहु वैदु न कोई ॥
आपे आपि निरंजनु सोई ॥
सतिगुर मिलिऐ मरै मंदा होवै गिआन बीचारी जीउ ॥४॥
एहु सबदु सारु जिस नो लाए ॥
गुरमुखि त्रिसना भुख गवाए ॥
आपण लीआ किछू न पाईऐ करि किरपा कल धारी जीउ ॥५॥
अगम निगमु सतिगुरू दिखाइआ ॥
करि किरपा अपनै घरि आइआ ॥
अंजन माहि निरंजनु जाता जिन कउ नदरि तुमारी जीउ ॥६॥
गुरमुखि होवै सो ततु पाए ॥
आपणा आपु विचहु गवाए ॥
सतिगुर बाझहु सभु धंधु कमावै वेखहु मनि वीचारी जीउ ॥७॥
इकि भ्रमि भूले फिरहि अहंकारी ॥
इकना गुरमुखि हउमै मारी ॥
सचै सबदि रते बैरागी होरि भरमि भुले गावारी जीउ ॥८॥
गुरमुखि जिनी नामु न पाइआ ॥
मनमुखि बिरथा जनमु गवाइआ ॥
अगै विणु नावै को बेली नाही बूझै गुर बीचारी जीउ ॥९॥
अंम्रित नामु सदा सुखदाता ॥
गुरि पूरै जुग चारे जाता ॥
जिसु तू देवहि सोई पाए नानक ततु बीचारी जीउ ॥१०॥१॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला ३ घरु ५ असटपदी ੴ सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! (परमात्मा) जिस मनुष्य के मन में (अपना) प्यार बसाता है। वह मनुष्य प्रभू की सदा-स्थिर सिफत-सालाह की बाणी में (जुड़ा रहता है)। आत्मिक अडोलता में (टिका रहता है) प्रभू प्यार में (लीन रहता है)। (प्रेम की चुभन का यही एक इलाज है)। वही मनुष्य इस वेदना को समझता है। कोई और मनुष्य (जिसके अंदर ये चुभन ये वेदना नहीं। इस पीड़ा का) इलाज नहीं जानता। 1। हे भाई ! परमात्मा स्वयं (जीव को अपने चरणों के साथ) जोड़ता है। स्वयं ही मिलाता है। (जीव के हृदय में) अपना प्यार परमात्मा स्वयं ही पैदा करता है। हे प्रभू ! (तेरे) प्यार की कद्र (भी) वही जीव जान सकता है। जिस पर तेरी मेहर की निगाह होती है। 1। रहाउ। (हे भाई ! जिस मनुष्य के मन में प्रभू अपना प्यार बसाता है उसके अंदर) आत्मिक जीवन का प्रकाश देने वाली निगाह जाग उठती है (और वह निगाह उसकी) भटकना दूर कर देती है। गुरू की कृपा से (वह मनुष्य) सबसे ऊँचा आत्मिक जीवन का दर्जा प्राप्त कर लेता है। (जो मनुष्य) इस जुगति को समझ लेता है वह (सही अर्थों में) जोगी है; गुरू के शबद की बरकति से वह ऊँचे जीवन की सूझ वाला हो जाता है। 2। हे भाई ! अच्छे भाग्यों से जिस जीव स्त्री का प्रभू-पति के साथ मिलाप हो जाता है। वह गुरू की मति पर चल कर अपने अंदर से खोटी मति नाश कर देती है। वह प्रेम के सदका प्रभू-पति के साथ आत्मिक मिलाप का आनंद भोगती है। वह अपने प्रभू-पति की लाडली बन जाती है। 3। हे भाई ! (प्रेम की वेदना का इलाज करने वाला) हकीम गुरू के बिना और कोई नहीं है (जिसका इलाज गुरू कर देता है उसको यह दिखाई दे जाता है कि) वह निर्लिप परमात्मा स्वयं ही स्वयं (हर जगह मौजूद है)। हे भाई ! अगर गुरू मिल जाए तो (मनुष्य के अंदर से) बुराई मिट जाती है। मनुष्य ऊँचे आत्मिक जीवन की विचार करने के योग्य हो जाता है। 4। हे भाई ! गुरू का यह श्रेष्ठ शबद जिसके हृदय में परमात्मा बसा देता है। (उसको) गुरू की शरण में डाल कर (उसके अंदर से) माया की तृष्णा माया की भूख दूर कर देता है। हे भाई ! अपनी बुद्धि के बल पर (आत्मिक जीवन का) कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता। परमात्मा स्वयं ही मेहर करके यह सक्ता (मनुष्य के अंदर) डालता है। 5। (हे जोगी ! यह निश्चय कि ‘आपण…धारी जीउ’ – यही है हमारे वास्ते ‘अगम निगमु’) प्रभू ने कृपा करके गुरू के द्वारा (जिस मनुष्य को यह) ‘अगम निगमु’ दिखा दिया। वह मनुष्य अपने असल घर में आ टिकता है। हे प्रभू ! जिन पर तेरी मेहर की निगाह होती है। वह मनुष्य इस माया के पसारे में तुझ निर्लिप को बसता हुआ पहचान लेते हैं। 6। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के सन्मुख होता है। वह (यह) अस्लियत पा लेता है। वह मनुष्य अपने अंदर से स्वै भाव दूर कर देता है। हे भाई ! अपने मन में विचार कर के देख ले कि गुरू की शरण पड़े बिना हरेक जीव माया के मोह में फसने वाली दौड़-भाग ही कर रहा है। 7। हे भाई ! कई ऐसे हैं जो भुलेखे में पड़ कर गलत रास्ते पर पड़े हुए (अपने इस गलत त्याग पर ही) मान करते फिरते हैं। कई ऐसे हैं जिन्होंने गुरू की शरण पड़ कर (अपने अंदर से) अहंकार को दूर कर लिया है। हे भाई ! असल बैरागी वह हैं जो सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह की बाणी में रंगे हुए हैं। बाकी मूर्ख (अपने त्याग के) भुलेखे में गलत रास्ते पर पड़े हुए हैं। 8। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा का नाम प्राप्त नहीं किया। उन मन के मुरीदों ने अपनी जिंदगी व्यर्थ गवा ली है। हे भाई ! परलोक में परमात्मा के नाम के बिना और कोई मददगार नहीं। पर इस बात को गुरू के शबद के विचार के द्वारा ही (कोई विरला मनुष्य) समझता है। 9। हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) तेरा आत्मिक जीवन देने वाला नाम सदा आनंद देने वाला है। सदा से पूरे गुरू के द्वारा ही (तेरे इस नाम से) सांझ पड़ती आ रही है। हे प्रभू ! वही मनुष्य तेरा नाम प्राप्त करता है जिसको तू स्वयं (ये दाति) देता है। वही मनुष्य असल जीवन-भेद को समझने-योग्य होता है। 10। 1।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1016 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
Karol Bagh की shopping street की भीड़, और घर लौटते वक़्त की थकान।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 39 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1016” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1017 →, पीछे का: ← अंग 1015।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।