अंग 1044

अंग
1044
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਆਪੇ ਮੇਲੇ ਦੇ ਵਡਿਆਈ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਕੀਮਤਿ ਪਾਈ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਬਹੁਤੁ ਫਿਰੈ ਬਿਲਲਾਦੀ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਖੁਆਈ ਹੇ ॥੩॥
ਹਉਮੈ ਮਾਇਆ ਵਿਚੇ ਪਾਈ ॥
ਮਨਮੁਖ ਭੂਲੇ ਪਤਿ ਗਵਾਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਸੋ ਨਾਇ ਰਾਚੈ ਸਾਚੈ ਰਹਿਆ ਸਮਾਈ ਹੇ ॥੪॥
ਗੁਰ ਤੇ ਗਿਆਨੁ ਨਾਮ ਰਤਨੁ ਪਾਇਆ ॥
ਮਨਸਾ ਮਾਰਿ ਮਨ ਮਾਹਿ ਸਮਾਇਆ ॥
ਆਪੇ ਖੇਲ ਕਰੇ ਸਭਿ ਕਰਤਾ ਆਪੇ ਦੇਇ ਬੁਝਾਈ ਹੇ ॥੫॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੇ ਆਪੁ ਗਵਾਏ ॥
ਮਿਲਿ ਪ੍ਰੀਤਮ ਸਬਦਿ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ॥
ਅੰਤਰਿ ਪਿਆਰੁ ਭਗਤੀ ਰਾਤਾ ਸਹਜਿ ਮਤੇ ਬਣਿ ਆਈ ਹੇ ॥੬॥
ਦੂਖ ਨਿਵਾਰਣੁ ਗੁਰ ਤੇ ਜਾਤਾ ॥
ਆਪਿ ਮਿਲਿਆ ਜਗਜੀਵਨੁ ਦਾਤਾ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਲਾਏ ਸੋਈ ਬੂਝੈ ਭਉ ਭਰਮੁ ਸਰੀਰਹੁ ਜਾਈ ਹੇ ॥੭॥
ਆਪੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਪੇ ਦੇਵੈ ॥
ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੈ ॥
ਜਰਾ ਜਮੁ ਤਿਸੁ ਜੋਹਿ ਨ ਸਾਕੈ ਸਾਚੇ ਸਿਉ ਬਣਿ ਆਈ ਹੇ ॥੮॥
ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਅਗਨਿ ਜਲੈ ਸੰਸਾਰਾ ॥
ਜਲਿ ਜਲਿ ਖਪੈ ਬਹੁਤੁ ਵਿਕਾਰਾ ॥
ਮਨਮੁਖੁ ਠਉਰ ਨ ਪਾਏ ਕਬਹੂ ਸਤਿਗੁਰ ਬੂਝ ਬੁਝਾਈ ਹੇ ॥੯॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਨਿ ਸੇ ਵਡਭਾਗੀ ॥
ਸਾਚੈ ਨਾਮਿ ਸਦਾ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ॥
ਅੰਤਰਿ ਨਾਮੁ ਰਵਿਆ ਨਿਹਕੇਵਲੁ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਸਬਦਿ ਬੁਝਾਈ ਹੇ ॥੧੦॥
ਸਚਾ ਸਬਦੁ ਸਚੀ ਹੈ ਬਾਣੀ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਿਰਲੈ ਕਿਨੈ ਪਛਾਣੀ ॥
ਸਚੇ ਸਬਦਿ ਰਤੇ ਬੈਰਾਗੀ ਆਵਣੁ ਜਾਣੁ ਰਹਾਈ ਹੇ ॥੧੧॥
ਸਬਦੁ ਬੁਝੈ ਸੋ ਮੈਲੁ ਚੁਕਾਏ ॥
ਨਿਰਮਲ ਨਾਮੁ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਏ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਅਪਣਾ ਸਦ ਹੀ ਸੇਵਹਿ ਹਉਮੈ ਵਿਚਹੁ ਜਾਈ ਹੇ ॥੧੨॥
ਗੁਰ ਤੇ ਬੂਝੈ ਤਾ ਦਰੁ ਸੂਝੈ ॥
ਨਾਮ ਵਿਹੂਣਾ ਕਥਿ ਕਥਿ ਲੂਝੈ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵੇ ਕੀ ਵਡਿਆਈ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਭੂਖ ਗਵਾਈ ਹੇ ॥੧੩॥
ਆਪੇ ਆਪਿ ਮਿਲੈ ਤਾ ਬੂਝੈ ॥
ਗਿਆਨ ਵਿਹੂਣਾ ਕਿਛੂ ਨ ਸੂਝੈ ॥
ਗੁਰ ਕੀ ਦਾਤਿ ਸਦਾ ਮਨ ਅੰਤਰਿ ਬਾਣੀ ਸਬਦਿ ਵਜਾਈ ਹੇ ॥੧੪॥
ਜੋ ਧੁਰਿ ਲਿਖਿਆ ਸੁ ਕਰਮ ਕਮਾਇਆ ॥
ਕੋਇ ਨ ਮੇਟੈ ਧੁਰਿ ਫੁਰਮਾਇਆ ॥
ਸਤਸੰਗਤਿ ਮਹਿ ਤਿਨ ਹੀ ਵਾਸਾ ਜਿਨ ਕਉ ਧੁਰਿ ਲਿਖਿ ਪਾਈ ਹੇ ॥੧੫॥
ਅਪਣੀ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਸੋ ਪਾਏ ॥
ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਤਾੜੀ ਚਿਤੁ ਲਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸੁ ਕਹੈ ਬੇਨੰਤੀ ਭੀਖਿਆ ਨਾਮੁ ਦਰਿ ਪਾਈ ਹੇ ॥੧੬॥੧॥
आपे मेले दे वडिआई ॥
गुर परसादी कीमति पाई ॥
मनमुखि बहुतु फिरै बिललादी दूजै भाइ खुआई हे ॥३॥
हउमै माइआ विचे पाई ॥
मनमुख भूले पति गवाई ॥
गुरमुखि होवै सो नाइ राचै साचै रहिआ समाई हे ॥४॥
गुर ते गिआनु नाम रतनु पाइआ ॥
मनसा मारि मन माहि समाइआ ॥
आपे खेल करे सभि करता आपे देइ बुझाई हे ॥५॥
सतिगुरु सेवे आपु गवाए ॥
मिलि प्रीतम सबदि सुखु पाए ॥
अंतरि पिआरु भगती राता सहजि मते बणि आई हे ॥६॥
दूख निवारणु गुर ते जाता ॥
आपि मिलिआ जगजीवनु दाता ॥
जिस नो लाए सोई बूझै भउ भरमु सरीरहु जाई हे ॥७॥
आपे गुरमुखि आपे देवै ॥
सचै सबदि सतिगुरु सेवै ॥
जरा जमु तिसु जोहि न साकै साचे सिउ बणि आई हे ॥८॥
त्रिसना अगनि जलै संसारा ॥
जलि जलि खपै बहुतु विकारा ॥
मनमुखु ठउर न पाए कबहू सतिगुर बूझ बुझाई हे ॥९॥
सतिगुरु सेवनि से वडभागी ॥
साचै नामि सदा लिव लागी ॥
अंतरि नामु रविआ निहकेवलु त्रिसना सबदि बुझाई हे ॥१०॥
सचा सबदु सची है बाणी ॥
गुरमुखि विरलै किनै पछाणी ॥
सचे सबदि रते बैरागी आवणु जाणु रहाई हे ॥११॥
सबदु बुझै सो मैलु चुकाए ॥
निरमल नामु वसै मनि आए ॥
सतिगुरु अपणा सद ही सेवहि हउमै विचहु जाई हे ॥१२॥
गुर ते बूझै ता दरु सूझै ॥
नाम विहूणा कथि कथि लूझै ॥
सतिगुर सेवे की वडिआई त्रिसना भूख गवाई हे ॥१३॥
आपे आपि मिलै ता बूझै ॥
गिआन विहूणा किछू न सूझै ॥
गुर की दाति सदा मन अंतरि बाणी सबदि वजाई हे ॥१४॥
जो धुरि लिखिआ सु करम कमाइआ ॥
कोइ न मेटै धुरि फुरमाइआ ॥
सतसंगति महि तिन ही वासा जिन कउ धुरि लिखि पाई हे ॥१५॥
अपणी नदरि करे सो पाए ॥
सचै सबदि ताड़ी चितु लाए ॥
नानक दासु कहै बेनंती भीखिआ नामु दरि पाई हे ॥१६॥१॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! प्रभू स्वयं ही (मनुष्य को गुरू से) मिलाता है और इज्जत बख्शता है। गुरू की कृपा से (वह मनुष्य इस मानस जनम की) कद्र समझता है। मन की मुरीद दुनिया माया के प्यार के कारण (सही जीवन-राह से) टूटी हुई बहुत विलकती फिरती है। 3। हे भाई ! (यह सृष्टि पैदा करके प्रभू ने स्वयं ही) इसके बीच में ही अहंकार और माया पैदा कर दी है। मन के पीछे चलने वाली दुनिया ने (अहंकार माया के कारण) गलत रास्ते पर पड़ के अपनी इज्जत गवा ली है। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है। वह परमात्मा के नाम में मस्त रहता है (और नाम की बरकति से वह) सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा में लीन रहता है। 4। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू से आत्मिक जीवन की सूझ और परमात्मा का कीमती नाम हासिल कर लेता है। वह अपने मन के फुरने को मार के अंतरात्मे ही लीन रहता है। उसको परमात्मा स्वयं ही यह समझ बख्श देता है कि सारे खेल परमात्मा स्वयं ही कर रहा है। 5। हे भाई ! जो मनुष्य स्वै भाव दूर करके गुरू की शरण पड़ता है। वह मनुष्य प्रीतम प्रभू को मिल के गुरू के शबद द्वारा आत्मिक आनंद लेता है। उसके अंदर परमात्मा का प्यार बना रहता है। वह मनुष्य परमात्मा की भक्ति में रंगा रहता है। आत्मिक अडोलता वाली बुद्धि के कारण प्रभू के साथ उसकी प्रतीति बनी रहती है। 6। हे भाई ! गुरू के द्वारा जिस मनुष्य ने दुखों के नाश करने वाले प्रभू के साथ गहरी सांझ डाल ली। सब दातें देने वाला और जगत का आसरा प्रभू स्वयं उसको आ मिला। वही मनुष्य आत्मिक जीवन की सूझ प्राप्त करता है। जिसको प्रभू स्वयं भक्ति में जोड़ता है। उस मनुष्य के अंदर से हरेक किस्म का डर हरेक भ्रम दूर हो जाता है। 7। हे भाई ! जिस मनुष्य को प्रभू स्वयं ही गुरू के सन्मुख रखता है जिस को स्वयं ही भक्ति की दाति देता है। वह मनुष्य गुरू की शरण पड़ा रहता है। वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह के शबद में जुड़ा रहता है। सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के साथ उसकी ऐसी प्रीति बन जाती है कि उस प्रीति को ना बुढ़ापा और ना ही आत्मिक मौत देख सकते हैं (भाव। ना वह प्रीति कभी कमजोर होती है और ना ही वहाँ विकारों को आने का मौका मिलता है)। 8। हे भाई ! जगत माया की तृष्णा की आग में जल रहा है। विकारों में जल-जल के बहुत दुखी हो रहा है। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (इस आग से बचाव का) रास्ता कभी भी नहीं पा सकता। (वही मनुष्य बचाव का राह पाता है जिसको) गुरू आत्मिक जीवन की सूझ देता है। 9। हे भाई ! वह मनुष्य बहुत भाग्यशाली हैं। जो गुरू की शरण पड़ते हैं। सदा-स्थिर प्रभू के नाम में उनकी सुरति सदा जुड़ी रहती है। उनके अंदर परमात्मा का पवित्र करने वाला नाम सदा टिका रहता है। गुरू के शबद से (उन्होंने अपने अंदर से) तृष्णा (की आग) बुझा ली होती है। 10। सदा-स्थिर पदार्थ गुरू-शबद ही है। सदा-स्थिर वस्तु सिफत-सालाह की बाणी ही है। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले किसी विरले मनुष्य ने ये बात समझ ली है जो मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह की बाणी में रंगे रहते हैं। वे माया से उपराम रहते हैं। उनका पैदा होना मरना (चक्कर) समाप्त हो जाता है। 11। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के शबद को समझ लेता है (भाव। अपनी बुद्धि का हिस्सा बना लेता है) वह (अपने अंदर विकारों की) मैल दूर कर लेता है। परमात्मा का पवित्र नाम उसके मन में आ बसता है। जो मनुष्य सदा अपने गुरू की शरण पड़े रहते हैं। उनके अंदर से अहंकार दूर हो जाता है। 12। हे भाई ! जब मनुष्य गुरू से (सही जीवन राह का उपदेश) समझ लेता है। तब उसको परमात्मा का दर दिखाई देता है (भाव। यह दिखाई दे जाता है कि हरी-नाम ही प्रभू-मिलाप का वसीला है उपाय है)। पर जो मनुष्य नाम से टूटा हुआ है वह (औरों को) व्याख्यान कर कर के (स्वयं अंदर से तृष्णा की आग में) जलता रहता है। हे भाई ! गुरू के शरण पड़ने की बरकति यह है कि मनुष्य (अपने अंदर से माया की) तृष्णा (माया की) भूख दूर कर लेता है। 13। पर। हे भाई ! (जीवों के भी क्या वश। ) परमात्मा स्वयं ही जीव को मिल जाए। तब ही वह (सही जीवन-राह को) समझता है। आत्मिक जीवन की सूझ के बिना मनुष्य को (माया की तृष्णा की भूख के बिना और) कुछ नहीं सूझता। हे भाई ! जिस मनुष्य के मन में गुरू की बख्शी (आत्मिक जीवन की सूझ की) दाति सदा बसती है। वह मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ के परमात्मा की सिफत-सालाह का प्रभाव अपने अंदर बनाए रखता है (जैसे बज रहे बाजों के कारण कोई और छोटी मोटी आवाज नहीं सुनती)। 14। (हे भाई ! सारी खेल परमात्मा की रज़ा में हो रही है) धुर दरगाह से (रज़ा के अनुसार जीव के माथे पर जो लेख) लिखे जाते हैं। वही कर्म जीव कमाता रहता है। धुर से हुए हुकम को कोई जीव मिटा नहीं सकता। हे भाई ! साध-संगति में उन मनुष्यों को ही बैठने का अवसर मिलता है। जिनके माथे पर धुर से लिख के यह बख्शिश सौंपी जाती है। 15। हे भाई ! (साध-संगति में टिकने की दाति) वह मनुष्य हासिल करता है। जिस पर परमात्मा अपनी मेहर की निगाह करता है। वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह की बाणी में अपना मन जोड़ता है- यही है (उसकी जोगियों वाली) समाधि। हे भाई ! (प्रभू का) दास नानक विनती करता है (कि वह मनुष्य प्रभू के) दर पर (हाजिर रह के) प्रभू के नाम की भिक्षा प्राप्त कर लेता है। 16। 1।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਏਕੋ ਏਕੁ ਵਰਤੈ ਸਭੁ ਸੋਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਿਰਲਾ ਬੂਝੈ ਕੋਈ ॥
ਏਕੋ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਸਭ ਅੰਤਰਿ ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ਹੇ ॥੧॥
ਲਖ ਚਉਰਾਸੀਹ ਜੀਅ ਉਪਾਏ ॥
मारू महला ३ ॥
एको एकु वरतै सभु सोई ॥
गुरमुखि विरला बूझै कोई ॥
एको रवि रहिआ सभ अंतरि तिसु बिनु अवरु न कोई हे ॥१॥
लख चउरासीह जीअ उपाए ॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला ३॥ हे भाई ! सिर्फ एक वह परमात्मा ही हर जगह मौजूद है। गुरू के सन्मुख रहने वाला कोई विरला मनुष्य (इस भेद को) समझता है कि सब जीवों के अंदर एक परमात्मा ही व्यापक है। उस (परमात्मा) के बिना और कोई दूसरा नहीं। 1। हे भाई ! (उस परमात्मा ने ही) चौरासी लाख जूनियों के जीव पैदा किए हैं।

संदर्भ: यह अंग 1044 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।

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ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 47 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1044” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1045 →, पीछे का: ← अंग 1043

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।