मारू महला 1 ॥ मुल खरीदी लाला गोला मेरा नाउ सभागा ॥ गुर की बचनी हाटि बिकाना जितु लाइआ तितु लागा ॥1॥ तेरे लाले किआ चतुराई ॥ साहिब का हुकमु न करणा जाई ॥1॥ रहाउ ॥ मा लाली पिउ लाला मेरा हउ लाले का जाइआ ॥ लाली नाचै लाला गावै भगति करउ तेरी राइआ ॥2॥ पीअहि त पाणी आणी मीरा खाहि त पीसण जाउ ॥ पखा फेरी पैर मलोवा जपत रहा तेरा नाउ ॥3॥ लूण हरामी नानकु लाला बखसिहि तुधु वडिआई ॥ आदि जुगादि दइआपति दाता तुधु विणु मुकति न पाई ॥4॥6॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ (हे प्रभू !) जब से गुरू ने मुझे मेरा प्रेम दे के उसके बदले में मेरा स्वैभाव खरीद लिया है। मैं आपका दास हैं गया हूँ। मैं आपका गुलाम हैं गया हूँ। मुझे दुनिया ही भाग्यशाली कहने लग पड़ी है। गुरू के दर पर गुरू के उपदेश के बदले मैंने स्वैभाव दे दिया है (अर्थात अहंकार त्याग दिया है)। अब जिस काम में मुझे गुरू लगाता है उसी काम में मैं लगा रहता हूँ। 1। (पर। हे प्रभू !) मुझे आपके गुलाम को अभी पूरी समझ नहीं। मुझसे। हे साहिब ! आपका हुकम पूरे तौर पर सिरे नहीं चढ़ता (मति तो ऐसी होनी चाहिए थी कि सेवा हुकम से ज्यादा की जाए; पर ज्यादा करना तो कहीं रहा। पूरी भी निभाई नहीं जाती)। 1। रहाउ। (गुरू की मेहर से) आपके हुकम में चलने वाली (मेरी मति बनी उस मति-) माँ (ने मुझे सेवक-जीवन वाला जन्म दिया)। (आपका बख्शा हुआ संतोष) मेरा पिता बना। मुझे (मेरे सेवक-स्वभाव को) संतोष-पिता से जनम मिला। अब। हे प्रभू ! ज्यों-ज्यों मैं आपकी भक्ति करता हॅूँ मेरा माँ (-मति) प्रसन्नता भरे हिलोरे में आती है। मेरा पिता (-संतोष) भी खुशियों भरी छलांगे लगाता है। 2। (हे प्रभू ! मुझे तो समझ नहीं कि मैं किस तरह आपका हुकम पूरी तरह कमा सकूँ। पर अगर आप मेहर करे तो) हे पातशाह ! मैं आपके (लोगों) के लिए खाने के लिए चक्की पीसूँ। पंखा फेरूँ। आपके (बंदों के) पैर दबाऊँ। और सदा आपका नाम जपता रहूँ। 3। (पर हे दया के मालिक प्रभू !) आपका गुलाम नानक आपकी उतनी खिदमत नहीं कर सकता। जितनी आप बख्शिशें कर रहा है (आपका गुलाम) आपकी बख्शिशों के मोह में ही फस जाता है। खिदमत करवाने के लिए भी यदि आप स्वयं ही मेहर करे (तब मैं खिदमत कर सकूँगा। इस में भी) आपकी ही जै-जैकार होगी। आप शुरू से ही युगों के आरम्भ से ही दया का मालिक है दातें देता आया है (इन दातों के मोह से) खलासी आपकी सहायता के बिना नहीं हैं सकती। 4। 6।
मारू महला 1 ॥ कोई आखै भूतना को कहै बेताला ॥ कोई आखै आदमी नानकु वेचारा ॥1॥ भइआ दिवाना साह का नानकु बउराना ॥ हउ हरि बिनु अवरु न जाना ॥1॥ रहाउ ॥ तउ देवाना जाणीऐ जा भै देवाना होइ ॥ एकी साहिब बाहरा दूजा अवरु न जाणै कोइ ॥2॥ तउ देवाना जाणीऐ जा एका कार कमाइ ॥ हुकमु पछाणै खसम का दूजी अवर सिआणप काइ ॥3॥ तउ देवाना जाणीऐ जा साहिब धरे पिआरु ॥ मंदा जाणै आप कउ अवरु भला संसारु ॥4॥7॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ (दुनिया के लोगों के साथ गहरी सांझ ना डाल सकने के कारण) कोई कहता है कि नानक तो कोई भूत है (क्योंकि ये लोगों से दूर रहता है) कोई कहता है कि नानक कोई जिन्न है (जो लोगों से परे परे जूह-उजाड़ में बहुत ज्यादा समय टिका रहता है)। पर कोई बंदा कहता है (नहीं) नानक है तो (हमारे जैसा) आदमी (ही) वैसे है निमाणा सा। 1। मैं शाह-प्रभू के नाम का आशिक हो गया हूँ। मैं परमात्मा के बिना किसी और से गहरी सांझ नहीं डाल पाता। 1। रहाउ। जब मनुष्य एक परमात्मा के बिना किसी और को नहीं पहचानता (किसी और की खुशामद मुथाजगी नहीं करता) जब वह दुनिया के डरों-फिक्रों से बेपरवाह हो जाता है। तब (दुनिया के लोगों की नजरों में) वह झल्ला समझा जाता है। 2। जब मनुष्य परमात्मा की रजा को समझने लग जाता है (रजा के उलट चलने के लिए अपनी) किसी और चतुराई का आसरा नहीं लेता। जब मनुष्य सिर्फ (रजा में राजी रहने का ही) कर्म करता है। (हरेक किरत-कार में प्रभू की रजा को ही मुख्य मानता है) तब लोगों की नजरों से वह झल्ला माना जाता है। 3। जब मनुष्य मालिक-प्रभू का प्यार ही (अपने हृदय में) टिकाए रखता है। तब वह (दुनिया की निगाहों में) झल्ला बना रहता है। जब मनुष्य अपने आप को (और सबसे) कमजोर (निम्न) समझता है। जब और जगत को अपने आप से अच्छा समझता है।4। 7।
मारू महला 1 ॥ इहु धनु सरब रहिआ भरपूरि ॥ मनमुख फिरहि सि जाणहि दूरि ॥1॥ सो धनु वखरु नामु रिदै हमारै ॥ जिसु तू देहि तिसै निसतारै ॥1॥ रहाउ ॥ न इहु धनु जलै न तसकरु लै जाइ ॥ न इहु धनु डूबै न इसु धन कउ मिलै सजाइ ॥2॥ इसु धन की देखहु वडिआई ॥ सहजे माते अनदिनु जाई ॥3॥ इक बात अनूप सुनहु नर भाई ॥ इसु धन बिनु कहहु किनै परम गति पाई ॥4॥ भणति नानकु अकथ की कथा सुणाए ॥ सतिगुरु मिलै त इहु धनु पाए ॥5॥8॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ (परमात्मा हर जगह ज़ॅरे-ज़ॅरे में व्यापक है विद्यमान है। उसका) ये नाम-धन (भी) सब में मौजूद है। (गुरू की शरण पड़ने से उस परमात्मा को हर जगह ही देखा जा सकता है और उसकी याद को हृदय में बसा सकते हैं)। पर अपने मन के पीछे चलने वाले लोग (परमात्मा को। परमात्मा के नाम-धन को) कहीं दूर-दराज़ जगह पर समझते हैं। 1। हे प्रभू ! जिस मनुष्य को आप अपना नाम-धन नाम-वाणज्य देता है उसको ये नाम-धन (माया की तृष्णा के समुंद्र से) पार लंघा लेता है। (मेहर कर) आपका ये नाम-धन ये नाम-वाणज्य मेरे हृदय में भी बस जाए। 1। रहाउ। (हृदय में बसाया हुआ परमात्मा का नाम) एक ऐसा धन है जो ना जलता है ना ही इसको कोई चोर चुरा के ले जा सकता है। यह धन (पानियों-बाढ़ों में भी) डूबता नहीं और ना ही इस धन की खातिर किसी को कोई दण्ड मिलता है। 2। देखिए। इस धन का बड़ा गुण यह है कि (जिस मनुष्य के पास यह धन है। उसकी जिंदगी का) हरेक दिन अडोल अवस्था में मस्त रह कर ही गुजरता है। 3। हे भाई जनो ! (इस नाम-धन की बाबत) एक और सुंदर बात (भी) सुनो (वह यह है कि) इस धन (की प्राप्ति) के बिना कभी किसी को ऊँची आत्मिक अवस्था नहीं मिली। 4। नानक कहता है- वह मनुष्य तब (औरों को) उस परमात्मा की सिफत-सालाहों वाली बातें सुनाता है जिसके गुण किसी पक्ष से भी बयान नहीं किए जा सकते। जब (किसी मनुष्य को) गुरू मिल जाता है तब वह ये नाम-धन हासिल कर लेता है 5। 8।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ (हे जोगी !) आप तामसी स्वभाव को दूर कर (ये है दाहिनी नासिका के रास्ते प्राण उतारने)। शांति स्वभाव को (अपने अंदर) तगड़ा कर (ये है बाई नासिका के रास्ते प्राण चढ़ाने)। सांस-सांस में नाम जपने वाला जिंदगी का सही ढंग बना (ये है असल में प्राणों को सुखमना नाड़ी में टिकाना)। (बस। हे जोगी ! परमात्मा के चरणों में जुड़ने का कोई) ऐसा मेल मिलाओ। इस तरीके से मछली जैसा चंचल मन वश में रख सकते हैं। मन विकारों की तरफ नहीं दौड़ता। ना ही शरीर विकारों में पड़ कर दुखी होता है। 1। (हे जोगी !) आप जगत की माया से वैराग हैं के ऊँचे से ऊँचे आत्मिक आनंद के मालिक परमात्मा को अभी तक पहचान नहीं सका। हे मूर्ख ! आप (प्राणायाम के) भुलेखे में पड़ के क्यों (जीवन के अस्लियत से) अलग राह पर जा रहा है। 1। रहाउ। (हे जोगी !) जरा-रहित प्रभू से मिलाप के राह में रुकावट डालने वाले मोह को (अपने अंदर से) जला दे। मौत-रहित हरी के मिलाप के रास्ते में विघन डालने वाले मन को वश में कर रख। भटकना छोड़ दे। तब ही आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस पीया जा सकता है। इसी प्रकार मछली जैसा चंचल मन काबू में रखा जा सकता है। मन विकारों की तरफ दौड़ने से हट जाता है। शरीर भी विकारों में पड़ कर दुखी होने से बच जाता है। 2।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “मारू महला 1॥ (हे प्रभू !) जब से गुरू ने मुझे मेरा प्रेम दे के उसके बदले में मेरा स्वैभाव खरीद लिया है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।