अंग
1025
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਨਾਵਹੁ ਭੁਲੀ ਚੋਟਾ ਖਾਏ ॥
ਬਹੁਤੁ ਸਿਆਣਪ ਭਰਮੁ ਨ ਜਾਏ ॥
ਪਚਿ ਪਚਿ ਮੁਏ ਅਚੇਤ ਨ ਚੇਤਹਿ ਅਜਗਰਿ ਭਾਰਿ ਲਦਾਈ ਹੇ ॥੮॥
ਬਿਨੁ ਬਾਦ ਬਿਰੋਧਹਿ ਕੋਈ ਨਾਹੀ ॥
ਮੈ ਦੇਖਾਲਿਹੁ ਤਿਸੁ ਸਾਲਾਹੀ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਅਰਪਿ ਮਿਲੈ ਜਗਜੀਵਨੁ ਹਰਿ ਸਿਉ ਬਣਤ ਬਣਾਈ ਹੇ ॥੯॥
ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਗਤਿ ਮਿਤਿ ਕੋਇ ਨ ਪਾਵੈ ॥
ਜੇ ਕੋ ਵਡਾ ਕਹਾਇ ਵਡਾਈ ਖਾਵੈ ॥
ਸਾਚੇ ਸਾਹਿਬ ਤੋਟਿ ਨ ਦਾਤੀ ਸਗਲੀ ਤਿਨਹਿ ਉਪਾਈ ਹੇ ॥੧੦॥
ਵਡੀ ਵਡਿਆਈ ਵੇਪਰਵਾਹੇ ॥
ਆਪਿ ਉਪਾਏ ਦਾਨੁ ਸਮਾਹੇ ॥
ਆਪਿ ਦਇਆਲੁ ਦੂਰਿ ਨਹੀ ਦਾਤਾ ਮਿਲਿਆ ਸਹਜਿ ਰਜਾਈ ਹੇ ॥੧੧॥
ਇਕਿ ਸੋਗੀ ਇਕਿ ਰੋਗਿ ਵਿਆਪੇ ॥
ਜੋ ਕਿਛੁ ਕਰੇ ਸੁ ਆਪੇ ਆਪੇ ॥
ਭਗਤਿ ਭਾਉ ਗੁਰ ਕੀ ਮਤਿ ਪੂਰੀ ਅਨਹਦਿ ਸਬਦਿ ਲਖਾਈ ਹੇ ॥੧੨॥
ਇਕਿ ਨਾਗੇ ਭੂਖੇ ਭਵਹਿ ਭਵਾਏ ॥
ਇਕਿ ਹਠੁ ਕਰਿ ਮਰਹਿ ਨ ਕੀਮਤਿ ਪਾਏ ॥
ਗਤਿ ਅਵਿਗਤ ਕੀ ਸਾਰ ਨ ਜਾਣੈ ਬੂਝੈ ਸਬਦੁ ਕਮਾਈ ਹੇ ॥੧੩॥
ਇਕਿ ਤੀਰਥਿ ਨਾਵਹਿ ਅੰਨੁ ਨ ਖਾਵਹਿ ॥
ਇਕਿ ਅਗਨਿ ਜਲਾਵਹਿ ਦੇਹ ਖਪਾਵਹਿ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਮੁਕਤਿ ਨ ਹੋਈ ਕਿਤੁ ਬਿਧਿ ਪਾਰਿ ਲੰਘਾਈ ਹੇ ॥੧੪॥
ਗੁਰਮਤਿ ਛੋਡਹਿ ਉਝੜਿ ਜਾਈ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਰਾਮੁ ਨ ਜਪੈ ਅਵਾਈ ॥
ਪਚਿ ਪਚਿ ਬੂਡਹਿ ਕੂੜੁ ਕਮਾਵਹਿ ਕੂੜਿ ਕਾਲੁ ਬੈਰਾਈ ਹੇ ॥੧੫॥
ਹੁਕਮੇ ਆਵੈ ਹੁਕਮੇ ਜਾਵੈ ॥
ਬੂਝੈ ਹੁਕਮੁ ਸੋ ਸਾਚਿ ਸਮਾਵੈ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਚੁ ਮਿਲੈ ਮਨਿ ਭਾਵੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਕਾਰ ਕਮਾਈ ਹੇ ॥੧੬॥੫॥
ਬਹੁਤੁ ਸਿਆਣਪ ਭਰਮੁ ਨ ਜਾਏ ॥
ਪਚਿ ਪਚਿ ਮੁਏ ਅਚੇਤ ਨ ਚੇਤਹਿ ਅਜਗਰਿ ਭਾਰਿ ਲਦਾਈ ਹੇ ॥੮॥
ਬਿਨੁ ਬਾਦ ਬਿਰੋਧਹਿ ਕੋਈ ਨਾਹੀ ॥
ਮੈ ਦੇਖਾਲਿਹੁ ਤਿਸੁ ਸਾਲਾਹੀ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਅਰਪਿ ਮਿਲੈ ਜਗਜੀਵਨੁ ਹਰਿ ਸਿਉ ਬਣਤ ਬਣਾਈ ਹੇ ॥੯॥
ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਗਤਿ ਮਿਤਿ ਕੋਇ ਨ ਪਾਵੈ ॥
ਜੇ ਕੋ ਵਡਾ ਕਹਾਇ ਵਡਾਈ ਖਾਵੈ ॥
ਸਾਚੇ ਸਾਹਿਬ ਤੋਟਿ ਨ ਦਾਤੀ ਸਗਲੀ ਤਿਨਹਿ ਉਪਾਈ ਹੇ ॥੧੦॥
ਵਡੀ ਵਡਿਆਈ ਵੇਪਰਵਾਹੇ ॥
ਆਪਿ ਉਪਾਏ ਦਾਨੁ ਸਮਾਹੇ ॥
ਆਪਿ ਦਇਆਲੁ ਦੂਰਿ ਨਹੀ ਦਾਤਾ ਮਿਲਿਆ ਸਹਜਿ ਰਜਾਈ ਹੇ ॥੧੧॥
ਇਕਿ ਸੋਗੀ ਇਕਿ ਰੋਗਿ ਵਿਆਪੇ ॥
ਜੋ ਕਿਛੁ ਕਰੇ ਸੁ ਆਪੇ ਆਪੇ ॥
ਭਗਤਿ ਭਾਉ ਗੁਰ ਕੀ ਮਤਿ ਪੂਰੀ ਅਨਹਦਿ ਸਬਦਿ ਲਖਾਈ ਹੇ ॥੧੨॥
ਇਕਿ ਨਾਗੇ ਭੂਖੇ ਭਵਹਿ ਭਵਾਏ ॥
ਇਕਿ ਹਠੁ ਕਰਿ ਮਰਹਿ ਨ ਕੀਮਤਿ ਪਾਏ ॥
ਗਤਿ ਅਵਿਗਤ ਕੀ ਸਾਰ ਨ ਜਾਣੈ ਬੂਝੈ ਸਬਦੁ ਕਮਾਈ ਹੇ ॥੧੩॥
ਇਕਿ ਤੀਰਥਿ ਨਾਵਹਿ ਅੰਨੁ ਨ ਖਾਵਹਿ ॥
ਇਕਿ ਅਗਨਿ ਜਲਾਵਹਿ ਦੇਹ ਖਪਾਵਹਿ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਮੁਕਤਿ ਨ ਹੋਈ ਕਿਤੁ ਬਿਧਿ ਪਾਰਿ ਲੰਘਾਈ ਹੇ ॥੧੪॥
ਗੁਰਮਤਿ ਛੋਡਹਿ ਉਝੜਿ ਜਾਈ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਰਾਮੁ ਨ ਜਪੈ ਅਵਾਈ ॥
ਪਚਿ ਪਚਿ ਬੂਡਹਿ ਕੂੜੁ ਕਮਾਵਹਿ ਕੂੜਿ ਕਾਲੁ ਬੈਰਾਈ ਹੇ ॥੧੫॥
ਹੁਕਮੇ ਆਵੈ ਹੁਕਮੇ ਜਾਵੈ ॥
ਬੂਝੈ ਹੁਕਮੁ ਸੋ ਸਾਚਿ ਸਮਾਵੈ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਚੁ ਮਿਲੈ ਮਨਿ ਭਾਵੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਕਾਰ ਕਮਾਈ ਹੇ ॥੧੬॥੫॥
नावहु भुली चोटा खाए ॥
बहुतु सिआणप भरमु न जाए ॥
पचि पचि मुए अचेत न चेतहि अजगरि भारि लदाई हे ॥८॥
बिनु बाद बिरोधहि कोई नाही ॥
मै देखालिहु तिसु सालाही ॥
मनु तनु अरपि मिलै जगजीवनु हरि सिउ बणत बणाई हे ॥९॥
प्रभ की गति मिति कोइ न पावै ॥
जे को वडा कहाइ वडाई खावै ॥
साचे साहिब तोटि न दाती सगली तिनहि उपाई हे ॥१०॥
वडी वडिआई वेपरवाहे ॥
आपि उपाए दानु समाहे ॥
आपि दइआलु दूरि नही दाता मिलिआ सहजि रजाई हे ॥११॥
इकि सोगी इकि रोगि विआपे ॥
जो किछु करे सु आपे आपे ॥
भगति भाउ गुर की मति पूरी अनहदि सबदि लखाई हे ॥१२॥
इकि नागे भूखे भवहि भवाए ॥
इकि हठु करि मरहि न कीमति पाए ॥
गति अविगत की सार न जाणै बूझै सबदु कमाई हे ॥१३॥
इकि तीरथि नावहि अंनु न खावहि ॥
इकि अगनि जलावहि देह खपावहि ॥
राम नाम बिनु मुकति न होई कितु बिधि पारि लंघाई हे ॥१४॥
गुरमति छोडहि उझड़ि जाई ॥
मनमुखि रामु न जपै अवाई ॥
पचि पचि बूडहि कूड़ु कमावहि कूड़ि कालु बैराई हे ॥१५॥
हुकमे आवै हुकमे जावै ॥
बूझै हुकमु सो साचि समावै ॥
नानक साचु मिलै मनि भावै गुरमुखि कार कमाई हे ॥१६॥५॥
बहुतु सिआणप भरमु न जाए ॥
पचि पचि मुए अचेत न चेतहि अजगरि भारि लदाई हे ॥८॥
बिनु बाद बिरोधहि कोई नाही ॥
मै देखालिहु तिसु सालाही ॥
मनु तनु अरपि मिलै जगजीवनु हरि सिउ बणत बणाई हे ॥९॥
प्रभ की गति मिति कोइ न पावै ॥
जे को वडा कहाइ वडाई खावै ॥
साचे साहिब तोटि न दाती सगली तिनहि उपाई हे ॥१०॥
वडी वडिआई वेपरवाहे ॥
आपि उपाए दानु समाहे ॥
आपि दइआलु दूरि नही दाता मिलिआ सहजि रजाई हे ॥११॥
इकि सोगी इकि रोगि विआपे ॥
जो किछु करे सु आपे आपे ॥
भगति भाउ गुर की मति पूरी अनहदि सबदि लखाई हे ॥१२॥
इकि नागे भूखे भवहि भवाए ॥
इकि हठु करि मरहि न कीमति पाए ॥
गति अविगत की सार न जाणै बूझै सबदु कमाई हे ॥१३॥
इकि तीरथि नावहि अंनु न खावहि ॥
इकि अगनि जलावहि देह खपावहि ॥
राम नाम बिनु मुकति न होई कितु बिधि पारि लंघाई हे ॥१४॥
गुरमति छोडहि उझड़ि जाई ॥
मनमुखि रामु न जपै अवाई ॥
पचि पचि बूडहि कूड़ु कमावहि कूड़ि कालु बैराई हे ॥१५॥
हुकमे आवै हुकमे जावै ॥
बूझै हुकमु सो साचि समावै ॥
नानक साचु मिलै मनि भावै गुरमुखि कार कमाई हे ॥१६॥५॥
हिन्दी अर्थ: जो जीव-स्त्री परमात्मा के नाम से टूटी रहती है वह दुख सहती है (दुनिया के कामों में चाहे वह) बहुत समझदारी (दिखाए)। उसकी (माया की) भटकना दूर नहीं होती। जो लोग परमात्मा की याद से बेखबर रहते हैं परमात्मा को याद नहीं करते। (वे माया के मोह में) दुखी हो-हो के आत्मिक मौत सहेड़ते हैं। वे (मोह के) बहुत ही भारे बोझ तले लदे रहते हैं। 8। (माया के मोह में फसे हुओं का जिधर-किधर भी हाल देखो) झगड़ों से विरोध से कोई भी खाली नहीं है (और अगर तुम्हें यकीन नहीं आता तो) मुझे कोई ऐसा दिखाओ। मैं उसका आदर करता हूँ। अपना मन और शरीर भेटा करने से ही (भाव। अपने मन की अगुवाई और ज्ञानेन्द्रियों की भटकना को छोड़ के ही) जगत का जीवन परमात्मा मिलता है। तब ही उसके साथ सांझ बनती है। 9। कोई आदमी नहीं जान सकता कि परमात्मा कैसा है और कितना बड़ा है। अगर कोई मनुष्य अपने आप को बड़ा कहलवा के (ये घमण्ड करे कि मैं प्रभू की गति-मिति पा सकता हूँ तो यह) घमण्ड उसके आत्मिक जीवन को तबाह कर देता है। सारी सृष्टि सदा-स्थिर रहने वाले मालिक ने पैदा की है (सबको दातें देता है। पर उसकी) दातों में कमी नहीं होती। 10। (परमात्मा की यह एक) बड़ी भारी खूबी है कि (इतने बड़े जगत-परिवार का मालिक-पति हो के भी) बे-परवाह है (प्रबंध करने में घबराता नहीं)। स्वयं ही पैदा करता है और स्वयं ही सबको रिजक पहुँचाता है। सब दातों का मालिक प्रभू दया का श्रोत है। किसी भी जीव से दूर नहीं। वह रजा का मालिक जिस जीव को मिल जाता है वह (भी) आत्मिक अडोलता में टिक जाता है। 11। (सृष्टि के) अनेकों जीव सोग में ग्रसे रहते हैं। अनेकों जीव रोग तले दबाए रहते हैं। जो कुछ करता है प्रभू स्वयं ही करता है। जो मनुष्य गुरू की पूरी मति के द्वारा परमात्मा की भगती करता है परमात्मा के साथ प्रेम गाठता है। वह उस अमर प्रभू में लीन रहता है। गुरू के शबद के द्वारा प्रभू उसको अपने आप की समझ दे देता है (और उसको कोई सोग कोई रोग नहीं व्यापता)। 12। अनेकों लोग (जगत त्याग के) नंगे रहते हैं। भूख काटते हैं (त्याग के भुलेखे के) भटकाए हुए (जगह-जगह) भटकते फिरते हैं। अनेकों लोग (किसी निहित आत्मिक उन्नति की प्राप्ति की खातिर) अपने शरीर पर जोर-जबरदस्ती कर-कर के मरते हैं। पर ऐसा कोई मनुष्य (मनुष्य जीवन की) कद्र नहीं समझता। ऐसे किसी व्यक्ति को अच्छे-बुरे आत्मिक जीवन की समझ नहीं पड़ती। वही व्यक्ति समझता है जो गुरू का शबद कमाता है (जो गुरू के शबद अनुसार अपना जीवन ढालता है)। 13। अनेकों लोग (जगत त्याग के) तीर्थ (तीर्थों) पर स्नान करते हैं। और अन्न नहीं खाते (दूधाधारी बनते हैं)। अनेकों लोग (त्यागी बन के) आग जलाते हैं (धूणियाँ तपाते हैं और) अपने शरीर को (तपों का) कष्ट देते हैं पर परमात्मा का नाम सिमरन के बिना (माया के बँधनों से) खलासी नहीं मिलती। सिमरन के बिना और किसी तरीके से कोई मनुष्य संसार-समुंद्र से पार नहीं लांघ सकता। 14। (कई व्यक्ति ऐसे हैं जो) कुर्मागी हो कर गुरू की मति पर चलना छोड़ देते हैं। अपने मन के पीछे चलने वाला अवैड़ा मनुष्य परमात्मा का नाम नहीं जपता। परमात्मा के नाम से टूटे हुए बंदे (निरा) माया का ही धंधा करते रहते हैं। ऐसे व्यक्ति दुखी हो-हो के (माया के मोह के समुंद्र में ही) गोते खाते रहते हैं (माया के मोह के) झूठे धंधों में (फसे रहने के कारण) आत्मिक मौत उनकी वैरनि बन जाती है। 15। हरेक जीव परमात्मा के हुकम अनुसार ही (जगत में) आता है। उसके हुकम अनुसार (यहाँ से) चला जाता है। जो जीव उसकी रजा को समझ लेता है वह उस सदा-स्थिर प्रभू में लीन रहता है। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर (सिमरन की) कार करता है उसको सदा-स्थिर प्रभू मिल जाता है। उसके मन को प्रभू प्यारा लगने लग जाता है। 16। 5।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਬਿਧਾਤਾ ॥
ਜਿਨਿ ਆਪੇ ਆਪਿ ਉਪਾਇ ਪਛਾਤਾ ॥
ਆਪੇ ਸਤਿਗੁਰੁ ਆਪੇ ਸੇਵਕੁ ਆਪੇ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਉਪਾਈ ਹੇ ॥੧॥
ਆਪੇ ਨੇੜੈ ਨਾਹੀ ਦੂਰੇ ॥
ਬੂਝਹਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੇ ਜਨ ਪੂਰੇ ॥
ਤਿਨ ਕੀ ਸੰਗਤਿ ਅਹਿਨਿਸਿ ਲਾਹਾ ਗੁਰ ਸੰਗਤਿ ਏਹ ਵਡਾਈ ਹੇ ॥੨॥
ਜੁਗਿ ਜੁਗਿ ਸੰਤ ਭਲੇ ਪ੍ਰਭ ਤੇਰੇ ॥
ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵਹਿ ਰਸਨ ਰਸੇਰੇ ॥
ਉਸਤਤਿ ਕਰਹਿ ਪਰਹਰਿ ਦੁਖੁ ਦਾਲਦੁ ਜਿਨ ਨਾਹੀ ਚਿੰਤ ਪਰਾਈ ਹੇ ॥੩॥
ਓਇ ਜਾਗਤ ਰਹਹਿ ਨ ਸੂਤੇ ਦੀਸਹਿ ॥
ਸੰਗਤਿ ਕੁਲ ਤਾਰੇ ਸਾਚੁ ਪਰੀਸਹਿ ॥
ਕਲਿਮਲ ਮੈਲੁ ਨਾਹੀ ਤੇ ਨਿਰਮਲ ਓਇ ਰਹਹਿ ਭਗਤਿ ਲਿਵ ਲਾਈ ਹੇ ॥੪॥
ਬੂਝਹੁ ਹਰਿ ਜਨ ਸਤਿਗੁਰ ਬਾਣੀ ॥
ਏਹੁ ਜੋਬਨੁ ਸਾਸੁ ਹੈ ਦੇਹ ਪੁਰਾਣੀ ॥
ਆਜੁ ਕਾਲਿ ਮਰਿ ਜਾਈਐ ਪ੍ਰਾਣੀ ਹਰਿ ਜਪੁ ਜਪਿ ਰਿਦੈ ਧਿਆਈ ਹੇ ॥੫॥
ਛੋਡਹੁ ਪ੍ਰਾਣੀ ਕੂੜ ਕਬਾੜਾ ॥
ਕੂੜੁ ਮਾਰੇ ਕਾਲੁ ਉਛਾਹਾੜਾ ॥
ਸਾਕਤ ਕੂੜਿ ਪਚਹਿ ਮਨਿ ਹਉਮੈ ਦੁਹੁ ਮਾਰਗਿ ਪਚੈ ਪਚਾਈ ਹੇ ॥੬॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਬਿਧਾਤਾ ॥
ਜਿਨਿ ਆਪੇ ਆਪਿ ਉਪਾਇ ਪਛਾਤਾ ॥
ਆਪੇ ਸਤਿਗੁਰੁ ਆਪੇ ਸੇਵਕੁ ਆਪੇ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਉਪਾਈ ਹੇ ॥੧॥
ਆਪੇ ਨੇੜੈ ਨਾਹੀ ਦੂਰੇ ॥
ਬੂਝਹਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੇ ਜਨ ਪੂਰੇ ॥
ਤਿਨ ਕੀ ਸੰਗਤਿ ਅਹਿਨਿਸਿ ਲਾਹਾ ਗੁਰ ਸੰਗਤਿ ਏਹ ਵਡਾਈ ਹੇ ॥੨॥
ਜੁਗਿ ਜੁਗਿ ਸੰਤ ਭਲੇ ਪ੍ਰਭ ਤੇਰੇ ॥
ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵਹਿ ਰਸਨ ਰਸੇਰੇ ॥
ਉਸਤਤਿ ਕਰਹਿ ਪਰਹਰਿ ਦੁਖੁ ਦਾਲਦੁ ਜਿਨ ਨਾਹੀ ਚਿੰਤ ਪਰਾਈ ਹੇ ॥੩॥
ਓਇ ਜਾਗਤ ਰਹਹਿ ਨ ਸੂਤੇ ਦੀਸਹਿ ॥
ਸੰਗਤਿ ਕੁਲ ਤਾਰੇ ਸਾਚੁ ਪਰੀਸਹਿ ॥
ਕਲਿਮਲ ਮੈਲੁ ਨਾਹੀ ਤੇ ਨਿਰਮਲ ਓਇ ਰਹਹਿ ਭਗਤਿ ਲਿਵ ਲਾਈ ਹੇ ॥੪॥
ਬੂਝਹੁ ਹਰਿ ਜਨ ਸਤਿਗੁਰ ਬਾਣੀ ॥
ਏਹੁ ਜੋਬਨੁ ਸਾਸੁ ਹੈ ਦੇਹ ਪੁਰਾਣੀ ॥
ਆਜੁ ਕਾਲਿ ਮਰਿ ਜਾਈਐ ਪ੍ਰਾਣੀ ਹਰਿ ਜਪੁ ਜਪਿ ਰਿਦੈ ਧਿਆਈ ਹੇ ॥੫॥
ਛੋਡਹੁ ਪ੍ਰਾਣੀ ਕੂੜ ਕਬਾੜਾ ॥
ਕੂੜੁ ਮਾਰੇ ਕਾਲੁ ਉਛਾਹਾੜਾ ॥
ਸਾਕਤ ਕੂੜਿ ਪਚਹਿ ਮਨਿ ਹਉਮੈ ਦੁਹੁ ਮਾਰਗਿ ਪਚੈ ਪਚਾਈ ਹੇ ॥੬॥
मारू महला १ ॥
आपे करता पुरखु बिधाता ॥
जिनि आपे आपि उपाइ पछाता ॥
आपे सतिगुरु आपे सेवकु आपे स्रिसटि उपाई हे ॥१॥
आपे नेड़ै नाही दूरे ॥
बूझहि गुरमुखि से जन पूरे ॥
तिन की संगति अहिनिसि लाहा गुर संगति एह वडाई हे ॥२॥
जुगि जुगि संत भले प्रभ तेरे ॥
हरि गुण गावहि रसन रसेरे ॥
उसतति करहि परहरि दुखु दालदु जिन नाही चिंत पराई हे ॥३॥
ओइ जागत रहहि न सूते दीसहि ॥
संगति कुल तारे साचु परीसहि ॥
कलिमल मैलु नाही ते निरमल ओइ रहहि भगति लिव लाई हे ॥४॥
बूझहु हरि जन सतिगुर बाणी ॥
एहु जोबनु सासु है देह पुराणी ॥
आजु कालि मरि जाईऐ प्राणी हरि जपु जपि रिदै धिआई हे ॥५॥
छोडहु प्राणी कूड़ कबाड़ा ॥
कूड़ु मारे कालु उछाहाड़ा ॥
साकत कूड़ि पचहि मनि हउमै दुहु मारगि पचै पचाई हे ॥६॥
आपे करता पुरखु बिधाता ॥
जिनि आपे आपि उपाइ पछाता ॥
आपे सतिगुरु आपे सेवकु आपे स्रिसटि उपाई हे ॥१॥
आपे नेड़ै नाही दूरे ॥
बूझहि गुरमुखि से जन पूरे ॥
तिन की संगति अहिनिसि लाहा गुर संगति एह वडाई हे ॥२॥
जुगि जुगि संत भले प्रभ तेरे ॥
हरि गुण गावहि रसन रसेरे ॥
उसतति करहि परहरि दुखु दालदु जिन नाही चिंत पराई हे ॥३॥
ओइ जागत रहहि न सूते दीसहि ॥
संगति कुल तारे साचु परीसहि ॥
कलिमल मैलु नाही ते निरमल ओइ रहहि भगति लिव लाई हे ॥४॥
बूझहु हरि जन सतिगुर बाणी ॥
एहु जोबनु सासु है देह पुराणी ॥
आजु कालि मरि जाईऐ प्राणी हरि जपु जपि रिदै धिआई हे ॥५॥
छोडहु प्राणी कूड़ कबाड़ा ॥
कूड़ु मारे कालु उछाहाड़ा ॥
साकत कूड़ि पचहि मनि हउमै दुहु मारगि पचै पचाई हे ॥६॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला १॥ करतार स्वयं ही सृष्टि को पैदा करने वाला है और स्वयं ही इसमें व्यापक है। उस करतार ने स्वयं ही जगत पैदा करके इसकी संभाल का फर्ज भी पहचाना है। प्रभू खुद ही सतिगुरू है खुद ही सेवक है। प्रभू ने स्वयं ही ये सृष्टि रची है। 1। (सर्व-व्यापक होने के कारण प्रभू) स्वयं ही (हरेक जीव के) नजदीक है किसी से भी दूर नहीं। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख हो के यह भेद समझ लेते हैं वे अभॅुल आत्मिक जीवन वाले बन जाते हैं। गुरू की संगति करने के कारण उन्हें ये महत्वता मिलती है कि उनकी संगत से भी दिन-रात लाभ ही लाभ मिलता है। 2। हे प्रभू ! हरेक युग में तेरे संत नेक बँदे होते हैं। वे जीभ से रस ले के तेरे गुण गाते हैं। तेरे बिना उन्हें किसी और की आस नहीं होती। हे प्रभू ! वह तेरी सिफत-सालाह करते हैं (अपने अंदर से) दुख-दरिद्रता दूर कर लेते हैं। 3। वह (संत जन माया के हमलों से सदा) सचेत रहते हैं। वह गफ़लत की नींद में कभी भी सोते नहीं दिखते। उनकी संगति अनेकों कुल तार देती है क्योंकि वह सबको सदा-स्थिर प्रभू का नाम बाँटते हैं। (उनके अंदर) पापों की मैल (रक्ती भर भी) नहीं होती। वह पवित्र जीवन वाले होते हैं। वह प्रभू की भक्ति में व्यस्त रहते हैं। प्रभू के चरणों में सुरति जोड़े रखते हैं। 4। हे प्राणियो ! हरी-जनों की संगति में रह के सतिगुरू की बाणी में जुड़ के (ये पक्की बात) समझ लो कि ये जवानी ये सांस ये शरीर सब पुराने हो जाने वाले हैं। हे प्राणी ! (जो भी पैदा हुआ है उसने) थोड़े ही समय में मौत के वश आ जाना है। (इस वास्ते) परमात्मा का नाम जपो और हृदय में उसका ध्यान धरो। 5। हे प्राणी ! निरी माया के मोह की बातें छोड़ो। जिस मनुष्य के अंदर निरा माया का मोह ही है उसको आत्मिक मौत पहुँच-पहुँच के मारती है। माया-ग्रसित जीव माया के मोह में दुखी होते हैं। जिस मनुष्य के मन में अहंकार है वह मेर-तेर के रास्ते पर पड़ कर दुखी होता है। अहंकार उसको ख्वार करता है। 6।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1025 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
Greater Kailash के बाज़ार में सर्दियों की धूप, और कोई पुराना दोस्त मिल जाए।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 46 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1025” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1026 →, पीछे का: ← अंग 1024।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।