अंग
1011
राग मारू
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ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਸਾਬਾਸਿ ਹੈ ਕਾਟੈ ਮਨ ਪੀਰਾ ॥੨॥
ਲਾਲਾ ਗੋਲਾ ਧਣੀ ਕੋ ਕਿਆ ਕਹਉ ਵਡਿਆਈਐ ॥
ਭਾਣੈ ਬਖਸੇ ਪੂਰਾ ਧਣੀ ਸਚੁ ਕਾਰ ਕਮਾਈਐ ॥
ਵਿਛੁੜਿਆ ਕਉ ਮੇਲਿ ਲਏ ਗੁਰ ਕਉ ਬਲਿ ਜਾਈਐ ॥੩॥
ਲਾਲੇ ਗੋਲੇ ਮਤਿ ਖਰੀ ਗੁਰ ਕੀ ਮਤਿ ਨੀਕੀ ॥
ਸਾਚੀ ਸੁਰਤਿ ਸੁਹਾਵਣੀ ਮਨਮੁਖ ਮਤਿ ਫੀਕੀ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਤੇਰਾ ਤੂ ਪ੍ਰਭੂ ਸਚੁ ਧੀਰਕ ਧੁਰ ਕੀ ॥੪॥
ਸਾਚੈ ਬੈਸਣੁ ਉਠਣਾ ਸਚੁ ਭੋਜਨੁ ਭਾਖਿਆ ॥
ਚਿਤਿ ਸਚੈ ਵਿਤੋ ਸਚਾ ਸਾਚਾ ਰਸੁ ਚਾਖਿਆ ॥
ਸਾਚੈ ਘਰਿ ਸਾਚੈ ਰਖੇ ਗੁਰ ਬਚਨਿ ਸੁਭਾਖਿਆ ॥੫॥
ਮਨਮੁਖ ਕਉ ਆਲਸੁ ਘਣੋ ਫਾਥੇ ਓਜਾੜੀ ॥
ਫਾਥਾ ਚੁਗੈ ਨਿਤ ਚੋਗੜੀ ਲਗਿ ਬੰਧੁ ਵਿਗਾੜੀ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਮੁਕਤੁ ਹੋਇ ਸਾਚੇ ਨਿਜ ਤਾੜੀ ॥੬॥
ਅਨਹਤਿ ਲਾਲਾ ਬੇਧਿਆ ਪ੍ਰਭ ਹੇਤਿ ਪਿਆਰੀ ॥
ਬਿਨੁ ਸਾਚੇ ਜੀਉ ਜਲਿ ਬਲਉ ਝੂਠੇ ਵੇਕਾਰੀ ॥
ਬਾਦਿ ਕਾਰਾ ਸਭਿ ਛੋਡੀਆ ਸਾਚੀ ਤਰੁ ਤਾਰੀ ॥੭॥
ਜਿਨੀ ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਿਆ ਤਿਨਾ ਠਉਰ ਨ ਠਾਉ ॥
ਲਾਲੈ ਲਾਲਚੁ ਤਿਆਗਿਆ ਪਾਇਆ ਹਰਿ ਨਾਉ ॥
ਤੂ ਬਖਸਹਿ ਤਾ ਮੇਲਿ ਲੈਹਿ ਨਾਨਕ ਬਲਿ ਜਾਉ ॥੮॥੪॥
ਲਾਲਾ ਗੋਲਾ ਧਣੀ ਕੋ ਕਿਆ ਕਹਉ ਵਡਿਆਈਐ ॥
ਭਾਣੈ ਬਖਸੇ ਪੂਰਾ ਧਣੀ ਸਚੁ ਕਾਰ ਕਮਾਈਐ ॥
ਵਿਛੁੜਿਆ ਕਉ ਮੇਲਿ ਲਏ ਗੁਰ ਕਉ ਬਲਿ ਜਾਈਐ ॥੩॥
ਲਾਲੇ ਗੋਲੇ ਮਤਿ ਖਰੀ ਗੁਰ ਕੀ ਮਤਿ ਨੀਕੀ ॥
ਸਾਚੀ ਸੁਰਤਿ ਸੁਹਾਵਣੀ ਮਨਮੁਖ ਮਤਿ ਫੀਕੀ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਤੇਰਾ ਤੂ ਪ੍ਰਭੂ ਸਚੁ ਧੀਰਕ ਧੁਰ ਕੀ ॥੪॥
ਸਾਚੈ ਬੈਸਣੁ ਉਠਣਾ ਸਚੁ ਭੋਜਨੁ ਭਾਖਿਆ ॥
ਚਿਤਿ ਸਚੈ ਵਿਤੋ ਸਚਾ ਸਾਚਾ ਰਸੁ ਚਾਖਿਆ ॥
ਸਾਚੈ ਘਰਿ ਸਾਚੈ ਰਖੇ ਗੁਰ ਬਚਨਿ ਸੁਭਾਖਿਆ ॥੫॥
ਮਨਮੁਖ ਕਉ ਆਲਸੁ ਘਣੋ ਫਾਥੇ ਓਜਾੜੀ ॥
ਫਾਥਾ ਚੁਗੈ ਨਿਤ ਚੋਗੜੀ ਲਗਿ ਬੰਧੁ ਵਿਗਾੜੀ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਮੁਕਤੁ ਹੋਇ ਸਾਚੇ ਨਿਜ ਤਾੜੀ ॥੬॥
ਅਨਹਤਿ ਲਾਲਾ ਬੇਧਿਆ ਪ੍ਰਭ ਹੇਤਿ ਪਿਆਰੀ ॥
ਬਿਨੁ ਸਾਚੇ ਜੀਉ ਜਲਿ ਬਲਉ ਝੂਠੇ ਵੇਕਾਰੀ ॥
ਬਾਦਿ ਕਾਰਾ ਸਭਿ ਛੋਡੀਆ ਸਾਚੀ ਤਰੁ ਤਾਰੀ ॥੭॥
ਜਿਨੀ ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਿਆ ਤਿਨਾ ਠਉਰ ਨ ਠਾਉ ॥
ਲਾਲੈ ਲਾਲਚੁ ਤਿਆਗਿਆ ਪਾਇਆ ਹਰਿ ਨਾਉ ॥
ਤੂ ਬਖਸਹਿ ਤਾ ਮੇਲਿ ਲੈਹਿ ਨਾਨਕ ਬਲਿ ਜਾਉ ॥੮॥੪॥
गुर पूरे साबासि है काटै मन पीरा ॥२॥
लाला गोला धणी को किआ कहउ वडिआईऐ ॥
भाणै बखसे पूरा धणी सचु कार कमाईऐ ॥
विछुड़िआ कउ मेलि लए गुर कउ बलि जाईऐ ॥३॥
लाले गोले मति खरी गुर की मति नीकी ॥
साची सुरति सुहावणी मनमुख मति फीकी ॥
मनु तनु तेरा तू प्रभू सचु धीरक धुर की ॥४॥
साचै बैसणु उठणा सचु भोजनु भाखिआ ॥
चिति सचै वितो सचा साचा रसु चाखिआ ॥
साचै घरि साचै रखे गुर बचनि सुभाखिआ ॥५॥
मनमुख कउ आलसु घणो फाथे ओजाड़ी ॥
फाथा चुगै नित चोगड़ी लगि बंधु विगाड़ी ॥
गुर परसादी मुकतु होइ साचे निज ताड़ी ॥६॥
अनहति लाला बेधिआ प्रभ हेति पिआरी ॥
बिनु साचे जीउ जलि बलउ झूठे वेकारी ॥
बादि कारा सभि छोडीआ साची तरु तारी ॥७॥
जिनी नामु विसारिआ तिना ठउर न ठाउ ॥
लालै लालचु तिआगिआ पाइआ हरि नाउ ॥
तू बखसहि ता मेलि लैहि नानक बलि जाउ ॥८॥४॥
लाला गोला धणी को किआ कहउ वडिआईऐ ॥
भाणै बखसे पूरा धणी सचु कार कमाईऐ ॥
विछुड़िआ कउ मेलि लए गुर कउ बलि जाईऐ ॥३॥
लाले गोले मति खरी गुर की मति नीकी ॥
साची सुरति सुहावणी मनमुख मति फीकी ॥
मनु तनु तेरा तू प्रभू सचु धीरक धुर की ॥४॥
साचै बैसणु उठणा सचु भोजनु भाखिआ ॥
चिति सचै वितो सचा साचा रसु चाखिआ ॥
साचै घरि साचै रखे गुर बचनि सुभाखिआ ॥५॥
मनमुख कउ आलसु घणो फाथे ओजाड़ी ॥
फाथा चुगै नित चोगड़ी लगि बंधु विगाड़ी ॥
गुर परसादी मुकतु होइ साचे निज ताड़ी ॥६॥
अनहति लाला बेधिआ प्रभ हेति पिआरी ॥
बिनु साचे जीउ जलि बलउ झूठे वेकारी ॥
बादि कारा सभि छोडीआ साची तरु तारी ॥७॥
जिनी नामु विसारिआ तिना ठउर न ठाउ ॥
लालै लालचु तिआगिआ पाइआ हरि नाउ ॥
तू बखसहि ता मेलि लैहि नानक बलि जाउ ॥८॥४॥
हिन्दी अर्थ: सेवक पूरे गुरू को धन्य-धन्य कहता है जो उसके मन की पीड़ा दूर करता है। 2। जो मनुष्य मालिक प्रभू का सेवक-गुलाम बन जाता है मैं उसकी क्या महिमा कह सकता हूँ। वह सब ताकतों का मालिक प्रभू अपनी रजा में (अपने सेवक पर) बख्शिश करता है (जिसकी बरकति से सेवक) नाम-सिमरन (की) कार करता रहता है। सेवक अपने गुरू से सदा कुर्बान जाता है जो विछुड़े जीव को परमात्मा के चरणों में मिला लेता है। 3। गुरू की सोहणी मति ले के सेवक-गुलाम की बुद्धि भी बढ़िया हो जाती है। उसकी सुरति सदा-स्थिर भगती में टिक के सुंदर हो जाती है। पर अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य की मति उसको (परमात्मा से दूर ले जाने। फीका करने) के रास्ते पर डालने वाली होती है। (पर। हे प्रभू ! जीवों के क्या वश। जीवों को यह) मन और शरीर तेरा ही दिया हुआ है। हे प्रभू ! तू सदा-स्थिर रहने वाला है। तू ही अपनी धुर-दरगाह से जीवों को (सिमरन की) टेक देने वाला है। 4। (सेवक का) उठना-बैठना (सदा ही) सदा-स्थिर प्रभू (की याद) में रहता है। सिमरन ही उसकी (आत्मिक) खुराक है सिमरन ही उसकी बोली है। सेवक के चिक्त में सदा-स्थिर प्रभू (की याद) टिकी रहती है। सदा-स्थिर प्रभू का नाम ही उसका धन है। यही रस सदा चखता रहता है। (सेवक) सदा-स्थिर प्रभू के घर में टिकाए रखता है। 5। पर अपने मन के पीछे चलने वाले बंदे को (नाम-सिमरन से) बहुत आलस रहता है। वह अपने मन के सूनेपन में ही फसा रहता है। (नाम से सूने मन की अगुवाई में) फँसा हुआ मनमुख नित्य (माया-मोह की) कोझी चोग चुगता है। (अपने मन के पीछे) लग के परमात्म से अपना संबंध खराब कर लेता है। (अपने मन की इस गुलामी में से मनमुख भी) गुरू की कृपा से स्वतंत्र हो के सदा-स्थिर प्रभू में अपनी सुरति जोड़ लेता है। 6। सेवक नाश-रहित प्रभू की याद में टिका रहता है। प्रभू के प्यार में (उसका मन) भेदा रहता है। (सेवक प्रभू-चरणों से) प्यार जोड़ता है। (सेवक को निष्चय है कि) झूठे विकारी लोगों की जिंद सदा-स्थिर प्रभू की याद से टूट के (विकारों में ही) जल के खत्म हो जाती है। (इस वास्ते) सेवक मोह-माया की व्यर्थ के कार्य-व्यवहार त्याग देता है। परमात्मा की भक्ति (सेवक के लिए संसार-समुंद्र में से) तैराने वाली समर्थ बेड़ी है। 7। सेवक व्यर्थ कार्य छोड़कर सत्य का गुणगान कर संसार सागर से पार हो गया है॥ ७॥ जिन्होंने प्रभू का नाम बिसार दिया उन्हें आत्मिक शांति के लिए कोई और जगह नहीं मिलती। सेवक ने माया का लालच त्याग दिया है। और परमात्मा का नाम-धन पा लिया है। हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) मैं तुझसे सदके जाता हूँ। तू स्वयं ही मेहर करे तो जीवों को (अपने चरणों में) मिलाए। 8। 4।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਲਾਲੈ ਗਾਰਬੁ ਛੋਡਿਆ ਗੁਰ ਕੈ ਭੈ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਈ ॥
ਲਾਲੈ ਖਸਮੁ ਪਛਾਣਿਆ ਵਡੀ ਵਡਿਆਈ ॥
ਖਸਮਿ ਮਿਲਿਐ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਕੀਮਤਿ ਕਹਣੁ ਨ ਜਾਈ ॥੧॥
ਲਾਲਾ ਗੋਲਾ ਖਸਮ ਕਾ ਖਸਮੈ ਵਡਿਆਈ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਉਬਰੇ ਹਰਿ ਕੀ ਸਰਣਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਲਾਲੇ ਨੋ ਸਿਰਿ ਕਾਰ ਹੈ ਧੁਰਿ ਖਸਮਿ ਫੁਰਮਾਈ ॥
ਲਾਲੈ ਹੁਕਮੁ ਪਛਾਣਿਆ ਸਦਾ ਰਹੈ ਰਜਾਈ ॥
ਆਪੇ ਮੀਰਾ ਬਖਸਿ ਲਏ ਵਡੀ ਵਡਿਆਈ ॥੨॥
ਆਪਿ ਸਚਾ ਸਭੁ ਸਚੁ ਹੈ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਬੁਝਾਈ ॥
ਤੇਰੀ ਸੇਵਾ ਸੋ ਕਰੇ ਜਿਸ ਨੋ ਲੈਹਿ ਤੂ ਲਾਈ ॥
ਬਿਨੁ ਸੇਵਾ ਕਿਨੈ ਨ ਪਾਇਆ ਦੂਜੈ ਭਰਮਿ ਖੁਆਈ ॥੩॥
ਸੋ ਕਿਉ ਮਨਹੁ ਵਿਸਾਰੀਐ ਨਿਤ ਦੇਵੈ ਚੜੈ ਸਵਾਇਆ ॥
ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਸਭੁ ਤਿਸ ਦਾ ਸਾਹੁ ਤਿਨੈ ਵਿਚਿ ਪਾਇਆ ॥
ਜਾ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਤਾ ਸੇਵੀਐ ਸੇਵਿ ਸਚਿ ਸਮਾਇਆ ॥੪॥
ਲਾਲਾ ਸੋ ਜੀਵਤੁ ਮਰੈ ਮਰਿ ਵਿਚਹੁ ਆਪੁ ਗਵਾਏ ॥
ਬੰਧਨ ਤੂਟਹਿ ਮੁਕਤਿ ਹੋਇ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਅਗਨਿ ਬੁਝਾਏ ॥
ਸਭ ਮਹਿ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਹੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਕੋ ਪਾਏ ॥੫॥
ਲਾਲੇ ਵਿਚਿ ਗੁਣੁ ਕਿਛੁ ਨਹੀ ਲਾਲਾ ਅਵਗਣਿਆਰੁ ॥
ਤੁਧੁ ਜੇਵਡੁ ਦਾਤਾ ਕੋ ਨਹੀ ਤੂ ਬਖਸਣਹਾਰੁ ॥
ਤੇਰਾ ਹੁਕਮੁ ਲਾਲਾ ਮੰਨੇ ਏਹ ਕਰਣੀ ਸਾਰੁ ॥੬॥
ਗੁਰੁ ਸਾਗਰੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਸਰੁ ਜੋ ਇਛੇ ਸੋ ਫਲੁ ਪਾਏ ॥
ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਅਮਰੁ ਹੈ ਹਿਰਦੈ ਮੰਨਿ ਵਸਾਏ ॥
ਲਾਲੈ ਗਾਰਬੁ ਛੋਡਿਆ ਗੁਰ ਕੈ ਭੈ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਈ ॥
ਲਾਲੈ ਖਸਮੁ ਪਛਾਣਿਆ ਵਡੀ ਵਡਿਆਈ ॥
ਖਸਮਿ ਮਿਲਿਐ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਕੀਮਤਿ ਕਹਣੁ ਨ ਜਾਈ ॥੧॥
ਲਾਲਾ ਗੋਲਾ ਖਸਮ ਕਾ ਖਸਮੈ ਵਡਿਆਈ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਉਬਰੇ ਹਰਿ ਕੀ ਸਰਣਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਲਾਲੇ ਨੋ ਸਿਰਿ ਕਾਰ ਹੈ ਧੁਰਿ ਖਸਮਿ ਫੁਰਮਾਈ ॥
ਲਾਲੈ ਹੁਕਮੁ ਪਛਾਣਿਆ ਸਦਾ ਰਹੈ ਰਜਾਈ ॥
ਆਪੇ ਮੀਰਾ ਬਖਸਿ ਲਏ ਵਡੀ ਵਡਿਆਈ ॥੨॥
ਆਪਿ ਸਚਾ ਸਭੁ ਸਚੁ ਹੈ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਬੁਝਾਈ ॥
ਤੇਰੀ ਸੇਵਾ ਸੋ ਕਰੇ ਜਿਸ ਨੋ ਲੈਹਿ ਤੂ ਲਾਈ ॥
ਬਿਨੁ ਸੇਵਾ ਕਿਨੈ ਨ ਪਾਇਆ ਦੂਜੈ ਭਰਮਿ ਖੁਆਈ ॥੩॥
ਸੋ ਕਿਉ ਮਨਹੁ ਵਿਸਾਰੀਐ ਨਿਤ ਦੇਵੈ ਚੜੈ ਸਵਾਇਆ ॥
ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਸਭੁ ਤਿਸ ਦਾ ਸਾਹੁ ਤਿਨੈ ਵਿਚਿ ਪਾਇਆ ॥
ਜਾ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਤਾ ਸੇਵੀਐ ਸੇਵਿ ਸਚਿ ਸਮਾਇਆ ॥੪॥
ਲਾਲਾ ਸੋ ਜੀਵਤੁ ਮਰੈ ਮਰਿ ਵਿਚਹੁ ਆਪੁ ਗਵਾਏ ॥
ਬੰਧਨ ਤੂਟਹਿ ਮੁਕਤਿ ਹੋਇ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਅਗਨਿ ਬੁਝਾਏ ॥
ਸਭ ਮਹਿ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਹੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਕੋ ਪਾਏ ॥੫॥
ਲਾਲੇ ਵਿਚਿ ਗੁਣੁ ਕਿਛੁ ਨਹੀ ਲਾਲਾ ਅਵਗਣਿਆਰੁ ॥
ਤੁਧੁ ਜੇਵਡੁ ਦਾਤਾ ਕੋ ਨਹੀ ਤੂ ਬਖਸਣਹਾਰੁ ॥
ਤੇਰਾ ਹੁਕਮੁ ਲਾਲਾ ਮੰਨੇ ਏਹ ਕਰਣੀ ਸਾਰੁ ॥੬॥
ਗੁਰੁ ਸਾਗਰੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਸਰੁ ਜੋ ਇਛੇ ਸੋ ਫਲੁ ਪਾਏ ॥
ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਅਮਰੁ ਹੈ ਹਿਰਦੈ ਮੰਨਿ ਵਸਾਏ ॥
मारू महला १ ॥
लालै गारबु छोडिआ गुर कै भै सहजि सुभाई ॥
लालै खसमु पछाणिआ वडी वडिआई ॥
खसमि मिलिऐ सुखु पाइआ कीमति कहणु न जाई ॥१॥
लाला गोला खसम का खसमै वडिआई ॥
गुर परसादी उबरे हरि की सरणाई ॥१॥ रहाउ ॥
लाले नो सिरि कार है धुरि खसमि फुरमाई ॥
लालै हुकमु पछाणिआ सदा रहै रजाई ॥
आपे मीरा बखसि लए वडी वडिआई ॥२॥
आपि सचा सभु सचु है गुर सबदि बुझाई ॥
तेरी सेवा सो करे जिस नो लैहि तू लाई ॥
बिनु सेवा किनै न पाइआ दूजै भरमि खुआई ॥३॥
सो किउ मनहु विसारीऐ नित देवै चड़ै सवाइआ ॥
जीउ पिंडु सभु तिस दा साहु तिनै विचि पाइआ ॥
जा क्रिपा करे ता सेवीऐ सेवि सचि समाइआ ॥४॥
लाला सो जीवतु मरै मरि विचहु आपु गवाए ॥
बंधन तूटहि मुकति होइ त्रिसना अगनि बुझाए ॥
सभ महि नामु निधानु है गुरमुखि को पाए ॥५॥
लाले विचि गुणु किछु नही लाला अवगणिआरु ॥
तुधु जेवडु दाता को नही तू बखसणहारु ॥
तेरा हुकमु लाला मंने एह करणी सारु ॥६॥
गुरु सागरु अंम्रित सरु जो इछे सो फलु पाए ॥
नामु पदारथु अमरु है हिरदै मंनि वसाए ॥
लालै गारबु छोडिआ गुर कै भै सहजि सुभाई ॥
लालै खसमु पछाणिआ वडी वडिआई ॥
खसमि मिलिऐ सुखु पाइआ कीमति कहणु न जाई ॥१॥
लाला गोला खसम का खसमै वडिआई ॥
गुर परसादी उबरे हरि की सरणाई ॥१॥ रहाउ ॥
लाले नो सिरि कार है धुरि खसमि फुरमाई ॥
लालै हुकमु पछाणिआ सदा रहै रजाई ॥
आपे मीरा बखसि लए वडी वडिआई ॥२॥
आपि सचा सभु सचु है गुर सबदि बुझाई ॥
तेरी सेवा सो करे जिस नो लैहि तू लाई ॥
बिनु सेवा किनै न पाइआ दूजै भरमि खुआई ॥३॥
सो किउ मनहु विसारीऐ नित देवै चड़ै सवाइआ ॥
जीउ पिंडु सभु तिस दा साहु तिनै विचि पाइआ ॥
जा क्रिपा करे ता सेवीऐ सेवि सचि समाइआ ॥४॥
लाला सो जीवतु मरै मरि विचहु आपु गवाए ॥
बंधन तूटहि मुकति होइ त्रिसना अगनि बुझाए ॥
सभ महि नामु निधानु है गुरमुखि को पाए ॥५॥
लाले विचि गुणु किछु नही लाला अवगणिआरु ॥
तुधु जेवडु दाता को नही तू बखसणहारु ॥
तेरा हुकमु लाला मंने एह करणी सारु ॥६॥
गुरु सागरु अंम्रित सरु जो इछे सो फलु पाए ॥
नामु पदारथु अमरु है हिरदै मंनि वसाए ॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला १॥ (प्रभू का) सेवक (वह है जिस) ने अहंकार त्याग दिया है गुरू के डर-अदब में रह के सेवक अडोल आत्मिक अवस्था में टिका रहता है। प्रेम स्वभाव वाला बन जाता है। सेवक वह है जिसने मालिक के साथ गहरी सांझ डाल ली है। मालिक से बहुत आदर-मान मिलता है। अगर पति-प्रभू मिल जाए। तो सेवक को इतना आत्मिक आनंद प्राप्त होता है कि उस आनन्द का मूल्य नहीं पाया जा सकता। 1। जो मनुष्य परमात्मा-मालिक का सेवक गुलाम बनता है वह पति-प्रभू की ही सिफत-सालाह करता रहता है। जो लोग गुरू की कृपा से परमात्मा की शरण पड़ते हैं वह (माया के मोह से) बच निकलते हैं। 1। रहाउ। पति-प्रभू ने धुर से ही हुकम दे दिया अपने सेवक को सिर पर (हुकम मानने की) कार सौंप दी (इस वास्ते प्रभू का) सेवक प्रभू का हुकम पहचानता है और सदा उसकी रजा में रहता है। मालिक स्वय ही (सेवक पर) बख्शिशें करता है और उसको बहुत आदर-मान देता है। 2। हे प्रभू ! तूने गुरू के शबद के द्वारा सेवक को ये समझ दी है कि तू स्वयं सदा अटल है और तेरा सारा (नियम) अटल है। हे प्रभू ! तेरी सेवा-भगती वही मनुष्य करता है जिसको तू स्वयं सेवा-भगती में जोड़ता है। तेरी सेवा-भक्ति के बिना कोई जीव तुझे नहीं पा सका। (तेरी सेवा-भक्ति के बिना जीव) माया की भटकना में पड़ कर जीवन-राह से टूटा रहता है। 3। उस परमात्मा को कभी मन से भुलाना नहीं चाहिए जो सब जीवों को सब कुछ सदा देता है और उसका दिया नित्य बढ़ता रहता है। ये प्राण और ये शरीर सब उस प्रभू का ही दिया हुआ है। शरीर में साँसें भी उसी ने ही रखी है। (पर उसकी सेवा-भक्ति भी उसकी मेहर से ही की जा सकती है) जब वह कृपा करता है तब उसकी सेवा की जा सकती है। जीव सेवा-भक्ति करके सदा-स्थिर प्रभू में लीन रहता है। 4। वह मनुष्य प्रभू का सेवक (कहलवा सकता) है जो दुनिया की किरत-कार करता हुआ माया के मोह की ओर से मरा रहता है। माया के मोह से ऊपर रह के अपने अंदर से स्वै-भाव दूर करता है। (ऐसे सेवक के माया वाले) बँधन टूट जाते हैं। माया के मोह से उसको स्वतंत्रता मिल जाती है। वह अपने अंदर से माया की तृष्णा की आग बुझा देता है। वैसे तो परमात्मा का नाम-खजाना हरेक जीव के अंदर ही मौजूद है। पर कोई वही आदमी इस खजाने को पा सकता है जो गुरू की शरण पड़ता है। 5। (हे प्रभू ! तेरी मेहर के बिना) सेवक में कोई गुण पैदा नहीं हो सकता। वह तो बल्कि अवगुणों से भरा रहता है। हे प्रभू ! तेरे जितना दाता और कोई नहीं। तू स्वयं ही बख्शिश करता है। और तेरा सेवक तेरा हुकम मानता है। हुकम मानने को ही सबसे उक्तम कार्य समझता है। 6। गुरू समुंद्र है। गुरू अमृत से भरा हुआ सरोवर है (‘अमृतसर’ है। सेवक इस अमृत के सरोवर गुरू की शरण पड़ता है। फिर यहाँ से) जो कुछ माँगता है वह फल ले लेता है। (गुरू की मेहर से सेवक अपने) हृदय में मन में परमात्मा का नाम बसाता है जो (असल) सरमाया है और जो कभी खत्म होने वाला नहीं।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1011 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
Khan Market की किताबों की दुकान में किसी पुरानी कविता-book को उठाते-उठाते।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 42 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1011” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1012 →, पीछे का: ← अंग 1010।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।