अंग
1033
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਭੁ ਕੋ ਬੋਲੈ ਆਪਣ ਭਾਣੈ ॥
ਮਨਮੁਖੁ ਦੂਜੈ ਬੋਲਿ ਨ ਜਾਣੈ ॥
ਅੰਧੁਲੇ ਕੀ ਮਤਿ ਅੰਧਲੀ ਬੋਲੀ ਆਇ ਗਇਆ ਦੁਖੁ ਤਾਹਾ ਹੇ ॥੧੧॥
ਦੁਖ ਮਹਿ ਜਨਮੈ ਦੁਖ ਮਹਿ ਮਰਣਾ ॥
ਦੂਖੁ ਨ ਮਿਟੈ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਕੀ ਸਰਣਾ ॥
ਦੂਖੀ ਉਪਜੈ ਦੂਖੀ ਬਿਨਸੈ ਕਿਆ ਲੈ ਆਇਆ ਕਿਆ ਲੈ ਜਾਹਾ ਹੇ ॥੧੨॥
ਸਚੀ ਕਰਣੀ ਗੁਰ ਕੀ ਸਿਰਕਾਰਾ ॥
ਆਵਣੁ ਜਾਣੁ ਨਹੀ ਜਮ ਧਾਰਾ ॥
ਡਾਲ ਛੋਡਿ ਤਤੁ ਮੂਲੁ ਪਰਾਤਾ ਮਨਿ ਸਾਚਾ ਓਮਾਹਾ ਹੇ ॥੧੩॥
ਹਰਿ ਕੇ ਲੋਗ ਨਹੀ ਜਮੁ ਮਾਰੈ ॥
ਨਾ ਦੁਖੁ ਦੇਖਹਿ ਪੰਥਿ ਕਰਾਰੈ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਪੂਜਾ ਅਵਰੁ ਨ ਦੂਜਾ ਕਾਹਾ ਹੇ ॥੧੪॥
ਓੜੁ ਨ ਕਥਨੈ ਸਿਫਤਿ ਸਜਾਈ ॥
ਜਿਉ ਤੁਧੁ ਭਾਵਹਿ ਰਹਹਿ ਰਜਾਈ ॥
ਦਰਗਹ ਪੈਧੇ ਜਾਨਿ ਸੁਹੇਲੇ ਹੁਕਮਿ ਸਚੇ ਪਾਤਿਸਾਹਾ ਹੇ ॥੧੫॥
ਕਿਆ ਕਹੀਐ ਗੁਣ ਕਥਹਿ ਘਨੇਰੇ ॥
ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਵਹਿ ਵਡੇ ਵਡੇਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਚੁ ਮਿਲੈ ਪਤਿ ਰਾਖਹੁ ਤੂ ਸਿਰਿ ਸਾਹਾ ਪਾਤਿਸਾਹਾ ਹੇ ॥੧੬॥੬॥੧੨॥
ਮਨਮੁਖੁ ਦੂਜੈ ਬੋਲਿ ਨ ਜਾਣੈ ॥
ਅੰਧੁਲੇ ਕੀ ਮਤਿ ਅੰਧਲੀ ਬੋਲੀ ਆਇ ਗਇਆ ਦੁਖੁ ਤਾਹਾ ਹੇ ॥੧੧॥
ਦੁਖ ਮਹਿ ਜਨਮੈ ਦੁਖ ਮਹਿ ਮਰਣਾ ॥
ਦੂਖੁ ਨ ਮਿਟੈ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਕੀ ਸਰਣਾ ॥
ਦੂਖੀ ਉਪਜੈ ਦੂਖੀ ਬਿਨਸੈ ਕਿਆ ਲੈ ਆਇਆ ਕਿਆ ਲੈ ਜਾਹਾ ਹੇ ॥੧੨॥
ਸਚੀ ਕਰਣੀ ਗੁਰ ਕੀ ਸਿਰਕਾਰਾ ॥
ਆਵਣੁ ਜਾਣੁ ਨਹੀ ਜਮ ਧਾਰਾ ॥
ਡਾਲ ਛੋਡਿ ਤਤੁ ਮੂਲੁ ਪਰਾਤਾ ਮਨਿ ਸਾਚਾ ਓਮਾਹਾ ਹੇ ॥੧੩॥
ਹਰਿ ਕੇ ਲੋਗ ਨਹੀ ਜਮੁ ਮਾਰੈ ॥
ਨਾ ਦੁਖੁ ਦੇਖਹਿ ਪੰਥਿ ਕਰਾਰੈ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਪੂਜਾ ਅਵਰੁ ਨ ਦੂਜਾ ਕਾਹਾ ਹੇ ॥੧੪॥
ਓੜੁ ਨ ਕਥਨੈ ਸਿਫਤਿ ਸਜਾਈ ॥
ਜਿਉ ਤੁਧੁ ਭਾਵਹਿ ਰਹਹਿ ਰਜਾਈ ॥
ਦਰਗਹ ਪੈਧੇ ਜਾਨਿ ਸੁਹੇਲੇ ਹੁਕਮਿ ਸਚੇ ਪਾਤਿਸਾਹਾ ਹੇ ॥੧੫॥
ਕਿਆ ਕਹੀਐ ਗੁਣ ਕਥਹਿ ਘਨੇਰੇ ॥
ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਵਹਿ ਵਡੇ ਵਡੇਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਚੁ ਮਿਲੈ ਪਤਿ ਰਾਖਹੁ ਤੂ ਸਿਰਿ ਸਾਹਾ ਪਾਤਿਸਾਹਾ ਹੇ ॥੧੬॥੬॥੧੨॥
सभु को बोलै आपण भाणै ॥
मनमुखु दूजै बोलि न जाणै ॥
अंधुले की मति अंधली बोली आइ गइआ दुखु ताहा हे ॥११॥
दुख महि जनमै दुख महि मरणा ॥
दूखु न मिटै बिनु गुर की सरणा ॥
दूखी उपजै दूखी बिनसै किआ लै आइआ किआ लै जाहा हे ॥१२॥
सची करणी गुर की सिरकारा ॥
आवणु जाणु नही जम धारा ॥
डाल छोडि ततु मूलु पराता मनि साचा ओमाहा हे ॥१३॥
हरि के लोग नही जमु मारै ॥
ना दुखु देखहि पंथि करारै ॥
राम नामु घट अंतरि पूजा अवरु न दूजा काहा हे ॥१४॥
ओड़ु न कथनै सिफति सजाई ॥
जिउ तुधु भावहि रहहि रजाई ॥
दरगह पैधे जानि सुहेले हुकमि सचे पातिसाहा हे ॥१५॥
किआ कहीऐ गुण कथहि घनेरे ॥
अंतु न पावहि वडे वडेरे ॥
नानक साचु मिलै पति राखहु तू सिरि साहा पातिसाहा हे ॥१६॥६॥१२॥
मनमुखु दूजै बोलि न जाणै ॥
अंधुले की मति अंधली बोली आइ गइआ दुखु ताहा हे ॥११॥
दुख महि जनमै दुख महि मरणा ॥
दूखु न मिटै बिनु गुर की सरणा ॥
दूखी उपजै दूखी बिनसै किआ लै आइआ किआ लै जाहा हे ॥१२॥
सची करणी गुर की सिरकारा ॥
आवणु जाणु नही जम धारा ॥
डाल छोडि ततु मूलु पराता मनि साचा ओमाहा हे ॥१३॥
हरि के लोग नही जमु मारै ॥
ना दुखु देखहि पंथि करारै ॥
राम नामु घट अंतरि पूजा अवरु न दूजा काहा हे ॥१४॥
ओड़ु न कथनै सिफति सजाई ॥
जिउ तुधु भावहि रहहि रजाई ॥
दरगह पैधे जानि सुहेले हुकमि सचे पातिसाहा हे ॥१५॥
किआ कहीऐ गुण कथहि घनेरे ॥
अंतु न पावहि वडे वडेरे ॥
नानक साचु मिलै पति राखहु तू सिरि साहा पातिसाहा हे ॥१६॥६॥१२॥
हिन्दी अर्थ: अपने मन के पीछे चलने वाला हरेक मनुष्य प्रभू के बिना और आसरे की झाक में अपने स्वार्थ के स्वभाव में ही (सब वचन) बोलता है। (परमात्मा की सिफत-सालाह के बोल) बोलना नहीं जानता। माया के मोह में अंधे हो चुके मनुष्य की बुद्धि अंधी व बहरी हो जाती है (उसको ना कहीं परमात्मा दिखता है। ना ही उसकी सिफत-सालाह वह सुनता है)। उसको जनम-मरण के चक्करों में दुख मिलता रहता है। 11। मनमुख मनुष्य दुखों में ग्रसित हुआ पैदा होता है (सारी उम्र दुख सह-सह के) दुखों में ही मरता है। गुरू की शरण पड़े बिना (ये जन्म-जन्मांतरों का लंबा) दुख मिट नहीं सकता। दुखों में पैदा होता और दुखों में ही मरता है। सदाचारी आत्मिक जीवन ना ही ले के यहाँ आता है। ना ही यहाँ से ले के जाता है। 12। गुरू की अगुवाई में चलना ही सही जीवन-रास्ता है। इस तरह जनम-मरण के चक्कर समाप्त हो जाते हैं। आत्मिक मौत के रास्ते से भी बचा जाता है। जो मनुष्य (गुरू की रहनुमाई में) टहनियों को छोड़ कर मूल को पहचान लेता है (प्रभू की रची हुई माया का मोह छोड़ कर सृजनहार प्रभू के साथ जान-पहचान बनाता है) उसके मन में सदा-स्थिर रहने वाला उत्साह पैदा हो जाता है। 13। जो लोग परमात्मा के सेवक बनते हैं उनको जम नहीं मार सकता (आत्मिक मौत नहीं मार सकती)। वह (आत्मिक मौत के) कठिन रास्ते पर (नहीं पड़ते और) दुख नहीं देखते। उनके हृदय में परमात्मा का नाम बसता है (वे अंतरात्मे परमात्मा की) भगती करते हैं। उनको (माया का) कोई और बखेड़ा नहीं होता। 14। हे प्रभू ! तेरे भगत जैसे तुझे अच्छे लगते हैं तेरी रजा में रहते हैं। वे तेरी सुंदर सिफतें करते रहते हैं उनके इस उद्यम का खात्मा नहीं होता। हे सदा-स्थिर रहने वाले पातशाह ! तेरे हुकम के अनुसार वे तेरी हजूरी में सम्मान-सहित आसानी से पहुँचते हैं। 15। हे प्रभू ! अनेकों ही जीव तेरे गुण कथन करते हैं। तेरे गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। (दुनिया में) बड़े-बड़े (देवते आदि कहलवाने वाले भी) तेरे गुणों का अंत नहीं पा सकते। हे प्रभू ! तू पातशाहों के सिर पर भी पातशाह है (मेरी अरदास है) मुझे नानक को तेरा सदा-स्थिर रहने वाला नाम मिल जाए। मेरी लाज रख। 16। 6। 12।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ਦਖਣੀ ॥
ਕਾਇਆ ਨਗਰੁ ਨਗਰ ਗੜ ਅੰਦਰਿ ॥
ਸਾਚਾ ਵਾਸਾ ਪੁਰਿ ਗਗਨੰਦਰਿ ॥
ਅਸਥਿਰੁ ਥਾਨੁ ਸਦਾ ਨਿਰਮਾਇਲੁ ਆਪੇ ਆਪੁ ਉਪਾਇਦਾ ॥੧॥
ਅੰਦਰਿ ਕੋਟ ਛਜੇ ਹਟਨਾਲੇ ॥
ਆਪੇ ਲੇਵੈ ਵਸਤੁ ਸਮਾਲੇ ॥
ਬਜਰ ਕਪਾਟ ਜੜੇ ਜੜਿ ਜਾਣੈ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਖੋਲਾਇਦਾ ॥੨॥
ਭੀਤਰਿ ਕੋਟ ਗੁਫਾ ਘਰ ਜਾਈ ॥
ਨਉ ਘਰ ਥਾਪੇ ਹੁਕਮਿ ਰਜਾਈ ॥
ਦਸਵੈ ਪੁਰਖੁ ਅਲੇਖੁ ਅਪਾਰੀ ਆਪੇ ਅਲਖੁ ਲਖਾਇਦਾ ॥੩॥
ਪਉਣ ਪਾਣੀ ਅਗਨੀ ਇਕ ਵਾਸਾ ॥
ਆਪੇ ਕੀਤੋ ਖੇਲੁ ਤਮਾਸਾ ॥
ਬਲਦੀ ਜਲਿ ਨਿਵਰੈ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਆਪੇ ਜਲ ਨਿਧਿ ਪਾਇਦਾ ॥੪॥
ਧਰਤਿ ਉਪਾਇ ਧਰੀ ਧਰਮ ਸਾਲਾ ॥
ਉਤਪਤਿ ਪਰਲਉ ਆਪਿ ਨਿਰਾਲਾ ॥
ਪਵਣੈ ਖੇਲੁ ਕੀਆ ਸਭ ਥਾਈ ਕਲਾ ਖਿੰਚਿ ਢਾਹਾਇਦਾ ॥੫॥
ਭਾਰ ਅਠਾਰਹ ਮਾਲਣਿ ਤੇਰੀ ॥
ਚਉਰੁ ਢੁਲੈ ਪਵਣੈ ਲੈ ਫੇਰੀ ॥
ਚੰਦੁ ਸੂਰਜੁ ਦੁਇ ਦੀਪਕ ਰਾਖੇ ਸਸਿ ਘਰਿ ਸੂਰੁ ਸਮਾਇਦਾ ॥੬॥
ਪੰਖੀ ਪੰਚ ਉਡਰਿ ਨਹੀ ਧਾਵਹਿ ॥
ਸਫਲਿਓ ਬਿਰਖੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਫਲੁ ਪਾਵਹਿ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਹਜਿ ਰਵੈ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਹਰਿ ਰਸੁ ਚੋਗ ਚੁਗਾਇਦਾ ॥੭॥
ਝਿਲਮਿਲਿ ਝਿਲਕੈ ਚੰਦੁ ਨ ਤਾਰਾ ॥
ਸੂਰਜ ਕਿਰਣਿ ਨ ਬਿਜੁਲਿ ਗੈਣਾਰਾ ॥
ਅਕਥੀ ਕਥਉ ਚਿਹਨੁ ਨਹੀ ਕੋਈ ਪੂਰਿ ਰਹਿਆ ਮਨਿ ਭਾਇਦਾ ॥੮॥
ਪਸਰੀ ਕਿਰਣਿ ਜੋਤਿ ਉਜਿਆਲਾ ॥
ਕਰਿ ਕਰਿ ਦੇਖੈ ਆਪਿ ਦਇਆਲਾ ॥
ਅਨਹਦ ਰੁਣ ਝੁਣਕਾਰੁ ਸਦਾ ਧੁਨਿ ਨਿਰਭਉ ਕੈ ਘਰਿ ਵਾਇਦਾ ॥੯॥
ਕਾਇਆ ਨਗਰੁ ਨਗਰ ਗੜ ਅੰਦਰਿ ॥
ਸਾਚਾ ਵਾਸਾ ਪੁਰਿ ਗਗਨੰਦਰਿ ॥
ਅਸਥਿਰੁ ਥਾਨੁ ਸਦਾ ਨਿਰਮਾਇਲੁ ਆਪੇ ਆਪੁ ਉਪਾਇਦਾ ॥੧॥
ਅੰਦਰਿ ਕੋਟ ਛਜੇ ਹਟਨਾਲੇ ॥
ਆਪੇ ਲੇਵੈ ਵਸਤੁ ਸਮਾਲੇ ॥
ਬਜਰ ਕਪਾਟ ਜੜੇ ਜੜਿ ਜਾਣੈ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਖੋਲਾਇਦਾ ॥੨॥
ਭੀਤਰਿ ਕੋਟ ਗੁਫਾ ਘਰ ਜਾਈ ॥
ਨਉ ਘਰ ਥਾਪੇ ਹੁਕਮਿ ਰਜਾਈ ॥
ਦਸਵੈ ਪੁਰਖੁ ਅਲੇਖੁ ਅਪਾਰੀ ਆਪੇ ਅਲਖੁ ਲਖਾਇਦਾ ॥੩॥
ਪਉਣ ਪਾਣੀ ਅਗਨੀ ਇਕ ਵਾਸਾ ॥
ਆਪੇ ਕੀਤੋ ਖੇਲੁ ਤਮਾਸਾ ॥
ਬਲਦੀ ਜਲਿ ਨਿਵਰੈ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਆਪੇ ਜਲ ਨਿਧਿ ਪਾਇਦਾ ॥੪॥
ਧਰਤਿ ਉਪਾਇ ਧਰੀ ਧਰਮ ਸਾਲਾ ॥
ਉਤਪਤਿ ਪਰਲਉ ਆਪਿ ਨਿਰਾਲਾ ॥
ਪਵਣੈ ਖੇਲੁ ਕੀਆ ਸਭ ਥਾਈ ਕਲਾ ਖਿੰਚਿ ਢਾਹਾਇਦਾ ॥੫॥
ਭਾਰ ਅਠਾਰਹ ਮਾਲਣਿ ਤੇਰੀ ॥
ਚਉਰੁ ਢੁਲੈ ਪਵਣੈ ਲੈ ਫੇਰੀ ॥
ਚੰਦੁ ਸੂਰਜੁ ਦੁਇ ਦੀਪਕ ਰਾਖੇ ਸਸਿ ਘਰਿ ਸੂਰੁ ਸਮਾਇਦਾ ॥੬॥
ਪੰਖੀ ਪੰਚ ਉਡਰਿ ਨਹੀ ਧਾਵਹਿ ॥
ਸਫਲਿਓ ਬਿਰਖੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਫਲੁ ਪਾਵਹਿ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਹਜਿ ਰਵੈ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਹਰਿ ਰਸੁ ਚੋਗ ਚੁਗਾਇਦਾ ॥੭॥
ਝਿਲਮਿਲਿ ਝਿਲਕੈ ਚੰਦੁ ਨ ਤਾਰਾ ॥
ਸੂਰਜ ਕਿਰਣਿ ਨ ਬਿਜੁਲਿ ਗੈਣਾਰਾ ॥
ਅਕਥੀ ਕਥਉ ਚਿਹਨੁ ਨਹੀ ਕੋਈ ਪੂਰਿ ਰਹਿਆ ਮਨਿ ਭਾਇਦਾ ॥੮॥
ਪਸਰੀ ਕਿਰਣਿ ਜੋਤਿ ਉਜਿਆਲਾ ॥
ਕਰਿ ਕਰਿ ਦੇਖੈ ਆਪਿ ਦਇਆਲਾ ॥
ਅਨਹਦ ਰੁਣ ਝੁਣਕਾਰੁ ਸਦਾ ਧੁਨਿ ਨਿਰਭਉ ਕੈ ਘਰਿ ਵਾਇਦਾ ॥੯॥
मारू महला १ दखणी ॥
काइआ नगरु नगर गड़ अंदरि ॥
साचा वासा पुरि गगनंदरि ॥
असथिरु थानु सदा निरमाइलु आपे आपु उपाइदा ॥१॥
अंदरि कोट छजे हटनाले ॥
आपे लेवै वसतु समाले ॥
बजर कपाट जड़े जड़ि जाणै गुर सबदी खोलाइदा ॥२॥
भीतरि कोट गुफा घर जाई ॥
नउ घर थापे हुकमि रजाई ॥
दसवै पुरखु अलेखु अपारी आपे अलखु लखाइदा ॥३॥
पउण पाणी अगनी इक वासा ॥
आपे कीतो खेलु तमासा ॥
बलदी जलि निवरै किरपा ते आपे जल निधि पाइदा ॥४॥
धरति उपाइ धरी धरम साला ॥
उतपति परलउ आपि निराला ॥
पवणै खेलु कीआ सभ थाई कला खिंचि ढाहाइदा ॥५॥
भार अठारह मालणि तेरी ॥
चउरु ढुलै पवणै लै फेरी ॥
चंदु सूरजु दुइ दीपक राखे ससि घरि सूरु समाइदा ॥६॥
पंखी पंच उडरि नही धावहि ॥
सफलिओ बिरखु अंम्रित फलु पावहि ॥
गुरमुखि सहजि रवै गुण गावै हरि रसु चोग चुगाइदा ॥७॥
झिलमिलि झिलकै चंदु न तारा ॥
सूरज किरणि न बिजुलि गैणारा ॥
अकथी कथउ चिहनु नही कोई पूरि रहिआ मनि भाइदा ॥८॥
पसरी किरणि जोति उजिआला ॥
करि करि देखै आपि दइआला ॥
अनहद रुण झुणकारु सदा धुनि निरभउ कै घरि वाइदा ॥९॥
काइआ नगरु नगर गड़ अंदरि ॥
साचा वासा पुरि गगनंदरि ॥
असथिरु थानु सदा निरमाइलु आपे आपु उपाइदा ॥१॥
अंदरि कोट छजे हटनाले ॥
आपे लेवै वसतु समाले ॥
बजर कपाट जड़े जड़ि जाणै गुर सबदी खोलाइदा ॥२॥
भीतरि कोट गुफा घर जाई ॥
नउ घर थापे हुकमि रजाई ॥
दसवै पुरखु अलेखु अपारी आपे अलखु लखाइदा ॥३॥
पउण पाणी अगनी इक वासा ॥
आपे कीतो खेलु तमासा ॥
बलदी जलि निवरै किरपा ते आपे जल निधि पाइदा ॥४॥
धरति उपाइ धरी धरम साला ॥
उतपति परलउ आपि निराला ॥
पवणै खेलु कीआ सभ थाई कला खिंचि ढाहाइदा ॥५॥
भार अठारह मालणि तेरी ॥
चउरु ढुलै पवणै लै फेरी ॥
चंदु सूरजु दुइ दीपक राखे ससि घरि सूरु समाइदा ॥६॥
पंखी पंच उडरि नही धावहि ॥
सफलिओ बिरखु अंम्रित फलु पावहि ॥
गुरमुखि सहजि रवै गुण गावै हरि रसु चोग चुगाइदा ॥७॥
झिलमिलि झिलकै चंदु न तारा ॥
सूरज किरणि न बिजुलि गैणारा ॥
अकथी कथउ चिहनु नही कोई पूरि रहिआ मनि भाइदा ॥८॥
पसरी किरणि जोति उजिआला ॥
करि करि देखै आपि दइआला ॥
अनहद रुण झुणकारु सदा धुनि निरभउ कै घरि वाइदा ॥९॥
हिन्दी अर्थ: {पन्ना 1033-1मारू दखणी-दखणी किस्म की मारू रागिनी।॥ (लोग अपने बसने के लिए शहर बसाते हैं और रक्षा के लिए किले बनाते हैं। इन) शहरों और किलों (की गिनती) में (मनुष्य का) शरीर भी एक शहर है (ये शहर परमात्मा ने अपने बसने के लिए बसाया है)। इस शरीर में इसके दसम-द्वार में प्रभू का सदा-स्थिर निवास है। वह परमात्मा पवित्र-स्वरूप है। उसका ठिकाना सदा कायम रहने वाला है। वह स्वयं ही अपने आप को (शरीरों के रूप में) प्रकट करता है। 1। इस (शरीर-) किले के अंदर ही। मानो। छॅजे और बाजार हैं जिनमें प्रभू खुद ही सौदा खरीदता है और संभालता है। (माया के मोह के) मजबूत किवाड़ भी अंदर जड़े हुए हैं। परमात्मा खुद ही ये किवाड़ बंद करने जानता है और खुद ही गुरू-शबद में (जीव को जोड़ के किवाड़) खुला देता है। 2। इस (शरीर) किले गुफा में परमात्मा की रिहायश की जगह है। रज़ा के मालिक प्रभू ने अपने हुकम में ही (इस किले में) नौ घर बना दिए हैं (जो प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं)। दसवें घर में (जो गुप्त है) सर्व-व्यापक लेखे से रहित और बेअंत प्रभू खुद बसता है। वह अदृश्य प्रभू स्वयं ही अपने आप के दर्शन करवाता है। 3। (इस शरीर में उसने) हवा। पानी। आग (आदि तत्वों) को एक साथ बसा दिया है। (जगत रचना का) यह खेल और तमाश उसने खुद ही रचा हुआ है। जो जलती हुई आग उसकी कृपा से पानी से बुझ जाती है वही आग (बड़वा अग्नि) उसने समुंद्र में टिका रखी है। 4। धरती पैदा करके परमात्मा ने इसको धर्म कमाने की स्थली बना दी है। जगत की उत्पक्ति और प्रलय करने वाला परमात्मा स्वयं ही है। पर खुद इस उत्पक्ति और प्रलय से निर्लिप रहता है। हर जगह (भाव। सब जीवों में) उसने श्वासों की खेल रची हुई है (भाव। श्वासों के आसरे जीव जीवित रखे हुए हैं)। खुद ही (इन श्वासों की) ताकत खींच के (निकाल के शरीरों की खेल को) गिरा देता है। 5। हे प्रभू ! सारी सृष्टि की वनस्पति (तेरे आगे फूल भेटा करने वाली) तेरी मालिन है (जो हवा) फेरियाँ लेती है (भाव। हर तरफ चलती है। उस) वायु का (मानो) चवर (तेरे ऊपर) झूल रहा है। (अपने जगत-महल में) तूने खुद ही चाँद और सूरज (मानो) दो दीए (जला) रखे हैं। चँद्रमा के घर में सूरज समाया हुआ है (सूरज की किरणें चँद्रमा में पड़ कर चँद्रमा को रौशनी दे रही हैं)। 6। उनकी (ज्ञानेन्द्रियाँ) पक्षी उड़ के बाहर (विकारों की ओर) दौड़ते नहीं फिरते। गुरू (मानो) फल देने वाला वृक्ष है (इस वृक्ष से जो) गुरमुख आत्मिक जीवन देने वाला नाम-फल प्राप्त करते हैं। गुरू के सन्मुख रहने वाला जीव-पक्षी आत्मिक अडोलता में रह कर नाम सिमरता है और प्रभू के गुण गाता है। प्रभू स्वयं ही उसको अपना नाम-रस (रूपी) चोग चुगाता है। 7। (‘सफल बिरख’ अर्थात सफल वृक्ष गुरू से आत्मिक जीवन देने वाला नाम-फल प्राप्त करने वाले गुरमुख के अंदर आत्म-प्रकाश पैदा होता है जो) ऐसा झिलमिल-झिलमिल करके चमकता है कि उसकी चमक तक ना चाँद। ना कोई तारा। ना सूरज की किरण। और ना ही आकाश की बिजली पहुँच सकती है (बराबरी कर सकती है)। (मैं उस प्रकाश का) बयान तो कर रहा हूँ (पर वह प्रकाश) बयान से बाहर है उसका कोई निशान नहीं दिया जा सकता। (जिस मनुष्य के अंदर वह प्रकाश अपना) ज़हूर करता है उसके मन को वह बहुत भाता है। 8। (जिस मनुष्य के अंदर ‘सफल बिरख’ गुरू की मेहर से) ईश्वरीय ज्योति की किरण प्रकाशमान होती है उसके अंदर (आत्मिक) रौशनी होती है। दया का श्रोत प्रभू स्वयं ही यह करिश्मे कर कर के देखता है। (उस गुरमुख के अंदर। मानो) एक-रस मीठी-मीठी सुर वाला गीत चल पड़ता है जिसकी धुनि सदा (उसके अंदर जारी रहती है)। (वह गुरमुख अपने अंदर। मानो। ऐसा साज़) बजाने लग जाता है (जिसकी बरकति से) वह निडरता के आत्मिक ठिकाने में (टिक जाता है)। 9।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1033 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
Diwali की पहली रात, अकेले बालकनी में पटाख़ों के बीच एक specific shift।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 46 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1033” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1034 →, पीछे का: ← अंग 1032।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।