अंग
1045
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗਿਆਨੀ ਧਿਆਨੀ ਆਖਿ ਸੁਣਾਏ ॥
ਸਭਨਾ ਰਿਜਕੁ ਸਮਾਹੇ ਆਪੇ ਕੀਮਤਿ ਹੋਰ ਨ ਹੋਈ ਹੇ ॥੨॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਅੰਧੁ ਅੰਧਾਰਾ ॥
ਹਉਮੈ ਮੇਰਾ ਪਸਰਿਆ ਪਾਸਾਰਾ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਜਲਤ ਰਹੈ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਸਾਂਤਿ ਨ ਹੋਈ ਹੇ ॥੩॥
ਆਪੇ ਜੋੜਿ ਵਿਛੋੜੇ ਆਪੇ ॥
ਆਪੇ ਥਾਪਿ ਉਥਾਪੇ ਆਪੇ ॥
ਸਚਾ ਹੁਕਮੁ ਸਚਾ ਪਾਸਾਰਾ ਹੋਰਨਿ ਹੁਕਮੁ ਨ ਹੋਈ ਹੇ ॥੪॥
ਆਪੇ ਲਾਇ ਲਏ ਸੋ ਲਾਗੈ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਜਮ ਕਾ ਭਉ ਭਾਗੈ ॥
ਅੰਤਰਿ ਸਬਦੁ ਸਦਾ ਸੁਖਦਾਤਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੂਝੈ ਕੋਈ ਹੇ ॥੫॥
ਆਪੇ ਮੇਲੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਏ ॥
ਪੁਰਬਿ ਲਿਖਿਆ ਸੋ ਮੇਟਣਾ ਨ ਜਾਏ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਭਗਤਿ ਕਰੇ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੇਵਾ ਹੋਈ ਹੇ ॥੬॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਜਾਤਾ ॥
ਆਪੇ ਆਇ ਮਿਲਿਆ ਸਭਨਾ ਕਾ ਦਾਤਾ ॥
ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਅਗਨਿ ਨਿਵਾਰੀ ਸਬਦੁ ਚੀਨਿ ਸੁਖੁ ਹੋਈ ਹੇ ॥੭॥
ਕਾਇਆ ਕੁਟੰਬੁ ਮੋਹੁ ਨ ਬੂਝੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਤ ਆਖੀ ਸੂਝੈ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮੁ ਰਵੈ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਮਿਲਿ ਪ੍ਰੀਤਮ ਸੁਖੁ ਹੋਈ ਹੇ ॥੮॥
ਮਨਮੁਖ ਧਾਤੁ ਦੂਜੈ ਹੈ ਲਾਗਾ ॥
ਜਨਮਤ ਕੀ ਨ ਮੂਓ ਆਭਾਗਾ ॥
ਆਵਤ ਜਾਤ ਬਿਰਥਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇਆ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਮੁਕਤਿ ਨ ਹੋਈ ਹੇ ॥੯॥
ਕਾਇਆ ਕੁਸੁਧ ਹਉਮੈ ਮਲੁ ਲਾਈ ॥
ਜੇ ਸਉ ਧੋਵਹਿ ਤਾ ਮੈਲੁ ਨ ਜਾਈ ॥
ਸਬਦਿ ਧੋਪੈ ਤਾ ਹਛੀ ਹੋਵੈ ਫਿਰਿ ਮੈਲੀ ਮੂਲਿ ਨ ਹੋਈ ਹੇ ॥੧੦॥
ਪੰਚ ਦੂਤ ਕਾਇਆ ਸੰਘਾਰਹਿ ॥
ਮਰਿ ਮਰਿ ਜੰਮਹਿ ਸਬਦੁ ਨ ਵੀਚਾਰਹਿ ॥
ਅੰਤਰਿ ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਗੁਬਾਰਾ ਜਿਉ ਸੁਪਨੈ ਸੁਧਿ ਨ ਹੋਈ ਹੇ ॥੧੧॥
ਇਕਿ ਪੰਚਾ ਮਾਰਿ ਸਬਦਿ ਹੈ ਲਾਗੇ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਆਇ ਮਿਲਿਆ ਵਡਭਾਗੇ ॥
ਅੰਤਰਿ ਸਾਚੁ ਰਵਹਿ ਰੰਗਿ ਰਾਤੇ ਸਹਜਿ ਸਮਾਵੈ ਸੋਈ ਹੇ ॥੧੨॥
ਗੁਰ ਕੀ ਚਾਲ ਗੁਰੂ ਤੇ ਜਾਪੈ ॥
ਪੂਰਾ ਸੇਵਕੁ ਸਬਦਿ ਸਿਞਾਪੈ ॥
ਸਦਾ ਸਬਦੁ ਰਵੈ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਰਸਨਾ ਰਸੁ ਚਾਖੈ ਸਚੁ ਸੋਈ ਹੇ ॥੧੩॥
ਹਉਮੈ ਮਾਰੇ ਸਬਦਿ ਨਿਵਾਰੇ ॥
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਰਖੈ ਉਰਿ ਧਾਰੇ ॥
ਏਕਸੁ ਬਿਨੁ ਹਉ ਹੋਰੁ ਨ ਜਾਣਾ ਸਹਜੇ ਹੋਇ ਸੁ ਹੋਈ ਹੇ ॥੧੪॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਸਹਜੁ ਕਿਨੈ ਨਹੀ ਪਾਇਆ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੂਝੈ ਸਚਿ ਸਮਾਇਆ ॥
ਸਚਾ ਸੇਵਿ ਸਬਦਿ ਸਚ ਰਾਤੇ ਹਉਮੈ ਸਬਦੇ ਖੋਈ ਹੇ ॥੧੫॥
ਆਪੇ ਗੁਣਦਾਤਾ ਬੀਚਾਰੀ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਦੇਵਹਿ ਪਕੀ ਸਾਰੀ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਸਮਾਵਹਿ ਸਾਚੈ ਸਾਚੇ ਤੇ ਪਤਿ ਹੋਈ ਹੇ ॥੧੬॥੨॥
ਸਭਨਾ ਰਿਜਕੁ ਸਮਾਹੇ ਆਪੇ ਕੀਮਤਿ ਹੋਰ ਨ ਹੋਈ ਹੇ ॥੨॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਅੰਧੁ ਅੰਧਾਰਾ ॥
ਹਉਮੈ ਮੇਰਾ ਪਸਰਿਆ ਪਾਸਾਰਾ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਜਲਤ ਰਹੈ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਸਾਂਤਿ ਨ ਹੋਈ ਹੇ ॥੩॥
ਆਪੇ ਜੋੜਿ ਵਿਛੋੜੇ ਆਪੇ ॥
ਆਪੇ ਥਾਪਿ ਉਥਾਪੇ ਆਪੇ ॥
ਸਚਾ ਹੁਕਮੁ ਸਚਾ ਪਾਸਾਰਾ ਹੋਰਨਿ ਹੁਕਮੁ ਨ ਹੋਈ ਹੇ ॥੪॥
ਆਪੇ ਲਾਇ ਲਏ ਸੋ ਲਾਗੈ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਜਮ ਕਾ ਭਉ ਭਾਗੈ ॥
ਅੰਤਰਿ ਸਬਦੁ ਸਦਾ ਸੁਖਦਾਤਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੂਝੈ ਕੋਈ ਹੇ ॥੫॥
ਆਪੇ ਮੇਲੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਏ ॥
ਪੁਰਬਿ ਲਿਖਿਆ ਸੋ ਮੇਟਣਾ ਨ ਜਾਏ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਭਗਤਿ ਕਰੇ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੇਵਾ ਹੋਈ ਹੇ ॥੬॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਜਾਤਾ ॥
ਆਪੇ ਆਇ ਮਿਲਿਆ ਸਭਨਾ ਕਾ ਦਾਤਾ ॥
ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਅਗਨਿ ਨਿਵਾਰੀ ਸਬਦੁ ਚੀਨਿ ਸੁਖੁ ਹੋਈ ਹੇ ॥੭॥
ਕਾਇਆ ਕੁਟੰਬੁ ਮੋਹੁ ਨ ਬੂਝੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਤ ਆਖੀ ਸੂਝੈ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮੁ ਰਵੈ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਮਿਲਿ ਪ੍ਰੀਤਮ ਸੁਖੁ ਹੋਈ ਹੇ ॥੮॥
ਮਨਮੁਖ ਧਾਤੁ ਦੂਜੈ ਹੈ ਲਾਗਾ ॥
ਜਨਮਤ ਕੀ ਨ ਮੂਓ ਆਭਾਗਾ ॥
ਆਵਤ ਜਾਤ ਬਿਰਥਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇਆ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਮੁਕਤਿ ਨ ਹੋਈ ਹੇ ॥੯॥
ਕਾਇਆ ਕੁਸੁਧ ਹਉਮੈ ਮਲੁ ਲਾਈ ॥
ਜੇ ਸਉ ਧੋਵਹਿ ਤਾ ਮੈਲੁ ਨ ਜਾਈ ॥
ਸਬਦਿ ਧੋਪੈ ਤਾ ਹਛੀ ਹੋਵੈ ਫਿਰਿ ਮੈਲੀ ਮੂਲਿ ਨ ਹੋਈ ਹੇ ॥੧੦॥
ਪੰਚ ਦੂਤ ਕਾਇਆ ਸੰਘਾਰਹਿ ॥
ਮਰਿ ਮਰਿ ਜੰਮਹਿ ਸਬਦੁ ਨ ਵੀਚਾਰਹਿ ॥
ਅੰਤਰਿ ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਗੁਬਾਰਾ ਜਿਉ ਸੁਪਨੈ ਸੁਧਿ ਨ ਹੋਈ ਹੇ ॥੧੧॥
ਇਕਿ ਪੰਚਾ ਮਾਰਿ ਸਬਦਿ ਹੈ ਲਾਗੇ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਆਇ ਮਿਲਿਆ ਵਡਭਾਗੇ ॥
ਅੰਤਰਿ ਸਾਚੁ ਰਵਹਿ ਰੰਗਿ ਰਾਤੇ ਸਹਜਿ ਸਮਾਵੈ ਸੋਈ ਹੇ ॥੧੨॥
ਗੁਰ ਕੀ ਚਾਲ ਗੁਰੂ ਤੇ ਜਾਪੈ ॥
ਪੂਰਾ ਸੇਵਕੁ ਸਬਦਿ ਸਿਞਾਪੈ ॥
ਸਦਾ ਸਬਦੁ ਰਵੈ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਰਸਨਾ ਰਸੁ ਚਾਖੈ ਸਚੁ ਸੋਈ ਹੇ ॥੧੩॥
ਹਉਮੈ ਮਾਰੇ ਸਬਦਿ ਨਿਵਾਰੇ ॥
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਰਖੈ ਉਰਿ ਧਾਰੇ ॥
ਏਕਸੁ ਬਿਨੁ ਹਉ ਹੋਰੁ ਨ ਜਾਣਾ ਸਹਜੇ ਹੋਇ ਸੁ ਹੋਈ ਹੇ ॥੧੪॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਸਹਜੁ ਕਿਨੈ ਨਹੀ ਪਾਇਆ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੂਝੈ ਸਚਿ ਸਮਾਇਆ ॥
ਸਚਾ ਸੇਵਿ ਸਬਦਿ ਸਚ ਰਾਤੇ ਹਉਮੈ ਸਬਦੇ ਖੋਈ ਹੇ ॥੧੫॥
ਆਪੇ ਗੁਣਦਾਤਾ ਬੀਚਾਰੀ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਦੇਵਹਿ ਪਕੀ ਸਾਰੀ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਸਮਾਵਹਿ ਸਾਚੈ ਸਾਚੇ ਤੇ ਪਤਿ ਹੋਈ ਹੇ ॥੧੬॥੨॥
गिआनी धिआनी आखि सुणाए ॥
सभना रिजकु समाहे आपे कीमति होर न होई हे ॥२॥
माइआ मोहु अंधु अंधारा ॥
हउमै मेरा पसरिआ पासारा ॥
अनदिनु जलत रहै दिनु राती गुर बिनु सांति न होई हे ॥३॥
आपे जोड़ि विछोड़े आपे ॥
आपे थापि उथापे आपे ॥
सचा हुकमु सचा पासारा होरनि हुकमु न होई हे ॥४॥
आपे लाइ लए सो लागै ॥
गुर परसादी जम का भउ भागै ॥
अंतरि सबदु सदा सुखदाता गुरमुखि बूझै कोई हे ॥५॥
आपे मेले मेलि मिलाए ॥
पुरबि लिखिआ सो मेटणा न जाए ॥
अनदिनु भगति करे दिनु राती गुरमुखि सेवा होई हे ॥६॥
सतिगुरु सेवि सदा सुखु जाता ॥
आपे आइ मिलिआ सभना का दाता ॥
हउमै मारि त्रिसना अगनि निवारी सबदु चीनि सुखु होई हे ॥७॥
काइआ कुटंबु मोहु न बूझै ॥
गुरमुखि होवै त आखी सूझै ॥
अनदिनु नामु रवै दिनु राती मिलि प्रीतम सुखु होई हे ॥८॥
मनमुख धातु दूजै है लागा ॥
जनमत की न मूओ आभागा ॥
आवत जात बिरथा जनमु गवाइआ बिनु गुर मुकति न होई हे ॥९॥
काइआ कुसुध हउमै मलु लाई ॥
जे सउ धोवहि ता मैलु न जाई ॥
सबदि धोपै ता हछी होवै फिरि मैली मूलि न होई हे ॥१०॥
पंच दूत काइआ संघारहि ॥
मरि मरि जंमहि सबदु न वीचारहि ॥
अंतरि माइआ मोह गुबारा जिउ सुपनै सुधि न होई हे ॥११॥
इकि पंचा मारि सबदि है लागे ॥
सतिगुरु आइ मिलिआ वडभागे ॥
अंतरि साचु रवहि रंगि राते सहजि समावै सोई हे ॥१२॥
गुर की चाल गुरू ते जापै ॥
पूरा सेवकु सबदि सिञापै ॥
सदा सबदु रवै घट अंतरि रसना रसु चाखै सचु सोई हे ॥१३॥
हउमै मारे सबदि निवारे ॥
हरि का नामु रखै उरि धारे ॥
एकसु बिनु हउ होरु न जाणा सहजे होइ सु होई हे ॥१४॥
बिनु सतिगुर सहजु किनै नही पाइआ ॥
गुरमुखि बूझै सचि समाइआ ॥
सचा सेवि सबदि सच राते हउमै सबदे खोई हे ॥१५॥
आपे गुणदाता बीचारी ॥
गुरमुखि देवहि पकी सारी ॥
नानक नामि समावहि साचै साचे ते पति होई हे ॥१६॥२॥
सभना रिजकु समाहे आपे कीमति होर न होई हे ॥२॥
माइआ मोहु अंधु अंधारा ॥
हउमै मेरा पसरिआ पासारा ॥
अनदिनु जलत रहै दिनु राती गुर बिनु सांति न होई हे ॥३॥
आपे जोड़ि विछोड़े आपे ॥
आपे थापि उथापे आपे ॥
सचा हुकमु सचा पासारा होरनि हुकमु न होई हे ॥४॥
आपे लाइ लए सो लागै ॥
गुर परसादी जम का भउ भागै ॥
अंतरि सबदु सदा सुखदाता गुरमुखि बूझै कोई हे ॥५॥
आपे मेले मेलि मिलाए ॥
पुरबि लिखिआ सो मेटणा न जाए ॥
अनदिनु भगति करे दिनु राती गुरमुखि सेवा होई हे ॥६॥
सतिगुरु सेवि सदा सुखु जाता ॥
आपे आइ मिलिआ सभना का दाता ॥
हउमै मारि त्रिसना अगनि निवारी सबदु चीनि सुखु होई हे ॥७॥
काइआ कुटंबु मोहु न बूझै ॥
गुरमुखि होवै त आखी सूझै ॥
अनदिनु नामु रवै दिनु राती मिलि प्रीतम सुखु होई हे ॥८॥
मनमुख धातु दूजै है लागा ॥
जनमत की न मूओ आभागा ॥
आवत जात बिरथा जनमु गवाइआ बिनु गुर मुकति न होई हे ॥९॥
काइआ कुसुध हउमै मलु लाई ॥
जे सउ धोवहि ता मैलु न जाई ॥
सबदि धोपै ता हछी होवै फिरि मैली मूलि न होई हे ॥१०॥
पंच दूत काइआ संघारहि ॥
मरि मरि जंमहि सबदु न वीचारहि ॥
अंतरि माइआ मोह गुबारा जिउ सुपनै सुधि न होई हे ॥११॥
इकि पंचा मारि सबदि है लागे ॥
सतिगुरु आइ मिलिआ वडभागे ॥
अंतरि साचु रवहि रंगि राते सहजि समावै सोई हे ॥१२॥
गुर की चाल गुरू ते जापै ॥
पूरा सेवकु सबदि सिञापै ॥
सदा सबदु रवै घट अंतरि रसना रसु चाखै सचु सोई हे ॥१३॥
हउमै मारे सबदि निवारे ॥
हरि का नामु रखै उरि धारे ॥
एकसु बिनु हउ होरु न जाणा सहजे होइ सु होई हे ॥१४॥
बिनु सतिगुर सहजु किनै नही पाइआ ॥
गुरमुखि बूझै सचि समाइआ ॥
सचा सेवि सबदि सच राते हउमै सबदे खोई हे ॥१५॥
आपे गुणदाता बीचारी ॥
गुरमुखि देवहि पकी सारी ॥
नानक नामि समावहि साचै साचे ते पति होई हे ॥१६॥२॥
हिन्दी अर्थ: समझदार मनुष्य और समाधियाँ लगाने वाले भी (यही बात) कह के सुना गए हैं। वह परमात्मा खुद ही सब जीवों को रिज़क पहुँचाता है। उस परमात्मा के बराबर की और कोई हस्ती नहीं। 2। हे भाई ! (जगत में हर जगह) माया का मोह (भी प्रबल) है। (मोह के कारण जगत में) घोर अंधेरा बना हुआ है। (हर तरफ) अहंकार और ममता का पसारा पसरा हुआ है। जगत हर वक्त दिन-रात (तृष्णा की आग में) जल रहा है। गुरू की शरण के बिना शांति प्राप्त नहीं होती। 3। हे भाई ! परमात्मा स्वयं ही (जीवों को) जोड़ के (यहाँ परिवारों में इकट्ठे करके) खुद ही (इनको आपस से) विछोड़ देता है। आप ही पैदा करके आप ही नाश करता है। हे भाई ! परमात्मा का हुकम अटल है। (उसके हुकम में पैदा हुआ यह) जगत-पसारा भी सच-मुच अस्तित्व वाला है। किसी और द्वारा (ऐसा) हुकम नहीं चलाया जा सकता। 4। हे भाई ! जिस मनुष्य को परमात्मा स्वयं ही (अपने चरणों में) जोड़ लेता है। वह मनुष्य (प्रभू की भक्ति में) लगता है। गुरू की कृपा से (उसके अंदर से) मौत का डर दूर हो जाता है। उसके अंदर सदा आत्मिक आनंद देने वाला गुरू-शबद बसा रहता है। गुरू के सन्मुख रहने वाला ही कोई मनुष्य (इस भेद को) समझता है। 5। हे भाई ! परमात्मा स्वयं ही (पूर्बले लिखे अनुसार जीव को गुरू-चरणों में) जोड़ के (अपने साथ) मिलाता है। पूर्बले किए कर्मों के अनुसार जो लेख (माथे पर) लिखा जाता है। वह (जीव से) मिटाया नहीं जा सकता। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य हर वक्त दिन-रात परमात्मा की भगती करता है। गुरू की शरण पड़ने से ही भगती हो सकती है। 6। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर सदा आत्मिक आनंद पाया जा सकता है। सबको दातें देने वाला प्रभू भी (गुरू की शरण पड़ने से) आप ही आ मिलता है। (गुरू की शरण पड़ने वाला मनुष्य अपने अंदर से) अहंकार मार के तृष्णा की आग बुझा लेता है। हे भाई ! गुरू के शबद को पहचान के ही सुख मिल सकता है। 7। हे भाई ! (जिस मनुष्य को) शरीर का मोह (ग्रस रहा है) परिवार (का मोह ग्रस रहा है) (वह मनुष्य आत्मिक जीवन की खेल को) नहीं समझता। अगर मनुष्य गुरू की शरण पड़ जाए। तो इसको इन आँखों से सब कुछ दिखाई दे जाता है। वह मनुष्य हर वक्त दिन रात परमात्मा का नाम जपने लग जाता है। प्रीतम प्रभू को मिल के उसके अंदर आत्मिक आनंद बना रहता है। 8। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य को माया (ग्रसे रखती है। वह मनुष्य) माया (के आहर) में व्यस्त रहता है। पर वह बदनसीब पैदा होते ही क्यों ना मर गया। वह जनम-मरण के चक्करों में पड़ा हुआ व्यर्थ जनम गवा जाता है। गुरू के बिना (इस चक्कर में से) खलासी नहीं होती। 9। हे भाई ! वह शरीर अपवित्र है जिसको अहंकार की मैल लगी हुई है। अगर (ऐसे शरीर को तीर्थों आदि पर लोग) सौ-सौ बार भी धोते रहें। तो भी इसकी मैल दूर नहीं होती। (यदि मनुष्य का हृदय) गुरू के शबद से धोया जाय। तो शरीर पवित्र हो जाता है। दोबारा शरीर (अहंकार की मैल से) कभी गंदा नहीं होता। 10। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के शबद को अपने मन में नहीं बसाते। कामादिक पाँचों वैरी उनके शरीर को गलाते रहते हैं और वे जनम-मरण के चक्कर में पड़े रहते हैं। उनके अंदर माया के मोह का अंधेरा पड़ा रहता है। उनको अपने आप की सूझ नहीं होती। वे ऐसे हैं जैसे सपने में हैं। 11। वे कामादिक पाँचों को मार के गुरू के शबद में लीन रहते हैं; हे भाई ! कई ऐसे भाग्यशाली हैं। जिनको गुरू आ मिला है। अपने हृदय में सदा-स्थिर प्रभू को याद करते रहते हैं। वे प्रभू के प्रेम-रंग में रंगे रहते हैं। (हे भाई ! जो मनुष्य प्रेम-रंग में रंगा जाता है) वही आत्मिक अडोलता में लीन रहता है। 12। हे भाई ! गुरू वाली जीवन-जुगति गुरू से ही सीखी जा सकती है। गुरू के शबद में जुड़ा हुआ मनुष्य ही पूरन सेवक पहचाना जाता है; वही मनुष्य अपनी जीभ से सदा-स्थिर नाम-रस चखता रहता है और अपने हृदय में गुरू का शबद सदा बसाए रखता है। 13। हे भाई ! (पूर्ण सेवक) गुरू के शबद के माध्यम से अपने अहंकार को मार मुकाता है। स्वै भाव को दूर कर देता है। और परमात्मा का नाम अपने दिल में बसाए रखता है। (पूर्ण सेवक यही यकीन रखता है-) एक परमात्मा के बिना मैं किसी और को (उस जैसा) नहीं समझता। जो कुछ उसकी रज़ा में हो रहा है वही ठीक हो रहा है। 14। हे भाई ! गुरू की शरण के बिना किसी मनुष्य ने आत्मिक अडोलता प्राप्त नहीं की। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य ही इसको समझता है और सदा-स्थिर प्रभू में लीन रहता है। हे भाई ! सदा-स्थिर प्रभू की बाणी में रति हुए मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू का सिमरन कर के गुरू के शबद के द्वारा ही अहंकार दूर कर लेते हैं। 15। हे प्रभू ! तू स्वयं ही (योग्य पात्र) विचार के (जीवों को अपने) गुणों की दाति देने वाला है; जिन्हें तू गुरू के द्वारा (अपने गुणों की दाति) देता है वे इस जीवन-खेल में माहिर हो जाते हैं। हे नानक1 वह मनुष्य नाम में लीन रहते हैं। सदा-स्थिर प्रभू से ही उनको (लोक-परलोक की) इज्जत मिलती है। 16। 2।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਜਗਜੀਵਨੁ ਸਾਚਾ ਏਕੋ ਦਾਤਾ ॥
ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਤੇ ਸਬਦਿ ਪਛਾਤਾ ॥
ਜਗਜੀਵਨੁ ਸਾਚਾ ਏਕੋ ਦਾਤਾ ॥
ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਤੇ ਸਬਦਿ ਪਛਾਤਾ ॥
मारू महला ३ ॥
जगजीवनु साचा एको दाता ॥
गुर सेवा ते सबदि पछाता ॥
जगजीवनु साचा एको दाता ॥
गुर सेवा ते सबदि पछाता ॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला ३॥ हे भाई ! जो परमात्मा सदा कायम रहने वाला है और (सारे) जगत का सहारा है। वही सब जीवों को दातें देने वाला है। गुरू की शरण पड़ने से। गुरू के शबद से ही उसके साथ गहरी सांझ पड़ सकती है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1045 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
Sunday सुबह 7 बजे parents से 30-मिनट की video-call, बीच में silence।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 47 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1045” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1046 →, पीछे का: ← अंग 1044।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।