अंग 1061

अंग
1061
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਹੁਕਮੇ ਸਾਜੇ ਹੁਕਮੇ ਢਾਹੇ ਹੁਕਮੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਇਦਾ ॥੫॥
ਹੁਕਮੈ ਬੂਝੈ ਸੁ ਹੁਕਮੁ ਸਲਾਹੇ ॥
ਅਗਮ ਅਗੋਚਰ ਵੇਪਰਵਾਹੇ ॥
ਜੇਹੀ ਮਤਿ ਦੇਹਿ ਸੋ ਹੋਵੈ ਤੂ ਆਪੇ ਸਬਦਿ ਬੁਝਾਇਦਾ ॥੬॥
ਅਨਦਿਨੁ ਆਰਜਾ ਛਿਜਦੀ ਜਾਏ ॥
ਰੈਣਿ ਦਿਨਸੁ ਦੁਇ ਸਾਖੀ ਆਏ ॥
ਮਨਮੁਖੁ ਅੰਧੁ ਨ ਚੇਤੈ ਮੂੜਾ ਸਿਰ ਊਪਰਿ ਕਾਲੁ ਰੂਆਇਦਾ ॥੭॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਸੀਤਲੁ ਗੁਰ ਚਰਣੀ ਲਾਗਾ ॥
ਅੰਤਰਿ ਭਰਮੁ ਗਇਆ ਭਉ ਭਾਗਾ ॥
ਸਦਾ ਅਨੰਦੁ ਸਚੇ ਗੁਣ ਗਾਵਹਿ ਸਚੁ ਬਾਣੀ ਬੋਲਾਇਦਾ ॥੮॥
ਜਿਨਿ ਤੂ ਜਾਤਾ ਕਰਮ ਬਿਧਾਤਾ ॥
ਪੂਰੈ ਭਾਗਿ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਪਛਾਤਾ ॥
ਜਤਿ ਪਤਿ ਸਚੁ ਸਚਾ ਸਚੁ ਸੋਈ ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ਮਿਲਾਇਦਾ ॥੯॥
ਮਨੁ ਕਠੋਰੁ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਲਾਗਾ ॥
ਭਰਮੇ ਭੂਲਾ ਫਿਰੈ ਅਭਾਗਾ ॥
ਕਰਮੁ ਹੋਵੈ ਤਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੇ ਸਹਜੇ ਹੀ ਸੁਖੁ ਪਾਇਦਾ ॥੧੦॥
ਲਖ ਚਉਰਾਸੀਹ ਆਪਿ ਉਪਾਏ ॥
ਮਾਨਸ ਜਨਮਿ ਗੁਰ ਭਗਤਿ ਦ੍ਰਿੜਾਏ ॥
ਬਿਨੁ ਭਗਤੀ ਬਿਸਟਾ ਵਿਚਿ ਵਾਸਾ ਬਿਸਟਾ ਵਿਚਿ ਫਿਰਿ ਪਾਇਦਾ ॥੧੧॥
ਕਰਮੁ ਹੋਵੈ ਗੁਰੁ ਭਗਤਿ ਦ੍ਰਿੜਾਏ ॥
ਵਿਣੁ ਕਰਮਾ ਕਿਉ ਪਾਇਆ ਜਾਏ ॥
ਆਪੇ ਕਰੇ ਕਰਾਏ ਕਰਤਾ ਜਿਉ ਭਾਵੈ ਤਿਵੈ ਚਲਾਇਦਾ ॥੧੨॥
ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਸਾਸਤ ਅੰਤੁ ਨ ਜਾਣੈ ॥
ਮੂਰਖੁ ਅੰਧਾ ਤਤੁ ਨ ਪਛਾਣੈ ॥
ਆਪੇ ਕਰੇ ਕਰਾਏ ਕਰਤਾ ਆਪੇ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਇਦਾ ॥੧੩॥
ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਆਪੇ ਆਪਿ ਕਰਾਏ ॥
ਆਪੇ ਸਿਰਿ ਸਿਰਿ ਧੰਧੈ ਲਾਏ ॥
ਆਪੇ ਥਾਪਿ ਉਥਾਪੇ ਵੇਖੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਪਿ ਬੁਝਾਇਦਾ ॥੧੪॥
ਸਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਗਹਿਰ ਗੰਭੀਰਾ ॥
ਸਦਾ ਸਲਾਹੀ ਤਾ ਮਨੁ ਧੀਰਾ ॥
ਅਗਮ ਅਗੋਚਰੁ ਕੀਮਤਿ ਨਹੀ ਪਾਈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਮੰਨਿ ਵਸਾਇਦਾ ॥੧੫॥
ਆਪਿ ਨਿਰਾਲਮੁ ਹੋਰ ਧੰਧੈ ਲੋਈ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਬੂਝੈ ਕੋਈ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਵਸੈ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਗੁਰਮਤੀ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਇਦਾ ॥੧੬॥੩॥੧੭॥
हुकमे साजे हुकमे ढाहे हुकमे मेलि मिलाइदा ॥५॥
हुकमै बूझै सु हुकमु सलाहे ॥
अगम अगोचर वेपरवाहे ॥
जेही मति देहि सो होवै तू आपे सबदि बुझाइदा ॥६॥
अनदिनु आरजा छिजदी जाए ॥
रैणि दिनसु दुइ साखी आए ॥
मनमुखु अंधु न चेतै मूड़ा सिर ऊपरि कालु रूआइदा ॥७॥
मनु तनु सीतलु गुर चरणी लागा ॥
अंतरि भरमु गइआ भउ भागा ॥
सदा अनंदु सचे गुण गावहि सचु बाणी बोलाइदा ॥८॥
जिनि तू जाता करम बिधाता ॥
पूरै भागि गुर सबदि पछाता ॥
जति पति सचु सचा सचु सोई हउमै मारि मिलाइदा ॥९॥
मनु कठोरु दूजै भाइ लागा ॥
भरमे भूला फिरै अभागा ॥
करमु होवै ता सतिगुरु सेवे सहजे ही सुखु पाइदा ॥१०॥
लख चउरासीह आपि उपाए ॥
मानस जनमि गुर भगति द्रिड़ाए ॥
बिनु भगती बिसटा विचि वासा बिसटा विचि फिरि पाइदा ॥११॥
करमु होवै गुरु भगति द्रिड़ाए ॥
विणु करमा किउ पाइआ जाए ॥
आपे करे कराए करता जिउ भावै तिवै चलाइदा ॥१२॥
सिम्रिति सासत अंतु न जाणै ॥
मूरखु अंधा ततु न पछाणै ॥
आपे करे कराए करता आपे भरमि भुलाइदा ॥१३॥
सभु किछु आपे आपि कराए ॥
आपे सिरि सिरि धंधै लाए ॥
आपे थापि उथापे वेखै गुरमुखि आपि बुझाइदा ॥१४॥
सचा साहिबु गहिर गंभीरा ॥
सदा सलाही ता मनु धीरा ॥
अगम अगोचरु कीमति नही पाई गुरमुखि मंनि वसाइदा ॥१५॥
आपि निरालमु होर धंधै लोई ॥
गुर परसादी बूझै कोई ॥
नानक नामु वसै घट अंतरि गुरमती मेलि मिलाइदा ॥१६॥३॥१७॥

हिन्दी अर्थ: (इस सारे जगत को परमात्मा अपने) हुकम में पैदा करता है। हुकम में ही गिराता है। हुकम अनुसार ही (जीवों को गुरू से) मेल के (अपने चरणों में) जोड़ता है। 5। जो मनुष्य तेरे हुकम को समझ लेता है। वह उस हुकम की शोभा करता है। हे अपहुँच ! हे अगोचर ! हे बेपरवाह ! हे प्रभू ! तू जैसी मति (किसी मनुष्य को) देता है। वह वैसा ही बन जाता है। तू स्वयं ही गुरू शबद में (मनुष्य को जोड़ के उसको अपने हुकम की) सूझ बख्शता है। 6। हे भाई ! हर रोज हर वक्त मनुष्य की उम्र घटती जाती है। रात और दिन ये दोनों इस बात के गवाह हैं (जो दिन-रात गुजर जाता है। वह वापस उम्र में नहीं आ सकता)। पर मन का मुरीद माया के मोह में अंधा हुआ मूर्ख मनुष्य (इस बात को) याद नहीं करता। (उधर से) मौत (का नगारा) सिर पर गरजता रहता है। 7। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के चरणों में लगता है। उसका मन शांत रहता है उसका तन शांत रहता है। उसके अंदर (टिकी हुई) भटकना दूर हो जाती है। उसका हरेक किस्म का डर समाप्त हो जाता है। हे भाई ! जो मनुष्य (गुरू की कृपा से) सदा कायम रहने वाले परमात्मा के गुण गाते रहते हैं। उनको सदा आत्मिक आनंद मिला रहता है। (पर जीव के वश की बात नहीं) ये सिफत-सालाह की बाणी भी सदा कायम रहने वाला परमात्मा (स्वयं ही) उच्चारण के लिए प्रेरित करता है। 8। हे प्रभू ! तू जीवों के किए कर्मों के अनुसार पैदा करने वाला है। जिस (मनुष्य) ने तेरे साथ सांझ डाल ली। सौभाग्य से गुरू-शबद में जुड़ के उसने तुझे (हर जगह बसता) पहचान लिया। हे भाई ! जिस मनुष्य के अहंकार को मार के सदा स्थिर प्रभू उसको अपने साथ मिला लेता है। उसकी जाति वह स्वयं बन जाता है। उसकी कुल वह सदा कायम रहने वाला प्रभू आप बन जाता है। 9। हे भाई ! जो मनुष्य माया के मोह में फसा रहता है। उसका मन कठोर टिका रहता है। वह भाग्यहीन मनुष्य भटकना में पड़ कर गलत राह पर पड़ा रहता है। जब उस पर परमात्मा की मेहर होती है। तब वह गुरू की शरण पड़ता है। और आत्मिक अडोलता में टिका रह के आत्मिक आनंद लेता है। 10। हे भाई ! चौरासी लाख जूनियों के जीव (परमात्मा ने) खुद पैदा किए हैं। (उसकी मेहर से ही) मानस जनम में गुरू जीव के अंदर परमात्मा की भक्ति पक्की करता है। भगती के बिना जीव का निवास विकारों के गंद में रहता है। और। बार बार विकारों के गंद में ही पाया जाता है। 11। हे भाई ! जब परमात्मा की मेहर होती है। गुरू (मनुष्य के हृदय में) परमात्मा की भक्ति पक्की करता है। प्रभू की बख्शिश के बिना प्रभू के साथ मिलाप नहीं हो सकता। (पर जीवों के भी क्या वश। ) परमात्मा खुद ही (सब कुछ) करता है। खुद ही (जीवों से) करवाता है। जैसी उसकी मर्जी होती है। वैसे ही जीवों को चलाता है। 12। हे भाई ! स्मृतियों-शास्त्रों (के बताए हुए कर्म-काण्डों) के द्वारा मनुष्य (प्रभू के मिलाप का) भेद नहीं जान सकता। (कर्म-काण्ड में ही फसा) अंधा मूर्ख मनुष्य अस्लियत को नहीं समझ सकता। (पर इसके भी क्या वश। ) करतार स्वयं ही सब कुछ करता कराता है। स्वयं ही भटकना में डाल के गलत मार्ग पर डाले रखता है। 13। हे भाई ! परमात्मा स्वयं ही स्वयं (जीवों से) सब कुछ करवाता है। हरेक जीव के सिर पर लिखे लेख के अनुसार प्रभू स्वयं ही हरेक को मायावी दौड़-भाग में लगाए रखता है। प्रभू स्वयं ही (जीवों को) पैदा करके आप ही नाश करता है। स्वयं ही (सब की) संभाल करता है। गुरू की शरण में डाल के स्वयं ही (सही जीवन-मार्ग की) समझ देता है। 14। हे भाई ! मालिक-प्रभू सदा कायम रहने वाला है। अथाह है बड़े जिगरे वाला है। जग मैं सदा उस की सिफत सालाह करता हूँ। तो मेरे मन में धीरज बना रहता है। हे भाई1 उस अपहुँच और अगोचर परमात्मा का मूल्य नहीं पाया जा सकता (किसी दुनियावी पदार्थ के बदले वह नहीं मिल सकता)। गुरू की शरण डाल कर (अपना नाम मनुष्य के) मन में बसाता है। 15। हे भाई ! परमात्मा स्वयं निर्लिप है। और सारी दुनिया माया की दौड़-भाग में खचित रहती है। कोई विरला मनुष्य गुरू की कृपा से (उसके साथ) सांझ डालता है। हे नानक ! (जिस पर गुरू की कृपा होती है) उस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का नाम आ बसता है। गुरू की मति में जोड़ के (प्रभू मनुष्य को अपने चरणों में) मिलाता है। 16। 3। 17।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਜੁਗ ਛਤੀਹ ਕੀਓ ਗੁਬਾਰਾ ॥
ਤੂ ਆਪੇ ਜਾਣਹਿ ਸਿਰਜਣਹਾਰਾ ॥
ਹੋਰ ਕਿਆ ਕੋ ਕਹੈ ਕਿ ਆਖਿ ਵਖਾਣੈ ਤੂ ਆਪੇ ਕੀਮਤਿ ਪਾਇਦਾ ॥੧॥
ਓਅੰਕਾਰਿ ਸਭ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਉਪਾਈ ॥
ਸਭੁ ਖੇਲੁ ਤਮਾਸਾ ਤੇਰੀ ਵਡਿਆਈ ॥
ਆਪੇ ਵੇਕ ਕਰੇ ਸਭਿ ਸਾਚਾ ਆਪੇ ਭੰਨਿ ਘੜਾਇਦਾ ॥੨॥
ਬਾਜੀਗਰਿ ਇਕ ਬਾਜੀ ਪਾਈ ॥
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਤੇ ਨਦਰੀ ਆਈ ॥
ਸਦਾ ਅਲਿਪਤੁ ਰਹੈ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਸਾਚੇ ਸਿਉ ਚਿਤੁ ਲਾਇਦਾ ॥੩॥
ਬਾਜਹਿ ਬਾਜੇ ਧੁਨਿ ਆਕਾਰਾ ॥
ਆਪਿ ਵਜਾਏ ਵਜਾਵਣਹਾਰਾ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਪਉਣੁ ਵਹੈ ਇਕ ਰੰਗੀ ਮਿਲਿ ਪਵਣੈ ਸਭ ਵਜਾਇਦਾ ॥੪॥
मारू महला ३ ॥
जुग छतीह कीओ गुबारा ॥
तू आपे जाणहि सिरजणहारा ॥
होर किआ को कहै कि आखि वखाणै तू आपे कीमति पाइदा ॥१॥
ओअंकारि सभ स्रिसटि उपाई ॥
सभु खेलु तमासा तेरी वडिआई ॥
आपे वेक करे सभि साचा आपे भंनि घड़ाइदा ॥२॥
बाजीगरि इक बाजी पाई ॥
पूरे गुर ते नदरी आई ॥
सदा अलिपतु रहै गुर सबदी साचे सिउ चितु लाइदा ॥३॥
बाजहि बाजे धुनि आकारा ॥
आपि वजाए वजावणहारा ॥
घटि घटि पउणु वहै इक रंगी मिलि पवणै सभ वजाइदा ॥४॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला ३॥ हे सृजनहार ! (जगत रचना से पहले) बेअंत समय तूने ऐसी हालत बनाए रखी जो जीवों की समझ से परे है। तू खुद ही जानता है (कि वह हालत क्या थी)। (उस गुबार की बाबत) कोई जीव कुछ भी नहीं कह सकता। कोई जीव कह के कुछ भी बयान नहीं कर सकता। तू खुद ही उसकी अस्लियत जानता है। 1। हे भाई ! परमात्मा ने स्वयं सारी सृष्टि पैदा की। हे प्रभू ! (तेरा रचा हुआ ये जगत) सारा तेरा खेल-तमाशा है। तेरी ही वडिआई है। हे भाई ! परमात्मा स्वयं ही सारे जीवों को अलग-अलग किस्म के बनाता है। स्वयं ही नाश करके स्वयं ही पैदा करता है। 2। हे भाई ! (प्रभू) बाजीगर ने (यह जगत) एक तमाश रचा हुआ है। जिस मनुष्य को पूरे गुरू से यह समझ आ गई। वह मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ के (इस जगत-तमाशे में) निर्लिप रहता है। वह मनुष्य सदा-स्थिर परमात्मा के साथ अपना मन जोड़े रखता है। 3। हे भाई ! ये सारे दिखाई दे रहे शरीर (मीठी सुर) से (मानो) बाजे बज रहे हैं। बजाने की समर्थता वाला प्रभू स्वयं ही यह (शरीर-) बाजे बजा रहा है। हरेक शरीर में उस सदा एक-रंग रहने वाले परमात्मा का बनाया हुआ श्वास चल रहा है। (उस अपने पैदा किए) पवन में मिल के परमात्मा ये सारे बाजे बजा रहा है। 4।

संदर्भ: यह अंग 1061 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।

Khan Market की किताबों की दुकान में किसी पुरानी कविता-book को उठाते-उठाते।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 47 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1061” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1062 →, पीछे का: ← अंग 1060

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।