अंग 1040

अंग
1040
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਰਬ ਨਿਰੰਜਨ ਪੁਰਖੁ ਸੁਜਾਨਾ ॥
ਅਦਲੁ ਕਰੇ ਗੁਰ ਗਿਆਨ ਸਮਾਨਾ ॥
ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਲੈ ਗਰਦਨਿ ਮਾਰੇ ਹਉਮੈ ਲੋਭੁ ਚੁਕਾਇਆ ॥੬॥
ਸਚੈ ਥਾਨਿ ਵਸੈ ਨਿਰੰਕਾਰਾ ॥
ਆਪਿ ਪਛਾਣੈ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰਾ ॥
ਸਚੈ ਮਹਲਿ ਨਿਵਾਸੁ ਨਿਰੰਤਰਿ ਆਵਣ ਜਾਣੁ ਚੁਕਾਇਆ ॥੭॥
ਨਾ ਮਨੁ ਚਲੈ ਨ ਪਉਣੁ ਉਡਾਵੈ ॥
ਜੋਗੀ ਸਬਦੁ ਅਨਾਹਦੁ ਵਾਵੈ ॥
ਪੰਚ ਸਬਦ ਝੁਣਕਾਰੁ ਨਿਰਾਲਮੁ ਪ੍ਰਭਿ ਆਪੇ ਵਾਇ ਸੁਣਾਇਆ ॥੮॥
ਭਉ ਬੈਰਾਗਾ ਸਹਜਿ ਸਮਾਤਾ ॥
ਹਉਮੈ ਤਿਆਗੀ ਅਨਹਦਿ ਰਾਤਾ ॥
ਅੰਜਨੁ ਸਾਰਿ ਨਿਰੰਜਨੁ ਜਾਣੈ ਸਰਬ ਨਿਰੰਜਨੁ ਰਾਇਆ ॥੯॥
ਦੁਖ ਭੈ ਭੰਜਨੁ ਪ੍ਰਭੁ ਅਬਿਨਾਸੀ ॥
ਰੋਗ ਕਟੇ ਕਾਟੀ ਜਮ ਫਾਸੀ ॥
ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋ ਭਉ ਭੰਜਨੁ ਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਪਾਇਆ ॥੧੦॥
ਕਾਲੈ ਕਵਲੁ ਨਿਰੰਜਨੁ ਜਾਣੈ ॥
ਬੂਝੈ ਕਰਮੁ ਸੁ ਸਬਦੁ ਪਛਾਣੈ ॥
ਆਪੇ ਜਾਣੈ ਆਪਿ ਪਛਾਣੈ ਸਭੁ ਤਿਸ ਕਾ ਚੋਜੁ ਸਬਾਇਆ ॥੧੧॥
ਆਪੇ ਸਾਹੁ ਆਪੇ ਵਣਜਾਰਾ ॥
ਆਪੇ ਪਰਖੇ ਪਰਖਣਹਾਰਾ ॥
ਆਪੇ ਕਸਿ ਕਸਵਟੀ ਲਾਏ ਆਪੇ ਕੀਮਤਿ ਪਾਇਆ ॥੧੨॥
ਆਪਿ ਦਇਆਲਿ ਦਇਆ ਪ੍ਰਭਿ ਧਾਰੀ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਬਨਵਾਰੀ ॥
ਪੁਰਖੁ ਅਤੀਤੁ ਵਸੈ ਨਿਹਕੇਵਲੁ ਗੁਰ ਪੁਰਖੈ ਪੁਰਖੁ ਮਿਲਾਇਆ ॥੧੩॥
ਪ੍ਰਭੁ ਦਾਨਾ ਬੀਨਾ ਗਰਬੁ ਗਵਾਏ ॥
ਦੂਜਾ ਮੇਟੈ ਏਕੁ ਦਿਖਾਏ ॥
ਆਸਾ ਮਾਹਿ ਨਿਰਾਲਮੁ ਜੋਨੀ ਅਕੁਲ ਨਿਰੰਜਨੁ ਗਾਇਆ ॥੧੪॥
ਹਉਮੈ ਮੇਟਿ ਸਬਦਿ ਸੁਖੁ ਹੋਈ ॥
ਆਪੁ ਵੀਚਾਰੇ ਗਿਆਨੀ ਸੋਈ ॥
ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਜਸੁ ਹਰਿ ਗੁਣ ਲਾਹਾ ਸਤਸੰਗਤਿ ਸਚੁ ਫਲੁ ਪਾਇਆ ॥੧੫॥੨॥੧੯॥
सरब निरंजन पुरखु सुजाना ॥
अदलु करे गुर गिआन समाना ॥
कामु क्रोधु लै गरदनि मारे हउमै लोभु चुकाइआ ॥६॥
सचै थानि वसै निरंकारा ॥
आपि पछाणै सबदु वीचारा ॥
सचै महलि निवासु निरंतरि आवण जाणु चुकाइआ ॥७॥
ना मनु चलै न पउणु उडावै ॥
जोगी सबदु अनाहदु वावै ॥
पंच सबद झुणकारु निरालमु प्रभि आपे वाइ सुणाइआ ॥८॥
भउ बैरागा सहजि समाता ॥
हउमै तिआगी अनहदि राता ॥
अंजनु सारि निरंजनु जाणै सरब निरंजनु राइआ ॥९॥
दुख भै भंजनु प्रभु अबिनासी ॥
रोग कटे काटी जम फासी ॥
नानक हरि प्रभु सो भउ भंजनु गुरि मिलिऐ हरि प्रभु पाइआ ॥१०॥
कालै कवलु निरंजनु जाणै ॥
बूझै करमु सु सबदु पछाणै ॥
आपे जाणै आपि पछाणै सभु तिस का चोजु सबाइआ ॥११॥
आपे साहु आपे वणजारा ॥
आपे परखे परखणहारा ॥
आपे कसि कसवटी लाए आपे कीमति पाइआ ॥१२॥
आपि दइआलि दइआ प्रभि धारी ॥
घटि घटि रवि रहिआ बनवारी ॥
पुरखु अतीतु वसै निहकेवलु गुर पुरखै पुरखु मिलाइआ ॥१३॥
प्रभु दाना बीना गरबु गवाए ॥
दूजा मेटै एकु दिखाए ॥
आसा माहि निरालमु जोनी अकुल निरंजनु गाइआ ॥१४॥
हउमै मेटि सबदि सुखु होई ॥
आपु वीचारे गिआनी सोई ॥
नानक हरि जसु हरि गुण लाहा सतसंगति सचु फलु पाइआ ॥१५॥२॥१९॥

हिन्दी अर्थ: वह सुजान प्रभू सब शरीरों में व्यापक होता हुआ भी माया के प्रभाव से परे है। और (हरेक बात में) न्याय करता है। जो मनुष्य गुरू के बख्शे इस ज्ञान में अपने आप को लीन करता है वह अपने अंदर से काम और क्रोध का बिल्कुल ही नाश कर देता है। उसने अहंकार और लोभ को भी समाप्त कर लिया है। 6। वह परमात्मा जिसका कोई विशेष रूप नहीं बताया जा सकता एक ऐसी जगह पर बिराजमान है जो हमेशा कायम रहने वाली है। वह आप ही अपने आप को विचारता है और स्वयं ही समझता है। जिस जीव ने उस सदा-स्थिर प्रभू के चरणों (महल) में अपना ठिकाना सदा के लिए बना लिया (भाव। जो मनुष्य सदा उसकी याद में जुड़ा रहता है) परमात्मा उसके पैदा होने मरने के चक्करों को समाप्त कर देता है। 7। उस मनुष्य का मन (माया की खातिर) नहीं भटकता। माया की तृष्णा उसको जगह-जगह नहीं भटकाए फिरती। प्रभू-चरणों में जुड़ा हुआ वह मनुष्य (अपने अंदर) एक-रस सिफत सालाह (का बाजा) बजाता रहता है। जिसकी बरकति से उसके अंदर। मानो। एक मीठा-मीठा एक-रस राग होता रहता है जैसे पाँच-किस्मों के साजों के एक साथ बजाने से पैदा होता है। उस राग को बाहर से किसी साज़ के आसरे की जरूरत नहीं पड़ती। यह राग (अंदर बसते) प्रभू ने स्वयं ही बजा के उसको सुनाया है। 8। उस मनुष्य के अंदर परमात्मा का डर-अदब पैदा होता है। परमात्मा का प्यार उपजता है। (जिसके कारण) वह आत्मिक अडोलता में टिका रहता है। वह मनुष्य अहंकार दूर करके अविनाशी प्रभू (के नाम-रंग) में रंगा रहता है। (प्रभू के नाम का) सुरमा डाल के वह पहचान लेता है कि वह राजन-प्रभू स्वयं माया के प्रभाव से परे है और (शरण पड़े) सब जीवों को भी माया के प्रभाव से बचा लेता है। 9। प्रभू जीवों के डर और दुख नाश करने वाला है और स्वयं कभी नाश होने वाला नहीं। वह जीवों के रोग काटता है। जम के फंदे तोड़ता है। हे नानक ! वह हरी। वह भय-भंजन प्रभू तभी मिलता है जब गुरू मिल जाए। 10। जो मनुष्य माया-रहित परमात्मा के साथ सांझ डाल लेता है वह मौत को ग्रास लेता है (निवाला बना लेता है वह मौत का डर समाप्त कर लेता है)। वह परमात्मा की बख्शिश को समझ लेता है। वह प्रभू की सिफत-सालाह की बाणी के साथ जान-पहचान डालता है। (उसको ये निश्चय बन जाता है कि) परमात्मा स्वयं सब जीवों के दिल की जानता है और पहचानता है। यह सारा जगत-तमाशा उसी का रचा हुआ है। 11। (यह जगत। मानो। एक शहर है जहाँ जीव प्रभू के नाम का व्यापार करने आते हैं) परमात्मा स्वयं ही (राशि-पूँजी देने वाला) शाहूकार है स्वयं ही (जीवों में व्यापक हो के) व्यापारी है। वह स्वयं ही इस सौदे को परखता है क्योंकि वह खुद ही इसे परखने की योग्यता रखता है। (हरेक जीव-वणजारे के किए हुए वणज को व्यापार को) प्रभू स्वयं ही परखता है जैसे सोनियारा सोने को कसवॅटी पर घिसा के परखता है। और फिर प्रभू स्वयं ही (उस वस्तु का) मूल्य डालता है। 12। जिस मनुष्य पर दया-के-घर प्रभू ने मेहर की उसे पक्का यकीन हो गया कि जगत का मालिक प्रभू हरेक शरीर में व्यापक है। हरेक शरीर में बसते हुए भी वह माया के प्रभाव से परे है और पवित्र स्वरूप है। (जिस पर प्रभू की मेहर हुई) उसको सतिगुरू पुरख ने वह सर्व-व्यापक प्रभू मिला दिया। 13। प्रभू सब जीवों के दिलों की जानता है सब के किए काम देखता है (जिस पर मेहर करे उसका) अहंकार मिटाता है। उसके अंदर से और सभी आसरों की झाक दूर कर देता है। और उसको एक अपना आप दिखा देता है। वह मनुष्य दुनियां की आशाओं में (विचरता हुआ भी) आशाओं के आसरे से बेमुथाज हो जाता है क्योंकि वह उस प्रभू की सिफत-सालाह करता रहता है जो माया के प्रभाव से परे है और जिसकी कोई खास कुल नहीं। 14। जो मनुष्य अपने आत्मिक जीवन को पड़तालता रहता है वही असल ज्ञानवान है। वह मनुष्य अहंकार को दूर करके गुरू के शबद में जुड़ता है और इस तरह उसको आत्मिक आनंद प्राप्त होता है। हे नानक ! परमात्मा की सिफत-सालाह करनी परमात्मा के गुण गाने- (जगत में यही असल) कमाई है। जो मनुष्य साध-संगति में आता है वह यह सदा-कायम रहने वाला फल पा लेता है। 15। 2। 19।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਸਚੁ ਕਹਹੁ ਸਚੈ ਘਰਿ ਰਹਣਾ ॥
ਜੀਵਤ ਮਰਹੁ ਭਵਜਲੁ ਜਗੁ ਤਰਣਾ ॥
ਗੁਰੁ ਬੋਹਿਥੁ ਗੁਰੁ ਬੇੜੀ ਤੁਲਹਾ ਮਨ ਹਰਿ ਜਪਿ ਪਾਰਿ ਲੰਘਾਇਆ ॥੧॥
ਹਉਮੈ ਮਮਤਾ ਲੋਭ ਬਿਨਾਸਨੁ ॥
ਨਉ ਦਰ ਮੁਕਤੇ ਦਸਵੈ ਆਸਨੁ ॥
ਊਪਰਿ ਪਰੈ ਪਰੈ ਅਪਰੰਪਰੁ ਜਿਨਿ ਆਪੇ ਆਪੁ ਉਪਾਇਆ ॥੨॥
ਗੁਰਮਤਿ ਲੇਵਹੁ ਹਰਿ ਲਿਵ ਤਰੀਐ ॥
ਅਕਲੁ ਗਾਇ ਜਮ ਤੇ ਕਿਆ ਡਰੀਐ ॥
ਜਤ ਜਤ ਦੇਖਉ ਤਤ ਤਤ ਤੁਮ ਹੀ ਅਵਰੁ ਨ ਦੁਤੀਆ ਗਾਇਆ ॥੩॥
ਸਚੁ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸਚੁ ਹੈ ਸਰਣਾ ॥
ਸਚੁ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਜਿਤੈ ਲਗਿ ਤਰਣਾ ॥
ਅਕਥੁ ਕਥੈ ਦੇਖੈ ਅਪਰੰਪਰੁ ਫੁਨਿ ਗਰਭਿ ਨ ਜੋਨੀ ਜਾਇਆ ॥੪॥
ਸਚ ਬਿਨੁ ਸਤੁ ਸੰਤੋਖੁ ਨ ਪਾਵੈ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਮੁਕਤਿ ਨ ਆਵੈ ਜਾਵੈ ॥
ਮੂਲ ਮੰਤ੍ਰੁ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਰਸਾਇਣੁ ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਪੂਰਾ ਪਾਇਆ ॥੫॥
मारू महला १ ॥
सचु कहहु सचै घरि रहणा ॥
जीवत मरहु भवजलु जगु तरणा ॥
गुरु बोहिथु गुरु बेड़ी तुलहा मन हरि जपि पारि लंघाइआ ॥१॥
हउमै ममता लोभ बिनासनु ॥
नउ दर मुकते दसवै आसनु ॥
ऊपरि परै परै अपरंपरु जिनि आपे आपु उपाइआ ॥२॥
गुरमति लेवहु हरि लिव तरीऐ ॥
अकलु गाइ जम ते किआ डरीऐ ॥
जत जत देखउ तत तत तुम ही अवरु न दुतीआ गाइआ ॥३॥
सचु हरि नामु सचु है सरणा ॥
सचु गुर सबदु जितै लगि तरणा ॥
अकथु कथै देखै अपरंपरु फुनि गरभि न जोनी जाइआ ॥४॥
सच बिनु सतु संतोखु न पावै ॥
बिनु गुर मुकति न आवै जावै ॥
मूल मंत्रु हरि नामु रसाइणु कहु नानक पूरा पाइआ ॥५॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला १॥ (हे भाई !) सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा का नाम सिमरो। (सिमरन की बरकति से उस) सदा-स्थिर प्रभू की हजूरी में जगह मिली रहेगी। जीवन-यात्रा में विकारों के हमलों से बचे रहोगे। और संसार-समुंद्र से पार लांघ जाओगे। हे मन ! (संसार-समुंद्र से पार लांघने के लिए) गुरू जहाज है। गुरू बेड़ी है। (गुरू की शरण पड़ कर) हरी-नाम जप। (जिस जिस ने नाम जपा है गुरू ने उसको) पार लंघा दिया है। 1। परमात्मा का नाम अहंकार ममता और लोभ का नाश करने वाला है। (नाम सिमरन की बरकति से) शरीर के नौ दरवाजों (गोलकों) के विषयों से निजात मिली रहती है। सुरति दसवें द्वार में टिकी रहती है (भाव। दसवें द्वार के द्वारा परमात्मा के साथ संबंध बना रहता है)। जिस परमात्मा ने अपने आप को (सृष्टि के रूप में) प्रकट किया है जो परे से परे है और बेअंत है वह उस दसम द्वार में प्रत्यक्ष हो जाता है। 2। (हे भाई !) गुरू की मति ग्रहण करो (गुरू की मति के द्वारा) परमात्मा में सुरति जोड़ने से संसार-समुंद्र से पार लांघा जाता है। (एक-रस व्यापक) अखण्ड प्रभू की सिफत-सालाह करने से जम से डरने की आवश्यक्ता नहीं रह जाती। (हे प्रभू ! यह तेरे सिमरन के सदके ही है कि) मैं जिधर-जिधर देखता हूँ उधर-उधर तू ही तू दिखता है। मुझे तेरे जैसा और कोई नहीं दिखाई देता। मैं तेरी उस्तति करता हूँ। 3। परमात्मा का नाम सदा-स्थिर रहने वाला है। उसका ओट-आसरा भी सदा-स्थिर रहने वाला है। गुरू का शबद (भी) सदा-स्थिर रहने वाला (वसीला) है। शबद में जुड़ के ही संसार-समुंद्र में से पार लांघा जा सकता है। परमात्मा का स्वरूप् बयान से परे है। जो मनुष्य उस परे से परे परमात्मा की सिफत-सालाह करता है वह उसके दर्शन कर लेता है। वह मनुष्य फिर गर्भ जोनि में नहीं आता। 4। सदा-स्थिर प्रभू का नाम सिमरन के बिना (कोई मनुष्य दूसरों की) सेवा व संतोख (का आत्मिक गुण) प्राप्त नहीं कर सकता। गुरू की शरण के बिना विकारों से खलासी नहीं मिलती। मनुष्य जनम-मरण के चक्करों में पड़ा रहता है। हे नानक ! हरी का नाम सिमर जो सब मंत्रों का मूल है और सब रसों को श्रोत है। (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर नाम सिमरता है) उसको पूर्ण प्रभू मिल जाता है। 5।

संदर्भ: यह अंग 1040 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

IIT-JEE result का दिन, परिवार phones के पास बैठा।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 46 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1040” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1041 →, पीछे का: ← अंग 1039

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।