अंग 1034

अंग
1034
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਅਨਹਦੁ ਵਾਜੈ ਭ੍ਰਮੁ ਭਉ ਭਾਜੈ ॥
ਸਗਲ ਬਿਆਪਿ ਰਹਿਆ ਪ੍ਰਭੁ ਛਾਜੈ ॥
ਸਭ ਤੇਰੀ ਤੂ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਤਾ ਦਰਿ ਸੋਹੈ ਗੁਣ ਗਾਇਦਾ ॥੧੦॥
ਆਦਿ ਨਿਰੰਜਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਸੋਈ ॥
ਅਵਰੁ ਨ ਜਾਣਾ ਦੂਜਾ ਕੋਈ ॥
ਏਕੰਕਾਰੁ ਵਸੈ ਮਨਿ ਭਾਵੈ ਹਉਮੈ ਗਰਬੁ ਗਵਾਇਦਾ ॥੧੧॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਆ ਸਤਿਗੁਰਿ ਦੀਆ ॥
ਅਵਰੁ ਨ ਜਾਣਾ ਦੂਆ ਤੀਆ ॥
ਏਕੋ ਏਕੁ ਸੁ ਅਪਰ ਪਰੰਪਰੁ ਪਰਖਿ ਖਜਾਨੈ ਪਾਇਦਾ ॥੧੨॥
ਗਿਆਨੁ ਧਿਆਨੁ ਸਚੁ ਗਹਿਰ ਗੰਭੀਰਾ ॥
ਕੋਇ ਨ ਜਾਣੈ ਤੇਰਾ ਚੀਰਾ ॥
ਜੇਤੀ ਹੈ ਤੇਤੀ ਤੁਧੁ ਜਾਚੈ ਕਰਮਿ ਮਿਲੈ ਸੋ ਪਾਇਦਾ ॥੧੩॥
ਕਰਮੁ ਧਰਮੁ ਸਚੁ ਹਾਥਿ ਤੁਮਾਰੈ ॥
ਵੇਪਰਵਾਹ ਅਖੁਟ ਭੰਡਾਰੈ ॥
ਤੂ ਦਇਆਲੁ ਕਿਰਪਾਲੁ ਸਦਾ ਪ੍ਰਭੁ ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਇਦਾ ॥੧੪॥
ਆਪੇ ਦੇਖਿ ਦਿਖਾਵੈ ਆਪੇ ॥
ਆਪੇ ਥਾਪਿ ਉਥਾਪੇ ਆਪੇ ॥
ਆਪੇ ਜੋੜਿ ਵਿਛੋੜੇ ਕਰਤਾ ਆਪੇ ਮਾਰਿ ਜੀਵਾਇਦਾ ॥੧੫॥
ਜੇਤੀ ਹੈ ਤੇਤੀ ਤੁਧੁ ਅੰਦਰਿ ॥
ਦੇਖਹਿ ਆਪਿ ਬੈਸਿ ਬਿਜ ਮੰਦਰਿ ॥
ਨਾਨਕੁ ਸਾਚੁ ਕਹੈ ਬੇਨੰਤੀ ਹਰਿ ਦਰਸਨਿ ਸੁਖੁ ਪਾਇਦਾ ॥੧੬॥੧॥੧੩॥
अनहदु वाजै भ्रमु भउ भाजै ॥
सगल बिआपि रहिआ प्रभु छाजै ॥
सभ तेरी तू गुरमुखि जाता दरि सोहै गुण गाइदा ॥१०॥
आदि निरंजनु निरमलु सोई ॥
अवरु न जाणा दूजा कोई ॥
एकंकारु वसै मनि भावै हउमै गरबु गवाइदा ॥११॥
अंम्रितु पीआ सतिगुरि दीआ ॥
अवरु न जाणा दूआ तीआ ॥
एको एकु सु अपर परंपरु परखि खजानै पाइदा ॥१२॥
गिआनु धिआनु सचु गहिर गंभीरा ॥
कोइ न जाणै तेरा चीरा ॥
जेती है तेती तुधु जाचै करमि मिलै सो पाइदा ॥१३॥
करमु धरमु सचु हाथि तुमारै ॥
वेपरवाह अखुट भंडारै ॥
तू दइआलु किरपालु सदा प्रभु आपे मेलि मिलाइदा ॥१४॥
आपे देखि दिखावै आपे ॥
आपे थापि उथापे आपे ॥
आपे जोड़ि विछोड़े करता आपे मारि जीवाइदा ॥१५॥
जेती है तेती तुधु अंदरि ॥
देखहि आपि बैसि बिज मंदरि ॥
नानकु साचु कहै बेनंती हरि दरसनि सुखु पाइदा ॥१६॥१॥१३॥

हिन्दी अर्थ: (उस गुरमुख के हृदय में) एक-रस (सिफत सालाह का बाजा बजता रहता है। उसके अंदर से) भटकनें और डर-सहम दूर हो जाते हैं (उसको प्रत्यक्ष दिखाई दे जाता है कि) परमात्मा सारे संसार में मौजूद है और सब पर (अपनी रक्षा की) छाया कर रहा है। हे प्रभू ! यह सारी रचना तेरी है (और तू ही इसकी रक्षा करने वाला है) – (‘सफल बिरख’ गुरू से नाम-फल प्राप्त करने वाला) गुरमुख ये बात समझ लेता है। वह गुरमुख तेरे गुण गाता है और तेरे दर पर शोभा पाता है। 10। उस गुरमुख ने जान लिया है कि वह पवित्र स्वरूप परमात्मा ही सारी सृष्टि का आदि है और माया के प्रभाव से ऊपर है। उस जैसा दूसरा और कोई नहीं। उस गुरमुख के मन में वही एक अकाल-पुरख बसता है और मन को प्यारा लगता है (इसकी बरकति से वह अपने अंदर से) हउमै-अहंकार दूर कर लेता है। 11। जिस गुरमुख को सतिगुरू नें नाम-अमृत दिया उसने लेकर पीया उसको जगत में कहीं भी परमात्मा के बिना और कोई दूसरा नहीं दिखता। (उसके अंदर कोई मेर-तेर नहीं रह जाती)। (उस गुरमुख को निष्चय हो जाता है कि हर जगह) एक ही एक अपर-अपार परमात्मा स्वयं ही है। वह खुद ही (जीवों के कर्मों को) परख के (और पसंद करके उनको) अपने खजाने में मिला लेता है। 12। हे गहरे और बड़े जिगरे वाले ! तेरे साथ जान-पहचान डालनी और तेरे चरणों में जुड़ना ही सदा-स्थिर रहने वाला (उद्यम) है। (तू एक ऐसा बेअंत समुंद्र है कि) तेरे पसारे को कोई समझ नहीं सकता। जितनी भी सृष्टि है ये सारी की सारी तुझसे ही (हरेक पदार्थ) माँगती है। वह ही जीव कुछ प्राप्त करता है जिसको तेरी बख्शिश से कुछ मिलता है। 13। हे बेपरवाह प्रभू ! (लोग अपनी-अपनी समझ के अनुसार धार्मिक निहित कर्म करते हैं। पर) तेरे सदा-स्थिर-नाम का सिमरन ही असल धर्म है। और यह नाम तेरे कभी ना समाप्त होने वाले खजाने में मौजूद है। हे प्रभू ! तू सदा दया का कृपा का घर है। सब का मालिक (प्रभू) है। तू खुद ही (अपने खजाने में से यह दाति दे के) अपनी संगति में मिला लेता है। 14। प्रभू स्वयं ही (जीवों की) संभाल करके स्वयं ही (जीवों को) अपने दर्शन कराता है। खुद ही पैदा करता है खुद नाश करता है। करतार स्वयं ही (अपने चरणों में) जोड़ता है। स्वयं ही (चरणों से) विछोड़ता है। स्वयं ही (किसी को) आत्मिक मौत मारता है। स्वयं ही आत्मिक जीवन देता है। 15। ये जितनी भी सृष्टि है सारी की सारी तेरे हुकम के अंदर चल रही है। तू अपने सदा-स्थिर महल में बैठ के खुद ही सबकी संभाल कर रहा है। हे हरी ! तेरा दास नानक तेरा चिर-स्थाई नाम सिमरता है (तेरे दीदार के लिए तेरे दर पर) विनती करता है (जिसको तेरा दीदार नसीब होता है। वह उस) दीदार की बरकति से आत्मिक आनंद प्राप्त करता है। 16। 1। 13।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਦਰਸਨੁ ਪਾਵਾ ਜੇ ਤੁਧੁ ਭਾਵਾ ॥
ਭਾਇ ਭਗਤਿ ਸਾਚੇ ਗੁਣ ਗਾਵਾ ॥
ਤੁਧੁ ਭਾਣੇ ਤੂ ਭਾਵਹਿ ਕਰਤੇ ਆਪੇ ਰਸਨ ਰਸਾਇਦਾ ॥੧॥
ਸੋਹਨਿ ਭਗਤ ਪ੍ਰਭੂ ਦਰਬਾਰੇ ॥
ਮੁਕਤੁ ਭਏ ਹਰਿ ਦਾਸ ਤੁਮਾਰੇ ॥
ਆਪੁ ਗਵਾਇ ਤੇਰੈ ਰੰਗਿ ਰਾਤੇ ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਦਾ ॥੨॥
ਈਸਰੁ ਬ੍ਰਹਮਾ ਦੇਵੀ ਦੇਵਾ ॥
ਇੰਦ੍ਰ ਤਪੇ ਮੁਨਿ ਤੇਰੀ ਸੇਵਾ ॥
ਜਤੀ ਸਤੀ ਕੇਤੇ ਬਨਵਾਸੀ ਅੰਤੁ ਨ ਕੋਈ ਪਾਇਦਾ ॥੩॥
ਵਿਣੁ ਜਾਣਾਏ ਕੋਇ ਨ ਜਾਣੈ ॥
ਜੋ ਕਿਛੁ ਕਰੇ ਸੁ ਆਪਣ ਭਾਣੈ ॥
ਲਖ ਚਉਰਾਸੀਹ ਜੀਅ ਉਪਾਏ ਭਾਣੈ ਸਾਹ ਲਵਾਇਦਾ ॥੪॥
ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਸੋ ਨਿਹਚਉ ਹੋਵੈ ॥
ਮਨਮੁਖੁ ਆਪੁ ਗਣਾਏ ਰੋਵੈ ॥
ਨਾਵਹੁ ਭੁਲਾ ਠਉਰ ਨ ਪਾਏ ਆਇ ਜਾਇ ਦੁਖੁ ਪਾਇਦਾ ॥੫॥
ਨਿਰਮਲ ਕਾਇਆ ਊਜਲ ਹੰਸਾ ॥
ਤਿਸੁ ਵਿਚਿ ਨਾਮੁ ਨਿਰੰਜਨ ਅੰਸਾ ॥
ਸਗਲੇ ਦੂਖ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਕਰਿ ਪੀਵੈ ਬਾਹੁੜਿ ਦੂਖੁ ਨ ਪਾਇਦਾ ॥੬॥
ਬਹੁ ਸਾਦਹੁ ਦੂਖੁ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਵੈ ॥
ਭੋਗਹੁ ਰੋਗ ਸੁ ਅੰਤਿ ਵਿਗੋਵੈ ॥
ਹਰਖਹੁ ਸੋਗੁ ਨ ਮਿਟਈ ਕਬਹੂ ਵਿਣੁ ਭਾਣੇ ਭਰਮਾਇਦਾ ॥੭॥
ਗਿਆਨ ਵਿਹੂਣੀ ਭਵੈ ਸਬਾਈ ॥
ਸਾਚਾ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਲਿਵ ਲਾਈ ॥
ਨਿਰਭਉ ਸਬਦੁ ਗੁਰੂ ਸਚੁ ਜਾਤਾ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਮਿਲਾਇਦਾ ॥੮॥
ਅਟਲੁ ਅਡੋਲੁ ਅਤੋਲੁ ਮੁਰਾਰੇ ॥
ਖਿਨ ਮਹਿ ਢਾਹੇ ਫੇਰਿ ਉਸਾਰੇ ॥
ਰੂਪੁ ਨ ਰੇਖਿਆ ਮਿਤਿ ਨਹੀ ਕੀਮਤਿ ਸਬਦਿ ਭੇਦਿ ਪਤੀਆਇਦਾ ॥੯॥
मारू महला १ ॥
दरसनु पावा जे तुधु भावा ॥
भाइ भगति साचे गुण गावा ॥
तुधु भाणे तू भावहि करते आपे रसन रसाइदा ॥१॥
सोहनि भगत प्रभू दरबारे ॥
मुकतु भए हरि दास तुमारे ॥
आपु गवाइ तेरै रंगि राते अनदिनु नामु धिआइदा ॥२॥
ईसरु ब्रहमा देवी देवा ॥
इंद्र तपे मुनि तेरी सेवा ॥
जती सती केते बनवासी अंतु न कोई पाइदा ॥३॥
विणु जाणाए कोइ न जाणै ॥
जो किछु करे सु आपण भाणै ॥
लख चउरासीह जीअ उपाए भाणै साह लवाइदा ॥४॥
जो तिसु भावै सो निहचउ होवै ॥
मनमुखु आपु गणाए रोवै ॥
नावहु भुला ठउर न पाए आइ जाइ दुखु पाइदा ॥५॥
निरमल काइआ ऊजल हंसा ॥
तिसु विचि नामु निरंजन अंसा ॥
सगले दूख अंम्रितु करि पीवै बाहुड़ि दूखु न पाइदा ॥६॥
बहु सादहु दूखु परापति होवै ॥
भोगहु रोग सु अंति विगोवै ॥
हरखहु सोगु न मिटई कबहू विणु भाणे भरमाइदा ॥७॥
गिआन विहूणी भवै सबाई ॥
साचा रवि रहिआ लिव लाई ॥
निरभउ सबदु गुरू सचु जाता जोती जोति मिलाइदा ॥८॥
अटलु अडोलु अतोलु मुरारे ॥
खिन महि ढाहे फेरि उसारे ॥
रूपु न रेखिआ मिति नही कीमति सबदि भेदि पतीआइदा ॥९॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला १॥ हे सदा-स्थिर (चिर-स्थाई) प्रभू ! अगर मैं तुझे अच्छा लगूँ। तो ही तेरे दर्शन कर सकता हूँ। और तेरे प्रेम में (जुड़ के) तेरी भक्ति (कर सकता हूँ। तथा) तेरे गुण गा सकता हूँ। हे करतार ! जो लोग तुझे प्यारे लगते हैं उन्हें तू प्यारा लगता है। तू स्वयं ही उनकी जीभ में (अपने नाम का) रस पैदा करता है। 1। हे प्रभू ! तेरे भगत तेरे दरबार में सुंदर लगते हैं। हे हरी ! तेरे दास (माया के बँधनों से) स्वतंत्र हो जाते हैं। वे स्वै भाव मिटा के तेरे नाम-रंग में रंगे रहते हैं। और हर रोज (हर समय) तेरा नाम सिमरते हैं। 2। शिव। ब्रहमा अनेकों देवी-देवते। इन्द्र देवता। तपी लोग। ऋषि-मुनि -ये सब तेरी ही सेवा-भगती करते हैं (भाव। चाहे ये कितने ही बड़े गिने जाएं। पर तेरे सामने ये तेरे साधारण से सेवक हैं)। अनेकों जतधारी। और अनेकों ही बनों में बसने वाले त्यागी (तेरे गुण गाते हैं। पर तेरे गुणों का) कोई भी अंत नहीं पा सकता। 3। जब तक परमात्मा स्वयं समझ ना बख्शे कोई जीव (परमात्मा की भगती करने की) सूझ प्राप्त नहीं कर सकता। परमात्मा जो कुछ करता है अपनी रजा में (अपनी मर्जी से) करता है। परमात्मा ने चौरासी लाख जूनियों में जीव पैदा किए हैं। वह अपनी मर्जी से ही इन जीवों को साँस लेने देता है (इनको जीवित रखता है)। 4। (जगत में) वही कुछ अवश्य होता है जो उस करतार को अच्छा लगता है। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (इस अस्लियत को नहीं समझता। वह) अपने आप को बड़ा जताता है (और अहंकार में ही) दुखी होता है। परमात्मा के नाम से टूटा हुआ (मनमुख) कहीं आत्मिक शांति का ठिकाना नहीं पा सकता। पैदा होता है मरता है। पैदा होता है मरता है। और (इस चक्कर में ही) दुख पाता है। 5। वह शरीर पवित्र है जिस में पवित्र (जीवन वाली) जीवात्मा बसती है (क्योंकि) उस (शरीर) में परमात्मा का नाम बसता है। (वह जीवात्मा सही अर्थों में) माया-रहित प्रभू का अंश है। प्रभू के नाम-अमृत की बरकति से वह मनुष्य अपने सारे दुख मिटा लेता है। और दोबारा वह कभी दुख नहीं पाता। 6। बहुत ज्यादा (भोगों के) स्वादों से दुख ही मिलता है (क्योंकि) भोगों से (आखिर) रोग पैदा होते हैं और आखिर में मनुष्य दुखी होता है। (माया की) खुशियों से भी चिंता ही पैदा होती है जो कभी नहीं मिटती। परमात्मा की रज़ा में चले बिना मनुष्य भटकना में पड़ा रहता है। 7। चिर-स्थाई रहने वाला परमात्मा सारी सृष्टि में गुप्त व्यापक है। पर इस बात से वंचित रह के सारी दुनिया भटक रही है। जिस मनुष्य ने गुरू का शबद। जो निर्भयता देने वाला है। अपने हृदय में बसाया है उसने सदा-स्थिर प्रभू को सदार सृष्टि में बसता पहचान लिया है। गुरू का शबद उसकी सुरति को परमात्मा की ज्योति में मिला देता है। 8। मुर (आदि दैत्यों) का वैरी परमात्मा (मुरारी) चिर-स्थाई रहने वाला है। माया के मोह में कभी डोलने वाला नहीं। उसका स्वरूप कभी तोला-नापा नहीं जा सकता। वह (अपने रचे हुए जगत को) एक छिन में गिरा सकता है और दोबारा पैदा कर सकता है। उसका कोई खास स्वरूप नहीं बताया जा सकता। उसके कोई खास चक्र-चिन्ह नहीं कहे जा सकते। वह कितना बड़ा है और कैसा है- ये भी बयान से परे है। जो मनुष्य (अपने मन को गुरू के) शबद में भेद लेता है वह उस परमात्मा (की याद) में पतीज जाता है। 9।

संदर्भ: यह अंग 1034 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

Holi के दूसरे दिन (puddva), सब रंग धुल चुके, और घर का calm।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 49 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1034” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1035 →, पीछे का: ← अंग 1033

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।