अंग 1072

अंग
1072
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਥਾਨ ਥਨੰਤਰਿ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਪੂਰਨ ਪਰਮੇਸੁਰ ਚਿੰਤਾ ਗਣਤ ਮਿਟਾਈ ਹੇ ॥੮॥
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਕੋਟਿ ਲਖ ਬਾਹਾ ॥
ਹਰਿ ਜਸੁ ਕੀਰਤਨੁ ਸੰਗਿ ਧਨੁ ਤਾਹਾ ॥
ਗਿਆਨ ਖੜਗੁ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਦੀਨਾ ਦੂਤ ਮਾਰੇ ਕਰਿ ਧਾਈ ਹੇ ॥੯॥
ਹਰਿ ਕਾ ਜਾਪੁ ਜਪਹੁ ਜਪੁ ਜਪਨੇ ॥
ਜੀਤਿ ਆਵਹੁ ਵਸਹੁ ਘਰਿ ਅਪਨੇ ॥
ਲਖ ਚਉਰਾਸੀਹ ਨਰਕ ਨ ਦੇਖਹੁ ਰਸਕਿ ਰਸਕਿ ਗੁਣ ਗਾਈ ਹੇ ॥੧੦॥
ਖੰਡ ਬ੍ਰਹਮੰਡ ਉਧਾਰਣਹਾਰਾ ॥
ਊਚ ਅਥਾਹ ਅਗੰਮ ਅਪਾਰਾ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਪ੍ਰਭੁ ਅਪਨੀ ਸੋ ਜਨੁ ਤਿਸਹਿ ਧਿਆਈ ਹੇ ॥੧੧॥
ਬੰਧਨ ਤੋੜਿ ਲੀਏ ਪ੍ਰਭਿ ਮੋਲੇ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਕੀਨੇ ਘਰ ਗੋਲੇ ॥
ਅਨਹਦ ਰੁਣ ਝੁਣਕਾਰੁ ਸਹਜ ਧੁਨਿ ਸਾਚੀ ਕਾਰ ਕਮਾਈ ਹੇ ॥੧੨॥
ਮਨਿ ਪਰਤੀਤਿ ਬਨੀ ਪ੍ਰਭ ਤੇਰੀ ॥
ਬਿਨਸਿ ਗਈ ਹਉਮੈ ਮਤਿ ਮੇਰੀ ॥
ਅੰਗੀਕਾਰੁ ਕੀਆ ਪ੍ਰਭਿ ਅਪਨੈ ਜਗ ਮਹਿ ਸੋਭ ਸੁਹਾਈ ਹੇ ॥੧੩॥
ਜੈ ਜੈ ਕਾਰੁ ਜਪਹੁ ਜਗਦੀਸੈ ॥
ਬਲਿ ਬਲਿ ਜਾਈ ਪ੍ਰਭ ਅਪੁਨੇ ਈਸੈ ॥
ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਦੂਜਾ ਅਵਰੁ ਨ ਦੀਸੈ ਏਕਾ ਜਗਤਿ ਸਬਾਈ ਹੇ ॥੧੪॥
ਸਤਿ ਸਤਿ ਸਤਿ ਪ੍ਰਭੁ ਜਾਤਾ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦਿ ਸਦਾ ਮਨੁ ਰਾਤਾ ॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਜੀਵਹਿ ਜਨ ਤੇਰੇ ਏਕੰਕਾਰਿ ਸਮਾਈ ਹੇ ॥੧੫॥
ਭਗਤ ਜਨਾ ਕਾ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਪਿਆਰਾ ॥
ਸਭੈ ਉਧਾਰਣੁ ਖਸਮੁ ਹਮਾਰਾ ॥
ਸਿਮਰਿ ਨਾਮੁ ਪੁੰਨੀ ਸਭ ਇਛਾ ਜਨ ਨਾਨਕ ਪੈਜ ਰਖਾਈ ਹੇ ॥੧੬॥੧॥
थान थनंतरि अंतरजामी ॥
सिमरि सिमरि पूरन परमेसुर चिंता गणत मिटाई हे ॥८॥
हरि का नामु कोटि लख बाहा ॥
हरि जसु कीरतनु संगि धनु ताहा ॥
गिआन खड़गु करि किरपा दीना दूत मारे करि धाई हे ॥९॥
हरि का जापु जपहु जपु जपने ॥
जीति आवहु वसहु घरि अपने ॥
लख चउरासीह नरक न देखहु रसकि रसकि गुण गाई हे ॥१०॥
खंड ब्रहमंड उधारणहारा ॥
ऊच अथाह अगंम अपारा ॥
जिस नो क्रिपा करे प्रभु अपनी सो जनु तिसहि धिआई हे ॥११॥
बंधन तोड़ि लीए प्रभि मोले ॥
करि किरपा कीने घर गोले ॥
अनहद रुण झुणकारु सहज धुनि साची कार कमाई हे ॥१२॥
मनि परतीति बनी प्रभ तेरी ॥
बिनसि गई हउमै मति मेरी ॥
अंगीकारु कीआ प्रभि अपनै जग महि सोभ सुहाई हे ॥१३॥
जै जै कारु जपहु जगदीसै ॥
बलि बलि जाई प्रभ अपुने ईसै ॥
तिसु बिनु दूजा अवरु न दीसै एका जगति सबाई हे ॥१४॥
सति सति सति प्रभु जाता ॥
गुर परसादि सदा मनु राता ॥
सिमरि सिमरि जीवहि जन तेरे एकंकारि समाई हे ॥१५॥
भगत जना का प्रीतमु पिआरा ॥
सभै उधारणु खसमु हमारा ॥
सिमरि नामु पुंनी सभ इछा जन नानक पैज रखाई हे ॥१६॥१॥

हिन्दी अर्थ: उस पूरन दिल की जानने वाला वह प्रभू हरेक जगह में बस रहा है। सबके परमेश्वर का नाम सदा सिमर के मनुष्य अपनी सारी चिंता-फिक्र मिटा लेता है। 8। हे भाई ! (जैसे वैरियों का मुकाबला करने के लिए बहुत सारी बाँहें और बहुत सारे साथी मनुष्य के लिए सहारा होते हैं। वैसे ही कामादिक वैरियों से मुकाबले में मनुष्य के लिए) परमात्मा का नाम (मानो) लाखों-करोड़ों बाहें हैं। परमात्मा का यश-कीर्तन उसके पास धन है। जिस मनुष्य को परमात्मा आत्मिक जीवन की सूझ की तलवार कृपा करके देता है। वह मनुष्य हमला करके कामादिक वैरियों को मार लेता है। 9। हे भाई ! परमात्मा के नाम का जाप जपा करो। यही जपने-योग्य जप है। (इस जप की बरकति से कामादिक वैरियों को) जीत के अपने असल घर में टिके रहोगे। चौरासी लाख जूनियों के नर्क देखने नहीं पड़ेंगे। (जो मनुष्य) प्रेम से प्रभू के गुण गाता है (उसको यह फल प्राप्त होता है)। 10। हे भाई ! परमात्मा खंडो-ब्रहमंडों के जीवों को विकारों से बचाने के योग्य है। वह प्रभू ऊँचा है अथाह है अपहुँच है बेअंत है। जिस मनुष्य पर वह अपनी कृपा करता है वह मनुष्य उसी प्रभू को ही सिमरता रहता है। 11। हे भाई ! जिस मनुष्य के (माया के मोह के) बँधन तोड़ के प्रभू ने उसको अपना बना लिया। मेहर करके जिसको उसने अपने घर का दास बना लिया। वह मनुष्य सदा-स्थिर हरी-नाम सिमरन की कार करता है। उसके अंदर आत्मिक अडोलता की तार बँधी रहती है। और उसके अंदर सिफतसालाह का (मानो) लगातार मीठा सुरीला राग होता रहता है। 12। हे प्रभू ! जिस मनुष्य के मन में तेरे प्रति श्रद्धा बन जाती है। उसके अंदर से अहंकार दूर हो जाता है। उसकी ममता वाली बुद्धि नाश हो जाती है। हे भाई ! अपने प्रभू ने जिस मनुष्य की सहायता की उसके सारे जगत में शोभा चमक पड़ी। 13। हे भाई ! जगत के मालिक प्रभू की सिफत सालाह करते रहो। मैं तो अपने ईश्वर प्रभू से सदा सदके जाता हूँ। उस प्रभू के बिना (उस जैसा) और कोई नहीं दिखता। सारे जगत में वह एक स्वयं ही स्वयं है। 14। हे भाई ! जिस मनुष्य ने परमात्मा को सदा-स्थिर जान लिया है उसका मन गुरू की कृपा से उसमें रंगा रहता है। हे प्रभू ! तेरे सेवक तेरा नाम सिमर-सिमर के आत्मिक जीवन हासिल करते हैं। वे सदा तेरे सर्व-व्यापक स्वरूप में लीन रहते हैं। 15। हे भाई ! हमारा मालिक-प्रभू अपने भक्तों का प्यारा है। सब जीवों का पार-उतारा करने वाला है। उसका नाम सिमर-सिमर के उसके भक्तों की हरेक आस पूरी हो जाती है। हे नानक ! परमात्मा अपने सेवकों की सदा लाज रखता है। 16। 1।
ਮਾਰੂ ਸੋਲਹੇ ਮਹਲਾ ੫
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਸੰਗੀ ਜੋਗੀ ਨਾਰਿ ਲਪਟਾਣੀ ॥
ਉਰਝਿ ਰਹੀ ਰੰਗ ਰਸ ਮਾਣੀ ॥
ਕਿਰਤ ਸੰਜੋਗੀ ਭਏ ਇਕਤ੍ਰਾ ਕਰਤੇ ਭੋਗ ਬਿਲਾਸਾ ਹੇ ॥੧॥
ਜੋ ਪਿਰੁ ਕਰੈ ਸੁ ਧਨ ਤਤੁ ਮਾਨੈ ॥
ਪਿਰੁ ਧਨਹਿ ਸੀਗਾਰਿ ਰਖੈ ਸੰਗਾਨੈ ॥
ਮਿਲਿ ਏਕਤ੍ਰ ਵਸਹਿ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਪ੍ਰਿਉ ਦੇ ਧਨਹਿ ਦਿਲਾਸਾ ਹੇ ॥੨॥
ਧਨ ਮਾਗੈ ਪ੍ਰਿਉ ਬਹੁ ਬਿਧਿ ਧਾਵੈ ॥
ਜੋ ਪਾਵੈ ਸੋ ਆਣਿ ਦਿਖਾਵੈ ॥
ਏਕ ਵਸਤੁ ਕਉ ਪਹੁਚਿ ਨ ਸਾਕੈ ਧਨ ਰਹਤੀ ਭੂਖ ਪਿਆਸਾ ਹੇ ॥੩॥
ਧਨ ਕਰੈ ਬਿਨਉ ਦੋਊ ਕਰ ਜੋਰੈ ॥
ਪ੍ਰਿਅ ਪਰਦੇਸਿ ਨ ਜਾਹੁ ਵਸਹੁ ਘਰਿ ਮੋਰੈ ॥
ਐਸਾ ਬਣਜੁ ਕਰਹੁ ਗ੍ਰਿਹ ਭੀਤਰਿ ਜਿਤੁ ਉਤਰੈ ਭੂਖ ਪਿਆਸਾ ਹੇ ॥੪॥
ਸਗਲੇ ਕਰਮ ਧਰਮ ਜੁਗ ਸਾਧਾ ॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਰਸ ਸੁਖੁ ਤਿਲੁ ਨਹੀ ਲਾਧਾ ॥
ਭਈ ਕ੍ਰਿਪਾ ਨਾਨਕ ਸਤਸੰਗੇ ਤਉ ਧਨ ਪਿਰ ਅਨੰਦ ਉਲਾਸਾ ਹੇ ॥੫॥
मारू सोलहे महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
संगी जोगी नारि लपटाणी ॥
उरझि रही रंग रस माणी ॥
किरत संजोगी भए इकत्रा करते भोग बिलासा हे ॥१॥
जो पिरु करै सु धन ततु मानै ॥
पिरु धनहि सीगारि रखै संगानै ॥
मिलि एकत्र वसहि दिनु राती प्रिउ दे धनहि दिलासा हे ॥२॥
धन मागै प्रिउ बहु बिधि धावै ॥
जो पावै सो आणि दिखावै ॥
एक वसतु कउ पहुचि न साकै धन रहती भूख पिआसा हे ॥३॥
धन करै बिनउ दोऊ कर जोरै ॥
प्रिअ परदेसि न जाहु वसहु घरि मोरै ॥
ऐसा बणजु करहु ग्रिह भीतरि जितु उतरै भूख पिआसा हे ॥४॥
सगले करम धरम जुग साधा ॥
बिनु हरि रस सुखु तिलु नही लाधा ॥
भई क्रिपा नानक सतसंगे तउ धन पिर अनंद उलासा हे ॥५॥

हिन्दी अर्थ: मारू सोलहे महला ५ ੴ सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! (यह जीवात्मा असल में विरक्त) जोगी (है। यह काया-) स्त्री का साथी (जब बन जाता है। तो काया-) स्त्री (इसके साथ) लिपटी रहती है। इसको अपने मोह में फसाती रहती है। (और इसके साथ माया के) रंग रस भोगती है। किए कर्मों के संजोगों से (यह जीवात्मा और काया) इकट्ठे होते हैं। और। (दुनिया के) भोग विलास करते रहते हैं। 1। हे भाई ! जो कुछ जीवात्मा-पति काया-स्त्री को कहता है वह तुरन्त मानती है जीवात्मा पति काया-स्त्री को सजा-सँवार के अपने साथ रखता है। मिल के दिन-रात ये इकट्ठे बसते हैं। जीवात्मा-पति काया-स्त्री को (कई तरह के) हौसले देता रहता है। 2। हे भाई ! काया-स्त्री (भी जो कुछ) माँगती है। (वह हासिल करने के लिए) जीवात्मा-पति कई तरह की दौड़-भाग करता फिरता है। जो कुछ उसको मिलता है। वह ला के (अपनी काया-स्त्री को) दिखा देता है। (पर इस दौड़-भाग में इसको) नाम-पदार्थ नहीं मिल सकता। (नाम-पदार्थ के बिना) काया-स्त्री की (माया वाली) भूख-प्यास टिकी रहती है। 3। हे भाई ! काया-स्त्री दोनों हाथ जोड़ती है और (जीवात्मा-पति के आगे) विनती करती है – हे प्यारे ! (मुझे छोड़ के) किसी और देश में ना चले जाना। मेरे ही इस घर में टिके रहना। इसी घर में कोई ऐसा वव्यापार करता रह। जिससे मेरी भूख-प्यास मिटती रहे (मेरी जरूरतें पूरी होती रहें)। 4। पर। हे भाई ! सदा से ही लोग मिथे हुए धार्मिक कर्म करते आए हैं। हरी-नाम के स्वाद के बिना किसी को भी रक्ती भर सुख नहीं मिला। हे नानक ! जब साध-संगति में परमात्मा की कृपा होती है तब यह जीवात्मा और काया मिल के (नाम की बरकति से) आत्मिक आनंद लेते हैं। 5।

संदर्भ: यह अंग 1072 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Noida के office-tower की 15वीं मंज़िल से शाम का Delhi-view।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 43 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1072” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1073 →, पीछे का: ← अंग 1071

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।