अंग
1086
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਾਧਸੰਗਿ ਭਜੁ ਅਚੁਤ ਸੁਆਮੀ ਦਰਗਹ ਸੋਭਾ ਪਾਵਣਾ ॥੩॥
ਚਾਰਿ ਪਦਾਰਥ ਅਸਟ ਦਸਾ ਸਿਧਿ ॥
ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਸਹਜ ਸੁਖੁ ਨਉ ਨਿਧਿ ॥
ਸਰਬ ਕਲਿਆਣ ਜੇ ਮਨ ਮਹਿ ਚਾਹਹਿ ਮਿਲਿ ਸਾਧੂ ਸੁਆਮੀ ਰਾਵਣਾ ॥੪॥
ਸਾਸਤ ਸਿੰਮ੍ਰਿਤਿ ਬੇਦ ਵਖਾਣੀ ॥
ਜਨਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਜੀਤੁ ਪਰਾਣੀ ॥
ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਨਿੰਦਾ ਪਰਹਰੀਐ ਹਰਿ ਰਸਨਾ ਨਾਨਕ ਗਾਵਣਾ ॥੫॥
ਜਿਸੁ ਰੂਪੁ ਨ ਰੇਖਿਆ ਕੁਲੁ ਨਹੀ ਜਾਤੀ ॥
ਪੂਰਨ ਪੂਰਿ ਰਹਿਆ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ॥
ਜੋ ਜੋ ਜਪੈ ਸੋਈ ਵਡਭਾਗੀ ਬਹੁੜਿ ਨ ਜੋਨੀ ਪਾਵਣਾ ॥੬॥
ਜਿਸ ਨੋ ਬਿਸਰੈ ਪੁਰਖੁ ਬਿਧਾਤਾ ॥
ਜਲਤਾ ਫਿਰੈ ਰਹੈ ਨਿਤ ਤਾਤਾ ॥
ਅਕਿਰਤਘਣੈ ਕਉ ਰਖੈ ਨ ਕੋਈ ਨਰਕ ਘੋਰ ਮਹਿ ਪਾਵਣਾ ॥੭॥
ਜੀਉ ਪ੍ਰਾਣ ਤਨੁ ਧਨੁ ਜਿਨਿ ਸਾਜਿਆ ॥
ਮਾਤ ਗਰਭ ਮਹਿ ਰਾਖਿ ਨਿਵਾਜਿਆ ॥
ਤਿਸ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਛਾਡਿ ਅਨ ਰਾਤਾ ਕਾਹੂ ਸਿਰੈ ਨ ਲਾਵਣਾ ॥੮॥
ਧਾਰਿ ਅਨੁਗ੍ਰਹੁ ਸੁਆਮੀ ਮੇਰੇ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਵਸਹਿ ਸਭਨ ਕੈ ਨੇਰੇ ॥
ਹਾਥਿ ਹਮਾਰੈ ਕਛੂਐ ਨਾਹੀ ਜਿਸੁ ਜਣਾਇਹਿ ਤਿਸੈ ਜਣਾਵਣਾ ॥੯॥
ਜਾ ਕੈ ਮਸਤਕਿ ਧੁਰਿ ਲਿਖਿ ਪਾਇਆ ॥
ਤਿਸ ਹੀ ਪੁਰਖ ਨ ਵਿਆਪੈ ਮਾਇਆ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਸਦਾ ਸਰਣਾਈ ਦੂਸਰ ਲਵੈ ਨ ਲਾਵਣਾ ॥੧੦॥
ਆਗਿਆ ਦੂਖ ਸੂਖ ਸਭਿ ਕੀਨੇ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਬਿਰਲੈ ਹੀ ਚੀਨੇ ॥
ਤਾ ਕੀ ਕੀਮਤਿ ਕਹਣੁ ਨ ਜਾਈ ਜਤ ਕਤ ਓਹੀ ਸਮਾਵਣਾ ॥੧੧॥
ਸੋਈ ਭਗਤੁ ਸੋਈ ਵਡ ਦਾਤਾ ॥
ਸੋਈ ਪੂਰਨ ਪੁਰਖੁ ਬਿਧਾਤਾ ॥
ਬਾਲ ਸਹਾਈ ਸੋਈ ਤੇਰਾ ਜੋ ਤੇਰੈ ਮਨਿ ਭਾਵਣਾ ॥੧੨॥
ਮਿਰਤੁ ਦੂਖ ਸੂਖ ਲਿਖਿ ਪਾਏ ॥
ਤਿਲੁ ਨਹੀ ਬਧਹਿ ਘਟਹਿ ਨ ਘਟਾਏ ॥
ਸੋਈ ਹੋਇ ਜਿ ਕਰਤੇ ਭਾਵੈ ਕਹਿ ਕੈ ਆਪੁ ਵਞਾਵਣਾ ॥੧੩॥
ਅੰਧ ਕੂਪ ਤੇ ਸੇਈ ਕਾਢੇ ॥
ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੇ ਟੂਟੇ ਗਾਂਢੇ ॥
ਕਿਰਪਾ ਧਾਰਿ ਰਖੇ ਕਰਿ ਅਪੁਨੇ ਮਿਲਿ ਸਾਧੂ ਗੋਬਿੰਦੁ ਧਿਆਵਣਾ ॥੧੪॥
ਤੇਰੀ ਕੀਮਤਿ ਕਹਣੁ ਨ ਜਾਈ ॥
ਅਚਰਜ ਰੂਪੁ ਵਡੀ ਵਡਿਆਈ ॥
ਭਗਤਿ ਦਾਨੁ ਮੰਗੈ ਜਨੁ ਤੇਰਾ ਨਾਨਕ ਬਲਿ ਬਲਿ ਜਾਵਣਾ ॥੧੫॥੧॥੧੪॥੨੨॥੨੪॥੨॥੧੪॥੬੨॥
ਚਾਰਿ ਪਦਾਰਥ ਅਸਟ ਦਸਾ ਸਿਧਿ ॥
ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਸਹਜ ਸੁਖੁ ਨਉ ਨਿਧਿ ॥
ਸਰਬ ਕਲਿਆਣ ਜੇ ਮਨ ਮਹਿ ਚਾਹਹਿ ਮਿਲਿ ਸਾਧੂ ਸੁਆਮੀ ਰਾਵਣਾ ॥੪॥
ਸਾਸਤ ਸਿੰਮ੍ਰਿਤਿ ਬੇਦ ਵਖਾਣੀ ॥
ਜਨਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਜੀਤੁ ਪਰਾਣੀ ॥
ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਨਿੰਦਾ ਪਰਹਰੀਐ ਹਰਿ ਰਸਨਾ ਨਾਨਕ ਗਾਵਣਾ ॥੫॥
ਜਿਸੁ ਰੂਪੁ ਨ ਰੇਖਿਆ ਕੁਲੁ ਨਹੀ ਜਾਤੀ ॥
ਪੂਰਨ ਪੂਰਿ ਰਹਿਆ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ॥
ਜੋ ਜੋ ਜਪੈ ਸੋਈ ਵਡਭਾਗੀ ਬਹੁੜਿ ਨ ਜੋਨੀ ਪਾਵਣਾ ॥੬॥
ਜਿਸ ਨੋ ਬਿਸਰੈ ਪੁਰਖੁ ਬਿਧਾਤਾ ॥
ਜਲਤਾ ਫਿਰੈ ਰਹੈ ਨਿਤ ਤਾਤਾ ॥
ਅਕਿਰਤਘਣੈ ਕਉ ਰਖੈ ਨ ਕੋਈ ਨਰਕ ਘੋਰ ਮਹਿ ਪਾਵਣਾ ॥੭॥
ਜੀਉ ਪ੍ਰਾਣ ਤਨੁ ਧਨੁ ਜਿਨਿ ਸਾਜਿਆ ॥
ਮਾਤ ਗਰਭ ਮਹਿ ਰਾਖਿ ਨਿਵਾਜਿਆ ॥
ਤਿਸ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਛਾਡਿ ਅਨ ਰਾਤਾ ਕਾਹੂ ਸਿਰੈ ਨ ਲਾਵਣਾ ॥੮॥
ਧਾਰਿ ਅਨੁਗ੍ਰਹੁ ਸੁਆਮੀ ਮੇਰੇ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਵਸਹਿ ਸਭਨ ਕੈ ਨੇਰੇ ॥
ਹਾਥਿ ਹਮਾਰੈ ਕਛੂਐ ਨਾਹੀ ਜਿਸੁ ਜਣਾਇਹਿ ਤਿਸੈ ਜਣਾਵਣਾ ॥੯॥
ਜਾ ਕੈ ਮਸਤਕਿ ਧੁਰਿ ਲਿਖਿ ਪਾਇਆ ॥
ਤਿਸ ਹੀ ਪੁਰਖ ਨ ਵਿਆਪੈ ਮਾਇਆ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਸਦਾ ਸਰਣਾਈ ਦੂਸਰ ਲਵੈ ਨ ਲਾਵਣਾ ॥੧੦॥
ਆਗਿਆ ਦੂਖ ਸੂਖ ਸਭਿ ਕੀਨੇ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਬਿਰਲੈ ਹੀ ਚੀਨੇ ॥
ਤਾ ਕੀ ਕੀਮਤਿ ਕਹਣੁ ਨ ਜਾਈ ਜਤ ਕਤ ਓਹੀ ਸਮਾਵਣਾ ॥੧੧॥
ਸੋਈ ਭਗਤੁ ਸੋਈ ਵਡ ਦਾਤਾ ॥
ਸੋਈ ਪੂਰਨ ਪੁਰਖੁ ਬਿਧਾਤਾ ॥
ਬਾਲ ਸਹਾਈ ਸੋਈ ਤੇਰਾ ਜੋ ਤੇਰੈ ਮਨਿ ਭਾਵਣਾ ॥੧੨॥
ਮਿਰਤੁ ਦੂਖ ਸੂਖ ਲਿਖਿ ਪਾਏ ॥
ਤਿਲੁ ਨਹੀ ਬਧਹਿ ਘਟਹਿ ਨ ਘਟਾਏ ॥
ਸੋਈ ਹੋਇ ਜਿ ਕਰਤੇ ਭਾਵੈ ਕਹਿ ਕੈ ਆਪੁ ਵਞਾਵਣਾ ॥੧੩॥
ਅੰਧ ਕੂਪ ਤੇ ਸੇਈ ਕਾਢੇ ॥
ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੇ ਟੂਟੇ ਗਾਂਢੇ ॥
ਕਿਰਪਾ ਧਾਰਿ ਰਖੇ ਕਰਿ ਅਪੁਨੇ ਮਿਲਿ ਸਾਧੂ ਗੋਬਿੰਦੁ ਧਿਆਵਣਾ ॥੧੪॥
ਤੇਰੀ ਕੀਮਤਿ ਕਹਣੁ ਨ ਜਾਈ ॥
ਅਚਰਜ ਰੂਪੁ ਵਡੀ ਵਡਿਆਈ ॥
ਭਗਤਿ ਦਾਨੁ ਮੰਗੈ ਜਨੁ ਤੇਰਾ ਨਾਨਕ ਬਲਿ ਬਲਿ ਜਾਵਣਾ ॥੧੫॥੧॥੧੪॥੨੨॥੨੪॥੨॥੧੪॥੬੨॥
साधसंगि भजु अचुत सुआमी दरगह सोभा पावणा ॥३॥
चारि पदारथ असट दसा सिधि ॥
नामु निधानु सहज सुखु नउ निधि ॥
सरब कलिआण जे मन महि चाहहि मिलि साधू सुआमी रावणा ॥४॥
सासत सिंम्रिति बेद वखाणी ॥
जनमु पदारथु जीतु पराणी ॥
कामु क्रोधु निंदा परहरीऐ हरि रसना नानक गावणा ॥५॥
जिसु रूपु न रेखिआ कुलु नही जाती ॥
पूरन पूरि रहिआ दिनु राती ॥
जो जो जपै सोई वडभागी बहुड़ि न जोनी पावणा ॥६॥
जिस नो बिसरै पुरखु बिधाता ॥
जलता फिरै रहै नित ताता ॥
अकिरतघणै कउ रखै न कोई नरक घोर महि पावणा ॥७॥
जीउ प्राण तनु धनु जिनि साजिआ ॥
मात गरभ महि राखि निवाजिआ ॥
तिस सिउ प्रीति छाडि अन राता काहू सिरै न लावणा ॥८॥
धारि अनुग्रहु सुआमी मेरे ॥
घटि घटि वसहि सभन कै नेरे ॥
हाथि हमारै कछूऐ नाही जिसु जणाइहि तिसै जणावणा ॥९॥
जा कै मसतकि धुरि लिखि पाइआ ॥
तिस ही पुरख न विआपै माइआ ॥
नानक दास सदा सरणाई दूसर लवै न लावणा ॥१०॥
आगिआ दूख सूख सभि कीने ॥
अंम्रित नामु बिरलै ही चीने ॥
ता की कीमति कहणु न जाई जत कत ओही समावणा ॥११॥
सोई भगतु सोई वड दाता ॥
सोई पूरन पुरखु बिधाता ॥
बाल सहाई सोई तेरा जो तेरै मनि भावणा ॥१२॥
मिरतु दूख सूख लिखि पाए ॥
तिलु नही बधहि घटहि न घटाए ॥
सोई होइ जि करते भावै कहि कै आपु वञावणा ॥१३॥
अंध कूप ते सेई काढे ॥
जनम जनम के टूटे गांढे ॥
किरपा धारि रखे करि अपुने मिलि साधू गोबिंदु धिआवणा ॥१४॥
तेरी कीमति कहणु न जाई ॥
अचरज रूपु वडी वडिआई ॥
भगति दानु मंगै जनु तेरा नानक बलि बलि जावणा ॥१५॥१॥१४॥२२॥२४॥२॥१४॥६२॥
चारि पदारथ असट दसा सिधि ॥
नामु निधानु सहज सुखु नउ निधि ॥
सरब कलिआण जे मन महि चाहहि मिलि साधू सुआमी रावणा ॥४॥
सासत सिंम्रिति बेद वखाणी ॥
जनमु पदारथु जीतु पराणी ॥
कामु क्रोधु निंदा परहरीऐ हरि रसना नानक गावणा ॥५॥
जिसु रूपु न रेखिआ कुलु नही जाती ॥
पूरन पूरि रहिआ दिनु राती ॥
जो जो जपै सोई वडभागी बहुड़ि न जोनी पावणा ॥६॥
जिस नो बिसरै पुरखु बिधाता ॥
जलता फिरै रहै नित ताता ॥
अकिरतघणै कउ रखै न कोई नरक घोर महि पावणा ॥७॥
जीउ प्राण तनु धनु जिनि साजिआ ॥
मात गरभ महि राखि निवाजिआ ॥
तिस सिउ प्रीति छाडि अन राता काहू सिरै न लावणा ॥८॥
धारि अनुग्रहु सुआमी मेरे ॥
घटि घटि वसहि सभन कै नेरे ॥
हाथि हमारै कछूऐ नाही जिसु जणाइहि तिसै जणावणा ॥९॥
जा कै मसतकि धुरि लिखि पाइआ ॥
तिस ही पुरख न विआपै माइआ ॥
नानक दास सदा सरणाई दूसर लवै न लावणा ॥१०॥
आगिआ दूख सूख सभि कीने ॥
अंम्रित नामु बिरलै ही चीने ॥
ता की कीमति कहणु न जाई जत कत ओही समावणा ॥११॥
सोई भगतु सोई वड दाता ॥
सोई पूरन पुरखु बिधाता ॥
बाल सहाई सोई तेरा जो तेरै मनि भावणा ॥१२॥
मिरतु दूख सूख लिखि पाए ॥
तिलु नही बधहि घटहि न घटाए ॥
सोई होइ जि करते भावै कहि कै आपु वञावणा ॥१३॥
अंध कूप ते सेई काढे ॥
जनम जनम के टूटे गांढे ॥
किरपा धारि रखे करि अपुने मिलि साधू गोबिंदु धिआवणा ॥१४॥
तेरी कीमति कहणु न जाई ॥
अचरज रूपु वडी वडिआई ॥
भगति दानु मंगै जनु तेरा नानक बलि बलि जावणा ॥१५॥१॥१४॥२२॥२४॥२॥१४॥६२॥
हिन्दी अर्थ: उस अविनाशी मालिक प्रभू का नाम गुरू की संगति में (रह के) जपा कर। प्रभू की हजूरी में (इस तरह) इज्जत मिलती है। 3। हे भाई ! अगर तू चार पदार्थ चाहता है। अगर तू अठारह सिद्धियों की अभिलाषा रखता है। यदि तुझे दुनियां के नौ निधियाँ (नौ खजाने) चाहिए। यदि तुझे सारे सुख चाहिए। तो गुरू को मिल के मालिक-प्रभू का सिमरन किया कर। ये हरी-नाम ही (असल) खजाना है। ये नाम ही आत्मिक अडोलता का सुख है। ये नाम ही चार-पदार्थ अठारह सिद्धियाँ और नौ निधियाँ हैं। 4। हे नानक ! (कह-) हे प्राणी ! शास्त्रों ने। स्मृतियों ने। वेदों ने कहा है कि अपने कीमती मानस जनम को सफल कर। (पर ये सफल तब ही हो सकता है यदि) जीभ से परमात्मा की सिफतसालाह गाई जाए। सिफतसालाह की बरकति से ही काम छोड़ा जा सकता है। क्रोध त्यागा जा सकता है निंदा तजी जा सकती है (और इन विकारों को त्यागने में ही जनम की सफलता है)। 5। हे भाई ! जिस परमात्मा का (क्या) रूप। रेख। कुल और जाति (है- ये बात) बताई नहीं जा सकती। जो परमात्मा दिन-रात हर वक्त सब जगह मौजूद है। उस परमात्मा का नाम जो जो मनुष्य जपता है वह बहुत भाग्यशाली बन जाता है। वह मनुष्य बार-बार जूनियों में नहीं पड़ता। 6। हे भाई ! जिस मनुष्य को सर्व-व्यापक बिसरा रहता है। वह सदा (विकारों में) जलता फिरता है। वह सदा (क्रोध से) जला भुजा रहता है। परमात्मा के किए उपकारों को भुलाने वाले उस मनुष्य को (इस बुरी आत्मिक दशा से) कोई बचा नहीं सकता। वह मनुष्य (सदा इस) भयानक नर्क में पड़ा रहता है। 7। हे नानक ! जिस परमात्मा ने जिंद दी। प्राण दिए। शरीर बनाया। धन दिया। माँ के पेट में रक्षा करके बड़ी दया की। जो मनुष्य उस परमात्मा का प्यार छोड़ के और ही पदार्थों के मोह में मस्त रहता है। वह मनुष्य किसी तरफ भी सिरे नहीं चढ़ता। 8। हे मेरे मालिक प्रभू ! (हम जीवों पर) दया किए रख। तू हरेक शरीर में बसता है। तू सब जीवों के नजदीक बसता है। हम जीवों के बस में कुछ भी नहीं। जिस मनुष्य को तू (आत्मिक जीवन की) समझ बख्शता है। वही मनुष्य यह समझ हासिल करता है। 9। हे नानक ! (कह- हे भाई !) धुर हजूरी में से जिस मनुष्य के माथे पर (प्रभू ने अच्छे भाग्यों के लेख) लिख दिए होते हैं। सिर्फ उस मनुष्य पर ही माया अपना जोर नहीं डाल सकती। हे भाई ! परमात्मा के भक्त सदा परमात्मा की शरण पड़े रहते हैं। वे किसी और को परमात्मा के बराबर का नहीं समझते। 10। हे भाई ! (जगत के) सारे दुख सारे सुख (परमात्मा ने अपने) हुकम में (आप ही) बनाए हैं। (इन दुखों से बचने के लिए) किसी विरले मनुष्य ने ही आत्मिक जीवन देने वाले हरी-नाम के साथ सांझ डाली है। हे भाई ! उस परमात्मा का मूल्य नहीं बताया जा सकता (वह परमात्मा किसी दुनियावी पदार्थ के बदले में नहीं मिलता। वैसे) हर जगह वह स्वयं ही समाया हुआ है। 11। हे भाई ! वह परमात्मा आप ही (अपने सेवक में बैठा अपनी) भगती करने वाला है। वह स्वयं ही सबसे बड़ा दातार है। वह स्वयं ही सबमें व्यापक सृजनहार है। हे प्रभू ! जो (तेरा भक्त) तेरे मन में (तुझे) प्यारा लगता है। वही तेरा बाल सखा है (वही तुझे इस तरह प्यारा है जैसे कोई छोटी उम्र से एक साथ रहने वाले बालक एक-दूसरे को सारी उम्र प्यार करने वाले होते हैं)। 12। हे भाई ! मौत दुख-सुख करतार ने स्वयं ही (जीवों के लेखों में) लिख के रख दिए हैं। ना ये बढ़ाने से तिल मात्र बढ़ते हैं। ना ही कम करने से कम होते हैं। हे भाई ! जो कुछ करतार को अच्छा लगता है वही होता है। (यह) कह के (कि हम अपने आप कुछ कर सकते हैं) अपने आप को दुखी ही करना होता है। 13। उनको ही परमात्मा माया के मोह के घोर अंधकार भरे कूएँ में से निकाल लेता है। और। कई जन्मों के (अपने से) टूटे हुओं को (दोबारा अपने साथ) जोड़ लेता है। हे भाई ! परमात्मा कृपा करके जिन मनुष्यों को अपना बना लेता है। जो मनुष्य गुरू को मिल के परमात्मा का नाम सिमरते हैं।14। हे नानक ! (कह-हे प्रभू !) तेरा मूल्य नहीं पाया जा सकता। तेरा स्वरूप हैरान कर देने वाला है और तेरी वडिआई बड़ी है। तेरा सेवक (तेरे दर से) तेरी भक्ति की ख़ैर माँगता है। और तुझसे सदके जाता है कुर्बान जाता है। 15। 1। 14। 22। 24। 2। 14। 62।
ਮਾਰੂ ਵਾਰ ਮਹਲਾ ੩
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੧ ॥
ਵਿਣੁ ਗਾਹਕ ਗੁਣੁ ਵੇਚੀਐ ਤਉ ਗੁਣੁ ਸਹਘੋ ਜਾਇ ॥
ਗੁਣ ਕਾ ਗਾਹਕੁ ਜੇ ਮਿਲੈ ਤਉ ਗੁਣੁ ਲਾਖ ਵਿਕਾਇ ॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੧ ॥
ਵਿਣੁ ਗਾਹਕ ਗੁਣੁ ਵੇਚੀਐ ਤਉ ਗੁਣੁ ਸਹਘੋ ਜਾਇ ॥
ਗੁਣ ਕਾ ਗਾਹਕੁ ਜੇ ਮਿਲੈ ਤਉ ਗੁਣੁ ਲਾਖ ਵਿਕਾਇ ॥
मारू वार महला ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोकु मः १ ॥
विणु गाहक गुणु वेचीऐ तउ गुणु सहघो जाइ ॥
गुण का गाहकु जे मिलै तउ गुणु लाख विकाइ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोकु मः १ ॥
विणु गाहक गुणु वेचीऐ तउ गुणु सहघो जाइ ॥
गुण का गाहकु जे मिलै तउ गुणु लाख विकाइ ॥
हिन्दी अर्थ: मारू वार महला ३ ੴ सतिगुर प्रसादि॥ श्लोक महला १॥ अगर कोई गाहक ना हो और (कोई) गुण (भाव। कोई कीमती पदार्थ) बेचें तो वह गुण सस्ते भाव में बिक जाता है। (भाव। उसकी कद्र नहीं पड़ती)। पर। यदि गुण का गाहक मिल जाए तो वह बहुत कीमती बिकता है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1086 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Lohri की रात अगियारी के पास, गाने और तिल-गुड़।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 42 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1086” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1087 →, पीछे का: ← अंग 1085।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।