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अंग 1103

अंग
1103
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: Bhagat Kabeer Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
राम नाम की गति नही जानी कैसे उतरसि पारा ॥1॥
जीअ बधहु सु धरमु करि थापहु अधरमु कहहु कत भाई ॥
आपस कउ मुनिवर करि थापहु का कउ कहहु कसाई ॥2॥
मन के अंधे आपि न बूझहु काहि बुझावहु भाई ॥
माइआ कारन बिदिआ बेचहु जनमु अबिरथा जाई ॥3॥
नारद बचन बिआसु कहत है सुक कउ पूछहु जाई ॥
कहि कबीर रामै रमि छूटहु नाहि त बूडे भाई ॥4॥1॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: (हे पांडे !) आप (संसार-समुंद्र से) कैसे पार होंगे। आपको इस बात की तो समझ ही नहीं पड़ी कि परमात्मा का नाम सिमरने से कैसी आत्मिक अवस्था बनती है। 1। (हे पांडे ! एक तरफ आप मांस खाने की निंदा करते हो; पर यज्ञ के वक्त आप भी) जीव मारते हैं (बलि देने के लिए। और) इस को धर्म का काम समझते हैं। फिर। हे भाई ! बताओ। पाप कौन सा है। (यज्ञ करने के वक्त आप स्वयं भी जीव हिंसा करते हैं। पर) अपने आप को आप श्रेष्ठ ऋषि मानते हैं। (अगर जीव मारने वाले लोग ऋषि हैं सकते हैं।) तो आप कसाई किसे कहते हैं। (आप) उन लोगों को कसाई क्यों कहते हैं जो मांस बेचते है। 2। हे अज्ञानी पांडे ! आपको अपने आप को (जीवन के सही रास्ते की) समझ नहीं आई। हे भाई ! और किस को समझा रहे हैं। (इस पढ़ी हुई विद्या से आप स्वयं ही कोई लाभ नहीं उठा रहे। इस) विद्या को सिर्फ माया की खातिर बेच ही रहे हैं। इस तरह आपकी जिंदगी व्यर्थ गुजर रही है। 3। (अगर मेरी इस बात पर यकीन नहीं आता। तो अपने ही पुरातन ऋषियों के वचन पढ़-सुन के देख लो) नारद ऋषि के यही वचन हैं। व्यास यही बात कहते हैं। सुकदेव को भी जा के पूछ लो (भाव। सुकदेव के वचन पढ़ के भी देख लो। वह भी यही कहता है कि नाम सिमरने से पार उतारा होता है)। कबीर कहता है- हे भाई ! (दुनिया के बँधनों से) प्रभू का नाम सिमर के ही मुक्त हो सकते हैं। नहीं तो अपने आप को डूबा हुआ समझो। 4। 1।
बनहि बसे किउ पाईऐ जउ लउ मनहु न तजहि बिकार ॥
जिह घरु बनु समसरि कीआ ते पूरे संसार ॥1॥
सार सुखु पाईऐ रामा ॥
रंगि रवहु आतमै राम ॥1॥ रहाउ ॥
जटा भसम लेपन कीआ कहा गुफा महि बासु ॥
मनु जीते जगु जीतिआ जां ते बिखिआ ते होइ उदासु ॥2॥
अंजनु देइ सभै कोई टुकु चाहन माहि बिडानु ॥
गिआन अंजनु जिह पाइआ ते लोइन परवानु ॥3॥
कहि कबीर अब जानिआ गुरि गिआनु दीआ समझाइ ॥
अंतरगति हरि भेटिआ अब मेरा मनु कतहू न जाइ ॥4॥2॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) आप अपने मन में से विकार नहीं छोड़ता। जंगल में जा बसने से परमात्मा कैसे मिल सकता है। जगत में संपूर्ण पुरख वही हैं जिन्होंने घर और जंगल को एक जैसा जान लिया है (भाव। गृहस्त में रहते हुए भी त्यागी हैं)। 1। असल श्रेष्ठ सुख प्रभू का नाम सिमरने से ही मिलता है; (इस वास्ते हे भाई !) अपने हृदय में ही प्रेम से राम का नाम सिमरो। 1। रहाउ। जब तक। अगर आप जटा (धार के उन पर) राख लगा ली। या किसी गुफा में जा कर डेरा लगा लिया। तो भी क्या हुआ। (माया का मोह इस तरह नहीं छोड़ता)। जिन्होंने अपने मन को जीत लिया है उन्होंने (मानो) सारे जगत को जीत लिया। क्योंकि मन जीतने से ही माया से उपराम हुआ जाता है। 2। हर कोई (आँख में) सुरमा डाल लेता है। पर (सुरमा डालने वाले की) नीयत में फर्क हुआ करता है (कोई सुरमा डालता है विकारों के लिए। और कोई आँखों की नजर अच्छी रखने के लिए। वैसे ही। माया के बँधनों से निकलने के लिए उद्यम करने की आवश्यक्ता है। पर उद्यम उद्यम में फर्क है) वहीं आँखें (प्रभू की नज़र में) कबूल हैं जिन्होंने (गुरू के) ज्ञान का सुरमा डाला है। 3। कबीर कहता है-मुझे मेरे गुरू ने (जीवन के सही रास्ते का) ज्ञान बख्श दिया है। मुझे अब समझ आ गई है। (गुरू की कृपा से) मेरे अंदर बैठा हुआ परमात्मा मुझे मिल गया है। मेरा मन (जंगल गुफा आदि) किसी और तरफ नहीं जाता। 4। 2।
रिधि सिधि जा कउ फुरी तब काहू सिउ किआ काज ॥
तेरे कहने की गति किआ कहउ मै बोलत ही बड लाज ॥1॥
रामु जिह पाइआ राम ॥
ते भवहि न बारै बार ॥1॥ रहाउ ॥
झूठा जगु डहकै घना दिन दुइ बरतन की आस ॥
राम उदकु जिह जन पीआ तिहि बहुरि न भई पिआस ॥2॥
गुर प्रसादि जिह बूझिआ आसा ते भइआ निरासु ॥
सभु सचु नदरी आइआ जउ आतम भइआ उदासु ॥3॥
राम नाम रसु चाखिआ हरि नामा हर तारि ॥
कहु कबीर कंचनु भइआ भ्रमु गइआ समुद्रै पारि ॥4॥3॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: (हे जोगी ! आप कहता है। ‘मुझे रिद्धियां-सिद्धियां आ गई हैं’। पर) आपके निरी (ये बात) कहने की हालत मैं क्या बताऊँ। मुझे तो बात करते हुए शर्म आती है। (भला। हे जोगी !) जिस मनुष्य के सिर्फ सोचने से ही रिद्धियां-सिद्धियां हो जाएं। उसको किसी और की मुथाजी कहाँ रह जाती है। (और आप अभी भी मुथाज हैं के लोगों के दर पर भटकता फिरता है)। 1। (हे जोगी !) जिन लोगों को सचमुच परमात्मा मिल जाता है। वह (भिक्षा माँगने के लिए) दर-दर पर नहीं भटकते। 1। रहाउ। दो-चार दिन (माया) बरतने की आस में ही यह झूठा जगत कितना भटकता फिरता है। (हे जोगी !) जिन लोगों ने प्रभू का नाम-अमृत पीया है। उनको फिर माया की प्यास नहीं लगती। 2। गुरू की कृपा से जिस ने (सही जीवन) समझ लिया है। वह आशाएं त्याग के आशाओं से ऊँचा हो जाता है। क्योंकि जब मनुष्य अंदर से माया से उपराम हो जाए तो उसको हर जगह प्रभू दिखाई देता है (माया की तरफ उसकी निगाह नहीं पड़ती)। 3। हे कबीर ! कह- जिस मनुष्य ने परमात्मा के नाम का स्वाद चख लिया है। उसको हरेक करिश्में में प्रभू का नाम ही दिखता और सुनता है। वह शुद्ध सोना बन जाता है। उसकी भटकना समुंद्र के पार चली जाती है (सदा के लिए मिट जाती है)। 4। 3।
उदक समुंद सलल की साखिआ नदी तरंग समावहिगे ॥
सुंनहि सुंनु मिलिआ समदरसी पवन रूप होइ जावहिगे ॥1॥
बहुरि हम काहे आवहिगे ॥
आवन जाना हुकमु तिसै का हुकमै बुझि समावहिगे ॥1॥ रहाउ ॥
जब चूकै पंच धातु की रचना ऐसे भरमु चुकावहिगे ॥
दरसनु छोडि भए समदरसी एको नामु धिआवहिगे ॥2॥
जित हम लाए तित ही लागे तैसे करम कमावहिगे ॥
हरि जी क्रिपा करे जउ अपनी तौ गुर के सबदि समावहिगे ॥3॥
जीवत मरहु मरहु फुनि जीवहु पुनरपि जनमु न होई ॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: जैसे पानी समुंद्र के पानी में मिल के एक-रूप हो जाता है। जैसे नदी के पानी की लहरें नदी के पानी में लीन हो जाती हैं। जैसे हवा हवा में मिल जाती है। वैसे ही वासना-रहित हुआ मेरा मन अफुर-प्रभू में मिल गया है। और अब मुझे हर जगह प्रभू ही दिखाई दे रहा है। 1। मैं फिर कभी (जनम मरण के चक्कर में) नहीं आऊँगा। ये जनम-मरण का चक्कर प्रभू की रज़ा (के अनुसार) ही है। मैं उस रज़ा को समझ के (रज़ा में) लीन हो गया हूँ। 1। रहाउ। अब जब (प्रभू में लीन होने के कारण) मेरा पाँच-तत्वी शरीर का मोह समाप्त हो गया है। मैंने अपना भुलेखा भी ऐसें समाप्त कर लिया है कि किसी खास भेष (की महत्वता का विचार) छोड़ के मुझे सबमें ही परमात्मा दिखता है। मैं एक प्रभू का नाम ही सिमर रहा हूँ। 2। (पर। ये प्रभू की अपनी ही मेहर है) जिस तरफ उसने मुझे लगाया है मैं उधर ही लग पड़ा हूँ (जिस प्रकार के काम वह मुझसे करवाता है) वैसे ही काम मैं कर रहा हॅूँ। जब भी (जिन पर) प्रभू जी अपनी मेहर करते हैं। वह गुरू के शबद में लीन हो जाते हैं। 3। (हे भाई !) गृहस्त में रहते हुए ही (पहले) विकारों से मरो। जब इस तरह मरोगे। तो फिर आत्मिक जीवन की तरफ जी उठोगे।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

कबीर पन्द्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, मगर रामानन्द-शिष्य परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, ज़बान सीधी है, कई बार चुभने वाली। उनकी कुछ रचनाएँ बीजक में हैं, कुछ आदि ग्रंथ में, कुछ अनेक संप्रदायों में बिखरी हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे पांडे !) आप (संसार-समुंद्र से) कैसे पार होंगे।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।