अंग
1059
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਸੁ ਸੋਝੀ ਪਾਏ ॥
ਹਉਮੈ ਮਾਇਆ ਭਰਮੁ ਗਵਾਏ ॥
ਗੁਰ ਕੀ ਪਉੜੀ ਊਤਮ ਊਚੀ ਦਰਿ ਸਚੈ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਇਦਾ ॥੭॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਚੁ ਸੰਜਮੁ ਕਰਣੀ ਸਾਰੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਏ ਮੋਖ ਦੁਆਰੁ ॥
ਭਾਇ ਭਗਤਿ ਸਦਾ ਰੰਗਿ ਰਾਤਾ ਆਪੁ ਗਵਾਇ ਸਮਾਇਦਾ ॥੮॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਮਨੁ ਖੋਜਿ ਸੁਣਾਏ ॥
ਸਚੈ ਨਾਮਿ ਸਦਾ ਲਿਵ ਲਾਏ ॥
ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਸੋਈ ਕਰਸੀ ਜੋ ਸਚੇ ਮਨਿ ਭਾਇਦਾ ॥੯॥
ਜਾ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਸਤਿਗੁਰੂ ਮਿਲਾਏ ॥
ਜਾ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਾ ਮੰਨਿ ਵਸਾਏ ॥
ਆਪਣੈ ਭਾਣੈ ਸਦਾ ਰੰਗਿ ਰਾਤਾ ਭਾਣੈ ਮੰਨਿ ਵਸਾਇਦਾ ॥੧੦॥
ਮਨਹਠਿ ਕਰਮ ਕਰੇ ਸੋ ਛੀਜੈ ॥
ਬਹੁਤੇ ਭੇਖ ਕਰੇ ਨਹੀ ਭੀਜੈ ॥
ਬਿਖਿਆ ਰਾਤੇ ਦੁਖੁ ਕਮਾਵਹਿ ਦੁਖੇ ਦੁਖਿ ਸਮਾਇਦਾ ॥੧੧॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਸੁ ਸੁਖੁ ਕਮਾਏ ॥
ਮਰਣ ਜੀਵਣ ਕੀ ਸੋਝੀ ਪਾਏ ॥
ਮਰਣੁ ਜੀਵਣੁ ਜੋ ਸਮ ਕਰਿ ਜਾਣੈ ਸੋ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰਭ ਭਾਇਦਾ ॥੧੨॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਰਹਿ ਸੁ ਹਹਿ ਪਰਵਾਣੁ ॥
ਆਵਣ ਜਾਣਾ ਸਬਦੁ ਪਛਾਣੁ ॥
ਮਰੈ ਨ ਜੰਮੈ ਨਾ ਦੁਖੁ ਪਾਏ ਮਨ ਹੀ ਮਨਹਿ ਸਮਾਇਦਾ ॥੧੩॥
ਸੇ ਵਡਭਾਗੀ ਜਿਨੀ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਾਇਆ ॥
ਹਉਮੈ ਵਿਚਹੁ ਮੋਹੁ ਚੁਕਾਇਆ ॥
ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਫਿਰਿ ਮੈਲੁ ਨ ਲਾਗੈ ਦਰਿ ਸਚੈ ਸੋਭਾ ਪਾਇਦਾ ॥੧੪॥
ਆਪੇ ਕਰੇ ਕਰਾਏ ਆਪੇ ॥
ਆਪੇ ਵੇਖੈ ਥਾਪਿ ਉਥਾਪੇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੇਵਾ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰਭ ਭਾਵੈ ਸਚੁ ਸੁਣਿ ਲੇਖੈ ਪਾਇਦਾ ॥੧੫॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਚੋ ਸਚੁ ਕਮਾਵੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਿਰਮਲੁ ਮੈਲੁ ਨ ਲਾਵੈ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਵੀਚਾਰੀ ਨਾਮੇ ਨਾਮਿ ਸਮਾਇਦਾ ॥੧੬॥੧॥੧੫॥
ਹਉਮੈ ਮਾਇਆ ਭਰਮੁ ਗਵਾਏ ॥
ਗੁਰ ਕੀ ਪਉੜੀ ਊਤਮ ਊਚੀ ਦਰਿ ਸਚੈ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਇਦਾ ॥੭॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਚੁ ਸੰਜਮੁ ਕਰਣੀ ਸਾਰੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਏ ਮੋਖ ਦੁਆਰੁ ॥
ਭਾਇ ਭਗਤਿ ਸਦਾ ਰੰਗਿ ਰਾਤਾ ਆਪੁ ਗਵਾਇ ਸਮਾਇਦਾ ॥੮॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਮਨੁ ਖੋਜਿ ਸੁਣਾਏ ॥
ਸਚੈ ਨਾਮਿ ਸਦਾ ਲਿਵ ਲਾਏ ॥
ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਸੋਈ ਕਰਸੀ ਜੋ ਸਚੇ ਮਨਿ ਭਾਇਦਾ ॥੯॥
ਜਾ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਸਤਿਗੁਰੂ ਮਿਲਾਏ ॥
ਜਾ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਾ ਮੰਨਿ ਵਸਾਏ ॥
ਆਪਣੈ ਭਾਣੈ ਸਦਾ ਰੰਗਿ ਰਾਤਾ ਭਾਣੈ ਮੰਨਿ ਵਸਾਇਦਾ ॥੧੦॥
ਮਨਹਠਿ ਕਰਮ ਕਰੇ ਸੋ ਛੀਜੈ ॥
ਬਹੁਤੇ ਭੇਖ ਕਰੇ ਨਹੀ ਭੀਜੈ ॥
ਬਿਖਿਆ ਰਾਤੇ ਦੁਖੁ ਕਮਾਵਹਿ ਦੁਖੇ ਦੁਖਿ ਸਮਾਇਦਾ ॥੧੧॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਸੁ ਸੁਖੁ ਕਮਾਏ ॥
ਮਰਣ ਜੀਵਣ ਕੀ ਸੋਝੀ ਪਾਏ ॥
ਮਰਣੁ ਜੀਵਣੁ ਜੋ ਸਮ ਕਰਿ ਜਾਣੈ ਸੋ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰਭ ਭਾਇਦਾ ॥੧੨॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਰਹਿ ਸੁ ਹਹਿ ਪਰਵਾਣੁ ॥
ਆਵਣ ਜਾਣਾ ਸਬਦੁ ਪਛਾਣੁ ॥
ਮਰੈ ਨ ਜੰਮੈ ਨਾ ਦੁਖੁ ਪਾਏ ਮਨ ਹੀ ਮਨਹਿ ਸਮਾਇਦਾ ॥੧੩॥
ਸੇ ਵਡਭਾਗੀ ਜਿਨੀ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਾਇਆ ॥
ਹਉਮੈ ਵਿਚਹੁ ਮੋਹੁ ਚੁਕਾਇਆ ॥
ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਫਿਰਿ ਮੈਲੁ ਨ ਲਾਗੈ ਦਰਿ ਸਚੈ ਸੋਭਾ ਪਾਇਦਾ ॥੧੪॥
ਆਪੇ ਕਰੇ ਕਰਾਏ ਆਪੇ ॥
ਆਪੇ ਵੇਖੈ ਥਾਪਿ ਉਥਾਪੇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੇਵਾ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰਭ ਭਾਵੈ ਸਚੁ ਸੁਣਿ ਲੇਖੈ ਪਾਇਦਾ ॥੧੫॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਚੋ ਸਚੁ ਕਮਾਵੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਿਰਮਲੁ ਮੈਲੁ ਨ ਲਾਵੈ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਵੀਚਾਰੀ ਨਾਮੇ ਨਾਮਿ ਸਮਾਇਦਾ ॥੧੬॥੧॥੧੫॥
गुरमुखि होवै सु सोझी पाए ॥
हउमै माइआ भरमु गवाए ॥
गुर की पउड़ी ऊतम ऊची दरि सचै हरि गुण गाइदा ॥७॥
गुरमुखि सचु संजमु करणी सारु ॥
गुरमुखि पाए मोख दुआरु ॥
भाइ भगति सदा रंगि राता आपु गवाइ समाइदा ॥८॥
गुरमुखि होवै मनु खोजि सुणाए ॥
सचै नामि सदा लिव लाए ॥
जो तिसु भावै सोई करसी जो सचे मनि भाइदा ॥९॥
जा तिसु भावै सतिगुरू मिलाए ॥
जा तिसु भावै ता मंनि वसाए ॥
आपणै भाणै सदा रंगि राता भाणै मंनि वसाइदा ॥१०॥
मनहठि करम करे सो छीजै ॥
बहुते भेख करे नही भीजै ॥
बिखिआ राते दुखु कमावहि दुखे दुखि समाइदा ॥११॥
गुरमुखि होवै सु सुखु कमाए ॥
मरण जीवण की सोझी पाए ॥
मरणु जीवणु जो सम करि जाणै सो मेरे प्रभ भाइदा ॥१२॥
गुरमुखि मरहि सु हहि परवाणु ॥
आवण जाणा सबदु पछाणु ॥
मरै न जंमै ना दुखु पाए मन ही मनहि समाइदा ॥१३॥
से वडभागी जिनी सतिगुरु पाइआ ॥
हउमै विचहु मोहु चुकाइआ ॥
मनु निरमलु फिरि मैलु न लागै दरि सचै सोभा पाइदा ॥१४॥
आपे करे कराए आपे ॥
आपे वेखै थापि उथापे ॥
गुरमुखि सेवा मेरे प्रभ भावै सचु सुणि लेखै पाइदा ॥१५॥
गुरमुखि सचो सचु कमावै ॥
गुरमुखि निरमलु मैलु न लावै ॥
नानक नामि रते वीचारी नामे नामि समाइदा ॥१६॥१॥१५॥
हउमै माइआ भरमु गवाए ॥
गुर की पउड़ी ऊतम ऊची दरि सचै हरि गुण गाइदा ॥७॥
गुरमुखि सचु संजमु करणी सारु ॥
गुरमुखि पाए मोख दुआरु ॥
भाइ भगति सदा रंगि राता आपु गवाइ समाइदा ॥८॥
गुरमुखि होवै मनु खोजि सुणाए ॥
सचै नामि सदा लिव लाए ॥
जो तिसु भावै सोई करसी जो सचे मनि भाइदा ॥९॥
जा तिसु भावै सतिगुरू मिलाए ॥
जा तिसु भावै ता मंनि वसाए ॥
आपणै भाणै सदा रंगि राता भाणै मंनि वसाइदा ॥१०॥
मनहठि करम करे सो छीजै ॥
बहुते भेख करे नही भीजै ॥
बिखिआ राते दुखु कमावहि दुखे दुखि समाइदा ॥११॥
गुरमुखि होवै सु सुखु कमाए ॥
मरण जीवण की सोझी पाए ॥
मरणु जीवणु जो सम करि जाणै सो मेरे प्रभ भाइदा ॥१२॥
गुरमुखि मरहि सु हहि परवाणु ॥
आवण जाणा सबदु पछाणु ॥
मरै न जंमै ना दुखु पाए मन ही मनहि समाइदा ॥१३॥
से वडभागी जिनी सतिगुरु पाइआ ॥
हउमै विचहु मोहु चुकाइआ ॥
मनु निरमलु फिरि मैलु न लागै दरि सचै सोभा पाइदा ॥१४॥
आपे करे कराए आपे ॥
आपे वेखै थापि उथापे ॥
गुरमुखि सेवा मेरे प्रभ भावै सचु सुणि लेखै पाइदा ॥१५॥
गुरमुखि सचो सचु कमावै ॥
गुरमुखि निरमलु मैलु न लावै ॥
नानक नामि रते वीचारी नामे नामि समाइदा ॥१६॥१॥१५॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। वह आत्मिक जीवन की सूझ प्राप्त कर लेता है। वह अपने अंदर से अहंकार और माया वाली भटकना दूर कर लेता है। वह मनुष्य प्रभू-चरणों में सुरति जोड़ के प्रभू के गुण गाता रहता है। यही है गुरू की (बताई हुई) ऊँची और उक्तम सीढ़ी (जिसके द्वारा मनुष्य ऊँचे आत्मिक मण्डल में चढ़ कर प्रभू को जा मिलता है)। 7। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है। सदा स्थिर हरी-नाम सिमरता है- यही है उसका करने-योग्य काम। यही है उसके लिए (विकारों से बचने की) बढ़िया जुगति। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य (विकारों से) मुक्ति पाने का (यह) दरवाजा पा लेता है। गुरू की शरण में रहने वाला मनुष्य प्रभू के प्रेम में प्रभू की भक्ति में प्रभू के नाम-रंग में सदा रंगा रहता है। वह (अपने अंदर से) स्वै भाव दूर करके प्रभू में समाया रहता है। 8। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। वह सदा-स्थिर हरी-नाम में सदा अपनी सुरति जोड़े रखता है। वह मनुष्य (अपने) मन को खोज के (यह निश्चय बनाता है। और औरों को भी) सुनाता है कि जो कुछ उस परमात्मा को अच्छा लगता है। वही कुछ वह करता है। (जगत में वही कुछ वह है) जो उस सदा कायम रहने वाले परमात्मा के मन में भा जाता है। 9। हे भाई ! (गुरमुख मनुष्य औरों को भी यही सुनाता है कि) जब परमात्मा की रजा होती है तब वह मनुष्य को गुरू मिलाता है। तब उसके मन में (अपना नाम) बसाता है। जिस मनुष्य को परमात्मा अपनी रज़ा में रखता है। वह मनुष्य सदा उस प्रेम-रंग में रंगा रहता है। (हे भाई ! गुरमुख यह यकीन बनाता है कि) प्रभू अपनी रजा के अनुसार ही (अपना नाम) मनुष्य के मन में बसाता है। 10। हे भाई ! जो मनुष्य के मन के हठ से (ही निहित किए धार्मिक) कर्म करता है वह (आत्मिक जीवन की ओर से) कमजोर होता जाता है (ऐसा मनुष्य) धार्मिक पहरावे तो बहुत सारे अपनाता है पर (इस तरह उसका मन प्रभू के प्यार में) भीगता नहीं। हे भाई ! माया के मोह में मस्त मनुष्य (जो भी कर्म करते हैं। वे उनमें से) दुख (ही) कमाते हैं। (हे भाई ! माया के मोह के कारण मनुष्य) हर वक्त दुख में ही फसा रहता है। 11। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। वह (अपने उद्यमों से) आत्मिक आनंद कमाता है। वह मनुष्य ये समझ लेता है कि आत्मिक मौत क्या है और आत्मिक जीवन क्या है। हे भाई ! जो मनुष्य मौत और जीवन को (परमात्मा की रजा में व्याप्त देख के) एक समान ही समझता है (ना जीवन की लालसा। ना मौत से डर)। वह मनुष्य मेरे परमात्मा को प्यारा लगता है। 12। हे भाई ! गुरू के सन्मुख हो के जो मनुष्य (अपने अंदर से) स्वै भाव दूर करते हैं। वह सुंदर आत्मिक जीवन वाले बन जाते हैं वह प्रभू की हजूरी में कबूल होते हैं (वे पैदा होने मरने को परमात्मा का हुकम समझते हैं)। हे भाई ! तू भी पैदा होने मरने को प्रभू का हुकम ही समझ। (जो मनुष्य ऐसा यकीन बनाता है) वह जनम-मरण के चक्कर में नहीं पड़ता। वह (ये) दुख नहीं पाता। वह (बाहर भटकने की जगह) सदा ही अंतरात्मे टिका रहता है। 13। हे भाई ! वे मनुष्य भाग्यशाली हैं। जिन्हें गुरू मिल गया। वे अपने अंदर से अहंकार और माया का मोह दूर कर लेते हैं। हे भाई ! जिस मनुष्य का मन पवित्र हो जाता है। जिसके मन को दोबारा विकारों की मैल नहीं लगती। वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू के दर पर आदर पाता है। 14। हे भाई ! प्रभू स्वयं ही (सब कुछ) करता है। स्वयं ही (जीवों से) करवाता है। खुद ही (सबकी) संभाल करता है। खुद ही पैदा करके नाश करता है। हे भाई ! गुरू के सन्मुख हो के की हुई सेवा-भगती प्रभू को प्यारी लगती है। (जीव से) हरी-नाम का सिमरन सुन के परमात्मा (उसकी) ये मेहनत परवान करता है। 15। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य सदा हरी-नाम सिमरन की कमाई करता है। उसका मन पवित्र हो जाता है। उसको विकारों की मैल नहीं लगती। हे नानक ! जो मनुष्य हरी-नाम में मस्त रहते हैं। वे आत्मिक जीवन की सूझ वाले हो जाते हैं। (आत्मिक जीवन की सूझ वाला मनुष्य) सदा हरी-नाम में ही लीन रहता है। 16। 1। 15।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਆਪੇ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਹੁਕਮਿ ਸਭ ਸਾਜੀ ॥
ਆਪੇ ਥਾਪਿ ਉਥਾਪਿ ਨਿਵਾਜੀ ॥
ਆਪੇ ਨਿਆਉ ਕਰੇ ਸਭੁ ਸਾਚਾ ਸਾਚੇ ਸਾਚਿ ਮਿਲਾਇਦਾ ॥੧॥
ਕਾਇਆ ਕੋਟੁ ਹੈ ਆਕਾਰਾ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਪਸਰਿਆ ਪਾਸਾਰਾ ॥
ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਭਸਮੈ ਕੀ ਢੇਰੀ ਖੇਹੂ ਖੇਹ ਰਲਾਇਦਾ ॥੨॥
ਕਾਇਆ ਕੰਚਨ ਕੋਟੁ ਅਪਾਰਾ ॥
ਜਿਸੁ ਵਿਚਿ ਰਵਿਆ ਸਬਦੁ ਅਪਾਰਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਗਾਵੈ ਸਦਾ ਗੁਣ ਸਾਚੇ ਮਿਲਿ ਪ੍ਰੀਤਮ ਸੁਖੁ ਪਾਇਦਾ ॥੩॥
ਕਾਇਆ ਹਰਿ ਮੰਦਰੁ ਹਰਿ ਆਪਿ ਸਵਾਰੇ ॥
ਤਿਸੁ ਵਿਚਿ ਹਰਿ ਜੀਉ ਵਸੈ ਮੁਰਾਰੇ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਵਣਜਨਿ ਵਾਪਾਰੀ ਨਦਰੀ ਆਪਿ ਮਿਲਾਇਦਾ ॥੪॥
ਸੋ ਸੂਚਾ ਜਿ ਕਰੋਧੁ ਨਿਵਾਰੇ ॥
ਸਬਦੇ ਬੂਝੈ ਆਪੁ ਸਵਾਰੇ ॥
ਆਪੇ ਕਰੇ ਕਰਾਏ ਕਰਤਾ ਆਪੇ ਮੰਨਿ ਵਸਾਇਦਾ ॥੫॥
ਨਿਰਮਲ ਭਗਤਿ ਹੈ ਨਿਰਾਲੀ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਧੋਵਹਿ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰੀ ॥
ਆਪੇ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਹੁਕਮਿ ਸਭ ਸਾਜੀ ॥
ਆਪੇ ਥਾਪਿ ਉਥਾਪਿ ਨਿਵਾਜੀ ॥
ਆਪੇ ਨਿਆਉ ਕਰੇ ਸਭੁ ਸਾਚਾ ਸਾਚੇ ਸਾਚਿ ਮਿਲਾਇਦਾ ॥੧॥
ਕਾਇਆ ਕੋਟੁ ਹੈ ਆਕਾਰਾ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਪਸਰਿਆ ਪਾਸਾਰਾ ॥
ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਭਸਮੈ ਕੀ ਢੇਰੀ ਖੇਹੂ ਖੇਹ ਰਲਾਇਦਾ ॥੨॥
ਕਾਇਆ ਕੰਚਨ ਕੋਟੁ ਅਪਾਰਾ ॥
ਜਿਸੁ ਵਿਚਿ ਰਵਿਆ ਸਬਦੁ ਅਪਾਰਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਗਾਵੈ ਸਦਾ ਗੁਣ ਸਾਚੇ ਮਿਲਿ ਪ੍ਰੀਤਮ ਸੁਖੁ ਪਾਇਦਾ ॥੩॥
ਕਾਇਆ ਹਰਿ ਮੰਦਰੁ ਹਰਿ ਆਪਿ ਸਵਾਰੇ ॥
ਤਿਸੁ ਵਿਚਿ ਹਰਿ ਜੀਉ ਵਸੈ ਮੁਰਾਰੇ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਵਣਜਨਿ ਵਾਪਾਰੀ ਨਦਰੀ ਆਪਿ ਮਿਲਾਇਦਾ ॥੪॥
ਸੋ ਸੂਚਾ ਜਿ ਕਰੋਧੁ ਨਿਵਾਰੇ ॥
ਸਬਦੇ ਬੂਝੈ ਆਪੁ ਸਵਾਰੇ ॥
ਆਪੇ ਕਰੇ ਕਰਾਏ ਕਰਤਾ ਆਪੇ ਮੰਨਿ ਵਸਾਇਦਾ ॥੫॥
ਨਿਰਮਲ ਭਗਤਿ ਹੈ ਨਿਰਾਲੀ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਧੋਵਹਿ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰੀ ॥
मारू महला ३ ॥
आपे स्रिसटि हुकमि सभ साजी ॥
आपे थापि उथापि निवाजी ॥
आपे निआउ करे सभु साचा साचे साचि मिलाइदा ॥१॥
काइआ कोटु है आकारा ॥
माइआ मोहु पसरिआ पासारा ॥
बिनु सबदै भसमै की ढेरी खेहू खेह रलाइदा ॥२॥
काइआ कंचन कोटु अपारा ॥
जिसु विचि रविआ सबदु अपारा ॥
गुरमुखि गावै सदा गुण साचे मिलि प्रीतम सुखु पाइदा ॥३॥
काइआ हरि मंदरु हरि आपि सवारे ॥
तिसु विचि हरि जीउ वसै मुरारे ॥
गुर कै सबदि वणजनि वापारी नदरी आपि मिलाइदा ॥४॥
सो सूचा जि करोधु निवारे ॥
सबदे बूझै आपु सवारे ॥
आपे करे कराए करता आपे मंनि वसाइदा ॥५॥
निरमल भगति है निराली ॥
मनु तनु धोवहि सबदि वीचारी ॥
आपे स्रिसटि हुकमि सभ साजी ॥
आपे थापि उथापि निवाजी ॥
आपे निआउ करे सभु साचा साचे साचि मिलाइदा ॥१॥
काइआ कोटु है आकारा ॥
माइआ मोहु पसरिआ पासारा ॥
बिनु सबदै भसमै की ढेरी खेहू खेह रलाइदा ॥२॥
काइआ कंचन कोटु अपारा ॥
जिसु विचि रविआ सबदु अपारा ॥
गुरमुखि गावै सदा गुण साचे मिलि प्रीतम सुखु पाइदा ॥३॥
काइआ हरि मंदरु हरि आपि सवारे ॥
तिसु विचि हरि जीउ वसै मुरारे ॥
गुर कै सबदि वणजनि वापारी नदरी आपि मिलाइदा ॥४॥
सो सूचा जि करोधु निवारे ॥
सबदे बूझै आपु सवारे ॥
आपे करे कराए करता आपे मंनि वसाइदा ॥५॥
निरमल भगति है निराली ॥
मनु तनु धोवहि सबदि वीचारी ॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला ३॥ हे भाई ! परमात्मा ने यह स्वयं ही ये सारी सृष्टि अपने हुकम से पैदा की हुई है। परमात्मा स्वयं ही (जीवों को) पैदा करके (स्वयं ही) नाश करता है (खुद ही जीवों पर) मेहर करता है। प्रभू आप ही यह सारा अपना अटॅल न्याय करता है। स्वयं ही (जीवों को अपने) सदा स्थिर हरी-नाम में जोड़ के रखता है। 1। हे भाई ! (यह मनुष्य) शरीर (मानो एक) किला है। यह परमात्मा का दिखाई देता स्वरूप है। (पर अगर इसमें) माया का मोह (ही प्रबल हो। और इसमें माया के मोह का ही) पसारा पसरा हुआ है। तो प्रभू की सिफत सालाह के बिना (ये शरीर) राख की ढेरी ही है। (मनुष्य हरी-नाम से वंचित रह कर इस शरीर को) मिट्टी में ही मिला देता है। 2। वह (मनुष्य) शरीर बेअंत परमात्मा के रहने के लिए (मानो) सोने का किला है। हे भाई ! जिस शरीर में बेअंत परमात्मा की सिफत-सालाह की बाणी हर वक्त मौजूद है। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य (इस शरीर के माध्यम से) सदा-स्थिर परमात्मा के गुण हमेशा गाता है। वह प्रीतम प्रभू को मिल के आत्मिक आनंद लेता है। 3। हे भाई ! ये मनुष्य का शरीर परमात्मा का (पवित्र) घर है। परमात्मा इसको खुद ही सुंदर बनाता है। इसमें विचार-दैत्यों को मारने वाला प्रभू स्वयं बसता है। हे भाई ! जो जीव वणजारे (इस शरीर में) गुरू के शबद से हरी-नाम का वणज करते हैं। प्रभू मेहर की निगाह से उनको (अपने साथ) मिला लेता है। 4। हे भाई ! जो मनुष्य (अपने अंदर से) क्रोध दूर कर लेता है। वह पवित्र हृदय वाला बन जाता है। वह मनुष्य गुरू के शबद की बरकति से (आत्मिक जीवन को) समझ लेता है। और। अपने जीवन को सँवार लेता है। (पर। हे भाई ! यह उसकी अपनी ही मेहर है) प्रभू स्वयं ही (जीव के अंदर बैठा यह उद्यम) करता है। (जीव से) करतार स्वयं ही (यह काम) करवाता है। स्वयं ही (उसके) मन में (अपना नाम) बसाता है। 5। हे भाई ! परमात्मा की भक्ति (जीवन को) पवित्र करने वाली (एक) अनोखी (दाति) है। गुरू के शबद में जुड़ के (भगती के अमृत के साथ जो मनुष्य अपना) मन और तन धोते हैं। वे सुंदर विचार के मालिक बन जाते हैं।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1059 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
Mehrauli के पुराने पत्थरों के पास, 800 साल का इतिहास और एक 600 साल पुरानी पंक्ति।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 48 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1059” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1060 →, पीछे का: ← अंग 1058।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।