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अंग 989

अंग
989
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
रागु मारू महला 1 घरु 1 चउपदे
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
सलोकु ॥
साजन तेरे चरन की होइ रहा सद धूरि ॥
नानक सरणि तुहारीआ पेखउ सदा हजूरि ॥1॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: रागु मारू महला 1 घरु 1 चउपदे ईश्वर केवल एक है, नाम उसका सत्य है, वही संसार का रचनहार है, सर्वशक्तिमान है, उसे कोई भय नहीं अर्थात् कर्म दोष से परे है, सब पर एक समान दृष्टि होने के कारण वह प्रेमस्वरूप है, अतः वैर भावना से रहित है, वह कालातीत ब्रह्म-मूर्ति सदा अमर है, जन्म-मरण से रहित है, स्वयंभू अर्थात् स्वयं ही प्रकाशमान हुआ है, उसे गुरु-कृपा से ही पाया जा सकता है। श्लोक॥ (मेहर कर।समर्था बख्श कि) मैं सदा आपके चरणों की धूड़ बना रहूँ। हे नानक ! (परमात्मा के आगे अरदास कर और कह-) हे मित्र प्रभू ! मैं आपकी शरण आया हॅूँ। मैं सदा आपको अपने अंग-संग देखता रहूँ। 1।
सबद ॥
पिछहु राती सदड़ा नामु खसम का लेहि ॥
खेमे छत्र सराइचे दिसनि रथ पीड़े ॥
जिनी तेरा नामु धिआइआ तिन कउ सदि मिले ॥1॥
बाबा मै करमहीण कूड़िआर ॥
नामु न पाइआ तेरा अंधा भरमि भूला मनु मेरा ॥1॥ रहाउ ॥
साद कीते दुख परफुड़े पूरबि लिखे माइ ॥
सुख थोड़े दुख अगले दूखे दूखि विहाइ ॥2॥
विछुड़िआ का किआ वीछुड़ै मिलिआ का किआ मेलु ॥
साहिबु सो सालाहीऐ जिनि करि देखिआ खेलु ॥3॥
संजोगी मेलावड़ा इनि तनि कीते भोग ॥
विजोगी मिलि विछुड़े नानक भी संजोग ॥4॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: शब्द॥ जिन (भाग्यशाली) लोगों को अमृत बेला में परमात्मा स्वयं स्नेह भरा निमंत्रण भेजता है (प्रेरित करता है) वह उस वक्त उठ के पति-प्रभू का नाम लेते हैं। तंबू। छत्र। कन्नातें। रथ (उनके दर पर हर वक्त) तैयार दिखाई देते हैं। ये सारे (दुनियावी आदर-सम्मान वाले पदार्थ) उन्हें खुद-ब-खुद आ मिलते हैं। जिन्होंने (हे प्रभू !) आपका नाम सिमरा है। 1। (पर) हे प्रभू ! मैं अभागा (ही रहा)। मैं झूठे पदार्थों का व्यापार ही करता रहा। (माया के मोह में) अंधा हो चुका मेरा मन (माया की खातिर) भटकना में ही गलत रास्ते पर पड़ा रहा। और मैं आपका नाम प्राप्त ना कर सका। 1। रहाउ। हे माँ ! मैं दुनिया के अनेकों पदार्थों के स्वाद भोगता रहा। अब से पहले सारे बेअंत लंबे जीवन-सफर में किए कर्मों के संस्कार मेरे मन में उकरते गए (और उन भोगों के बदले में मेरे वास्ते) दुख बढ़ते गए। सुख तो थोड़े ही भोगे। पर दुख बेअंत उग आए। अब मेरी उम्र दुख में ही गुजर रही है। 2। उन लोगों का जो परमात्मा से विछड़े हुए हैं और किस प्यारे पदार्थ से विछोड़ा है। (सबसे कीमती पदार्थ तो हरी-नाम ही था जिससे वे विछुड़ गए)। उन जीवों का जो प्रभू-चरणों में जुड़े हुए हैं और किस श्रेष्ठ पदार्थ के साथ मेल बाकी रह गया। (उन्हें किसी और पदार्थ की आवश्यक्ता नहीं रह गई)। (हे भाई !) सदा उस मालिक की सिफत-सालाह करनी चाहिए जिसने ये जगत-तमाशा रचा है और रच के इसकी संभाल कर रहा है। 3। परमात्मा की बख्शिश के संयोग से इस मानस शरीर के साथ सुंदर मिलाप हुआ था। पर इस शरीर में आ के मायावी पदार्थों के रस ही भोगते रहे। जब उसकी रजा में मौत आई। मनुष्य-शरीर से विछोड़ा हो गया। (पर मायावी पदार्थों के ही भोगों के कारण) बार-बार अनेकों जन्मों के चक्करों में से गुजरना पड़ा। 4। 1।
मारू महला 1 ॥
मिलि मात पिता पिंडु कमाइआ ॥
तिनि करतै लेखु लिखाइआ ॥
लिखु दाति जोति वडिआई ॥
मिलि माइआ सुरति गवाई ॥1॥
मूरख मन काहे करसहि माणा ॥
उठि चलणा खसमै भाणा ॥1॥ रहाउ ॥
तजि साद सहज सुखु होई ॥
घर छडणे रहै न कोई ॥
किछु खाजै किछु धरि जाईऐ ॥
जे बाहुड़ि दुनीआ आईऐ ॥2॥
सजु काइआ पटु हढाए ॥
फुरमाइसि बहुतु चलाए ॥
करि सेज सुखाली सोवै ॥
हथी पउदी काहे रोवै ॥3॥
घर घुंमणवाणी भाई ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 1॥ (जिस करतार की रजा के अनुसार) आपके माता-पिता ने मिल के आपका शरीर बनाया। उसी करतार ने (आपके माथे पर ये) लेख (भी) लिख दिए कि आप (जगत में जा के) जोति-रूप प्रभू की बख्शिशें याद करना और उसकी सिफत-सालाह भी करना (सिफत-सालाह के लेख अपने अंदर लिखते रहना)। पर तूने माया (के मोह) में फस के ये चेता ही भुला दिया। 1। हे (मेरे) मूर्ख मन ! आप (इन दुनियावी मल्कियतों का) मान क्यूँ करता है। (जब) पति-प्रभू का हुकम हुआ तब (इनको छोड़ के जगत को) चले जाना पड़ेगा। 1। रहाउ। (हे मन ! आप घरों की मल्कियतों में से सुख-शांति तलाशता है) माया के स्वाद छोड़ के आत्मिक अडोलता का आनंद पैदा हो सकता है (जिन घरों की मल्कियत को आप सुख का मूल समझ रहा है। यह) घर तो छोड़ जाने हैं। कोई भी जीव (यहाँ सदा) टिका नहीं रह सकता। (हे मूर्ख मन ! आप सदा ये सोचता है कि) कुछ धन-पदार्थ खा-खर्च लें और कुछ संभाल के रखते जाएं (पर संभाल के रखते जाने का लाभ तो तब ही हो सकता है) अगर दोबारा (इस धन को बरतने के लिए) जगत में आ सकना हो। 2। मनुष्य अपने शरीर पर हार रेशमी कपड़ा आदि पहनता है। हुकम भी खूब चलाता है। सुखदाई सेज का सुख भी भोगता है (पर जिस करतार ने ये सब कुछ दिया उसको बिसारे रखता है। आखिर) जब जमों के हाथ पड़ता है। तब रोने पछताने का कोई लाभ नहीं हो सकता। 3। हे भाई ! घरों के मोह दरिया के (पानी की लहरों के) घुम्मन-घेरियों (चक्रों की तरह) हैं।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रागु मारू महला 1 घरु 1 चउपदे ईश्वर केवल एक है, नाम उसका सत्य है, वही संसार का रचनहार है, सर्वशक्तिमान है, उसे कोई भय नहीं अर्थात् कर्म दोष से परे है, सब पर एक समान दृष्टि होने के क।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।