अंग 1070

अंग
1070
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮਿ ਸਮਾਇ ਸਮਾਵੈ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈ ਹੇ ॥੧੨॥
ਭਗਤਾ ਮੁਖਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਹੈ ਬਾਣੀ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਆਖਿ ਵਖਾਣੀ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਕਰਤ ਸਦਾ ਮਨੁ ਬਿਗਸੈ ਹਰਿ ਚਰਣੀ ਮਨੁ ਲਾਈ ਹੇ ॥੧੩॥
ਹਮ ਮੂਰਖ ਅਗਿਆਨ ਗਿਆਨੁ ਕਿਛੁ ਨਾਹੀ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਸਮਝ ਪੜੀ ਮਨ ਮਾਹੀ ॥
ਹੋਹੁ ਦਇਆਲੁ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰਿ ਹਰਿ ਜੀਉ ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਲਾਈ ਹੇ ॥੧੪॥
ਜਿਨਿ ਸਤਿਗੁਰੁ ਜਾਤਾ ਤਿਨਿ ਏਕੁ ਪਛਾਤਾ ॥
ਸਰਬੇ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਸੁਖਦਾਤਾ ॥
ਆਤਮੁ ਚੀਨਿ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਇਆ ਸੇਵਾ ਸੁਰਤਿ ਸਮਾਈ ਹੇ ॥੧੫॥
ਜਿਨ ਕਉ ਆਦਿ ਮਿਲੀ ਵਡਿਆਈ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਲਿਵ ਲਾਈ ॥
ਆਪਿ ਮਿਲਿਆ ਜਗਜੀਵਨੁ ਦਾਤਾ ਨਾਨਕ ਅੰਕਿ ਸਮਾਈ ਹੇ ॥੧੬॥੧॥
गुरमुखि नामि समाइ समावै नानक नामु धिआई हे ॥१२॥
भगता मुखि अंम्रित है बाणी ॥
गुरमुखि हरि नामु आखि वखाणी ॥
हरि हरि करत सदा मनु बिगसै हरि चरणी मनु लाई हे ॥१३॥
हम मूरख अगिआन गिआनु किछु नाही ॥
सतिगुर ते समझ पड़ी मन माही ॥
होहु दइआलु क्रिपा करि हरि जीउ सतिगुर की सेवा लाई हे ॥१४॥
जिनि सतिगुरु जाता तिनि एकु पछाता ॥
सरबे रवि रहिआ सुखदाता ॥
आतमु चीनि परम पदु पाइआ सेवा सुरति समाई हे ॥१५॥
जिन कउ आदि मिली वडिआई ॥
सतिगुरु मनि वसिआ लिव लाई ॥
आपि मिलिआ जगजीवनु दाता नानक अंकि समाई हे ॥१६॥१॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! गुरू के द्वारा नाम में ही लीन हो के वह मनुष्य (परमात्मा में) लीन रहता है। वह हर समय हरी-नाम ही सिमरता है। 12। हे भाई ! भक्तों के मुँह में (गुरू की आत्मिक जीवन देने वाली) बाणी टिकी रहती है। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य परमात्मा का नाम (स्वयं) उच्चार के (औरों को भी) सुनाता है। परमात्मा का नाम सिमरते हुए उसका मन सदा खिला रहता है। वह मनुष्य परमात्मा के चरणों में मन जोड़ के रखता है। 13। हे प्रभू ! हम जीव मूर्ख हैं। अंजान हैं। हमें आत्मिक जीवन की कुछ भी सूझ नहीं। गुरू से (यह) समझ मन में पड़ती है। हे प्रभू ! दयावान हो। मेहर करो। (हमें) गुरू की सेवा में लगाए रखो। 14। हे भाई ! जिस मनुष्य ने गुरू के साथ सांझ डाल ली। उसने एक परमात्मा को (इस प्रकार) पहचान लिया कि वह सुखदाता प्रभू सबमें बस रहा है। उस मनुष्य ने अपने जीवन को पड़ताल के सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल कर लिया। उसकी सुरति परमात्मा की सेवा-भक्ति में टिकी रहती है। 15। हे भाई ! जिनको धुर-दरगाह से इज्जत मिलती है। उनके मन में गुरू बसा रहता है। वे प्रभू-चरणों में सुरति जोड़े रखते हैं। हे नानक ! (कह-) उनको जगत का सहारा दातार स्वयं आ के मिलता है। वे प्रभू की गोद में (प्रभू-चरणों में) समाए रहते हैं। 16। 1।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੪ ॥
ਹਰਿ ਅਗਮ ਅਗੋਚਰੁ ਸਦਾ ਅਬਿਨਾਸੀ ॥
ਸਰਬੇ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਘਟ ਵਾਸੀ ॥
ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ਦਾਤਾ ਹਰਿ ਤਿਸਹਿ ਸਰੇਵਹੁ ਪ੍ਰਾਣੀ ਹੇ ॥੧॥
ਜਾ ਕਉ ਰਾਖੈ ਹਰਿ ਰਾਖਣਹਾਰਾ ॥ ਤਾ ਕਉ ਕੋਇ ਨ ਸਾਕਸਿ ਮਾਰਾ ॥
ਸੋ ਐਸਾ ਹਰਿ ਸੇਵਹੁ ਸੰਤਹੁ ਜਾ ਕੀ ਊਤਮ ਬਾਣੀ ਹੇ ॥੨॥
ਜਾ ਜਾਪੈ ਕਿਛੁ ਕਿਥਾਊ ਨਾਹੀ ॥
ਤਾ ਕਰਤਾ ਭਰਪੂਰਿ ਸਮਾਹੀ ॥
ਸੂਕੇ ਤੇ ਫੁਨਿ ਹਰਿਆ ਕੀਤੋਨੁ ਹਰਿ ਧਿਆਵਹੁ ਚੋਜ ਵਿਡਾਣੀ ਹੇ ॥੩॥
ਜੋ ਜੀਆ ਕੀ ਵੇਦਨ ਜਾਣੈ ॥
ਤਿਸੁ ਸਾਹਿਬ ਕੈ ਹਉ ਕੁਰਬਾਣੈ ॥
ਤਿਸੁ ਆਗੈ ਜਨ ਕਰਿ ਬੇਨੰਤੀ ਜੋ ਸਰਬ ਸੁਖਾ ਕਾ ਦਾਣੀ ਹੇ ॥੪॥
ਜੋ ਜੀਐ ਕੀ ਸਾਰ ਨ ਜਾਣੈ ॥
ਤਿਸੁ ਸਿਉ ਕਿਛੁ ਨ ਕਹੀਐ ਅਜਾਣੈ ॥
ਮੂਰਖ ਸਿਉ ਨਹ ਲੂਝੁ ਪਰਾਣੀ ਹਰਿ ਜਪੀਐ ਪਦੁ ਨਿਰਬਾਣੀ ਹੇ ॥੫॥
ਨਾ ਕਰਿ ਚਿੰਤ ਚਿੰਤਾ ਹੈ ਕਰਤੇ ॥
ਹਰਿ ਦੇਵੈ ਜਲਿ ਥਲਿ ਜੰਤਾ ਸਭਤੈ ॥
ਅਚਿੰਤ ਦਾਨੁ ਦੇਇ ਪ੍ਰਭੁ ਮੇਰਾ ਵਿਚਿ ਪਾਥਰ ਕੀਟ ਪਖਾਣੀ ਹੇ ॥੬॥
ਨਾ ਕਰਿ ਆਸ ਮੀਤ ਸੁਤ ਭਾਈ ॥
ਨਾ ਕਰਿ ਆਸ ਕਿਸੈ ਸਾਹ ਬਿਉਹਾਰ ਕੀ ਪਰਾਈ ॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਨਾਵੈ ਕੋ ਬੇਲੀ ਨਾਹੀ ਹਰਿ ਜਪੀਐ ਸਾਰੰਗਪਾਣੀ ਹੇ ॥੭॥
ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮੁ ਜਪਹੁ ਬਨਵਾਰੀ ॥
ਸਭ ਆਸਾ ਮਨਸਾ ਪੂਰੈ ਥਾਰੀ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਜਪਹੁ ਭਵ ਖੰਡਨੁ ਸੁਖਿ ਸਹਜੇ ਰੈਣਿ ਵਿਹਾਣੀ ਹੇ ॥੮॥
ਜਿਨਿ ਹਰਿ ਸੇਵਿਆ ਤਿਨਿ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥
ਸਹਜੇ ਹੀ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਸਮਾਇਆ ॥
ਜੋ ਸਰਣਿ ਪਰੈ ਤਿਸ ਕੀ ਪਤਿ ਰਾਖੈ ਜਾਇ ਪੂਛਹੁ ਵੇਦ ਪੁਰਾਣੀ ਹੇ ॥੯॥
ਜਿਸੁ ਹਰਿ ਸੇਵਾ ਲਾਏ ਸੋਈ ਜਨੁ ਲਾਗੈ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਭਰਮ ਭਉ ਭਾਗੈ ॥
ਵਿਚੇ ਗ੍ਰਿਹ ਸਦਾ ਰਹੈ ਉਦਾਸੀ ਜਿਉ ਕਮਲੁ ਰਹੈ ਵਿਚਿ ਪਾਣੀ ਹੇ ॥੧੦॥
मारू महला ४ ॥
हरि अगम अगोचरु सदा अबिनासी ॥
सरबे रवि रहिआ घट वासी ॥
तिसु बिनु अवरु न कोई दाता हरि तिसहि सरेवहु प्राणी हे ॥१॥
जा कउ राखै हरि राखणहारा ॥ ता कउ कोइ न साकसि मारा ॥
सो ऐसा हरि सेवहु संतहु जा की ऊतम बाणी हे ॥२॥
जा जापै किछु किथाऊ नाही ॥
ता करता भरपूरि समाही ॥
सूके ते फुनि हरिआ कीतोनु हरि धिआवहु चोज विडाणी हे ॥३॥
जो जीआ की वेदन जाणै ॥
तिसु साहिब कै हउ कुरबाणै ॥
तिसु आगै जन करि बेनंती जो सरब सुखा का दाणी हे ॥४॥
जो जीऐ की सार न जाणै ॥
तिसु सिउ किछु न कहीऐ अजाणै ॥
मूरख सिउ नह लूझु पराणी हरि जपीऐ पदु निरबाणी हे ॥५॥
ना करि चिंत चिंता है करते ॥
हरि देवै जलि थलि जंता सभतै ॥
अचिंत दानु देइ प्रभु मेरा विचि पाथर कीट पखाणी हे ॥६॥
ना करि आस मीत सुत भाई ॥
ना करि आस किसै साह बिउहार की पराई ॥
बिनु हरि नावै को बेली नाही हरि जपीऐ सारंगपाणी हे ॥७॥
अनदिनु नामु जपहु बनवारी ॥
सभ आसा मनसा पूरै थारी ॥
जन नानक नामु जपहु भव खंडनु सुखि सहजे रैणि विहाणी हे ॥८॥
जिनि हरि सेविआ तिनि सुखु पाइआ ॥
सहजे ही हरि नामि समाइआ ॥
जो सरणि परै तिस की पति राखै जाइ पूछहु वेद पुराणी हे ॥९॥
जिसु हरि सेवा लाए सोई जनु लागै ॥
गुर कै सबदि भरम भउ भागै ॥
विचे ग्रिह सदा रहै उदासी जिउ कमलु रहै विचि पाणी हे ॥१०॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला ४॥ हे भाई ! परमात्मा अपहुँच है। इन्द्रियों की पहुँच से परे है। सदा ही नाश रहित है। सब जीवों में व्यापक है। सब शरीरों में बसने वाला है। उसके बिना और कोई दाता नहीं। हे प्राणी ! उसी परमात्मा का सिमरन किया करो। 1। हे भाई ! बचाने की समर्था वाला परमात्मा जिस (मनुष्य) की रक्षा करता है। उसको कोई मार नहीं सकता। हे संत जनो ! उस परमात्मा की सेवा भक्ति किया करो। उसकी सिफतसालाह की बाणी जीवन को ऊँचा कर देती है। 2। हे भाई ! जब ये समझ आ जाती है कि कहीं भी कोई चीज (सदा-स्थिर) नहीं। तब करतार को हर जगह व्यापक समझो (जो सदा कायम रहने वाला है)। हे भाई ! वह करतार सूखे को हरा-भरा करने वाला है। उस हरी का ही सिमरन करो। वह आश्चर्यजनक करिश्मे कर सकने वाला है। 3। जो सब जीवों के दिल की पीड़ा जानता है। हे भाई ! मैं तो उस परमात्मा मालिक से सदा सदके जाता हूँ। हे भाई ! उस मालिक की हजूरी में अरदास किया कर। जो सारे सुखों को देने वाला है। 4। हे भाई ! जो मनुष्य (किसी और की) जिंद का दुख-दर्द नहीं समझ सकता। उस मूर्ख के साथ (अपने दुर्ख-दर्द की) कोई बात नहीं करनी चाहिए। हे प्राणी ! उस मूर्ख से कोई गिला ना कर। सिर्फ परमात्मा का नाम जपना चाहिए। वही वासना-रहित आत्मिक दर्जा देने वाला है। 5। हे भाई ! (रोजी की खातिर) चिंता-फिक्र ना कर। ये फिक्र करतार को है। वह करतार जल में धरती में (बसने वाले) सब जीवों को (रिज़क) देता है। मेरा प्रभू वह वह दाति देता है जिसका हमें चिक्त-चेता भी नहीं होता। पत्थरों में बसने वाले कीड़ों को भी (रिज़क) देता है। 6। हे भाई ! मित्र की। पुत्र की। भाई की- किसी की भी आस ना कर। किसी शाह की। किसी व्यवहार की- कोई भी पराई आशा ना कर। परमात्मा के नाम के बिना और कोई मददगार नहीं। उस परमात्मा का ही नाम जपना चाहिए। 7। हे भाई ! हर वक्त परमात्मा का ही नाम जपते रहो। वही तेरी हरेक आशा पूरी करता है। तेरा हरेक फुरना पूरा करता है। हे दास नानक ! सदा हरी-नाम जपते रहो। हरी का नाम जनम-मरण के चक्करों का नाश करने वाला है। (जो मनुष्य जपता है उसकी) उम्र-रात्रि सुख में आत्मिक अडोलता बीतती है। ै8। हे भाई ! जिस मनुष्य ने परमात्मा की भक्ति की उसने सुख प्राप्त किया। वह बिना किसी (तप आदि) जतन के परमात्मा के नाम में लीन रहता है। बेशक वेद-पुराणों (के पढ़ने वालों) से जा के पूछ लो। जो मनुष्य परमात्मा की शरण पड़ता है। परमात्मा उसकी लाज रखता है। 9। पर। हे भाई ! वही मनुष्य परमात्मा की भक्ति में लगता है। जिसको परमात्मा स्वयं लगाता है। गुरू के शबद की बरकति से उस मनुष्य की भटकना उसका डर दूर हो जाता है। जैसे कमल-फूल पानी में (रह के भी पानी से) निर्लिप रहता है। वैसे ही वह मनुष्य गृहस्त में ही (माया से) सदा उपराम रहता है। 10।

संदर्भ: यह अंग 1070 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Raam Daas Ji।

Faridabad-Delhi border के पास सर्दियों की धुंध में सुबह का सूरज।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 43 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1070” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1071 →, पीछे का: ← अंग 1069

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।