कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: फिर कभी जनम (मरण का चक्कर) नहीं होंगे। हे कबीर ! कह- जो जो मनुष्य प्रभू के नाम में लीन होता है वह अफुर-प्रभू में सुरति जोड़े रखता है। 4। 4।
जउ तुम॑ मो कउ दूरि करत हउ तउ तुम मुकति बतावहु ॥ एक अनेक होइ रहिओ सगल महि अब कैसे भरमावहु ॥1॥ राम मो कउ तारि कहां लै जई है ॥ सोधउ मुकति कहा देउ कैसी करि प्रसादु मोहि पाई है ॥1॥ रहाउ ॥ तारन तरनु तबै लगु कहीऐ जब लगु ततु न जानिआ ॥ अब तउ बिमल भए घट ही महि कहि कबीर मनु मानिआ ॥2॥5॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे राम ! अगर आप मुझे अपने चरणों से विछोड़ दे। तो बता और मुक्ति क्या है। आप एक प्रभू अनेकों रूप धार के सारे जीवों में व्यापक है (मेरे अंदर भी बैठ के मुझे मिला हुआ है)। अब मुझे किसी और भुलेखे में क्यों डालता है (कि मुक्ति किसी और जगह किसी और किस्म की मिलेगी) । 1। हे राम ! (मैं तो पहले ही आपके चरणों में जुड़ा बैठा हूँ। लोग कहते हैं कि मरने के बाद मुक्ति मिलती है) मुझे संसार समुंद्र से पार और कहाँ ले जाएगा। (आपके चरणों में टिके रहना ही मेरे लिए मुक्ति है। अगर आपके चरणों में जुड़े रहना मुक्ति नहीं। तो) मैं पूछता हूँ- वह मुक्ति कैसी होगी। तथा मुझे और कहाँ ले जा के आप देगा। (आपके चरणों में जुड़े रहने वाली मुक्ति तो) आपकी कृपा से मैंने पहले ही प्राप्त की हुई है। 1। रहाउ। संसार-समुंद्र से पार लंघाना और पार लांघना- ये बात तब तक ही कही जाती है। जब तक जगत के मूल प्रभू के साथ सांझ नहीं डाली जाती। कबीर कहता है- मैं तो अब हृदय में ही (आपके मिलाप की बरकति से) पवित्र हैं चुका हूँ मेरा मन (आपके साथ ही) परच गया है (मुझे किसी और मुक्ति की आवश्यक्ता नहीं रही)। 2। 5।
जिनि गड़ कोट कीए कंचन के छोडि गइआ सो रावनु ॥1॥ काहे कीजतु है मनि भावनु ॥ जब जमु आइ केस ते पकरै तह हरि को नामु छडावन ॥1॥ रहाउ ॥ कालु अकालु खसम का कीन॑ा इहु परपंचु बधावनु ॥ कहि कबीर ते अंते मुकते जिन॑ हिरदै राम रसाइनु ॥2॥6॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: जिस रावण ने सोने के किले बनवाए (बताया जाता है)। वह भी (वह किले यहीं पर ही) छोड़ गया। 1। हे भाई ! क्यों अपनी मन-मर्जी करता है। जब जमदूत आ के केसों से पकड़ लेता है (भाव। जब मौत सिर पर आ जाती है) उस वक्त परमात्मा का नाम ही (उस मौत के सहम से) बचाता है। 1। रहाउ। कबीर कहता है- ये अमोड़ मौत और बँधन-रूप ये जगत परमात्मा के ही बनाए हुए हैं। इन से बचते वही हैं जिनके हृदय में सब रसों का घर परमात्मा का नाम मौजूद है। 2। 6।
देही गावा जीउ धर महतउ बसहि पंच किरसाना ॥ नैनू नकटू स्रवनू रसपति इंद्री कहिआ न माना ॥1॥ बाबा अब न बसउ इह गाउ ॥ घरी घरी का लेखा मागै काइथु चेतू नाउ ॥1॥ रहाउ ॥ धरम राइ जब लेखा मागै बाकी निकसी भारी ॥ पंच क्रिसानवा भागि गए लै बाधिओ जीउ दरबारी ॥2॥ कहै कबीरु सुनहु रे संतहु खेत ही करहु निबेरा ॥ अब की बार बखसि बंदे कउ बहुरि न भउजलि फेरा ॥3॥7॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: ये मानस शरीर (मानो एक) नगर है। जीव इस (नगर की) धरती का चौधरी है। इसमें पाँच किसान बसते हैं- आँख। नाक। कान। जीभ और (काम वासना वाली) इन्द्री। ये पाँचों ही जीव-चौधरी का कहा नहीं मानते। 1। हे बाबा ! अब मैंने इस गाँव में नहीं बसना। जहाँ रहने पर वह पटवारी जिसका नाम चित्रगुप्त है। हरेक घड़ी का लेखा माँगता है। 1। रहाउ। (जो जीव इन पाँचों के अधीन हो के रहता है) जब धर्मराज (इस जीवन में किए कामों का) हिसाब माँगता है (उसके जिम्मे) बहुत कुछ देना (बकाया) निकलता है। (शरीर गिर जाने पर) वह पाँच किसान तो भाग जाते हैं पर जीव को (लेखा माँगने वाले) दरबारी बाँध लेते हैं। 2। कबीर कहता है- हे संत जनों ! सुनो। इसी ही मनुष्य जन्म में (इन इन्द्रियों का) हिसाब खत्म कर दो (और। प्रभू के आगे नित्य अरदास करो) – हे प्रभू ! इसी ही बार (भाव। इसी ही जन्म में) मुझे अपने सेवक को बख्श ले। इस संसार-समुंद्र में मेरा फिर फेरा ना हो। 3। 7।
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: रागु मारू बाणी कबीर जीउ की सतिगुर प्रसादि॥ हे अंजान बैरागी ! (परमात्मा को इन आँखों से कभी) किसी ने नहीं देखा। उसका तो आत्मिक झलकारा ही बसता है। और। ये आत्मिक झलकारा तब बजता है। जब मनुष्य दुनिया के डरों से रहित हो जाता है। 1। हे अंजान बैरागी ! जो मनुष्य परमात्मा-पति को हर वक्त अंग-संग समझता है। उसके अंदर उसका डर पैदा होता है (कि प्रभू हमारे सारे किए कर्मों को देख रहा है)। इस डर की बरकति से (मनुष्य) उस प्रभू का हुकम समझता है (भाव। ये समझने की कोशिश करता है कि हम जीवों को कैसे जीना चाहिए) तो सांसारिक डरों से रहित हो जाता है (क्योंकि रज़ा को समझ के सांसारिक डरों वाले काम करने छोड़ देता है)। 2। हे अंजान बैरागी ! (ये तीर्थ आदि करके) परमात्मा के साथ ठगी ना करें। सारा जगत (तीर्थ आदि करने के वहिण में पड़ कर) पाखण्ड में व्यस्त है। 3। हे अंजान बैरागी ! (पाखण्ड कर्म करने से) तृष्णा खलासी नहीं करती। बल्कि माया की ममता शरीर को जला देती है। 4। हे अंजान बैरागी ! अगर मनुष्य का मन (तृष्णा ममता की ओर से) मर जाए। (तो वह सच्चा बैरागी बन जाता है। उस ऐसे बैरागी ने) चिंता जला के शरीर (का मोह) जला लिया है। 5। (पर) हे अंजान बैरागी ! सतिगुरू (की शरण आए) बिना (हृदय में) बैराग पैदा नहीं हो सकता। चाहे कोई कितनी ही तांघ करे। 6। (और) हे अंजान बैरागी ! सतिगुरू तब मिलता है जब (प्रभू की) कृपा हो। वह मनुष्य (फिर) सहजे ही (बैराग) प्राप्त कर लेता है। 7। हे कबीर ! कह-हे अंजान बैरागी ! (पाखण्ड से कुछ नहीं सँवरना। प्रभू के आगे) इस तरह अरदास कर। हे प्रभू ! मुझे संसार-समुंद्र से पार लंघा ले”। 8। 1। 8।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
कबीर की पहचान उनके उलट-बाँसी हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी। आज भी, बनारस के अस्सी-घाट के पास उनकी समाधि है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “फिर कभी जनम (मरण का चक्कर) नहीं होंगे।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।