अंग
1043
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਮੋਹ ਪਸਾਰ ਨਹੀ ਸੰਗਿ ਬੇਲੀ ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਗੁਰ ਕਿਨਿ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥੪॥
ਜਿਸ ਕਉ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ॥
ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਏ ਗੁਰਮਤਿ ਸੂਰਾ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਕੇ ਚਰਨ ਸਰੇਵਹੁ ਜਿਨਿ ਭੂਲਾ ਮਾਰਗਿ ਪਾਇਆ ॥੫॥
ਸੰਤ ਜਨਾਂ ਹਰਿ ਧਨੁ ਜਸੁ ਪਿਆਰਾ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਪਾਇਆ ਨਾਮੁ ਤੁਮਾਰਾ ॥
ਜਾਚਿਕੁ ਸੇਵ ਕਰੇ ਦਰਿ ਹਰਿ ਕੈ ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਜਸੁ ਗਾਇਆ ॥੬॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਤ ਮਹਲਿ ਬੁਲਾਏ ॥
ਸਾਚੀ ਦਰਗਹ ਗਤਿ ਪਤਿ ਪਾਏ ॥
ਸਾਕਤ ਠਉਰ ਨਾਹੀ ਹਰਿ ਮੰਦਰ ਜਨਮ ਮਰੈ ਦੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥੭॥
ਸੇਵਹੁ ਸਤਿਗੁਰ ਸਮੁੰਦੁ ਅਥਾਹਾ ॥
ਪਾਵਹੁ ਨਾਮੁ ਰਤਨੁ ਧਨੁ ਲਾਹਾ ॥
ਬਿਖਿਆ ਮਲੁ ਜਾਇ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਸਰਿ ਨਾਵਹੁ ਗੁਰ ਸਰ ਸੰਤੋਖੁ ਪਾਇਆ ॥੮॥
ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵਹੁ ਸੰਕ ਨ ਕੀਜੈ ॥
ਆਸਾ ਮਾਹਿ ਨਿਰਾਸੁ ਰਹੀਜੈ ॥
ਸੰਸਾ ਦੂਖ ਬਿਨਾਸਨੁ ਸੇਵਹੁ ਫਿਰਿ ਬਾਹੁੜਿ ਰੋਗੁ ਨ ਲਾਇਆ ॥੯॥
ਸਾਚੇ ਭਾਵੈ ਤਿਸੁ ਵਡੀਆਏ ॥
ਕਉਨੁ ਸੁ ਦੂਜਾ ਤਿਸੁ ਸਮਝਾਏ ॥
ਹਰਿ ਗੁਰ ਮੂਰਤਿ ਏਕਾ ਵਰਤੈ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਗੁਰ ਭਾਇਆ ॥੧੦॥
ਵਾਚਹਿ ਪੁਸਤਕ ਵੇਦ ਪੁਰਾਨਾਂ ॥
ਇਕ ਬਹਿ ਸੁਨਹਿ ਸੁਨਾਵਹਿ ਕਾਨਾਂ ॥
ਅਜਗਰ ਕਪਟੁ ਕਹਹੁ ਕਿਉ ਖੁਲੑੈ ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਤਤੁ ਨ ਪਾਇਆ ॥੧੧॥
ਕਰਹਿ ਬਿਭੂਤਿ ਲਗਾਵਹਿ ਭਸਮੈ ॥
ਅੰਤਰਿ ਕ੍ਰੋਧੁ ਚੰਡਾਲੁ ਸੁ ਹਉਮੈ ॥
ਪਾਖੰਡ ਕੀਨੇ ਜੋਗੁ ਨ ਪਾਈਐ ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਅਲਖੁ ਨ ਪਾਇਆ ॥੧੨॥
ਤੀਰਥ ਵਰਤ ਨੇਮ ਕਰਹਿ ਉਦਿਆਨਾ ॥
ਜਤੁ ਸਤੁ ਸੰਜਮੁ ਕਥਹਿ ਗਿਆਨਾ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਕਿਉ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਭਰਮੁ ਨ ਜਾਇਆ ॥੧੩॥
ਨਿਉਲੀ ਕਰਮ ਭੁਇਅੰਗਮ ਭਾਠੀ ॥
ਰੇਚਕ ਕੁੰਭਕ ਪੂਰਕ ਮਨ ਹਾਠੀ ॥
ਪਾਖੰਡ ਧਰਮੁ ਪ੍ਰੀਤਿ ਨਹੀ ਹਰਿ ਸਉ ਗੁਰ ਸਬਦ ਮਹਾ ਰਸੁ ਪਾਇਆ ॥੧੪॥
ਕੁਦਰਤਿ ਦੇਖਿ ਰਹੇ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਸਭੁ ਬ੍ਰਹਮੁ ਪਛਾਨਿਆ ॥
ਨਾਨਕ ਆਤਮ ਰਾਮੁ ਸਬਾਇਆ ਗੁਰ ਸਤਿਗੁਰ ਅਲਖੁ ਲਖਾਇਆ ॥੧੫॥੫॥੨੨॥
ਜਿਸ ਕਉ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ॥
ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਏ ਗੁਰਮਤਿ ਸੂਰਾ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਕੇ ਚਰਨ ਸਰੇਵਹੁ ਜਿਨਿ ਭੂਲਾ ਮਾਰਗਿ ਪਾਇਆ ॥੫॥
ਸੰਤ ਜਨਾਂ ਹਰਿ ਧਨੁ ਜਸੁ ਪਿਆਰਾ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਪਾਇਆ ਨਾਮੁ ਤੁਮਾਰਾ ॥
ਜਾਚਿਕੁ ਸੇਵ ਕਰੇ ਦਰਿ ਹਰਿ ਕੈ ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਜਸੁ ਗਾਇਆ ॥੬॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਤ ਮਹਲਿ ਬੁਲਾਏ ॥
ਸਾਚੀ ਦਰਗਹ ਗਤਿ ਪਤਿ ਪਾਏ ॥
ਸਾਕਤ ਠਉਰ ਨਾਹੀ ਹਰਿ ਮੰਦਰ ਜਨਮ ਮਰੈ ਦੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥੭॥
ਸੇਵਹੁ ਸਤਿਗੁਰ ਸਮੁੰਦੁ ਅਥਾਹਾ ॥
ਪਾਵਹੁ ਨਾਮੁ ਰਤਨੁ ਧਨੁ ਲਾਹਾ ॥
ਬਿਖਿਆ ਮਲੁ ਜਾਇ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਸਰਿ ਨਾਵਹੁ ਗੁਰ ਸਰ ਸੰਤੋਖੁ ਪਾਇਆ ॥੮॥
ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵਹੁ ਸੰਕ ਨ ਕੀਜੈ ॥
ਆਸਾ ਮਾਹਿ ਨਿਰਾਸੁ ਰਹੀਜੈ ॥
ਸੰਸਾ ਦੂਖ ਬਿਨਾਸਨੁ ਸੇਵਹੁ ਫਿਰਿ ਬਾਹੁੜਿ ਰੋਗੁ ਨ ਲਾਇਆ ॥੯॥
ਸਾਚੇ ਭਾਵੈ ਤਿਸੁ ਵਡੀਆਏ ॥
ਕਉਨੁ ਸੁ ਦੂਜਾ ਤਿਸੁ ਸਮਝਾਏ ॥
ਹਰਿ ਗੁਰ ਮੂਰਤਿ ਏਕਾ ਵਰਤੈ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਗੁਰ ਭਾਇਆ ॥੧੦॥
ਵਾਚਹਿ ਪੁਸਤਕ ਵੇਦ ਪੁਰਾਨਾਂ ॥
ਇਕ ਬਹਿ ਸੁਨਹਿ ਸੁਨਾਵਹਿ ਕਾਨਾਂ ॥
ਅਜਗਰ ਕਪਟੁ ਕਹਹੁ ਕਿਉ ਖੁਲੑੈ ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਤਤੁ ਨ ਪਾਇਆ ॥੧੧॥
ਕਰਹਿ ਬਿਭੂਤਿ ਲਗਾਵਹਿ ਭਸਮੈ ॥
ਅੰਤਰਿ ਕ੍ਰੋਧੁ ਚੰਡਾਲੁ ਸੁ ਹਉਮੈ ॥
ਪਾਖੰਡ ਕੀਨੇ ਜੋਗੁ ਨ ਪਾਈਐ ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਅਲਖੁ ਨ ਪਾਇਆ ॥੧੨॥
ਤੀਰਥ ਵਰਤ ਨੇਮ ਕਰਹਿ ਉਦਿਆਨਾ ॥
ਜਤੁ ਸਤੁ ਸੰਜਮੁ ਕਥਹਿ ਗਿਆਨਾ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਕਿਉ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਭਰਮੁ ਨ ਜਾਇਆ ॥੧੩॥
ਨਿਉਲੀ ਕਰਮ ਭੁਇਅੰਗਮ ਭਾਠੀ ॥
ਰੇਚਕ ਕੁੰਭਕ ਪੂਰਕ ਮਨ ਹਾਠੀ ॥
ਪਾਖੰਡ ਧਰਮੁ ਪ੍ਰੀਤਿ ਨਹੀ ਹਰਿ ਸਉ ਗੁਰ ਸਬਦ ਮਹਾ ਰਸੁ ਪਾਇਆ ॥੧੪॥
ਕੁਦਰਤਿ ਦੇਖਿ ਰਹੇ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਸਭੁ ਬ੍ਰਹਮੁ ਪਛਾਨਿਆ ॥
ਨਾਨਕ ਆਤਮ ਰਾਮੁ ਸਬਾਇਆ ਗੁਰ ਸਤਿਗੁਰ ਅਲਖੁ ਲਖਾਇਆ ॥੧੫॥੫॥੨੨॥
मोह पसार नही संगि बेली बिनु हरि गुर किनि सुखु पाइआ ॥४॥
जिस कउ नदरि करे गुरु पूरा ॥
सबदि मिलाए गुरमति सूरा ॥
नानक गुर के चरन सरेवहु जिनि भूला मारगि पाइआ ॥५॥
संत जनां हरि धनु जसु पिआरा ॥
गुरमति पाइआ नामु तुमारा ॥
जाचिकु सेव करे दरि हरि कै हरि दरगह जसु गाइआ ॥६॥
सतिगुरु मिलै त महलि बुलाए ॥
साची दरगह गति पति पाए ॥
साकत ठउर नाही हरि मंदर जनम मरै दुखु पाइआ ॥७॥
सेवहु सतिगुर समुंदु अथाहा ॥
पावहु नामु रतनु धनु लाहा ॥
बिखिआ मलु जाइ अंम्रित सरि नावहु गुर सर संतोखु पाइआ ॥८॥
सतिगुर सेवहु संक न कीजै ॥
आसा माहि निरासु रहीजै ॥
संसा दूख बिनासनु सेवहु फिरि बाहुड़ि रोगु न लाइआ ॥९॥
साचे भावै तिसु वडीआए ॥
कउनु सु दूजा तिसु समझाए ॥
हरि गुर मूरति एका वरतै नानक हरि गुर भाइआ ॥१०॥
वाचहि पुसतक वेद पुरानां ॥
इक बहि सुनहि सुनावहि कानां ॥
अजगर कपटु कहहु किउ खुल॑ै बिनु सतिगुर ततु न पाइआ ॥११॥
करहि बिभूति लगावहि भसमै ॥
अंतरि क्रोधु चंडालु सु हउमै ॥
पाखंड कीने जोगु न पाईऐ बिनु सतिगुर अलखु न पाइआ ॥१२॥
तीरथ वरत नेम करहि उदिआना ॥
जतु सतु संजमु कथहि गिआना ॥
राम नाम बिनु किउ सुखु पाईऐ बिनु सतिगुर भरमु न जाइआ ॥१३॥
निउली करम भुइअंगम भाठी ॥
रेचक कुंभक पूरक मन हाठी ॥
पाखंड धरमु प्रीति नही हरि सउ गुर सबद महा रसु पाइआ ॥१४॥
कुदरति देखि रहे मनु मानिआ ॥
गुर सबदी सभु ब्रहमु पछानिआ ॥
नानक आतम रामु सबाइआ गुर सतिगुर अलखु लखाइआ ॥१५॥५॥२२॥
जिस कउ नदरि करे गुरु पूरा ॥
सबदि मिलाए गुरमति सूरा ॥
नानक गुर के चरन सरेवहु जिनि भूला मारगि पाइआ ॥५॥
संत जनां हरि धनु जसु पिआरा ॥
गुरमति पाइआ नामु तुमारा ॥
जाचिकु सेव करे दरि हरि कै हरि दरगह जसु गाइआ ॥६॥
सतिगुरु मिलै त महलि बुलाए ॥
साची दरगह गति पति पाए ॥
साकत ठउर नाही हरि मंदर जनम मरै दुखु पाइआ ॥७॥
सेवहु सतिगुर समुंदु अथाहा ॥
पावहु नामु रतनु धनु लाहा ॥
बिखिआ मलु जाइ अंम्रित सरि नावहु गुर सर संतोखु पाइआ ॥८॥
सतिगुर सेवहु संक न कीजै ॥
आसा माहि निरासु रहीजै ॥
संसा दूख बिनासनु सेवहु फिरि बाहुड़ि रोगु न लाइआ ॥९॥
साचे भावै तिसु वडीआए ॥
कउनु सु दूजा तिसु समझाए ॥
हरि गुर मूरति एका वरतै नानक हरि गुर भाइआ ॥१०॥
वाचहि पुसतक वेद पुरानां ॥
इक बहि सुनहि सुनावहि कानां ॥
अजगर कपटु कहहु किउ खुल॑ै बिनु सतिगुर ततु न पाइआ ॥११॥
करहि बिभूति लगावहि भसमै ॥
अंतरि क्रोधु चंडालु सु हउमै ॥
पाखंड कीने जोगु न पाईऐ बिनु सतिगुर अलखु न पाइआ ॥१२॥
तीरथ वरत नेम करहि उदिआना ॥
जतु सतु संजमु कथहि गिआना ॥
राम नाम बिनु किउ सुखु पाईऐ बिनु सतिगुर भरमु न जाइआ ॥१३॥
निउली करम भुइअंगम भाठी ॥
रेचक कुंभक पूरक मन हाठी ॥
पाखंड धरमु प्रीति नही हरि सउ गुर सबद महा रसु पाइआ ॥१४॥
कुदरति देखि रहे मनु मानिआ ॥
गुर सबदी सभु ब्रहमु पछानिआ ॥
नानक आतम रामु सबाइआ गुर सतिगुर अलखु लखाइआ ॥१५॥५॥२२॥
हिन्दी अर्थ: जगत के मोह के पसारे किसी मनुष्य के साथ साथी नहीं बन सकते। परमात्मा के नाम के बिना गुरू की शरण के बिना कभी किसी ने सुख प्राप्त नहीं किया। 4। जिस मनुष्य पर पूरा गुरू मेहर की नजर करता है। उसको अपने शबद में जोड़ता है। वह मनुष्य गुरू की मति के आसरे (विकारों का मुकाबला करने के लिए) शूरवीर हो जाता है। हे नानक ! जिस गुरू ने भूले हुए जीव को सही जीवन-रास्ते पर डाला है (भाव। जो गुरू भटकते जीव को ठीक रास्ते पर डाल देता है) उस गुरू की शरण पहुँचो (भाव। स्वै भाव गवा के उस गुरू का पल्ला पकड़ो)। 5। जिन संत-जनों को ही मिलता है उनको यह नाम-धन प्यारा लगता है उनको तेरी सिफत सालाह प्यारी लगती है। हे प्रभू ! तेरा नाम गुरू की मति पर चलने से ही मिलता है। प्रभू के दर का मँगता प्रभू के दर पर टिक कर प्रभू की सेवा-भक्ति करता है। प्रभू की हजूरी में (जुड़ के प्रभू की) सिफत-सालाह करता है। 6। जिस मनुष्य को गुरू मिल जाता है। परमात्मा उसको अपनी हजूरी में बुलाता है (भाव। अपने चरणों में जोड़े रखता है)। वह मनुष्य प्रभू के चरणों में जुड़ के ऊँची आत्मिक अवस्था प्राप्त करता है (लोक-परलोक में) इज्जत पाता है। पर माया-ग्रसित व्यक्ति को परमात्मा के महल का ठिकाना नहीं मिलता। वह जन्मों के चक्कर में पड़ कर दुख सहता है। 7। (हे भाई !) सतिगुरू अथाह समुंद्र है (उसमें प्रभू के गुणों के रतन भरे हुए हैं)। गुरू की सेवा करो। गुरू से नाम-रतन नाम-धन हासिल कर लोगे (यही मनुष्य के जीवन का) लाभ (है)। (हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर) नाम-अमृत के सरोवर में (आत्मिक) स्नान करो। (इस तरह) माया (के मोह) की मैल (मन से) धुल जाएगी (तृष्णा समाप्त हो जाएगी और) गुरू सरोवर का संतोख (-जल) प्राप्त हो जाएगा। 8। (हे भाई ! पूरी श्रद्धा से) गुरू की बताई हुई सेवा करो। (गुरू के हुकम में रक्ती भर भी) शक ना करो (गुरू के बताए हुए रास्ते पर चलने से) दुनियां की आशाओं से निर्लिप रह के जीया जा सकता है। परमात्मा (का नाम) सिमरो जो सारे सहम और दुख नाश करने वाला है। जो मनुष्य सिमरता है उसको दोबारा (मोह का) रोग नहीं व्यापता। 9। जो मनुष्य सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा को अच्छा लग जाता है उसको वह (गुरू के माध्यम से अपने नाम की दाति दे के) इज्जत बख्शता है। गुरू केू बिना कोई और नहीं जो सही रास्ता बता सके। गुरू और परमात्मा दोनों की एक ही हस्ती है जो जगत में काम कर रही है। हे नानक ! जो हरी को अच्छा लगता है वह गुरू को अच्छा लगता है। और गुरू को भाता है वही हरी-प्रभू को पसंद है। 10। (गुरू से टूट के पंडित लोग) वेद पुराण आदि (धर्म-) पुस्तकें पढ़ते हैं। जो कुछ वे सुनाते हैं उसको अनेकों व्यक्ति बैठ के ध्यान से सुनते हैं। पर इस तरह (मन को काबू रखने वाला माया के मोह का) करड़ा किवाड़ किसी भी हालत में खुल नहीं सकता। (क्योंकि) गुरू की शरण के बिना अस्लियत नहीं मिलती। 11। (एक वे भी हैं जो त्यागी बन के जंगलों में जा के बैठते हैं। लकड़ियाँ जला के) राख तैयार करते हैं और वह राख (अपने शरीर पर) मल लेते हैं। पर उनके अंदर (हृदय में) चण्डाल क्रोध बसता है अहंकार बसता है। (सो। त्याग के) ये पाखंड करने से परमात्मा का मिलाप प्राप्त नहीं हो सकता। गुरू की शरण पड़े बिना अदृश्य प्रभू नहीं मिलता। 12। (त्यागी बन के) जंगलों में निवास करते हैं तीर्थों पर स्नान करते हैं व्रतों के नियम धारते हैं। ज्ञान की बातें करते हैं जत सत संजम के साधन करते हैं। पर परमात्मा के नाम के बिना आत्मिक आनंद प्राप्त नहीं होता। सतिगुरू के बिना मन की भटकना दूर नहीं होती। 13। (यह लोग) नियोली कर्म करते हैं। कुण्डलनी को दसम द्वार में खोलना बताते हैं। मन के हठ से (प्राणायाम के अभ्यास में) प्राण ऊपर चढ़ाते हैं। सुखमनां में रोक के रखते हैं और फिर नीचे उतारते हैं पर ये धार्मिक कर्म निरे पाखण्ड धर्म ही हैं। इसके द्वारा परमात्मा के साथ प्रीति नहीं बन सकती। गुरू-शबद वाला महान (आनंद देने वाला) रस नहीं मिलता। 14। (एक वे हैं जो) कुदरति में बस रहे प्रभू को देखते हैं उनका मन उस दीदार में प्रसन्न होता है। गुरू के शबद में जुड़ के वे हर जगह गुरू को बसता पहचानते हैं। हे नानक ! उनको सारी सृष्टि में व्यापक परमात्मा दिखता है। गुरू ही अदृष्ट परमात्मा के दीदार करवाता है। 15। 5। 22।
ਮਾਰੂ ਸੋਲਹੇ ਮਹਲਾ ੩
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਹੁਕਮੀ ਸਹਜੇ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਉਪਾਈ ॥
ਕਰਿ ਕਰਿ ਵੇਖੈ ਅਪਣੀ ਵਡਿਆਈ ॥
ਆਪੇ ਕਰੇ ਕਰਾਏ ਆਪੇ ਹੁਕਮੇ ਰਹਿਆ ਸਮਾਈ ਹੇ ॥੧॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਜਗਤੁ ਗੁਬਾਰਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੂਝੈ ਕੋ ਵੀਚਾਰਾ ॥
ਆਪੇ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਸੋ ਪਾਏ ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਈ ਹੇ ॥੨॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਹੁਕਮੀ ਸਹਜੇ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਉਪਾਈ ॥
ਕਰਿ ਕਰਿ ਵੇਖੈ ਅਪਣੀ ਵਡਿਆਈ ॥
ਆਪੇ ਕਰੇ ਕਰਾਏ ਆਪੇ ਹੁਕਮੇ ਰਹਿਆ ਸਮਾਈ ਹੇ ॥੧॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਜਗਤੁ ਗੁਬਾਰਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੂਝੈ ਕੋ ਵੀਚਾਰਾ ॥
ਆਪੇ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਸੋ ਪਾਏ ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਈ ਹੇ ॥੨॥
मारू सोलहे महला ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हुकमी सहजे स्रिसटि उपाई ॥
करि करि वेखै अपणी वडिआई ॥
आपे करे कराए आपे हुकमे रहिआ समाई हे ॥१॥
माइआ मोहु जगतु गुबारा ॥
गुरमुखि बूझै को वीचारा ॥
आपे नदरि करे सो पाए आपे मेलि मिलाई हे ॥२॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हुकमी सहजे स्रिसटि उपाई ॥
करि करि वेखै अपणी वडिआई ॥
आपे करे कराए आपे हुकमे रहिआ समाई हे ॥१॥
माइआ मोहु जगतु गुबारा ॥
गुरमुखि बूझै को वीचारा ॥
आपे नदरि करे सो पाए आपे मेलि मिलाई हे ॥२॥
हिन्दी अर्थ: मारू सोलहे महला ३ ੴ सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! परमात्मा ने बिना किसी विशेष प्रयत्न के अपने हुकम से ये सृष्टि पैदा कर दी है। (जगत उत्पक्ति के काम) कर कर के अपनी वडिआई (स्वयं ही) देख रहा है। आप ही सब कुछ कर रहा है। (जीवों से) खुद ही करवा रहा है। अपनी रजा के अनुसार (सारी सृष्टि में) व्यापक हो रहा है। 1। हे भाई ! (सृष्टि में प्रभू स्वयं ही) माया का मोह पैदा करने वाला है (जिसने) जगत में घॅुप अंधेरा बना रखा है। इस विचार को गुरू के सन्मुख रहने वाला कोई विरला मनुष्य ही समझता है। हे भाई ! जिस जीव पर प्रभू स्वयं ही मेहर की निगाह करता है। वही। यह सूझ प्राप्त करता है कि प्रभू स्वयं ही (गुरू से) मिला के (अपने चरणों में) मिलाता है। 2।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1043 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
दिल्ली-NCR की office-canteen की 1 बजे की दोपहर।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 42 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1043” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1044 →, पीछे का: ← अंग 1042।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।