अंग
1052
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਜਹ ਦੇਖਾ ਤੂ ਸਭਨੀ ਥਾਈ ॥
ਪੂਰੈ ਗੁਰਿ ਸਭ ਸੋਝੀ ਪਾਈ ॥
ਨਾਮੋ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈਐ ਸਦਾ ਸਦ ਇਹੁ ਮਨੁ ਨਾਮੇ ਰਾਤਾ ਹੇ ॥੧੨॥
ਨਾਮੇ ਰਾਤਾ ਪਵਿਤੁ ਸਰੀਰਾ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਡੂਬਿ ਮੁਏ ਬਿਨੁ ਨੀਰਾ ॥
ਆਵਹਿ ਜਾਵਹਿ ਨਾਮੁ ਨਹੀ ਬੂਝਹਿ ਇਕਨਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਬਦੁ ਪਛਾਤਾ ਹੇ ॥੧੩॥
ਪੂਰੈ ਸਤਿਗੁਰਿ ਬੂਝ ਬੁਝਾਈ ॥
ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਮੁਕਤਿ ਕਿਨੈ ਨ ਪਾਈ ॥
ਨਾਮੇ ਨਾਮਿ ਮਿਲੈ ਵਡਿਆਈ ਸਹਜਿ ਰਹੈ ਰੰਗਿ ਰਾਤਾ ਹੇ ॥੧੪॥
ਕਾਇਆ ਨਗਰੁ ਢਹੈ ਢਹਿ ਢੇਰੀ ॥
ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਚੂਕੈ ਨਹੀ ਫੇਰੀ ॥
ਸਾਚੁ ਸਲਾਹੇ ਸਾਚਿ ਸਮਾਵੈ ਜਿਨਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਏਕੋ ਜਾਤਾ ਹੇ ॥੧੫॥
ਜਿਸ ਨੋ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਸੋ ਪਾਏ ॥ ਸਾਚਾ ਸਬਦੁ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਏ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਨਿਰੰਕਾਰੀ ਦਰਿ ਸਾਚੈ ਸਾਚੁ ਪਛਾਤਾ ਹੇ ॥੧੬॥੮॥
ਪੂਰੈ ਗੁਰਿ ਸਭ ਸੋਝੀ ਪਾਈ ॥
ਨਾਮੋ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈਐ ਸਦਾ ਸਦ ਇਹੁ ਮਨੁ ਨਾਮੇ ਰਾਤਾ ਹੇ ॥੧੨॥
ਨਾਮੇ ਰਾਤਾ ਪਵਿਤੁ ਸਰੀਰਾ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਡੂਬਿ ਮੁਏ ਬਿਨੁ ਨੀਰਾ ॥
ਆਵਹਿ ਜਾਵਹਿ ਨਾਮੁ ਨਹੀ ਬੂਝਹਿ ਇਕਨਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਬਦੁ ਪਛਾਤਾ ਹੇ ॥੧੩॥
ਪੂਰੈ ਸਤਿਗੁਰਿ ਬੂਝ ਬੁਝਾਈ ॥
ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਮੁਕਤਿ ਕਿਨੈ ਨ ਪਾਈ ॥
ਨਾਮੇ ਨਾਮਿ ਮਿਲੈ ਵਡਿਆਈ ਸਹਜਿ ਰਹੈ ਰੰਗਿ ਰਾਤਾ ਹੇ ॥੧੪॥
ਕਾਇਆ ਨਗਰੁ ਢਹੈ ਢਹਿ ਢੇਰੀ ॥
ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਚੂਕੈ ਨਹੀ ਫੇਰੀ ॥
ਸਾਚੁ ਸਲਾਹੇ ਸਾਚਿ ਸਮਾਵੈ ਜਿਨਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਏਕੋ ਜਾਤਾ ਹੇ ॥੧੫॥
ਜਿਸ ਨੋ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਸੋ ਪਾਏ ॥ ਸਾਚਾ ਸਬਦੁ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਏ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਨਿਰੰਕਾਰੀ ਦਰਿ ਸਾਚੈ ਸਾਚੁ ਪਛਾਤਾ ਹੇ ॥੧੬॥੮॥
जह देखा तू सभनी थाई ॥
पूरै गुरि सभ सोझी पाई ॥
नामो नामु धिआईऐ सदा सद इहु मनु नामे राता हे ॥१२॥
नामे राता पवितु सरीरा ॥
बिनु नावै डूबि मुए बिनु नीरा ॥
आवहि जावहि नामु नही बूझहि इकना गुरमुखि सबदु पछाता हे ॥१३॥
पूरै सतिगुरि बूझ बुझाई ॥
विणु नावै मुकति किनै न पाई ॥
नामे नामि मिलै वडिआई सहजि रहै रंगि राता हे ॥१४॥
काइआ नगरु ढहै ढहि ढेरी ॥
बिनु सबदै चूकै नही फेरी ॥
साचु सलाहे साचि समावै जिनि गुरमुखि एको जाता हे ॥१५॥
जिस नो नदरि करे सो पाए ॥ साचा सबदु वसै मनि आए ॥
नानक नामि रते निरंकारी दरि साचै साचु पछाता हे ॥१६॥८॥
पूरै गुरि सभ सोझी पाई ॥
नामो नामु धिआईऐ सदा सद इहु मनु नामे राता हे ॥१२॥
नामे राता पवितु सरीरा ॥
बिनु नावै डूबि मुए बिनु नीरा ॥
आवहि जावहि नामु नही बूझहि इकना गुरमुखि सबदु पछाता हे ॥१३॥
पूरै सतिगुरि बूझ बुझाई ॥
विणु नावै मुकति किनै न पाई ॥
नामे नामि मिलै वडिआई सहजि रहै रंगि राता हे ॥१४॥
काइआ नगरु ढहै ढहि ढेरी ॥
बिनु सबदै चूकै नही फेरी ॥
साचु सलाहे साचि समावै जिनि गुरमुखि एको जाता हे ॥१५॥
जिस नो नदरि करे सो पाए ॥ साचा सबदु वसै मनि आए ॥
नानक नामि रते निरंकारी दरि साचै साचु पछाता हे ॥१६॥८॥
हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! मैं जिधर देखता हूँ। तू सब जगहों में बसता मुझे दिखाई देता है। मुझे ये सारी समझ पूरे गुरू से मिली है। हे भाई ! सदा ही सदा ही परमात्मा का नाम ही नाम सिमरना चाहिए। (जो मनुष्य सिमरता है उसका) यह मन नाम में ही रंगा जाता है। 12। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा के नाम-रंग में रंगा रहता है। उसका शरीर (विकारों की मैल से) पवित्र रहता है; पर जो मनुष्य नाम से टूटे रहते हैं। वे (विकारों में) डूबके (आत्मिक मौत) मरे रहते हैं। वे विकारों का रक्ती भर भी मुकाबला नहीं कर सकते। जो मनुष्य हरी नाम की कद्र नहीं समझते। वे जगत में आते हैं और (खाली ही) चले जाते हैं। पर कई ऐसे हैं जो गुरू की शरण पड़ कर गुरू-शबद से सांझ डालते हैं। 13। हे भाई ! पूरे गुरू ने (हमें ये) समझ बख्शी है कि परमात्मा के नाम के बिना किसी भी मनुष्य ने (विकारों से) मुक्ति हासिल नहीं की। जो मनुष्य हर वक्त नाम में लीन रहता है उसको (लोक-परलोक की) इज्जत मिलती है। वह आत्मिक अडोलता में टिका रहता है। वह प्रेम-रंग में रंगा रहता है। 14। हे भाई ! यह शरीर-नगर (आखिर) गिर जाता है। और ढह-ढेरी हो जाता है। पर गुरू-शबद (को मन में बसाए) बिना (जीवात्मा का) जनम-मरण का चक्कर समाप्त नहीं होता। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर एक परमात्मा के साथ सांझ डालता है वह सदा-स्थिर परमात्मा की सिफत-सालाह करता रहता है। वह सदा-स्थिर (की याद) में लीन रहता है। 15। हे भाई ! वही मनुष्य (सिफत-सालाह की दाति) हासिल करता है। जिस पर परमात्मा मेहर की निगाह करता है। सदा स्थिर परमात्मा की सिफत-सालाह का शबद उसके मन में आ बसता है। हे नानक ! जो मनुष्य निरंकार के नाम में रंगे रहते हैं। जो सदा-स्थिर प्रभू के साथ सांझ डालते हैं वे उस सदा स्थिर के दर पर (कबूल हो जाते हैं)। 16। 8।
ਮਾਰੂ ਸੋਲਹੇ ੩ ॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਸਭੁ ਜਿਸੁ ਕਰਣਾ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਸਭਿ ਤੇਰੀ ਸਰਣਾ ॥
ਆਪੇ ਗੁਪਤੁ ਵਰਤੈ ਸਭ ਅੰਤਰਿ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਪਛਾਤਾ ਹੇ ॥੧॥
ਹਰਿ ਕੇ ਭਗਤਿ ਭਰੇ ਭੰਡਾਰਾ ॥
ਆਪੇ ਬਖਸੇ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰਾ ॥
ਜੋ ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ਸੋਈ ਕਰਸਹਿ ਸਚੇ ਸਿਉ ਮਨੁ ਰਾਤਾ ਹੇ ॥੨॥
ਆਪੇ ਹੀਰਾ ਰਤਨੁ ਅਮੋਲੋ ॥
ਆਪੇ ਨਦਰੀ ਤੋਲੇ ਤੋਲੋ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਸਭਿ ਸਰਣਿ ਤੁਮਾਰੀ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਆਪਿ ਪਛਾਤਾ ਹੇ ॥੩॥
ਜਿਸ ਨੋ ਨਦਰਿ ਹੋਵੈ ਧੁਰਿ ਤੇਰੀ ॥
ਮਰੈ ਨ ਜੰਮੈ ਚੂਕੈ ਫੇਰੀ ॥
ਸਾਚੇ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਜੁਗਿ ਜੁਗਿ ਏਕੋ ਜਾਤਾ ਹੇ ॥੪॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਸਭੁ ਜਗਤੁ ਉਪਾਇਆ ॥
ਬ੍ਰਹਮਾ ਬਿਸਨੁ ਦੇਵ ਸਬਾਇਆ ॥
ਜੋ ਤੁਧੁ ਭਾਣੇ ਸੇ ਨਾਮਿ ਲਾਗੇ ਗਿਆਨ ਮਤੀ ਪਛਾਤਾ ਹੇ ॥੫॥
ਪਾਪ ਪੁੰਨ ਵਰਤੈ ਸੰਸਾਰਾ ॥
ਹਰਖੁ ਸੋਗੁ ਸਭੁ ਦੁਖੁ ਹੈ ਭਾਰਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਸੋ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ਜਿਨਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਪਛਾਤਾ ਹੇ ॥੬॥
ਕਿਰਤੁ ਨ ਕੋਈ ਮੇਟਣਹਾਰਾ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦੇ ਮੋਖ ਦੁਆਰਾ ॥
ਪੂਰਬਿ ਲਿਖਿਆ ਸੋ ਫਲੁ ਪਾਇਆ ਜਿਨਿ ਆਪੁ ਮਾਰਿ ਪਛਾਤਾ ਹੇ ॥੭॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਹਰਿ ਸਿਉ ਚਿਤੁ ਨ ਲਾਗੈ ॥
ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਘਣਾ ਦੁਖੁ ਆਗੈ ॥
ਮਨਮੁਖ ਭਰਮਿ ਭੁਲੇ ਭੇਖਧਾਰੀ ਅੰਤ ਕਾਲਿ ਪਛੁਤਾਤਾ ਹੇ ॥੮॥
ਹਰਿ ਕੈ ਭਾਣੈ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਏ ॥
ਸਭਿ ਕਿਲਬਿਖ ਕਾਟੇ ਦੂਖ ਸਬਾਏ ॥
ਹਰਿ ਨਿਰਮਲੁ ਨਿਰਮਲ ਹੈ ਬਾਣੀ ਹਰਿ ਸੇਤੀ ਮਨੁ ਰਾਤਾ ਹੇ ॥੯॥
ਜਿਸ ਨੋ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਸੋ ਗੁਣ ਨਿਧਿ ਪਾਏ ॥
ਹਉਮੈ ਮੇਰਾ ਠਾਕਿ ਰਹਾਏ ॥
ਗੁਣ ਅਵਗਣ ਕਾ ਏਕੋ ਦਾਤਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਿਰਲੀ ਜਾਤਾ ਹੇ ॥੧੦॥
ਮੇਰਾ ਪ੍ਰਭੁ ਨਿਰਮਲੁ ਅਤਿ ਅਪਾਰਾ ॥
ਆਪੇ ਮੇਲੈ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰਾ ॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਸਭੁ ਜਿਸੁ ਕਰਣਾ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਸਭਿ ਤੇਰੀ ਸਰਣਾ ॥
ਆਪੇ ਗੁਪਤੁ ਵਰਤੈ ਸਭ ਅੰਤਰਿ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਪਛਾਤਾ ਹੇ ॥੧॥
ਹਰਿ ਕੇ ਭਗਤਿ ਭਰੇ ਭੰਡਾਰਾ ॥
ਆਪੇ ਬਖਸੇ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰਾ ॥
ਜੋ ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ਸੋਈ ਕਰਸਹਿ ਸਚੇ ਸਿਉ ਮਨੁ ਰਾਤਾ ਹੇ ॥੨॥
ਆਪੇ ਹੀਰਾ ਰਤਨੁ ਅਮੋਲੋ ॥
ਆਪੇ ਨਦਰੀ ਤੋਲੇ ਤੋਲੋ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਸਭਿ ਸਰਣਿ ਤੁਮਾਰੀ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਆਪਿ ਪਛਾਤਾ ਹੇ ॥੩॥
ਜਿਸ ਨੋ ਨਦਰਿ ਹੋਵੈ ਧੁਰਿ ਤੇਰੀ ॥
ਮਰੈ ਨ ਜੰਮੈ ਚੂਕੈ ਫੇਰੀ ॥
ਸਾਚੇ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਜੁਗਿ ਜੁਗਿ ਏਕੋ ਜਾਤਾ ਹੇ ॥੪॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਸਭੁ ਜਗਤੁ ਉਪਾਇਆ ॥
ਬ੍ਰਹਮਾ ਬਿਸਨੁ ਦੇਵ ਸਬਾਇਆ ॥
ਜੋ ਤੁਧੁ ਭਾਣੇ ਸੇ ਨਾਮਿ ਲਾਗੇ ਗਿਆਨ ਮਤੀ ਪਛਾਤਾ ਹੇ ॥੫॥
ਪਾਪ ਪੁੰਨ ਵਰਤੈ ਸੰਸਾਰਾ ॥
ਹਰਖੁ ਸੋਗੁ ਸਭੁ ਦੁਖੁ ਹੈ ਭਾਰਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਸੋ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ਜਿਨਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਪਛਾਤਾ ਹੇ ॥੬॥
ਕਿਰਤੁ ਨ ਕੋਈ ਮੇਟਣਹਾਰਾ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦੇ ਮੋਖ ਦੁਆਰਾ ॥
ਪੂਰਬਿ ਲਿਖਿਆ ਸੋ ਫਲੁ ਪਾਇਆ ਜਿਨਿ ਆਪੁ ਮਾਰਿ ਪਛਾਤਾ ਹੇ ॥੭॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਹਰਿ ਸਿਉ ਚਿਤੁ ਨ ਲਾਗੈ ॥
ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਘਣਾ ਦੁਖੁ ਆਗੈ ॥
ਮਨਮੁਖ ਭਰਮਿ ਭੁਲੇ ਭੇਖਧਾਰੀ ਅੰਤ ਕਾਲਿ ਪਛੁਤਾਤਾ ਹੇ ॥੮॥
ਹਰਿ ਕੈ ਭਾਣੈ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਏ ॥
ਸਭਿ ਕਿਲਬਿਖ ਕਾਟੇ ਦੂਖ ਸਬਾਏ ॥
ਹਰਿ ਨਿਰਮਲੁ ਨਿਰਮਲ ਹੈ ਬਾਣੀ ਹਰਿ ਸੇਤੀ ਮਨੁ ਰਾਤਾ ਹੇ ॥੯॥
ਜਿਸ ਨੋ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਸੋ ਗੁਣ ਨਿਧਿ ਪਾਏ ॥
ਹਉਮੈ ਮੇਰਾ ਠਾਕਿ ਰਹਾਏ ॥
ਗੁਣ ਅਵਗਣ ਕਾ ਏਕੋ ਦਾਤਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਿਰਲੀ ਜਾਤਾ ਹੇ ॥੧੦॥
ਮੇਰਾ ਪ੍ਰਭੁ ਨਿਰਮਲੁ ਅਤਿ ਅਪਾਰਾ ॥
ਆਪੇ ਮੇਲੈ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰਾ ॥
मारू सोलहे ३ ॥
आपे करता सभु जिसु करणा ॥
जीअ जंत सभि तेरी सरणा ॥
आपे गुपतु वरतै सभ अंतरि गुर कै सबदि पछाता हे ॥१॥
हरि के भगति भरे भंडारा ॥
आपे बखसे सबदि वीचारा ॥
जो तुधु भावै सोई करसहि सचे सिउ मनु राता हे ॥२॥
आपे हीरा रतनु अमोलो ॥
आपे नदरी तोले तोलो ॥
जीअ जंत सभि सरणि तुमारी करि किरपा आपि पछाता हे ॥३॥
जिस नो नदरि होवै धुरि तेरी ॥
मरै न जंमै चूकै फेरी ॥
साचे गुण गावै दिनु राती जुगि जुगि एको जाता हे ॥४॥
माइआ मोहि सभु जगतु उपाइआ ॥
ब्रहमा बिसनु देव सबाइआ ॥
जो तुधु भाणे से नामि लागे गिआन मती पछाता हे ॥५॥
पाप पुंन वरतै संसारा ॥
हरखु सोगु सभु दुखु है भारा ॥
गुरमुखि होवै सो सुखु पाए जिनि गुरमुखि नामु पछाता हे ॥६॥
किरतु न कोई मेटणहारा ॥
गुर कै सबदे मोख दुआरा ॥
पूरबि लिखिआ सो फलु पाइआ जिनि आपु मारि पछाता हे ॥७॥
माइआ मोहि हरि सिउ चितु न लागै ॥
दूजै भाइ घणा दुखु आगै ॥
मनमुख भरमि भुले भेखधारी अंत कालि पछुताता हे ॥८॥
हरि कै भाणै हरि गुण गाए ॥
सभि किलबिख काटे दूख सबाए ॥
हरि निरमलु निरमल है बाणी हरि सेती मनु राता हे ॥९॥
जिस नो नदरि करे सो गुण निधि पाए ॥
हउमै मेरा ठाकि रहाए ॥
गुण अवगण का एको दाता गुरमुखि विरली जाता हे ॥१०॥
मेरा प्रभु निरमलु अति अपारा ॥
आपे मेलै गुर सबदि वीचारा ॥
आपे करता सभु जिसु करणा ॥
जीअ जंत सभि तेरी सरणा ॥
आपे गुपतु वरतै सभ अंतरि गुर कै सबदि पछाता हे ॥१॥
हरि के भगति भरे भंडारा ॥
आपे बखसे सबदि वीचारा ॥
जो तुधु भावै सोई करसहि सचे सिउ मनु राता हे ॥२॥
आपे हीरा रतनु अमोलो ॥
आपे नदरी तोले तोलो ॥
जीअ जंत सभि सरणि तुमारी करि किरपा आपि पछाता हे ॥३॥
जिस नो नदरि होवै धुरि तेरी ॥
मरै न जंमै चूकै फेरी ॥
साचे गुण गावै दिनु राती जुगि जुगि एको जाता हे ॥४॥
माइआ मोहि सभु जगतु उपाइआ ॥
ब्रहमा बिसनु देव सबाइआ ॥
जो तुधु भाणे से नामि लागे गिआन मती पछाता हे ॥५॥
पाप पुंन वरतै संसारा ॥
हरखु सोगु सभु दुखु है भारा ॥
गुरमुखि होवै सो सुखु पाए जिनि गुरमुखि नामु पछाता हे ॥६॥
किरतु न कोई मेटणहारा ॥
गुर कै सबदे मोख दुआरा ॥
पूरबि लिखिआ सो फलु पाइआ जिनि आपु मारि पछाता हे ॥७॥
माइआ मोहि हरि सिउ चितु न लागै ॥
दूजै भाइ घणा दुखु आगै ॥
मनमुख भरमि भुले भेखधारी अंत कालि पछुताता हे ॥८॥
हरि कै भाणै हरि गुण गाए ॥
सभि किलबिख काटे दूख सबाए ॥
हरि निरमलु निरमल है बाणी हरि सेती मनु राता हे ॥९॥
जिस नो नदरि करे सो गुण निधि पाए ॥
हउमै मेरा ठाकि रहाए ॥
गुण अवगण का एको दाता गुरमुखि विरली जाता हे ॥१०॥
मेरा प्रभु निरमलु अति अपारा ॥
आपे मेलै गुर सबदि वीचारा ॥
हिन्दी अर्थ: मारू सोलहे ३॥ हे प्रभू ! तू स्वयं ही वह करतार है जिसका (रचा हुआ यह) सारा जगत है। सारे जीव तेरी ही शरण में हैं। हे भाई ! प्रभू खुद ही सब जीवों के अंदर गुप्त रूप में मौजूद है। गुरू के शबद से उसके साथ सांझ पड़ सकती है। 1। हे भाई ! हरी के खजाने में भक्ति के भंडारे भरे पड़े हैं। गुरू के शबद से स्वयं ही प्रभू यह सूझ बख्शता है। हे प्रभू ! जो तुझे अच्छा लगता है। वही कुछ जीव करते हैं। हे भाई ! (प्रभू की रजा से ही) जीव का मन उस सदा-स्थिर प्रभू के साथ जुड़ सकता है। 2। हे भाई ! प्रभू स्वयं ही (कीमती) हीरा है खुद ही अमोलक रत्न है। प्रभू स्वयं ही अपनी मेहर की निगाह से (इस हीरे की) परख करता है। हे प्रभू ! सारे ही जीव तेरी ही शरण में हैं। तू स्वयं ही कृपा करके (अपने साथ) गहरी सांझ पैदा करता है। 3। हे प्रभू ! जिस मनुष्य पर धुर से तेरी हजूरी से तेरी मेहर की निगाह हो। वह बार-बार पैदा होता-मरता नहीं। उसका जनम-मरण का चक्कर समाप्त हो जाता है। हे भाई ! (जिस पर उसकी निगाह हो। वह) दिन-रात सदा-स्थिर प्रभू के गुण गाता है। हरेक युग में वह उस प्रभू को ही (बसता) समझता है। 4। यह सारा ही जगत तूने माया के मोह में (ही) पैदा किया है (सब पर माया का प्रभाव है)। हे प्रभू ! ब्रहमा। विष्णू। सारे ही देवता गण (जो भी जगत में पैदा हुआ है) जो तुझे अच्छे लगते हैं। वह तेरे नाम में जुड़ते हैं। आत्मिक जीवन की सूझ वाली मति के द्वारा ही तेरे साथ जान-पहचान बनती है। 5। हे भाई ! सारे जगत में (माया के प्रभाव तहत ही) पाप और पुन्य हो रहा है। (माया के मोह में ही) हर जगह कहीं खुशी और कहीं ग़मी है (माया के मोह का) बहुत सारा दुख (जगत को व्याप रहा है)। जिस मनुष्य ने गुरू की शरण पड़ कर हरी-नाम के साथ सांझ डाली है। जो गुरू के सन्मुख रहता है वही आत्मिक आनंद पाता है। 6। हे भाई ! कोई मनुष्य पिछले किए कर्मों की कमाई मिटा नहीं सकता। (पिछले किए कर्मों से) मुक्ति का रास्ता गुरू के शबद द्वारा ही मिलता है। जिस मनुष्य ने स्वै भाव मिटा के (हरी-नाम के साथ) सांझ डाल ली। उसने भी जो कुछ पूर्बले जनम में कमाई की। वही फल अब प्राप्त किया। 7। हे भाई ! माया के मोह के कारण परमात्मा के साथ मन जुड़ नहीं सकता। माया के मोह में फसे रहने से जीवन-सफर में बहुत दुख होता है। मन के मुरीद मनुष्य धार्मिक पहरावा पहन के भी भटकना के कारण गलत राह पर पड़े रहते हैं। आखिरी वक्त में पछताना पड़ता है। 8। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा की रजा में रह के परमात्मा के गुण गाता है। वह अपने सारे पाप सारे दुख (अपने अंदर से) काट देता है। उस का मन उस प्रभू के साथ रंगा रहता है। जो विकारों की मैल से रहित है और जिसकी सिफत सालाह की बाणी भी पवित्र है। 9। हे भाई ! परमात्मा जिस मनुष्य पर मेहर की निगाह करता है वह उस गुणों के खजाने हरी का मिलाप हासिल कर लेता है। वह मनुष्य अपने अंदर से अहंकार और ममता (के प्रभाव) को रोक देता है। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले विरलों (कुछ एक ने ही) ये समझ लिया है कि गुण देने वाला और अवगुण पैदा करने वाला सिर्फ परमात्मा ही है। 10। हे भाई ! मेरा प्रभू बड़ा बेअंत है और विकारों के प्रभाव से परे है। गुरू के शबद द्वारा (अपने गुणों की) विचार बख्श के वह स्वयं ही (जीव को अपने साथ) मिलाता है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1052 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
सीस-गंज साहिब के बाहर Chandni Chowk की भीड़ और अंदर का shrine, दोनों एक साथ।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 47 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1052” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1053 →, पीछे का: ← अंग 1051।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।