अंग
1084
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਚੁ ਕਮਾਵੈ ਸੋਈ ਕਾਜੀ ॥
ਜੋ ਦਿਲੁ ਸੋਧੈ ਸੋਈ ਹਾਜੀ ॥
ਸੋ ਮੁਲਾ ਮਲਊਨ ਨਿਵਾਰੈ ਸੋ ਦਰਵੇਸੁ ਜਿਸੁ ਸਿਫਤਿ ਧਰਾ ॥੬॥
ਸਭੇ ਵਖਤ ਸਭੇ ਕਰਿ ਵੇਲਾ ॥ ਖਾਲਕੁ ਯਾਦਿ ਦਿਲੈ ਮਹਿ ਮਉਲਾ ॥
ਤਸਬੀ ਯਾਦਿ ਕਰਹੁ ਦਸ ਮਰਦਨੁ ਸੁੰਨਤਿ ਸੀਲੁ ਬੰਧਾਨਿ ਬਰਾ ॥੭॥
ਦਿਲ ਮਹਿ ਜਾਨਹੁ ਸਭ ਫਿਲਹਾਲਾ ॥
ਖਿਲਖਾਨਾ ਬਿਰਾਦਰ ਹਮੂ ਜੰਜਾਲਾ ॥
ਮੀਰ ਮਲਕ ਉਮਰੇ ਫਾਨਾਇਆ ਏਕ ਮੁਕਾਮ ਖੁਦਾਇ ਦਰਾ ॥੮॥
ਅਵਲਿ ਸਿਫਤਿ ਦੂਜੀ ਸਾਬੂਰੀ ॥
ਤੀਜੈ ਹਲੇਮੀ ਚਉਥੈ ਖੈਰੀ ॥
ਪੰਜਵੈ ਪੰਜੇ ਇਕਤੁ ਮੁਕਾਮੈ ਏਹਿ ਪੰਜਿ ਵਖਤ ਤੇਰੇ ਅਪਰਪਰਾ ॥੯॥
ਸਗਲੀ ਜਾਨਿ ਕਰਹੁ ਮਉਦੀਫਾ ॥
ਬਦ ਅਮਲ ਛੋਡਿ ਕਰਹੁ ਹਥਿ ਕੂਜਾ ॥
ਖੁਦਾਇ ਏਕੁ ਬੁਝਿ ਦੇਵਹੁ ਬਾਂਗਾਂ ਬੁਰਗੂ ਬਰਖੁਰਦਾਰ ਖਰਾ ॥੧੦॥
ਹਕੁ ਹਲਾਲੁ ਬਖੋਰਹੁ ਖਾਣਾ ॥
ਦਿਲ ਦਰੀਆਉ ਧੋਵਹੁ ਮੈਲਾਣਾ ॥
ਪੀਰੁ ਪਛਾਣੈ ਭਿਸਤੀ ਸੋਈ ਅਜਰਾਈਲੁ ਨ ਦੋਜ ਠਰਾ ॥੧੧॥
ਕਾਇਆ ਕਿਰਦਾਰ ਅਉਰਤ ਯਕੀਨਾ ॥
ਰੰਗ ਤਮਾਸੇ ਮਾਣਿ ਹਕੀਨਾ ॥
ਨਾਪਾਕ ਪਾਕੁ ਕਰਿ ਹਦੂਰਿ ਹਦੀਸਾ ਸਾਬਤ ਸੂਰਤਿ ਦਸਤਾਰ ਸਿਰਾ ॥੧੨॥
ਮੁਸਲਮਾਣੁ ਮੋਮ ਦਿਲਿ ਹੋਵੈ ॥
ਅੰਤਰ ਕੀ ਮਲੁ ਦਿਲ ਤੇ ਧੋਵੈ ॥
ਦੁਨੀਆ ਰੰਗ ਨ ਆਵੈ ਨੇੜੈ ਜਿਉ ਕੁਸਮ ਪਾਟੁ ਘਿਉ ਪਾਕੁ ਹਰਾ ॥੧੩॥
ਜਾ ਕਉ ਮਿਹਰ ਮਿਹਰ ਮਿਹਰਵਾਨਾ ॥
ਸੋਈ ਮਰਦੁ ਮਰਦੁ ਮਰਦਾਨਾ ॥
ਸੋਈ ਸੇਖੁ ਮਸਾਇਕੁ ਹਾਜੀ ਸੋ ਬੰਦਾ ਜਿਸੁ ਨਜਰਿ ਨਰਾ ॥੧੪॥
ਕੁਦਰਤਿ ਕਾਦਰ ਕਰਣ ਕਰੀਮਾ ॥
ਸਿਫਤਿ ਮੁਹਬਤਿ ਅਥਾਹ ਰਹੀਮਾ ॥
ਹਕੁ ਹੁਕਮੁ ਸਚੁ ਖੁਦਾਇਆ ਬੁਝਿ ਨਾਨਕ ਬੰਦਿ ਖਲਾਸ ਤਰਾ ॥੧੫॥੩॥੧੨॥
ਜੋ ਦਿਲੁ ਸੋਧੈ ਸੋਈ ਹਾਜੀ ॥
ਸੋ ਮੁਲਾ ਮਲਊਨ ਨਿਵਾਰੈ ਸੋ ਦਰਵੇਸੁ ਜਿਸੁ ਸਿਫਤਿ ਧਰਾ ॥੬॥
ਸਭੇ ਵਖਤ ਸਭੇ ਕਰਿ ਵੇਲਾ ॥ ਖਾਲਕੁ ਯਾਦਿ ਦਿਲੈ ਮਹਿ ਮਉਲਾ ॥
ਤਸਬੀ ਯਾਦਿ ਕਰਹੁ ਦਸ ਮਰਦਨੁ ਸੁੰਨਤਿ ਸੀਲੁ ਬੰਧਾਨਿ ਬਰਾ ॥੭॥
ਦਿਲ ਮਹਿ ਜਾਨਹੁ ਸਭ ਫਿਲਹਾਲਾ ॥
ਖਿਲਖਾਨਾ ਬਿਰਾਦਰ ਹਮੂ ਜੰਜਾਲਾ ॥
ਮੀਰ ਮਲਕ ਉਮਰੇ ਫਾਨਾਇਆ ਏਕ ਮੁਕਾਮ ਖੁਦਾਇ ਦਰਾ ॥੮॥
ਅਵਲਿ ਸਿਫਤਿ ਦੂਜੀ ਸਾਬੂਰੀ ॥
ਤੀਜੈ ਹਲੇਮੀ ਚਉਥੈ ਖੈਰੀ ॥
ਪੰਜਵੈ ਪੰਜੇ ਇਕਤੁ ਮੁਕਾਮੈ ਏਹਿ ਪੰਜਿ ਵਖਤ ਤੇਰੇ ਅਪਰਪਰਾ ॥੯॥
ਸਗਲੀ ਜਾਨਿ ਕਰਹੁ ਮਉਦੀਫਾ ॥
ਬਦ ਅਮਲ ਛੋਡਿ ਕਰਹੁ ਹਥਿ ਕੂਜਾ ॥
ਖੁਦਾਇ ਏਕੁ ਬੁਝਿ ਦੇਵਹੁ ਬਾਂਗਾਂ ਬੁਰਗੂ ਬਰਖੁਰਦਾਰ ਖਰਾ ॥੧੦॥
ਹਕੁ ਹਲਾਲੁ ਬਖੋਰਹੁ ਖਾਣਾ ॥
ਦਿਲ ਦਰੀਆਉ ਧੋਵਹੁ ਮੈਲਾਣਾ ॥
ਪੀਰੁ ਪਛਾਣੈ ਭਿਸਤੀ ਸੋਈ ਅਜਰਾਈਲੁ ਨ ਦੋਜ ਠਰਾ ॥੧੧॥
ਕਾਇਆ ਕਿਰਦਾਰ ਅਉਰਤ ਯਕੀਨਾ ॥
ਰੰਗ ਤਮਾਸੇ ਮਾਣਿ ਹਕੀਨਾ ॥
ਨਾਪਾਕ ਪਾਕੁ ਕਰਿ ਹਦੂਰਿ ਹਦੀਸਾ ਸਾਬਤ ਸੂਰਤਿ ਦਸਤਾਰ ਸਿਰਾ ॥੧੨॥
ਮੁਸਲਮਾਣੁ ਮੋਮ ਦਿਲਿ ਹੋਵੈ ॥
ਅੰਤਰ ਕੀ ਮਲੁ ਦਿਲ ਤੇ ਧੋਵੈ ॥
ਦੁਨੀਆ ਰੰਗ ਨ ਆਵੈ ਨੇੜੈ ਜਿਉ ਕੁਸਮ ਪਾਟੁ ਘਿਉ ਪਾਕੁ ਹਰਾ ॥੧੩॥
ਜਾ ਕਉ ਮਿਹਰ ਮਿਹਰ ਮਿਹਰਵਾਨਾ ॥
ਸੋਈ ਮਰਦੁ ਮਰਦੁ ਮਰਦਾਨਾ ॥
ਸੋਈ ਸੇਖੁ ਮਸਾਇਕੁ ਹਾਜੀ ਸੋ ਬੰਦਾ ਜਿਸੁ ਨਜਰਿ ਨਰਾ ॥੧੪॥
ਕੁਦਰਤਿ ਕਾਦਰ ਕਰਣ ਕਰੀਮਾ ॥
ਸਿਫਤਿ ਮੁਹਬਤਿ ਅਥਾਹ ਰਹੀਮਾ ॥
ਹਕੁ ਹੁਕਮੁ ਸਚੁ ਖੁਦਾਇਆ ਬੁਝਿ ਨਾਨਕ ਬੰਦਿ ਖਲਾਸ ਤਰਾ ॥੧੫॥੩॥੧੨॥
सचु कमावै सोई काजी ॥
जो दिलु सोधै सोई हाजी ॥
सो मुला मलऊन निवारै सो दरवेसु जिसु सिफति धरा ॥६॥
सभे वखत सभे करि वेला ॥ खालकु यादि दिलै महि मउला ॥
तसबी यादि करहु दस मरदनु सुंनति सीलु बंधानि बरा ॥७॥
दिल महि जानहु सभ फिलहाला ॥
खिलखाना बिरादर हमू जंजाला ॥
मीर मलक उमरे फानाइआ एक मुकाम खुदाइ दरा ॥८॥
अवलि सिफति दूजी साबूरी ॥
तीजै हलेमी चउथै खैरी ॥
पंजवै पंजे इकतु मुकामै एहि पंजि वखत तेरे अपरपरा ॥९॥
सगली जानि करहु मउदीफा ॥
बद अमल छोडि करहु हथि कूजा ॥
खुदाइ एकु बुझि देवहु बांगां बुरगू बरखुरदार खरा ॥१०॥
हकु हलालु बखोरहु खाणा ॥
दिल दरीआउ धोवहु मैलाणा ॥
पीरु पछाणै भिसती सोई अजराईलु न दोज ठरा ॥११॥
काइआ किरदार अउरत यकीना ॥
रंग तमासे माणि हकीना ॥
नापाक पाकु करि हदूरि हदीसा साबत सूरति दसतार सिरा ॥१२॥
मुसलमाणु मोम दिलि होवै ॥
अंतर की मलु दिल ते धोवै ॥
दुनीआ रंग न आवै नेड़ै जिउ कुसम पाटु घिउ पाकु हरा ॥१३॥
जा कउ मिहर मिहर मिहरवाना ॥
सोई मरदु मरदु मरदाना ॥
सोई सेखु मसाइकु हाजी सो बंदा जिसु नजरि नरा ॥१४॥
कुदरति कादर करण करीमा ॥
सिफति मुहबति अथाह रहीमा ॥
हकु हुकमु सचु खुदाइआ बुझि नानक बंदि खलास तरा ॥१५॥३॥१२॥
जो दिलु सोधै सोई हाजी ॥
सो मुला मलऊन निवारै सो दरवेसु जिसु सिफति धरा ॥६॥
सभे वखत सभे करि वेला ॥ खालकु यादि दिलै महि मउला ॥
तसबी यादि करहु दस मरदनु सुंनति सीलु बंधानि बरा ॥७॥
दिल महि जानहु सभ फिलहाला ॥
खिलखाना बिरादर हमू जंजाला ॥
मीर मलक उमरे फानाइआ एक मुकाम खुदाइ दरा ॥८॥
अवलि सिफति दूजी साबूरी ॥
तीजै हलेमी चउथै खैरी ॥
पंजवै पंजे इकतु मुकामै एहि पंजि वखत तेरे अपरपरा ॥९॥
सगली जानि करहु मउदीफा ॥
बद अमल छोडि करहु हथि कूजा ॥
खुदाइ एकु बुझि देवहु बांगां बुरगू बरखुरदार खरा ॥१०॥
हकु हलालु बखोरहु खाणा ॥
दिल दरीआउ धोवहु मैलाणा ॥
पीरु पछाणै भिसती सोई अजराईलु न दोज ठरा ॥११॥
काइआ किरदार अउरत यकीना ॥
रंग तमासे माणि हकीना ॥
नापाक पाकु करि हदूरि हदीसा साबत सूरति दसतार सिरा ॥१२॥
मुसलमाणु मोम दिलि होवै ॥
अंतर की मलु दिल ते धोवै ॥
दुनीआ रंग न आवै नेड़ै जिउ कुसम पाटु घिउ पाकु हरा ॥१३॥
जा कउ मिहर मिहर मिहरवाना ॥
सोई मरदु मरदु मरदाना ॥
सोई सेखु मसाइकु हाजी सो बंदा जिसु नजरि नरा ॥१४॥
कुदरति कादर करण करीमा ॥
सिफति मुहबति अथाह रहीमा ॥
हकु हुकमु सचु खुदाइआ बुझि नानक बंदि खलास तरा ॥१५॥३॥१२॥
हिन्दी अर्थ: हे ख़ुदा के बँदे ! जो मनुष्य सदा कायम रहने वाले अल्लाह की बंदगी करता है वह है (असल) काज़ी। जो मनुष्य अपने दिल को पवित्र रखने का यतन करता रहता है वही है (असल) हॅज करने वाला। जो मनुष्य (अपने अंदर से) विकारों को दूर करता है वह (असल) मुल्ला है। जिस मनुष्य को ख़ुदा की सिफत-सालाह का सहारा है वह (असल) फ़कीर। 6। हे ख़ुदा के बँदे ! हर वक्त हर समय ख़ालक को मौला को अपने दिल में याद करता रह। हर वक्त ख़ुदा को याद करते रहो- यही है तसब्बी। वह ख़ुदा दसों इन्द्रियों को वश में ला सकता है। हे ख़ुदा के बँदे ! अच्छा स्वभाव और (विकारों से) मज़बूती से परहेज़ ही सुन्नत (समझ)। 7। हे अल्लाह के बँदे ! सारी रचना का अपने दिल में नाशवंत जान। हे भाई ! ये टॅबर-टोर (परिवार आदि) का मोह सब बँधन (में फसाने वाले ही) हैं। शाह। पातशाह। अमीर लोक सब नाशवंत हैं। सिर्फ ख़ुदा का दर ही सदा कायम रहने वाला है। 8। हे ख़ुदा के बँदे ! (तेरी उम्र के) ये पाँच वक्त तेरे वास्ते बड़े ही लाभदायक हो सकते हैं (अगर तू) पहले वक्त में रॅब की सिफत सलाह करता रहे। अगर संतोष तेरी दूसरी निमाज़ हो। निमाज़ के तीसरे वक्त में तू विनम्रता धारण करे। और चौथे वक्त में तू सबका भला माँगे। अगर पाँचवें वक्त में तू कामादिक पाँचों को ही वश में रखे (भाव। रॅब की सिफतसालाह। संतोष। विनम्रता। सबका भला माँगना और कामादिक पाँचों को वश में रखना- ये पाँच हैं आत्मिक जीवन की पाँच निमाज़ें। और ये जीवन को बहुत ऊँचा करती हैं)। 9। हे अल्ला के बँदे ! सारी सृष्टि में एक ही ख़ुदा को बसता जान- इसको तू हर वक्त अपना रॅबी सलाम का पाठ बनाए रख। बुरे काम करने छोड़ दे- ये पानी का लोटा तू अपने हाथ में पकड़ (शरीर की स्वच्छता के लिए)। ये यकीन बना कि सारी ख़लकत का एक ही ख़ुदा है- ये बाँग सदा दिया कर। हे फकीर सांई ! ख़ुदा अच्छा पुत्र बनने का यतन किया कर-ये सिंज्ञीं बजाया कर। 10। हे ख़ुदा के बँदे ! हॅक की कमाई करा कर- ये है ‘हलाल’। ये खाना खाया कर। (दिल में से भेद भाव निकाल के) दिल को दरिया बनाने का यतन कर। (इस तरह) दिल की (विकारों की) मैल धोया कर। हे अल्लाह के बँदे ! जो मनुष्य अपने गुरू-पीर (के हुकम) को पहचानता है। वह बहिश्त का हकदार बन जाता है। अज़राइल उसको दोज़क में नहीं फैंकता। 11। हे ख़ुदा के बँदे ! अपने इस शरीर को। जिसके द्वारा सदा अच्छे-बुरे काम किए जाते हैं अपनी वफ़ादार औरत (पतिव्रता स्त्री) बना। (और। विकारों के रंग-तमाशों में डूबने की जगह। इस पतिव्रता स्त्री के माध्यम से) रॅबी मिलाप के रंग-तमाशे भोगा कर। हे अल्ला के बँदे ! (विकारों में) मलीन हो रहे मन को पवित्र करने का यतन कर- यही है रॅबी मिलाप पैदा करने वाली शरह की किताब। (सुन्नत। लबें कटाने आदि की शरह छोड़ के) अपनी शकल को ज्यों का त्यों रख- यह (लोक-परलोक में) इज्जत-सम्मान प्राप्त करने का वसीला बन जाता है। 12। हे ख़ुदा के बँदे ! (असल) मुसलमान वह है जो मोम जैसे नर्म दिल वाला होता है और जो अपने दिल के अंदरूनी (विकारों की) मैल धो देता है। (वह मुसलमान) दुनियावी रंग-तमाशों के नजदीक नहीं फटकता (जो इस तरह पवित्र रहता है) जैसे फूल रेशम घी और मृगछाला पवित्र (रहते हैं)। 13। हे ख़ुदा के बँदे ! जिस मनुष्य पर मेहरवान (मौला) की हर वक्त मेहर रहती है। (विकारों के मुकाबले पर) वही मनुष्य सूरमा मर्द (साबित होता) है। वही है (असल) शेख मसाइक और हाज़ी। वही है (असल) ख़ुदा का बँदा जिस पर ख़ुदा की मेहर की निगाह रहती है। 14। हे नानक ! (कह- ) हे ख़ुदा के बँदे ! कादर की कुदरति को। बख्शिंद मालिक के रचे हुए जगत को। बेअंत गहरे रहिम-दिल ख़ुदा की मुहब्बत और सिफत-सालाह को। सदा कायम रहने वाले प्रभू के हुकम को। सदा कायम रहने वाले ख़ुदा को समझ के माया के मोह के बँधनों से मुक्ति मिल जाती है। और। संसार-समुंद्र से पार लांघा जाता है। 15। 3। 12।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਸਭ ਊਚ ਬਿਰਾਜੇ ॥
ਆਪੇ ਥਾਪਿ ਉਥਾਪੇ ਸਾਜੇ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਸਰਣਿ ਗਹਤ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ਕਿਛੁ ਭਉ ਨ ਵਿਆਪੈ ਬਾਲ ਕਾ ॥੧॥
ਗਰਭ ਅਗਨਿ ਮਹਿ ਜਿਨਹਿ ਉਬਾਰਿਆ ॥
ਰਕਤ ਕਿਰਮ ਮਹਿ ਨਹੀ ਸੰਘਾਰਿਆ ॥
ਅਪਨਾ ਸਿਮਰਨੁ ਦੇ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਿਆ ਓਹੁ ਸਗਲ ਘਟਾ ਕਾ ਮਾਲਕਾ ॥੨॥
ਚਰਣ ਕਮਲ ਸਰਣਾਈ ਆਇਆ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਹੈ ਹਰਿ ਜਸੁ ਗਾਇਆ ॥
ਜਨਮ ਮਰਣ ਸਭਿ ਦੂਖ ਨਿਵਾਰੇ ਜਪਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਭਉ ਨਹੀ ਕਾਲ ਕਾ ॥੩॥
ਸਮਰਥ ਅਕਥ ਅਗੋਚਰ ਦੇਵਾ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਸਭਿ ਤਾ ਕੀ ਸੇਵਾ ॥
ਅੰਡਜ ਜੇਰਜ ਸੇਤਜ ਉਤਭੁਜ ਬਹੁ ਪਰਕਾਰੀ ਪਾਲਕਾ ॥੪॥
ਤਿਸਹਿ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਇ ਨਿਧਾਨਾ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਰਸੁ ਅੰਤਰਿ ਮਾਨਾ ॥
ਕਰੁ ਗਹਿ ਲੀਨੇ ਅੰਧ ਕੂਪ ਤੇ ਵਿਰਲੇ ਕੇਈ ਸਾਲਕਾ ॥੫॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਸਭ ਊਚ ਬਿਰਾਜੇ ॥
ਆਪੇ ਥਾਪਿ ਉਥਾਪੇ ਸਾਜੇ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਸਰਣਿ ਗਹਤ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ਕਿਛੁ ਭਉ ਨ ਵਿਆਪੈ ਬਾਲ ਕਾ ॥੧॥
ਗਰਭ ਅਗਨਿ ਮਹਿ ਜਿਨਹਿ ਉਬਾਰਿਆ ॥
ਰਕਤ ਕਿਰਮ ਮਹਿ ਨਹੀ ਸੰਘਾਰਿਆ ॥
ਅਪਨਾ ਸਿਮਰਨੁ ਦੇ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਿਆ ਓਹੁ ਸਗਲ ਘਟਾ ਕਾ ਮਾਲਕਾ ॥੨॥
ਚਰਣ ਕਮਲ ਸਰਣਾਈ ਆਇਆ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਹੈ ਹਰਿ ਜਸੁ ਗਾਇਆ ॥
ਜਨਮ ਮਰਣ ਸਭਿ ਦੂਖ ਨਿਵਾਰੇ ਜਪਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਭਉ ਨਹੀ ਕਾਲ ਕਾ ॥੩॥
ਸਮਰਥ ਅਕਥ ਅਗੋਚਰ ਦੇਵਾ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਸਭਿ ਤਾ ਕੀ ਸੇਵਾ ॥
ਅੰਡਜ ਜੇਰਜ ਸੇਤਜ ਉਤਭੁਜ ਬਹੁ ਪਰਕਾਰੀ ਪਾਲਕਾ ॥੪॥
ਤਿਸਹਿ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਇ ਨਿਧਾਨਾ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਰਸੁ ਅੰਤਰਿ ਮਾਨਾ ॥
ਕਰੁ ਗਹਿ ਲੀਨੇ ਅੰਧ ਕੂਪ ਤੇ ਵਿਰਲੇ ਕੇਈ ਸਾਲਕਾ ॥੫॥
मारू महला ५ ॥
पारब्रहम सभ ऊच बिराजे ॥
आपे थापि उथापे साजे ॥
प्रभ की सरणि गहत सुखु पाईऐ किछु भउ न विआपै बाल का ॥१॥
गरभ अगनि महि जिनहि उबारिआ ॥
रकत किरम महि नही संघारिआ ॥
अपना सिमरनु दे प्रतिपालिआ ओहु सगल घटा का मालका ॥२॥
चरण कमल सरणाई आइआ ॥
साधसंगि है हरि जसु गाइआ ॥
जनम मरण सभि दूख निवारे जपि हरि हरि भउ नही काल का ॥३॥
समरथ अकथ अगोचर देवा ॥
जीअ जंत सभि ता की सेवा ॥
अंडज जेरज सेतज उतभुज बहु परकारी पालका ॥४॥
तिसहि परापति होइ निधाना ॥
राम नाम रसु अंतरि माना ॥
करु गहि लीने अंध कूप ते विरले केई सालका ॥५॥
पारब्रहम सभ ऊच बिराजे ॥
आपे थापि उथापे साजे ॥
प्रभ की सरणि गहत सुखु पाईऐ किछु भउ न विआपै बाल का ॥१॥
गरभ अगनि महि जिनहि उबारिआ ॥
रकत किरम महि नही संघारिआ ॥
अपना सिमरनु दे प्रतिपालिआ ओहु सगल घटा का मालका ॥२॥
चरण कमल सरणाई आइआ ॥
साधसंगि है हरि जसु गाइआ ॥
जनम मरण सभि दूख निवारे जपि हरि हरि भउ नही काल का ॥३॥
समरथ अकथ अगोचर देवा ॥
जीअ जंत सभि ता की सेवा ॥
अंडज जेरज सेतज उतभुज बहु परकारी पालका ॥४॥
तिसहि परापति होइ निधाना ॥
राम नाम रसु अंतरि माना ॥
करु गहि लीने अंध कूप ते विरले केई सालका ॥५॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला ५॥ हे भाई ! परमात्मा सबसे ऊँचे (आत्मिक) ठिकाने पर टिका रहता है। वह खुद ही (सबको) पैदा करके आप ही नाश करता है। वह स्वयं ही रचना रचता है। हे भाई ! उस परमात्मा का आसरा लेने से आत्मिक आनंद प्राप्त हुआ रहता है। माया के मोह का डर तिल मात्र भी अपना जोर नहीं डाल सकता। 1। हे भाई ! जिस परमात्मा ने (जीवों को) माँ की पेट की आग में बचाए रखा। जिसने माँ का लहू के कृमियों के बीच (जीव को) मरने ना दिया उसने (तब) अपने (नाम का) सिमरन दे के रक्षा की। हे भाई ! वह प्रभू सारे जीवों का मालिक है। 2। हे भाई ! जो मनुष्य प्रभू के सोहणें चरणों की शरण में आ जाता है। जो मनुष्य साध-संगति में (रह के) परमात्मा की सिफतसालाह करता है। परमात्मा उसके सारी उम्र के दुख दूर कर देता है। परमात्मा का नाम जप-जप के उसको (आत्मिक) मौत का डर नहीं रह जाता। 3। हे भाई ! परमात्मा सब ताकतों का मालिक है। उसका स्वरूप सही तरह से बयान नहीं किया जा सकता। वह ज्ञान-इन्द्रियों की पहुँच से परे है। वह नूर ही नूर है। सारे जीव-जंतुओं को उसी का ही आसरा है। हे भाई ! अंडज-जेरज-सेतज-उत्भुज -इन चारों ही खाणियों के जीवों को वह कई तरीकों से पालने वाला है। 4। हे भाई ! उस-उस मनुष्य को ही (नाम का) खजाना मिलता है। वही मनुष्य परमात्मा के नाम का आनंद अपने अंदर उठाते हैं। जिनको (उनका) हाथ पकड़ कर (परमातमा माया के मोह के) अंधे कूएँ में से निकाल लेता है। पर। हे भाई ! ऐसे कोई विरले ही संत होते हैं। 5।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1084 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Holi के दूसरे दिन (puddva), सब रंग धुल चुके, और घर का calm।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 45 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1084” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1085 →, पीछे का: ← अंग 1083।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।