अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: उस प्रभू ने मुझे अपने साथ जान-पहचान की पूँजी अपना नाम-धन सौंप दिया है। और मुझे ये सौदा करने के लायक बना दिया है। प्रभू ने मुझे सतिगुरू के साथ भाईवाल बना दिया है। (अब) सारे सुख मेरे दास बन गए हैं। मेरा पिता-प्रभू कभी भी मुझसे विछुड़ता नहीं। सारी बातें करने के समर्थ है। 21।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक डखणे महला 5॥ हे नानक ! (माया के आसरे प्रीति डालने वालों की प्रीति का बँधन पक्का नहीं होता। सो) उनसे प्रीति तोड़ ले जिनकी प्रीति कच्ची है (उन्हें सदा निभने वाला साथी ना समझ)। गुरमुखों की संत-जनों की तलाश कर। उनकी प्रीति पक्की होती है (क्योंकि उनका) कोई स्वार्थ नहीं होता। स्वार्थी तो जीते-जी ही (दिल से) विछड़े रहते हैं। पर गुरमुख सत्संगी मरने पर भी साथ नहीं छोड़ते (प्रभू प्यार की दाति के लिए अरदास करते हैं)।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे नानक ! (सावन की ऋतु में जब) बादलों की घनघोर काली घटाएं गरजती हैं। (उनमें) बिजलिया चमकती हैं। और बादल मूसलाधार बरसते हैं (तब कैसा सुहावना समय होता है); पर ये काली घटाएं (सि्त्रयों को) पति के मिलाप में ही सुहावनी लगती हैं। 2।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे नानक ! (जेठ-आसाढ़ की तपती लू के बाद बरखा ऋतु में) नदियाँ और मैदान (बरसात के) पानी से भरे हुए हों। ठंडी हवाएं बहती हों। सोने का पलंग हो जिसमें हीरे और लाल जड़े हुए हों। शगनों के दुशाले पहने हुए हों। (पर अगर स्त्री का अपने) पति से विछोड़ा है तो (ये सारे सुहावने पदार्थ हृदय को सुख पहुँचाने की जगह) तपश पैदा करते हैं। 3।
पउड़ी ॥ कारणु करतै जो कीआ सोई है करणा ॥ जे सउ धावहि प्राणीआ पावहि धुरि लहणा ॥ बिनु करमा किछू न लभई जे फिरहि सभ धरणा ॥ गुर मिलि भउ गोविंद का भै डरु दूरि करणा ॥ भै ते बैरागु ऊपजै हरि खोजत फिरणा ॥ खोजत खोजत सहजु उपजिआ फिरि जनमि न मरणा ॥ हिआइ कमाइ धिआइआ पाइआ साध सरणा ॥ बोहिथु नानक देउ गुरु जिसु हरि चड़ाए तिसु भउजलु तरणा ॥22॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे प्राणी ! जो सबब करतार ने बनाया है वही बनना है। अगर आप सैंकड़े बार दौड़ता फिरे। जो धुर से (आपके किए कर्मों के अनुसार) लेना (लिखा) है वही प्राप्त करेगा। सारी धरती पर भी अगर भटकता फिरे। तो भी प्रभू की मेहर के बिना कुछ नहीं मिलेगा (इस वास्ते उसकी मेहर का पात्र बन)। जिस मनुष्य ने गुरू को मिल के परमात्मा का डर (हृदय में बसाया है)। प्रभू ने उसका दुनियावी डरों का सहम दूर कर दिया है। परमात्मा के डर से ही दुनिया की तरफ से वैराग पैदा होता है मनुष्य प्रभू की खोज में लग जाता है। परमात्मा की खोज करते-करते (मनुष्य के अंदर) आत्मिक अडोलता पैदा हो जाती है। और उसका जनम-मरण का चक्कर समाप्त हो जाता है। जिसको गुरू की शरण प्राप्त हो गई। उसने हृदय में नाम सिमरा। नाम की कमाई की। (हे प्राणी !) गुरू नानक देव (आत्मिक) जहाज है। हरी ने इस जहाज में जिसको बैठा दिया। उसने संसार-समुंद्र को पार कर लिया। 22।
सलोक मः 5 ॥ पहिला मरणु कबूलि जीवण की छडि आस ॥ होहु सभना की रेणुका तउ आउ हमारै पासि ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ पहले (अहंकार ममता का) त्याग परवान करे। और (स्वार्थ-भरी) जिंदगी की तमन्ना छोड़ दे। (परमात्मा की तरफ से संदेशा है- हे बँदे !) तब ही आप मेरे नजदीक आ सकता है। जब सबके चरणों की धूल हैं जाए। 1।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ असल में उसी व्यक्ति को जीवित समझो जिसने सांसारिक वासनाएं मिटा ली हैं। जो निरे दुनियां के रंग भोगते हैं वे आत्मिक मौत मर जाते हैं। वही मनुष्य शिरोमणि (कहे जाते हैं)। जिनका प्यार एक परमात्मा से है। 2।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ जिस मनुष्य के मन में (सदा) परमात्मा (का नाम) बसता है। कोई दुख-कलेश उसके नजदीक नहीं आता। माया की भूख-प्यास उस पर अपना दबाव नहीं डाल सकती। मौत का डर भी उसके नजदीक नहीं आता। 3।
पउड़ी ॥ कीमति कहणु न जाईऐ सचु साह अडोलै ॥ सिध साधिक गिआनी धिआनीआ कउणु तुधुनो तोलै ॥ भंनण घड़ण समरथु है ओपति सभ परलै ॥ करण कारण समरथु है घटि घटि सभ बोलै ॥ रिजकु समाहे सभसै किआ माणसु डोलै ॥ गहिर गभीरु अथाहु तू गुण गिआन अमोलै ॥ सोई कंमु कमावणा कीआ धुरि मउलै ॥ तुधहु बाहरि किछु नही नानकु गुण बोलै ॥23॥1॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे सदा-स्थिर और कभी ना डोलने वाले शाह ! आपका मूल्य नहीं आँका जा सकता। जोग-साधना में सिद्ध-हस्त योगी। साधना करने वाले (साधक)। ज्ञान-चर्चा करने वाले- इनमें से कौन है जो आपका मूल्य आँक सके। (हे भाई !) प्रभू (सृष्टि को) पैदा करने और नाश करने के समर्थ है। (सृष्टि की) उत्पक्ति भी वही करता है और नाश भी वही। जगत पैदा करने की ताकत रखता है हरेक जीव के अंदर वही बोलता है। हरेक जीव को रिज़क पहुँचाता है। मनुष्य व्यर्थ ही घबराता है। हे प्रभू ! आप गहरा है समझदार है। आपकी थाह नहीं लगाई जा सकती। आपके गुणों का मूल्य नहीं आँका जा सकता। आपके ज्ञान का मूल्य नहीं पड़ सकता। (हे भाई !) जीव वही काम करता है जो धुर से करतार ने उसके वास्ते मिथ दिया है (भाव। उसके किए कर्मों के अनुसार ही जिस तरह के संस्कार जीव के अंदर डाल दिए हैं)। हे प्रभू ! आपसे आकी हैं के (जगत में) कुछ नहीं घटित हैं रहा। नानक आपकी ही सिफत-सालाह करता है। 23। 1। 2।
रागु मारू बाणी कबीर जीउ की ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ पडीआ कवन कुमति तुम लागे ॥ बूडहुगे परवार सकल सिउ रामु न जपहु अभागे ॥1॥ रहाउ ॥ बेद पुरान पड़े का किआ गुनु खर चंदन जस भारा ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: रागु मारू बाणी कबीर जीउ की सतिगुर प्रसादि॥ हे पण्डित ! आप लोग किस कुमति में लगे हुए हैं। हे अभागे पांडे ! आप प्रभू का नाम नहीं सिमरते। सारे परिवार समेत ही (संसार-समुंद्र में) डूब जाएँगे। 1। रहाउ। (आप माण करता है कि तूने वेद आदिक धर्म-पुस्तकें पढ़ी हुई हैं। पर) वेद-पुराण पढ़ने का कोई लाभ नहीं (अगर नाम से सूना रहा। ये तो दिमाग़ पर भार ही लाद लिया)। जैसे किसी गधे पर चंदन लाद लिया।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उस प्रभू ने मुझे अपने साथ जान-पहचान की पूँजी अपना नाम-धन सौंप दिया है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।