अंग
1013
राग मारू
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਅੰਤਰਿ ਅਗਨਿ ਨ ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਬੂਝੈ ਬਾਹਰਿ ਪੂਅਰ ਤਾਪੈ ॥
ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਬਿਨੁ ਭਗਤਿ ਨ ਹੋਵੀ ਕਿਉ ਕਰਿ ਚੀਨਸਿ ਆਪੈ ॥
ਨਿੰਦਾ ਕਰਿ ਕਰਿ ਨਰਕ ਨਿਵਾਸੀ ਅੰਤਰਿ ਆਤਮ ਜਾਪੈ ॥
ਅਠਸਠਿ ਤੀਰਥ ਭਰਮਿ ਵਿਗੂਚਹਿ ਕਿਉ ਮਲੁ ਧੋਪੈ ਪਾਪੈ ॥੩॥
ਛਾਣੀ ਖਾਕੁ ਬਿਭੂਤ ਚੜਾਈ ਮਾਇਆ ਕਾ ਮਗੁ ਜੋਹੈ ॥
ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਏਕੁ ਨ ਜਾਣੈ ਸਾਚੁ ਕਹੇ ਤੇ ਛੋਹੈ ॥
ਪਾਠੁ ਪੜੈ ਮੁਖਿ ਝੂਠੋ ਬੋਲੈ ਨਿਗੁਰੇ ਕੀ ਮਤਿ ਓਹੈ ॥
ਨਾਮੁ ਨ ਜਪਈ ਕਿਉ ਸੁਖੁ ਪਾਵੈ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਕਿਉ ਸੋਹੈ ॥੪॥
ਮੂੰਡੁ ਮੁਡਾਇ ਜਟਾ ਸਿਖ ਬਾਧੀ ਮੋਨਿ ਰਹੈ ਅਭਿਮਾਨਾ ॥
ਮਨੂਆ ਡੋਲੈ ਦਹ ਦਿਸ ਧਾਵੈ ਬਿਨੁ ਰਤ ਆਤਮ ਗਿਆਨਾ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਛੋਡਿ ਮਹਾ ਬਿਖੁ ਪੀਵੈ ਮਾਇਆ ਕਾ ਦੇਵਾਨਾ ॥
ਕਿਰਤੁ ਨ ਮਿਟਈ ਹੁਕਮੁ ਨ ਬੂਝੈ ਪਸੂਆ ਮਾਹਿ ਸਮਾਨਾ ॥੫॥
ਹਾਥ ਕਮੰਡਲੁ ਕਾਪੜੀਆ ਮਨਿ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਉਪਜੀ ਭਾਰੀ ॥
ਇਸਤ੍ਰੀ ਤਜਿ ਕਰਿ ਕਾਮਿ ਵਿਆਪਿਆ ਚਿਤੁ ਲਾਇਆ ਪਰ ਨਾਰੀ ॥
ਸਿਖ ਕਰੇ ਕਰਿ ਸਬਦੁ ਨ ਚੀਨੈ ਲੰਪਟੁ ਹੈ ਬਾਜਾਰੀ ॥
ਅੰਤਰਿ ਬਿਖੁ ਬਾਹਰਿ ਨਿਭਰਾਤੀ ਤਾ ਜਮੁ ਕਰੇ ਖੁਆਰੀ ॥੬॥
ਸੋ ਸੰਨਿਆਸੀ ਜੋ ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵੈ ਵਿਚਹੁ ਆਪੁ ਗਵਾਏ ॥
ਛਾਦਨ ਭੋਜਨ ਕੀ ਆਸ ਨ ਕਰਈ ਅਚਿੰਤੁ ਮਿਲੈ ਸੋ ਪਾਏ ॥
ਬਕੈ ਨ ਬੋਲੈ ਖਿਮਾ ਧਨੁ ਸੰਗ੍ਰਹੈ ਤਾਮਸੁ ਨਾਮਿ ਜਲਾਏ ॥
ਧਨੁ ਗਿਰਹੀ ਸੰਨਿਆਸੀ ਜੋਗੀ ਜਿ ਹਰਿ ਚਰਣੀ ਚਿਤੁ ਲਾਏ ॥੭॥
ਆਸ ਨਿਰਾਸ ਰਹੈ ਸੰਨਿਆਸੀ ਏਕਸੁ ਸਿਉ ਲਿਵ ਲਾਏ ॥
ਹਰਿ ਰਸੁ ਪੀਵੈ ਤਾ ਸਾਤਿ ਆਵੈ ਨਿਜ ਘਰਿ ਤਾੜੀ ਲਾਏ ॥
ਮਨੂਆ ਨ ਡੋਲੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੂਝੈ ਧਾਵਤੁ ਵਰਜਿ ਰਹਾਏ ॥
ਗ੍ਰਿਹੁ ਸਰੀਰੁ ਗੁਰਮਤੀ ਖੋਜੇ ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਪਾਏ ॥੮॥
ਬ੍ਰਹਮਾ ਬਿਸਨੁ ਮਹੇਸੁ ਸਰੇਸਟ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਵੀਚਾਰੀ ॥
ਖਾਣੀ ਬਾਣੀ ਗਗਨ ਪਤਾਲੀ ਜੰਤਾ ਜੋਤਿ ਤੁਮਾਰੀ ॥
ਸਭਿ ਸੁਖ ਮੁਕਤਿ ਨਾਮ ਧੁਨਿ ਬਾਣੀ ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਉਰ ਧਾਰੀ ॥
ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਨਹੀ ਛੂਟਸਿ ਨਾਨਕ ਸਾਚੀ ਤਰੁ ਤੂ ਤਾਰੀ ॥੯॥੭॥
ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਬਿਨੁ ਭਗਤਿ ਨ ਹੋਵੀ ਕਿਉ ਕਰਿ ਚੀਨਸਿ ਆਪੈ ॥
ਨਿੰਦਾ ਕਰਿ ਕਰਿ ਨਰਕ ਨਿਵਾਸੀ ਅੰਤਰਿ ਆਤਮ ਜਾਪੈ ॥
ਅਠਸਠਿ ਤੀਰਥ ਭਰਮਿ ਵਿਗੂਚਹਿ ਕਿਉ ਮਲੁ ਧੋਪੈ ਪਾਪੈ ॥੩॥
ਛਾਣੀ ਖਾਕੁ ਬਿਭੂਤ ਚੜਾਈ ਮਾਇਆ ਕਾ ਮਗੁ ਜੋਹੈ ॥
ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਏਕੁ ਨ ਜਾਣੈ ਸਾਚੁ ਕਹੇ ਤੇ ਛੋਹੈ ॥
ਪਾਠੁ ਪੜੈ ਮੁਖਿ ਝੂਠੋ ਬੋਲੈ ਨਿਗੁਰੇ ਕੀ ਮਤਿ ਓਹੈ ॥
ਨਾਮੁ ਨ ਜਪਈ ਕਿਉ ਸੁਖੁ ਪਾਵੈ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਕਿਉ ਸੋਹੈ ॥੪॥
ਮੂੰਡੁ ਮੁਡਾਇ ਜਟਾ ਸਿਖ ਬਾਧੀ ਮੋਨਿ ਰਹੈ ਅਭਿਮਾਨਾ ॥
ਮਨੂਆ ਡੋਲੈ ਦਹ ਦਿਸ ਧਾਵੈ ਬਿਨੁ ਰਤ ਆਤਮ ਗਿਆਨਾ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਛੋਡਿ ਮਹਾ ਬਿਖੁ ਪੀਵੈ ਮਾਇਆ ਕਾ ਦੇਵਾਨਾ ॥
ਕਿਰਤੁ ਨ ਮਿਟਈ ਹੁਕਮੁ ਨ ਬੂਝੈ ਪਸੂਆ ਮਾਹਿ ਸਮਾਨਾ ॥੫॥
ਹਾਥ ਕਮੰਡਲੁ ਕਾਪੜੀਆ ਮਨਿ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਉਪਜੀ ਭਾਰੀ ॥
ਇਸਤ੍ਰੀ ਤਜਿ ਕਰਿ ਕਾਮਿ ਵਿਆਪਿਆ ਚਿਤੁ ਲਾਇਆ ਪਰ ਨਾਰੀ ॥
ਸਿਖ ਕਰੇ ਕਰਿ ਸਬਦੁ ਨ ਚੀਨੈ ਲੰਪਟੁ ਹੈ ਬਾਜਾਰੀ ॥
ਅੰਤਰਿ ਬਿਖੁ ਬਾਹਰਿ ਨਿਭਰਾਤੀ ਤਾ ਜਮੁ ਕਰੇ ਖੁਆਰੀ ॥੬॥
ਸੋ ਸੰਨਿਆਸੀ ਜੋ ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵੈ ਵਿਚਹੁ ਆਪੁ ਗਵਾਏ ॥
ਛਾਦਨ ਭੋਜਨ ਕੀ ਆਸ ਨ ਕਰਈ ਅਚਿੰਤੁ ਮਿਲੈ ਸੋ ਪਾਏ ॥
ਬਕੈ ਨ ਬੋਲੈ ਖਿਮਾ ਧਨੁ ਸੰਗ੍ਰਹੈ ਤਾਮਸੁ ਨਾਮਿ ਜਲਾਏ ॥
ਧਨੁ ਗਿਰਹੀ ਸੰਨਿਆਸੀ ਜੋਗੀ ਜਿ ਹਰਿ ਚਰਣੀ ਚਿਤੁ ਲਾਏ ॥੭॥
ਆਸ ਨਿਰਾਸ ਰਹੈ ਸੰਨਿਆਸੀ ਏਕਸੁ ਸਿਉ ਲਿਵ ਲਾਏ ॥
ਹਰਿ ਰਸੁ ਪੀਵੈ ਤਾ ਸਾਤਿ ਆਵੈ ਨਿਜ ਘਰਿ ਤਾੜੀ ਲਾਏ ॥
ਮਨੂਆ ਨ ਡੋਲੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੂਝੈ ਧਾਵਤੁ ਵਰਜਿ ਰਹਾਏ ॥
ਗ੍ਰਿਹੁ ਸਰੀਰੁ ਗੁਰਮਤੀ ਖੋਜੇ ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਪਾਏ ॥੮॥
ਬ੍ਰਹਮਾ ਬਿਸਨੁ ਮਹੇਸੁ ਸਰੇਸਟ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਵੀਚਾਰੀ ॥
ਖਾਣੀ ਬਾਣੀ ਗਗਨ ਪਤਾਲੀ ਜੰਤਾ ਜੋਤਿ ਤੁਮਾਰੀ ॥
ਸਭਿ ਸੁਖ ਮੁਕਤਿ ਨਾਮ ਧੁਨਿ ਬਾਣੀ ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਉਰ ਧਾਰੀ ॥
ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਨਹੀ ਛੂਟਸਿ ਨਾਨਕ ਸਾਚੀ ਤਰੁ ਤੂ ਤਾਰੀ ॥੯॥੭॥
अंतरि अगनि न गुर बिनु बूझै बाहरि पूअर तापै ॥
गुर सेवा बिनु भगति न होवी किउ करि चीनसि आपै ॥
निंदा करि करि नरक निवासी अंतरि आतम जापै ॥
अठसठि तीरथ भरमि विगूचहि किउ मलु धोपै पापै ॥३॥
छाणी खाकु बिभूत चड़ाई माइआ का मगु जोहै ॥
अंतरि बाहरि एकु न जाणै साचु कहे ते छोहै ॥
पाठु पड़ै मुखि झूठो बोलै निगुरे की मति ओहै ॥
नामु न जपई किउ सुखु पावै बिनु नावै किउ सोहै ॥४॥
मूंडु मुडाइ जटा सिख बाधी मोनि रहै अभिमाना ॥
मनूआ डोलै दह दिस धावै बिनु रत आतम गिआना ॥
अंम्रितु छोडि महा बिखु पीवै माइआ का देवाना ॥
किरतु न मिटई हुकमु न बूझै पसूआ माहि समाना ॥५॥
हाथ कमंडलु कापड़ीआ मनि त्रिसना उपजी भारी ॥
इसत्री तजि करि कामि विआपिआ चितु लाइआ पर नारी ॥
सिख करे करि सबदु न चीनै लंपटु है बाजारी ॥
अंतरि बिखु बाहरि निभराती ता जमु करे खुआरी ॥६॥
सो संनिआसी जो सतिगुर सेवै विचहु आपु गवाए ॥
छादन भोजन की आस न करई अचिंतु मिलै सो पाए ॥
बकै न बोलै खिमा धनु संग्रहै तामसु नामि जलाए ॥
धनु गिरही संनिआसी जोगी जि हरि चरणी चितु लाए ॥७॥
आस निरास रहै संनिआसी एकसु सिउ लिव लाए ॥
हरि रसु पीवै ता साति आवै निज घरि ताड़ी लाए ॥
मनूआ न डोलै गुरमुखि बूझै धावतु वरजि रहाए ॥
ग्रिहु सरीरु गुरमती खोजे नामु पदारथु पाए ॥८॥
ब्रहमा बिसनु महेसु सरेसट नामि रते वीचारी ॥
खाणी बाणी गगन पताली जंता जोति तुमारी ॥
सभि सुख मुकति नाम धुनि बाणी सचु नामु उर धारी ॥
नाम बिना नही छूटसि नानक साची तरु तू तारी ॥९॥७॥
गुर सेवा बिनु भगति न होवी किउ करि चीनसि आपै ॥
निंदा करि करि नरक निवासी अंतरि आतम जापै ॥
अठसठि तीरथ भरमि विगूचहि किउ मलु धोपै पापै ॥३॥
छाणी खाकु बिभूत चड़ाई माइआ का मगु जोहै ॥
अंतरि बाहरि एकु न जाणै साचु कहे ते छोहै ॥
पाठु पड़ै मुखि झूठो बोलै निगुरे की मति ओहै ॥
नामु न जपई किउ सुखु पावै बिनु नावै किउ सोहै ॥४॥
मूंडु मुडाइ जटा सिख बाधी मोनि रहै अभिमाना ॥
मनूआ डोलै दह दिस धावै बिनु रत आतम गिआना ॥
अंम्रितु छोडि महा बिखु पीवै माइआ का देवाना ॥
किरतु न मिटई हुकमु न बूझै पसूआ माहि समाना ॥५॥
हाथ कमंडलु कापड़ीआ मनि त्रिसना उपजी भारी ॥
इसत्री तजि करि कामि विआपिआ चितु लाइआ पर नारी ॥
सिख करे करि सबदु न चीनै लंपटु है बाजारी ॥
अंतरि बिखु बाहरि निभराती ता जमु करे खुआरी ॥६॥
सो संनिआसी जो सतिगुर सेवै विचहु आपु गवाए ॥
छादन भोजन की आस न करई अचिंतु मिलै सो पाए ॥
बकै न बोलै खिमा धनु संग्रहै तामसु नामि जलाए ॥
धनु गिरही संनिआसी जोगी जि हरि चरणी चितु लाए ॥७॥
आस निरास रहै संनिआसी एकसु सिउ लिव लाए ॥
हरि रसु पीवै ता साति आवै निज घरि ताड़ी लाए ॥
मनूआ न डोलै गुरमुखि बूझै धावतु वरजि रहाए ॥
ग्रिहु सरीरु गुरमती खोजे नामु पदारथु पाए ॥८॥
ब्रहमा बिसनु महेसु सरेसट नामि रते वीचारी ॥
खाणी बाणी गगन पताली जंता जोति तुमारी ॥
सभि सुख मुकति नाम धुनि बाणी सचु नामु उर धारी ॥
नाम बिना नही छूटसि नानक साची तरु तू तारी ॥९॥७॥
हिन्दी अर्थ: (अपनी ओर से त्यागी बने हुए मनमुख के) मन में तृष्णा की (जलती) आग गुरू के बिना बुझती नहीं। पर बाहर धूणियाँ तपाता है। गुरू की बताई हुई सेवा किए बिना परमात्मा की भक्ति हो नहीं सकती (यह मनमुख) अपने आत्मिक जीवन को कैसे पहचाने। वैसे अंतरात्मे इसको समझ आ जाती है कि (किरती गृहस्तियों की) निंदा कर करके नरकी जीवन व्यतीत कर रहा है। अढ़सठ तीर्थों पर भटक के भी (मनमुख त्यागी) दुखी होते हैं। (तीर्थों पर जाने से) पापों की मैल कैसे धुल सकती है। 3। (लोक दिखावे के लिए) राख छानता है और वह राख अपने शरीर पर मल लेता है। पर (अंतरात्मे) माया का रास्ता ताकता रहता है (कि कोई गृहस्ती दानी आ के माया भेट करे)। (बाहर से और व अंदर से और होने के कारण) अपने अंदर और बाहर जगत में एक परमात्मा को (व्यापक) नहीं समझ सकता। (अगर) ये सच्चा वाक्य उसको कहें तो वह खीझता है। (धर्म-पुस्तकों का) पाठ पढ़ता (तो) है पर मुँह से झूठ ही बोलता है। गुरू हीन होने के कारण उसकी मति उस पहले जैसी ही रहती है (भाव। बाहरी तौर पर त्याग करने से उसके आत्मिक जीवन में कोई बदलाव नहीं पड़ता)। जब तक परमात्मा का नाम नहीं जपता तब तक आत्मिक आनंद नहीं मिलता। प्रभू-नाम के बिना जीवन सुचज्जा (सदाचारी) नहीं बन सकता। 4। कोई सिर मुनवा लेता है। कोई जटाओं का जूड़ा बना लेता है। और मौन धार के बैठ जाता है (इन सारे भेषों का) घमण्ड (भी करता है)। पर आत्मिक तौर पर प्रभू के साथ गहरी सांझ के रंग में रंगे जाने के बिना उसका मन डोलता रहता है। और (माया की तृष्णा में ही) दसों-दिशाओं में दौड़ता-फिरता है। (अंतरात्मे) माया का प्रेमी (होने के कारण) परमात्मा का नाम-अमृत छोड़ देता है और (तृष्णा का वह) जहर पीता रहता है (जो इसके आत्मिक जीवन को मार डालता है)। (पर। इस मनमुख के भी क्या वश। ) पिछले किए कर्मों के संस्कारों का समूह (अंदर से) समाप्त नहीं होता। (उन संस्कारों के असर तले जीव) परमात्मा की रजा को नहीं समझ सकता। (इस तरह। त्यागी बन के भी) पशु-स्वभाव में टिका रहता है। 5। (मनमुख मनुष्य त्यागी बन के) हाथ में कमण्डल पकड़ लेता है। कपड़े की लीरों का चोला पहन लेता है। पर मन में माया की भारी तृष्णा पैदा हुई रहती है (अपनी ओर से त्यागी बन के) अपनी स्त्री छोड़ के आए को काम-वासना ने आ दबाया। तो पराई नारि के साथ चिक्त जोड़ता है। चेले बनाता है। गुरू के शबद को नहीं पहचानता। काम-वासना में ग्रसा हुआ है। और (इस तरह सन्यासी बनने की जगह लोगों की नजरों में) मसखरा बना हुआ है। (मनमुख के) अंदर (आत्मिक मौत लाने वाली तृष्णा का) जहर है। बाहर (लोगों को दिखाने के लिए) शांति धारण की हुई है। (ऐसे पाखण्डी को) आत्मिक मौत दुखी करती है। 6। असल सन्यासी वह है जो गुरू की बताई हुई सेवा करता है और अपने अंदर से सवै-भाव दूर करता है। (लोगों से) कपड़े और भोजन की आस बनाए नहीं रखता। सहज सुभाय जो मिल जाता है वह ले लेता है। बहुत कम व ज्यादा बोल नहीं बोलता रहता। दूसरों की ज्यादती को सहने के स्वभाव रूप धन अपने अंदर संचित करता है। प्रभू के नाम की बरकति से अंदर से क्रोध को जला देता है। जो मनुष्य सदा परमात्मा के चरणों में चिक्त जोड़े रखता है। वह भाग्यशाली है। (फिर) चाहे वह गृहस्ती है चाहे सन्यासी है चाहे जोगी है। 7। असल सन्यासी वह है जो मायावी आशाओं की तरफ से निराश रहता है और एक परमात्मा के चरणों में सुरति जोड़े रखता है। जब मनुष्य परमात्मा का नाम-रस पीता है और अंतरात्मे प्रभू-चरणों में जुड़ता है तब इसके अंदर शांति पैदा होती है। जब मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर (सही जीवन राह) समझता है उसका मन माया की तृष्णा में डोलता नहीं। माया के पीछे दौड़ते मन को वह रोक के रखता है; गुरू की शिक्षा ले के (जंगलों में तलाशने की बजाय) शरीर-घर में खोजता है और परमात्मा का नाम-पूँजी को प्राप्त कर लेता है। 8। ब्रहमा हो। विष्णू हो। शिव हो। वही सबसे श्रेष्ठ हैं जो प्रभू के नाम में रंगे गए और (इस तरह) सुंदर विचारों के मालिक बन गए। हे प्रभू ! (भले ही) चारों खाणियों के जीवों में और उनकी बोलियों में। पाताल-आकाश में सब जीवों के अंदर तेरी ही ज्योति है। पर जिन्होंने तेरे सदा-स्थिर नाम को अपने हृदय में टिकाया है जिनके अंदर तेरे नाम की रौंअ जारी है जिनकी सुरति तेरी सिफत-सालाह की बाणी में है उन्हें ही सारे सुख हैं उनको ही माया के बँधनों से मुक्ति मिलती है। हे नानक ! परमात्मा के नाम के बिना कोई भी जीव माया के मोह से नहीं बच सकता। तू भी यही तैराकी तैर जिससे कभी डूबने का खतरा ना रहेगा। 9। 7।
ਮਾਰੂ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਮਾਤ ਪਿਤਾ ਸੰਜੋਗਿ ਉਪਾਏ ਰਕਤੁ ਬਿੰਦੁ ਮਿਲਿ ਪਿੰਡੁ ਕਰੇ ॥
ਅੰਤਰਿ ਗਰਭ ਉਰਧਿ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਸਾਰੇ ਦਾਤਿ ਕਰੇ ॥੧॥
ਸੰਸਾਰੁ ਭਵਜਲੁ ਕਿਉ ਤਰੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਨਿਰੰਜਨੁ ਪਾਈਐ ਅਫਰਿਓ ਭਾਰੁ ਅਫਾਰੁ ਟਰੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੇ ਗੁਣ ਵਿਸਰਿ ਗਏ ਅਪਰਾਧੀ ਮੈ ਬਉਰਾ ਕਿਆ ਕਰਉ ਹਰੇ ॥
ਤੂ ਦਾਤਾ ਦਇਆਲੁ ਸਭੈ ਸਿਰਿ ਅਹਿਨਿਸਿ ਦਾਤਿ ਸਮਾਰਿ ਕਰੇ ॥੨॥
ਚਾਰਿ ਪਦਾਰਥ ਲੈ ਜਗਿ ਜਨਮਿਆ ਸਿਵ ਸਕਤੀ ਘਰਿ ਵਾਸੁ ਧਰੇ ॥
ਮਾਤ ਪਿਤਾ ਸੰਜੋਗਿ ਉਪਾਏ ਰਕਤੁ ਬਿੰਦੁ ਮਿਲਿ ਪਿੰਡੁ ਕਰੇ ॥
ਅੰਤਰਿ ਗਰਭ ਉਰਧਿ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਸਾਰੇ ਦਾਤਿ ਕਰੇ ॥੧॥
ਸੰਸਾਰੁ ਭਵਜਲੁ ਕਿਉ ਤਰੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਨਿਰੰਜਨੁ ਪਾਈਐ ਅਫਰਿਓ ਭਾਰੁ ਅਫਾਰੁ ਟਰੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੇ ਗੁਣ ਵਿਸਰਿ ਗਏ ਅਪਰਾਧੀ ਮੈ ਬਉਰਾ ਕਿਆ ਕਰਉ ਹਰੇ ॥
ਤੂ ਦਾਤਾ ਦਇਆਲੁ ਸਭੈ ਸਿਰਿ ਅਹਿਨਿਸਿ ਦਾਤਿ ਸਮਾਰਿ ਕਰੇ ॥੨॥
ਚਾਰਿ ਪਦਾਰਥ ਲੈ ਜਗਿ ਜਨਮਿਆ ਸਿਵ ਸਕਤੀ ਘਰਿ ਵਾਸੁ ਧਰੇ ॥
मारू महला १ ॥
मात पिता संजोगि उपाए रकतु बिंदु मिलि पिंडु करे ॥
अंतरि गरभ उरधि लिव लागी सो प्रभु सारे दाति करे ॥१॥
संसारु भवजलु किउ तरै ॥
गुरमुखि नामु निरंजनु पाईऐ अफरिओ भारु अफारु टरै ॥१॥ रहाउ ॥
ते गुण विसरि गए अपराधी मै बउरा किआ करउ हरे ॥
तू दाता दइआलु सभै सिरि अहिनिसि दाति समारि करे ॥२॥
चारि पदारथ लै जगि जनमिआ सिव सकती घरि वासु धरे ॥
मात पिता संजोगि उपाए रकतु बिंदु मिलि पिंडु करे ॥
अंतरि गरभ उरधि लिव लागी सो प्रभु सारे दाति करे ॥१॥
संसारु भवजलु किउ तरै ॥
गुरमुखि नामु निरंजनु पाईऐ अफरिओ भारु अफारु टरै ॥१॥ रहाउ ॥
ते गुण विसरि गए अपराधी मै बउरा किआ करउ हरे ॥
तू दाता दइआलु सभै सिरि अहिनिसि दाति समारि करे ॥२॥
चारि पदारथ लै जगि जनमिआ सिव सकती घरि वासु धरे ॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला १॥ माता और पिता के (शारीरिक) संयोग के द्वारा परमात्मा जीव पैदा करता है। माँ का लहू और पिता का वीर्य मिलने पर परमात्मा (जीव का) शरीर बनाता है। माँ के पेट में उल्टे पड़े हुए की लगन प्रभू-चरणों में लगी रहती है। वह परमात्मा इसकी हर तरह संभाल करता है (और आवश्यक्ता अनुसार पदार्थ) देता है। 1। (परमात्मा के नाम के बिना) संसारी जीव संसार-समुंद्र से किसी भी हालत में पार नहीं लांघ सकता क्योंकि जीव माया आदि के अहंकार के कारण आफरा रहता है। परमात्मा का नाम। जिस पर माया की कालिख का प्रभाव नहीं पड़ सकता। गुरू की शरण पड़ने पर मिलता है। (जिस मनुष्य को नाम प्राप्त होता है) उसका (अहंकार आदि का) असहि भार दूर हो जाता है (यह अहंकार आदि ही भार बन के जीव को संसार समुंद्र में डुबा देता है)। 1। रहाउ। हे हरी ! मुझ गुनाहगार को तेरे वह उपकार भूल गए हैं। मैं (माया के मोह में) झल्ला हुआ पड़ा हूँ (तेरा सिमरन करने से) बेबस हूँ। पर तू दया का श्रोत है। हरेक जीव के सिर पर (रखवाला) है। और सबको दातें देता है। (हे भाई !) दयालु प्रभू दिन-रात (जीवों की) संभाल करता है और दातें देता है। 2। (जीव परमात्मा से) चारों ही पदार्थ ले के जगत में पैदा हुआ है (फिर भी प्रभू की बख्शिश भुला के सदा) परमात्मा की पैदा की हुई माया के घर में निवास रखता है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1013 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
Hauz Khas Village के lake के पास बैठ कर पानी देखना।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 36 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1013” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1014 →, पीछे का: ← अंग 1012।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।