अंग 1089

अंग
1089
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਆਪੇ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਸਭ ਸਾਜੀਅਨੁ ਆਪੇ ਵਰਤੀਜੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਦਾ ਸਲਾਹੀਐ ਸਚੁ ਕੀਮਤਿ ਕੀਜੈ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਕਮਲੁ ਬਿਗਾਸਿਆ ਇਵ ਹਰਿ ਰਸੁ ਪੀਜੈ ॥
ਆਵਣ ਜਾਣਾ ਠਾਕਿਆ ਸੁਖਿ ਸਹਜਿ ਸਵੀਜੈ ॥੭॥
आपे स्रिसटि सभ साजीअनु आपे वरतीजै ॥
गुरमुखि सदा सलाहीऐ सचु कीमति कीजै ॥
गुर सबदी कमलु बिगासिआ इव हरि रसु पीजै ॥
आवण जाणा ठाकिआ सुखि सहजि सवीजै ॥७॥

हिन्दी अर्थ: (प्रभू के ‘नाम’ के बराबर के मूल्य की कोई चीज हो भी कैसे। क्योंकि) उसने स्वयं ही सारी सृष्टि बनाई है और स्वयं ही इसमें हर जगह मौजूद है। (हाँ। ) गुरू के सन्मुख हो के सदा सिफत-सालाह करें (बस। यह) सिमरन ही (‘नाम’ की प्राप्ति के लिए) मूल्य किया जा सकता है। (क्योंकि) गुरू के शबद से हृदय-कमल खिलता है और इस तरह नाम-रस पीया जाता है। (जगत में) आने-जाने का चक्कर समाप्त हो जाता है और सुख में अडोल अवस्था में लीन हो जाया जाता है। 7।
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੧ ॥
ਨਾ ਮੈਲਾ ਨਾ ਧੁੰਧਲਾ ਨਾ ਭਗਵਾ ਨਾ ਕਚੁ ॥
ਨਾਨਕ ਲਾਲੋ ਲਾਲੁ ਹੈ ਸਚੈ ਰਤਾ ਸਚੁ ॥੧॥
सलोकु मः १ ॥
ना मैला ना धुंधला ना भगवा ना कचु ॥
नानक लालो लालु है सचै रता सचु ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला १॥ हे नानक ! (कह- हे भाई !जो मनुष्य) सदा कायम रहने वाले परमात्मा (के नाम) में रंगा रहता है वह सदा स्थिर प्रभू (का ही रूप) हो जाता है। (उसका मन परमात्मा के प्रेम-रंग से) गाढ़ा रंगा जाता है। (हे भाई ! उसका मन) विकारों से नहीं लिबड़ता। उसकी निगाह धुंधली नहीं होती (भाव। उसको हर जगह परमात्मा साफ दिखाई देता है) उसको किसी भेष आदि की तमन्ना नहीं होती। नाशवंत जगत का मोह भी उसको नहीं व्यापता। 1।
ਮਃ ੩ ॥
ਸਹਜਿ ਵਣਸਪਤਿ ਫੁਲੁ ਫਲੁ ਭਵਰੁ ਵਸੈ ਭੈ ਖੰਡਿ ॥
ਨਾਨਕ ਤਰਵਰੁ ਏਕੁ ਹੈ ਏਕੋ ਫੁਲੁ ਭਿਰੰਗੁ ॥੨॥
मः ३ ॥
सहजि वणसपति फुलु फलु भवरु वसै भै खंडि ॥
नानक तरवरु एकु है एको फुलु भिरंगु ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ३॥ वह जीव-भौरा (दुनिया के) सारे डर नाश करके (सदा) आत्मिक अडोलता में टिका रहता है। बनस्पति का हरेक फूल हरेक फल (जगत का हरेक मन-मोहना पदार्थ उसको माया की भटकना में डालने की जगह) आत्मिक अडोलता में टिकाता है। हे नानक ! (कह- हे भाई ! जैसे पंछियों के रैन-बसेरे के लिए वृक्ष आसरा है। वैसे ही जो जीव-) भौरा सिर्फ परमात्मा को ही आसरा-सहारा समझता है (जो भौरों की तरह हरेक फूल की सुगंधि नहीं लेता फिरता। बल्कि परमात्मा के ही सिफतसालाह-रूप) फूल (की सुगंधि ही) लेता है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਜੋ ਜਨ ਲੂਝਹਿ ਮਨੈ ਸਿਉ ਸੇ ਸੂਰੇ ਪਰਧਾਨਾ ॥
ਹਰਿ ਸੇਤੀ ਸਦਾ ਮਿਲਿ ਰਹੇ ਜਿਨੀ ਆਪੁ ਪਛਾਨਾ ॥
ਗਿਆਨੀਆ ਕਾ ਇਹੁ ਮਹਤੁ ਹੈ ਮਨ ਮਾਹਿ ਸਮਾਨਾ ॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਕਾ ਮਹਲੁ ਪਾਇਆ ਸਚੁ ਲਾਇ ਧਿਆਨਾ ॥
ਜਿਨ ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਮਨੁ ਜੀਤਿਆ ਜਗੁ ਤਿਨਹਿ ਜਿਤਾਨਾ ॥੮॥
पउड़ी ॥
जो जन लूझहि मनै सिउ से सूरे परधाना ॥
हरि सेती सदा मिलि रहे जिनी आपु पछाना ॥
गिआनीआ का इहु महतु है मन माहि समाना ॥
हरि जीउ का महलु पाइआ सचु लाइ धिआना ॥
जिन गुर परसादी मनु जीतिआ जगु तिनहि जिताना ॥८॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जो मनुष्य (अपने) मन के साथ लड़ते हैं वे सूरमे इन्सान बनते हैं वे जाने-माने जाते हैं; जिन्होंने अपने आप को पहचाना है वे सदा ईश्वर के साथ मिले रहते हैं। ज्ञानवान लोगों की सिफत ही यही है (भाव। इसी बात में महानता है) कि वे मन में टिके रहते हैं (भाव। माया के पीछे भटकने की जगह अंदर की ओर केन्द्रित रहते हैं); (इस तरह) सुरति जोड़ के उन्हें ईश्वर का घर मिल जाता है। (सो) जिन्होंने गुरू की मेहर से अपने मन को जीता है उन्होंनें जगत जीत लिया है। 8।
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੩ ॥
ਜੋਗੀ ਹੋਵਾ ਜਗਿ ਭਵਾ ਘਰਿ ਘਰਿ ਭੀਖਿਆ ਲੇਉ ॥
ਦਰਗਹ ਲੇਖਾ ਮੰਗੀਐ ਕਿਸੁ ਕਿਸੁ ਉਤਰੁ ਦੇਉ ॥
ਭਿਖਿਆ ਨਾਮੁ ਸੰਤੋਖੁ ਮੜੀ ਸਦਾ ਸਚੁ ਹੈ ਨਾਲਿ ॥
ਭੇਖੀ ਹਾਥ ਨ ਲਧੀਆ ਸਭ ਬਧੀ ਜਮਕਾਲਿ ॥
ਨਾਨਕ ਗਲਾ ਝੂਠੀਆ ਸਚਾ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿ ॥੧॥
सलोकु मः ३ ॥
जोगी होवा जगि भवा घरि घरि भीखिआ लेउ ॥
दरगह लेखा मंगीऐ किसु किसु उतरु देउ ॥
भिखिआ नामु संतोखु मड़ी सदा सचु है नालि ॥
भेखी हाथ न लधीआ सभ बधी जमकालि ॥
नानक गला झूठीआ सचा नामु समालि ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ३॥ अगर मैं जोगी बन जाऊँ। जगत में भटकता फिरूँ और घर-घर से (सिर्फ) भिक्षा ही लेता फिरूँ (और अपनी करतूतों की तरफ देखूँ भी ना। तो) प्रभू की हजूरी में (तो अमलों का) लेखा माँगा जाता है मैं (अपनी) किस-किस करतूत का जवाब दूँगा। (जिस मनुष्य ने) प्रभू के नाम को भिक्षा बनाया है संतोख को कुटिया बनाया है ईश्वर सदा उसके साथ बसता है। भेष (बनाने) से कभी किसी को अस्लियत नहीं मिली। सारी सृष्टि जमकाल ने बाँध रखी है। हे नानक ! प्रभू का नाम ही याद कर। इसके अलावा और बातें झूठी हैं। 1।
ਮਃ ੩ ॥
ਜਿਤੁ ਦਰਿ ਲੇਖਾ ਮੰਗੀਐ ਸੋ ਦਰੁ ਸੇਵਿਹੁ ਨ ਕੋਇ ॥
ਐਸਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਲੋੜਿ ਲਹੁ ਜਿਸੁ ਜੇਵਡੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥
ਤਿਸੁ ਸਰਣਾਈ ਛੂਟੀਐ ਲੇਖਾ ਮੰਗੈ ਨ ਕੋਇ ॥
ਸਚੁ ਦ੍ਰਿੜਾਏ ਸਚੁ ਦ੍ਰਿੜੁ ਸਚਾ ਓਹੁ ਸਬਦੁ ਦੇਇ ॥
ਹਿਰਦੈ ਜਿਸ ਦੈ ਸਚੁ ਹੈ ਤਨੁ ਮਨੁ ਭੀ ਸਚਾ ਹੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਚੈ ਹੁਕਮਿ ਮੰਨਿਐ ਸਚੀ ਵਡਿਆਈ ਦੇਇ ॥
ਸਚੇ ਮਾਹਿ ਸਮਾਵਸੀ ਜਿਸ ਨੋ ਨਦਰਿ ਕਰੇਇ ॥੨॥
मः ३ ॥
जितु दरि लेखा मंगीऐ सो दरु सेविहु न कोइ ॥
ऐसा सतिगुरु लोड़ि लहु जिसु जेवडु अवरु न कोइ ॥
तिसु सरणाई छूटीऐ लेखा मंगै न कोइ ॥
सचु द्रिड़ाए सचु द्रिड़ु सचा ओहु सबदु देइ ॥
हिरदै जिस दै सचु है तनु मनु भी सचा होइ ॥
नानक सचै हुकमि मंनिऐ सची वडिआई देइ ॥
सचे माहि समावसी जिस नो नदरि करेइ ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ३॥ (हे भाई !) जिस दरवाजे पर (बैठने से। किए हुए कर्मों का) लेखा (फिर भी) माँगा जाना है उस दर पे कोई ना बैठना। ऐसा गुरू ढूँढो जिस जैसा और कोई ना मिल सके। उस गुरू की शरण पड़ने से (कर्मों के चक्करों से) मुक्त हुआ जाता है (फिर किसी कर्मों का) लेखा कोई नहीं माँगता (क्योंकि) वह गुरू स्वयं प्रभू का नाम पल्ले बाँधता है (शरण आए हुओं के) पल्ले बँधाता है और प्रभू की सिफत-सालाह की बाणी देता है। जिस मनुष्य के हृदय में ईश्वर आ बसता है उसका शरीर भी उसका मन भी रॅब के प्यार में रंगा जाता है। हे नानक ! अगर प्रभू की रजा मान लें तो वह सच्ची वडिआई बख्शता है; पर। वही मनुष्य अपना आप प्रभू में लीन करता है जिस परवह खुद मिहर की निगाह करता है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਸੂਰੇ ਏਹਿ ਨ ਆਖੀਅਹਿ ਅਹੰਕਾਰਿ ਮਰਹਿ ਦੁਖੁ ਪਾਵਹਿ ॥
ਅੰਧੇ ਆਪੁ ਨ ਪਛਾਣਨੀ ਦੂਜੈ ਪਚਿ ਜਾਵਹਿ ॥
ਅਤਿ ਕਰੋਧ ਸਿਉ ਲੂਝਦੇ ਅਗੈ ਪਿਛੈ ਦੁਖੁ ਪਾਵਹਿ ॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਅਹੰਕਾਰੁ ਨ ਭਾਵਈ ਵੇਦ ਕੂਕਿ ਸੁਣਾਵਹਿ ॥
ਅਹੰਕਾਰਿ ਮੁਏ ਸੇ ਵਿਗਤੀ ਗਏ ਮਰਿ ਜਨਮਹਿ ਫਿਰਿ ਆਵਹਿ ॥੯॥
पउड़ी ॥
सूरे एहि न आखीअहि अहंकारि मरहि दुखु पावहि ॥
अंधे आपु न पछाणनी दूजै पचि जावहि ॥
अति करोध सिउ लूझदे अगै पिछै दुखु पावहि ॥
हरि जीउ अहंकारु न भावई वेद कूकि सुणावहि ॥
अहंकारि मुए से विगती गए मरि जनमहि फिरि आवहि ॥९॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जो मनुष्य अहंकार में मरते हैं (खपते हैं) और दुख पाते हैं उन्हें शूरवीर नहीं कहा जाता। वह (अहंकारी) अंधे अपना असल नहीं पहचानते और माया के मोह में दुखी होते हैं। बड़े क्रोध में आ के (दुनिया से) लड़ते हैं और इस लोक में व परलोक में दुख ही पाते हैं। वेद आदि धर्म-पुस्तकें पुकार-पुकार कर कह रही हैं कि ईश्वर को अहंकार अच्छा नहीं लगता। जो मनुष्य अहंकार में मरते रहे वे बे-गति ही चले गए (उनका जीवन ना सुधरा)। वे बार-बार पैदा होते मरते रहते हैं। 9।
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੩ ॥
ਕਾਗਉ ਹੋਇ ਨ ਊਜਲਾ ਲੋਹੇ ਨਾਵ ਨ ਪਾਰੁ ॥
ਪਿਰਮ ਪਦਾਰਥੁ ਮੰਨਿ ਲੈ ਧੰਨੁ ਸਵਾਰਣਹਾਰੁ ॥
ਹੁਕਮੁ ਪਛਾਣੈ ਊਜਲਾ ਸਿਰਿ ਕਾਸਟ ਲੋਹਾ ਪਾਰਿ ॥
ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਛੋਡੈ ਭੈ ਵਸੈ ਨਾਨਕ ਕਰਣੀ ਸਾਰੁ ॥੧॥
सलोकु मः ३ ॥
कागउ होइ न ऊजला लोहे नाव न पारु ॥
पिरम पदारथु मंनि लै धंनु सवारणहारु ॥
हुकमु पछाणै ऊजला सिरि कासट लोहा पारि ॥
त्रिसना छोडै भै वसै नानक करणी सारु ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ३॥ कौआ (हंस) के समान सफेद नहीं बन सकता। लोहे की नाव से (नदी) पार नहीं की जा सकती; पर शाबाश है उस सँवारने वाले (गुरू) का (जिसकी मति ले के कौए जैसे काले मन वाला भी) परमात्मा का नाम अंगीकार करता है। हुकम पहचानता है और इस तरह (कौए से) हंस बन जाता है (जैसे) लकड़ी के आसरे लोहा (नदी के) उस पार जा लगता है; (गुरू के आसरे) हे नानक ! वह तृष्णा त्यागता है और रॅब के भय में जीता है। (बस !) यही करणी सबसे अच्छी है। 1।
ਮਃ ੩ ॥
ਮਾਰੂ ਮਾਰਣ ਜੋ ਗਏ ਮਾਰਿ ਨ ਸਕਹਿ ਗਵਾਰ ॥
ਨਾਨਕ ਜੇ ਇਹੁ ਮਾਰੀਐ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਵੀਚਾਰਿ ॥
ਏਹੁ ਮਨੁ ਮਾਰਿਆ ਨਾ ਮਰੈ ਜੇ ਲੋਚੈ ਸਭੁ ਕੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਮਨ ਹੀ ਕਉ ਮਨੁ ਮਾਰਸੀ ਜੇ ਸਤਿਗੁਰੁ ਭੇਟੈ ਸੋਇ ॥੨॥
मः ३ ॥
मारू मारण जो गए मारि न सकहि गवार ॥
नानक जे इहु मारीऐ गुर सबदी वीचारि ॥
एहु मनु मारिआ ना मरै जे लोचै सभु कोइ ॥
नानक मन ही कउ मनु मारसी जे सतिगुरु भेटै सोइ ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ३॥ जो मनुष्य बाहर जंगलों में मन को मारने के लिए गए वे मार न सके; हे नानक ! अगर यह मन वश में किया जा सकता है तो गुरू के शबद में विचार जोड़ने से ही वश में किया जा सकता है। (नहीं तो ऐसे) चाहे कोई कितनी भी तांघ करे (कोशिश करे) ये मन प्रयत्न करने पर वश में नहीं आता। हे नानक ! अगर समर्थ गुरू मिल जाए तो मन ही मन को मार लेता है (भाव। गुरू की सहायता से अंदर की ओर झाँकने से मन वश में आ जाता है)। 2।

संदर्भ: यह अंग 1089 है, राग मारू का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।

CBSE board-exam का दिन सुबह, बच्चा pencil-box check कर रहा, माँ चुप।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 46 पंक्तियों का है, 9 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1089” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: मारू राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1090 →, पीछे का: ← अंग 1088

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।