राग आसा
भोर का राग, उम्मीद का सुर।
आसा का अर्थ ही "उम्मीद" है। राग का समय भोर का है, जब रोशनी आती है मगर दिन की हलचल नहीं शुरू हुई। यह एक तरह की उठाव की धुन है, बिस्तर छोड़ कर खड़े होने का सुर।

"आसा दी वार" इसी राग में बँधी है, और सिख परम्परा में सुबह की कीर्तन-संगति का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। ग्रंथ में यह राग तीन-सौ-सैंतालिस से शुरू होकर चार-सौ-अठ्ठासी तक चलता है।
"बलिहारी गुर आपणे दिउहाड़ी सद वार ॥" आसा M1, आसा-दी-वार
इस राग के सब अंग
347348349350351352353354355356357358359360361362363364365366367368369370371372373374375376377378379380381382383384385386387388389390391392393394395396397398399400401402403404405406407408409410411412413414415416417418419420421422423424425426427428429430431432433434435436437438439440441442443444445446447448449450451452453454455456457458459460461462463464465466467468469470471472473474475476477478479480481482483484485486487488
इस राग के शबद
हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, वाणी के अनुसार। पंक्ति पर जाने से वह शबद अपने अंग पर खुलता है।
महला 1 (130)
- सो दरु तेरा केहा सो घरु केहा जितु बहि सरब सम॑ाले ॥अंग 347
- सुणि वडा आखै सभ कोई ॥अंग 348
- आखा जीवा विसरै मरि जाउ ॥अंग 349
- जे दरि मांगतु कूक करे महली खसमु सुणे ॥अंग 349
- ताल मदीरे घट के घाट ॥अंग 349
- जेता सबदु सुरति धुनि तेती जेता रूपु काइआ तेरी ॥अंग 350
- वाजा मति पखावजु भाउ ॥अंग 350
- पउणु उपाइ धरी सभ धरती जल अगनी का बंधु कीआ ॥अंग 350
- करम करतूति बेलि बिसथारी राम नामु फलु हूआ ॥अंग 351
- मै गुण गला के सिरि भार ॥अंग 351
- करि किरपा अपनै घरि आइआ ता मिलि सखीआ काजु रचाइआ ॥अंग 351
- ग्रिहु बनु समसरि सहजि सुभाइ ॥अंग 351
- एको सरवरु कमल अनूप ॥अंग 352
- गुरमति साची हुजति दूरि ॥अंग 352
- जो तिनि कीआ सो सचु थीआ ॥अंग 352
- इकि आवहि इकि जावहि आई ॥अंग 353
- निवि निवि पाइ लगउ गुर अपुने आतम रामु निहारिआ ॥अंग 353
- किस कउ कहहि सुणावहि किस कउ किसु समझावहि समझि रहे ॥अंग 353
- कोई भीखकु भीखिआ खाइ ॥अंग 354
- दुध बिनु धेनु पंख बिनु पंखी जल बिनु उतभुज कामि नाही ॥अंग 354
- काइआ ब्रहमा मनु है धोती ॥अंग 355
- सेवकु दासु भगतु जनु सोई ॥अंग 355
- काची गागरि देह दुहेली उपजै बिनसै दुखु पाई ॥अंग 355
- मोहु कुटंबु मोहु सभ कार ॥अंग 356
- आपि करे सचु अलख अपारु ॥अंग 356
- विदिआ वीचारी तां परउपकारी ॥अंग 356
- एक न भरीआ गुण करि धोवा ॥अंग 356
- पेवकड़ै धन खरी इआणी ॥अंग 357
- न किस का पूतु न किस की माई ॥अंग 357
- तितु सरवरड़ै भईले निवासा पाणी पावकु तिनहि कीआ ॥अंग 357
- छिअ घर छिअ गुर छिअ उपदेस ॥अंग 357
- लख लसकर लख वाजे नेजे लख उठि करहि सलामु ॥अंग 358
- दीवा मेरा एकु नामु दुखु विचि पाइआ तेलु ॥अंग 358
- देवतिआ दरसन कै ताई दूख भूख तीरथ कीए ॥अंग 358
- भीतरि पंच गुपत मनि वासे ॥अंग 359
- मनु मोती जे गहणा होवै पउणु होवै सूत धारी ॥अंग 359
- कीता होवै करे कराइआ तिसु किआ कहीऐ भाई ॥अंग 359
- गुर का सबदु मनै महि मुंद्रा खिंथा खिमा हढावउ ॥अंग 359
- गुड़ु करि गिआनु धिआनु करि धावै करि करणी कसु पाईऐ ॥अंग 360
- खुरासान खसमाना कीआ हिंदुसतानु डराइआ ॥अंग 360
- उतरि अवघटि सरवरि न॑ावै ॥अंग 411
- सभि जप सभि तप सभ चतुराई ॥अंग 412
- लेख असंख लिखि लिखि मानु ॥अंग 412
- एकु मरै पंचे मिलि रोवहि ॥अंग 413
- आपु वीचारै सु परखे हीरा ॥अंग 413
- गुरमुखि गिआनु धिआनु मनि मानु ॥अंग 414
- गावहि गीते चीति अनीते ॥अंग 414
- मनु मैगलु साकतु देवाना ॥अंग 415
- तनु बिनसै धनु का को कहीऐ ॥अंग 416
- गुरु सेवे सो ठाकुर जानै ॥अंग 416
- जिन सिरि सोहनि पटीआ मांगी पाइ संधूरु ॥अंग 417
- कहा सु खेल तबेला घोड़े कहा भेरी सहनाई ॥अंग 417
- जैसे गोइलि गोइली तैसे संसारा ॥अंग 418
- चारे कुंडा ढूढीआ को नीम॑ी मैडा ॥अंग 418
- मनसा मनहि समाइले भउजलु सचि तरणा ॥अंग 419
- चले चलणहार वाट वटाइआ ॥अंग 419
- किआ जंगलु ढूढी जाइ मै घरि बनु हरीआवला ॥अंग 420
- जिन॑ी नामु विसारिआ दूजै भरमि भुलाई ॥अंग 420
- मै ओल॑गीआ ओल॑गी हम छोरू थारे ॥अंग 421
- केता आखणु आखीऐ ता के अंत न जाणा ॥अंग 421
- मनु रातउ हरि नाइ सचु वखाणिआ ॥अंग 421
- आवण जाणा किउ रहै किउ मेला होई ॥अंग 422
- ससै सोइ स्रिसटि जिनि साजी सभना साहिबु एकु भइआ ॥अंग 432
- मुंध जोबनि बालड़ीए मेरा पिरु रलीआला राम ॥अंग 435
- अनहदो अनहदु वाजै रुण झुणकारे राम ॥अंग 436
- मेरा मनो मेरा मनु राता राम पिआरे राम ॥अंग 437
- दूख बिसारणहारु सुआमी कीता जा का होवै ॥अंग 438
- तूं सुणि हरणा कालिआ की वाड़ीऐ राता राम ॥अंग 438
- बलिहारी गुर आपणे दिउहाड़ी सद वार ॥अंग 462
- नानक गुरू न चेतनी मनि आपणै सुचेत ॥अंग 463
- आपीन॑ै आपु साजिओ आपीन॑ै रचिओ नाउ ॥अंग 463
- सचे तेरे खंड सचे ब्रहमंड ॥अंग 463
- वडी वडिआई जा वडा नाउ ॥अंग 463
- विसमादु नाद विसमादु वेद ॥अंग 463
- कुदरति दिसै कुदरति सुणीऐ कुदरति भउ सुख सारु ॥अंग 464
- आपीन॑ै भोग भोगि कै होइ भसमड़ि भउरु सिधाइआ ॥अंग 464
- भै विचि पवणु वहै सदवाउ ॥अंग 464
- नानक निरभउ निरंकारु होरि केते राम रवाल ॥अंग 464
- नदरि करहि जे आपणी ता नदरी सतिगुरु पाइआ ॥अंग 465
- घड़ीआ सभे गोपीआ पहर कंन॑ गोपाल ॥अंग 465
- वाइनि चेले नचनि गुर ॥अंग 465
- नाउ तेरा निरंकारु है नाइ लइऐ नरकि न जाईऐ ॥अंग 465
- मुसलमाना सिफति सरीअति पड़ि पड़ि करहि बीचारु ॥अंग 465
- मिटी मुसलमान की पेड़ै पई कुमि॑आर ॥अंग 466
- बिनु सतिगुर किनै न पाइओ बिनु सतिगुर किनै न पाइआ ॥अंग 466
- हउ विचि आइआ हउ विचि गइआ ॥अंग 466
- पुरखां बिरखां तीरथां तटां मेघां खेतांह ॥अंग 467
- लख नेकीआ चंगिआईआ लख पुंना परवाणु ॥अंग 467
- सचा साहिबु एकु तूं जिनि सचो सचु वरताइआ ॥अंग 467
- पड़ि पड़ि गडी लदीअहि पड़ि पड़ि भरीअहि साथ ॥अंग 467
- लिखि लिखि पड़िआ ॥अंग 467
- भगत तेरै मनि भावदे दरि सोहनि कीरति गावदे ॥अंग 468
- कूड़ु राजा कूड़ु परजा कूड़ु सभु संसारु ॥अंग 468
- सचु ता परु जाणीऐ जा रिदै सचा होइ ॥अंग 468
- दानु महिंडा तली खाकु जे मिलै त मसतकि लाईऐ ॥अंग 468
- सचि कालु कूड़ु वरतिआ कलि कालख बेताल ॥अंग 468
- लबु पापु दुइ राजा महता कूड़ु होआ सिकदारु ॥अंग 468
- वदी सु वजगि नानका सचा वेखै सोइ ॥अंग 469
- धुरि करमु जिना कउ तुधु पाइआ ता तिनी खसमु धिआइआ ॥अंग 469
- दुखु दारू सुखु रोगु भइआ जा सुखु तामि न होई ॥अंग 469
- कुंभे बधा जलु रहै जल बिनु कुंभु न होइ ॥अंग 469
- पड़िआ होवै गुनहगारु ता ओमी साधु न मारीऐ ॥अंग 469
- नानक मेरु सरीर का इकु रथु इकु रथवाहु ॥अंग 470
- साम कहै सेतंबरु सुआमी सच महि आछै साचि रहे ॥ सभु को सचि समावै ॥अंग 470
- सतिगुर विटहु वारिआ जितु मिलिऐ खसमु समालिआ ॥अंग 470
- सिंमल रुखु सराइरा अति दीरघ अति मुचु ॥अंग 470
- पड़ि पुसतक संधिआ बादं ॥अंग 470
- कपड़ु रूपु सुहावणा छडि दुनीआ अंदरि जावणा ॥अंग 470
- दइआ कपाह संतोखु सूतु जतु गंढी सतु वटु ॥अंग 471
- लख चोरीआ लख जारीआ लख कूड़ीआ लख गालि ॥अंग 471
- नाइ मंनिऐ पति ऊपजै सालाही सचु सूतु ॥अंग 471
- तगु न इंद्री तगु न नारी ॥अंग 471
- साहिबु होइ दइआलु किरपा करे ता साई कार कराइसी ॥अंग 471
- गऊ बिराहमण कउ करु लावहु गोबरि तरणु न जाई ॥अंग 471
- माणस खाणे करहि निवाज ॥अंग 471
- चितै अंदरि सभु को वेखि नदरी हेठि चलाइदा ॥अंग 472
- जे मोहाका घरु मुहै घरु मुहि पितरी देइ ॥अंग 472
- जिउ जोरू सिरनावणी आवै वारो वार ॥अंग 472
- तुरे पलाणे पउण वेग हर रंगी हरम सवारिआ ॥अंग 472
- जे करि सूतकु मंनीऐ सभ तै सूतकु होइ ॥अंग 472
- मन का सूतकु लोभु है जिहवा सूतकु कूड़ु ॥अंग 472
- सभो सूतकु भरमु है दूजै लगै जाइ ॥अंग 472
- सतिगुरु वडा करि सालाहीऐ जिसु विचि वडीआ वडिआईआ ॥अंग 473
- पहिला सुचा आपि होइ सुचै बैठा आइ ॥अंग 473
- भंडि जंमीऐ भंडि निंमीऐ भंडि मंगणु वीआहु ॥अंग 473
- सभु को आखै आपणा जिसु नाही सो चुणि कढीऐ ॥अंग 473
- नानक फिकै बोलिऐ तनु मनु फिका होइ ॥अंग 473
- अंदरहु झूठे पैज बाहरि दुनीआ अंदरि फैलु ॥अंग 473
- आपे ही करणा कीओ कल आपे ही तै धारीऐ ॥अंग 474
- आपे भांडे साजिअनु आपे पूरणु देइ ॥अंग 475
महला 2 (21)
- जे सउ चंदा उगवहि सूरज चड़हि हजार ॥अंग 463
- इहु जगु सचै की है कोठड़ी सचे का विचि वासु ॥अंग 463
- नानक जीअ उपाइ कै लिखि नावै धरमु बहालिआ ॥अंग 463
- हउमै एहा जाति है हउमै करम कमाहि ॥अंग 466
- सेव कीती संतोखीइंी जिन॑ी सचो सचु धिआइआ ॥अंग 466
- जोग सबदं गिआन सबदं बेद सबदं ब्राहमणह ॥अंग 469
- एक क्रिसनं सरब देवा देव देवा त आतमा ॥अंग 469
- एह किनेही आसकी दूजै लगै जाइ ॥अंग 474
- सलामु जबाबु दोवै करे मुंढहु घुथा जाइ ॥अंग 474
- जितु सेविऐ सुखु पाईऐ सो साहिबु सदा सम॑ालीऐ ॥अंग 474
- चाकरु लगै चाकरी नाले गारबु वादु ॥अंग 474
- जो जीइ होइ सु उगवै मुह का कहिआ वाउ ॥अंग 474
- नालि इआणे दोसती कदे न आवै रासि ॥अंग 474
- नालि इआणे दोसती वडारू सिउ नेहु ॥अंग 474
- होइ इआणा करे कंमु आणि न सकै रासि ॥अंग 474
- चाकरु लगै चाकरी जे चलै खसमै भाइ ॥अंग 474
- एह किनेही दाति आपस ते जो पाईऐ ॥अंग 474
- एह किनेही चाकरी जितु भउ खसम न जाइ ॥अंग 475
- नानक अंत न जापन॑ी हरि ता के पारावार ॥अंग 475
- आपे साजे करे आपि जाई भि रखै आपि ॥अंग 475
- वडे कीआ वडिआईआ किछु कहणा कहणु न जाइ ॥अंग 475
महला 3 (31)
- हरि दरसनु पावै वडभागि ॥अंग 360
- सबदि मुआ विचहु आपु गवाइ ॥अंग 361
- सतिगुर विचि वडी वडिआई ॥अंग 361
- मेरा प्रभु साचा गहिर गंभीर ॥अंग 361
- दूजै भाइ लगे दुखु पाइआ ॥अंग 362
- मनमुख मरहि मरि मरणु विगाड़हि ॥अंग 362
- लालै आपणी जाति गवाई ॥अंग 362
- मनमुखि झूठो झूठु कमावै ॥अंग 363
- भगति रता जनु सहजि सुभाइ ॥अंग 363
- गुरु साइरु सतिगुरु सचु सोइ ॥अंग 363
- सबदि मरै तिसु सदा अनंद ॥अंग 364
- निरति करे बहु वाजे वजाए ॥अंग 364
- हरि कै भाणै सतिगुरु मिलै सचु सोझी होई ॥अंग 365
- सासतु बेदु सिंम्रिति सरु तेरा सुरसरी चरण समाणी ॥अंग 422
- सतिगुर हमरा भरमु गवाइआ ॥अंग 423
- आसा आस करे सभु कोई ॥अंग 423
- गुर ते सांति ऊपजै जिनि त्रिसना अगनि बुझाई ॥अंग 424
- सुणि मन मंनि वसाइ तूं आपे आइ मिलै मेरे भाई ॥अंग 425
- घरै अंदरि सभु वथु है बाहरि किछु नाही ॥अंग 425
- आपै आपु पछाणिआ सादु मीठा भाई ॥अंग 426
- दोहागणी महलु न पाइन॑ी न जाणनि पिर का सुआउ ॥अंग 426
- सचे रते से निरमले सदा सची सोइ ॥अंग 426
- सभ नावै नो लोचदी जिसु क्रिपा करे सो पाए ॥अंग 427
- सचि रतीआ सोहागणी जिना गुर कै सबदि सीगारि ॥अंग 427
- अंम्रितु जिन॑ा चखाइओनु रसु आइआ सहजि सुभाइ ॥अंग 428
- सतिगुर ते गुण ऊपजै जा प्रभु मेलै सोइ ॥अंग 428
- विचहु आपु गइआ नाउ मंनिआ सचि मिलावा होइ ॥1॥अंग 429
- अन रस महि भोलाइआ बिनु नामै दुख पाइ ॥अंग 430
- अयो अंङै सभु जगु आइआ काखै घंङै कालु भइआ ॥अंग 434
- हम घरे साचा सोहिला साचै सबदि सुहाइआ राम ॥अंग 439
- साजन मेरे प्रीतमहु तुम सह की भगति करेहो ॥अंग 440
महला 4 (30)
- सो पुरखु निरंजनु हरि पुरखु निरंजनु हरि अगमा अगम अपारा ॥अंग 348
- तूं करता सचिआरु मैडा सांई ॥अंग 365
- किस ही धड़ा कीआ मित्र सुत नालि भाई ॥अंग 366
- हिरदै सुणि सुणि मनि अंम्रितु भाइआ ॥अंग 366
- मेरै मनि तनि प्रेमु नामु आधारु ॥अंग 366
- गुरमुखि हरि गुण आखि वखाणी ॥1॥अंग 367
- नामु सुणी नामो मनि भावै ॥अंग 367
- गुरमुखि हरि हरि वेलि वधाई ॥अंग 367
- हरि हरि नाम की मनि भूख लगाई ॥अंग 367
- हथि करि तंतु वजावै जोगी थोथर वाजै बेन ॥अंग 368
- कब को भालै घुंघरू ताला कब को बजावै रबाबु ॥अंग 368
- सतसंगति मिलीऐ हरि साधू मिलि संगति हरि गुण गाइ ॥अंग 368
- आइआ मरणु धुराहु हउमै रोईऐ ॥अंग 369
- जनमु पदारथु पाइ नामु धिआइआ ॥अंग 369
- हउ अनदिनु हरि नामु कीरतनु करउ ॥अंग 369
- माई मोरो प्रीतमु रामु बतावहु री माई ॥अंग 369
- जीवनो मै जीवनु पाइआ गुरमुखि भाए राम ॥अंग 442
- झिमि झिमे झिमि झिमि वरसै अंम्रित धारा राम ॥अंग 442
- हरि ऊतमु कामु जपीऐ हरि नामु हरि जपीऐ असथिरु होवै ॥अंग 444
- गुण गिआनु पदारथु हरि हरि किरतारथु सोभा गुरमुखि होई ॥अंग 445
- धुरि मसतकि भागु हरि नामि सुहागु हरि नामै हरि गुण गाइआ ॥अंग 446
- मनि हरि हरि भाउ गुरु करे पसाउ जीवन मुकतु सुखु होई ॥अंग 447
- गोविंदु अलख अपारु अपरंपरु आपु आपणा जाणै ॥अंग 448
- हरि अंम्रित भिंने लोइणा मनु प्रेमि रतंना राम राजे ॥अंग 448
- गुरमुखि ढूंढि ढूढेदिआ हरि सजणु लधा राम राजे ॥अंग 449
- हरि अंम्रित भगति भंडार है गुर सतिगुर पासे राम राजे ॥अंग 449
- जिन मसतकि धुरि हरि लिखिआ तिना सतिगुरु मिलिआ राम राजे ॥अंग 450
- जिन अंतरि हरि हरि प्रीति है ते जन सुघड़ सिआणे राम राजे ॥अंग 450
- जिन॑ा भेटिआ मेरा पूरा सतिगुरू तिन हरि नामु द्रिड़ावै राम राजे ॥अंग 451
- मेरे मन परदेसी वे पिआरे आउ घरे ॥अंग 451
महला 5 (183)
- जिनि लाई प्रीति सोई फिरि खाइआ ॥अंग 370
- ससू ते पिरि कीनी वाखि ॥अंग 370
- निज भगती सीलवंती नारि ॥अंग 370
- मता करउ सो पकनि न देई ॥अंग 371
- प्रथमे मता जि पत्री चलावउ ॥अंग 371
- परदेसु झागि सउदे कउ आइआ ॥अंग 372
- गुनु अवगनु मेरो कछु न बीचारो ॥अंग 372
- दानु देइ करि पूजा करना ॥अंग 372
- अरड़ावै बिललावै निंदकु ॥अंग 373
- जउ मै कीओ सगल सीगारा ॥अंग 373
- जीवत दीसै तिसु सरपर मरणा ॥अंग 374
- पुतरी तेरी बिधि करि थाटी ॥अंग 374
- इक घड़ी दिनसु मो कउ बहुतु दिहारे ॥अंग 374
- हरि सेवा महि परम निधानु ॥अंग 375
- प्रभु होइ क्रिपालु त इहु मनु लाई ॥अंग 375
- करि किरपा हरि परगटी आइआ ॥अंग 375
- जैसे किरसाणु बोवै किरसानी ॥अंग 375
- नउ निधि तेरै सगल निधान ॥अंग 376
- निकटि जीअ कै सद ही संगा ॥अंग 376
- हरि रसु छोडि होछै रसि माता ॥अंग 376
- जीअ प्रान धनु हरि को नामु ॥अंग 376
- अनद बिनोद भरेपुरि धारिआ ॥अंग 376
- गुर कै सबदि बनावहु इहु मनु ॥अंग 377
- बुधि प्रगास भई मति पूरी ॥अंग 377
- हरि रसु पीवत सद ही राता ॥अंग 377
- कामु क्रोधु लोभु मोहु मिटावै छुटकै दुरमति अपुनी धारी ॥अंग 377
- भई परापति मानुख देहुरीआ ॥अंग 378
- तुझ बिनु अवरु नाही मै दूजा तूं मेरे मन माही ॥अंग 378
- हरि जन लीने प्रभू छडाइ ॥अंग 378
- अउखधु खाइओ हरि को नाउ ॥अंग 378
- बांछत नाही सु बेला आई ॥अंग 378
- सदा सदा आतम परगासु ॥अंग 378
- जा का हरि सुआमी प्रभु बेली ॥अंग 378
- काम क्रोध माइआ मद मतसर ए खेलत सभि जूऐ हारे ॥अंग 379
- तू बिअंतु अविगतु अगोचरु इहु सभु तेरा आकारु ॥अंग 379
- राज मिलक जोबन ग्रिह सोभा रूपवंतु जोुआनी ॥अंग 379
- भ्रम महि सोई सगल जगत धंध अंध ॥अंग 380
- जो तुधु भावै सो परवाना सूखु सहजु मनि सोई ॥अंग 380
- जनम जनम की मलु धोवै पराई आपणा कीता पावै ॥अंग 380
- बाहरु धोइ अंतरु मनु मैला दुइ ठउर अपुने खोए ॥अंग 381
- उदमु करत होवै मनु निरमलु नाचै आपु निवारे ॥अंग 381
- अधम चंडाली भई ब्रहमणी सूदी ते स्रेसटाई रे ॥अंग 381
- बंधन काटि बिसारे अउगन अपना बिरदु सम॑ारिआ ॥अंग 382
- जा तूं साहिबु ता भउ केहा हउ तुधु बिनु किसु सालाही ॥अंग 382
- अंम्रितु नामु तुम॑ारा ठाकुर एहु महा रसु जनहि पीओ ॥अंग 382
- आगै ही ते सभु किछु हूआ अवरु कि जाणै गिआना ॥अंग 383
- तूं विसरहि तां सभु को लागू चीति आवहि तां सेवा ॥अंग 383
- करि किरपा प्रभ अंतरजामी साधसंगि हरि पाईऐ ॥अंग 383
- मोह मलन नीद ते छुटकी कउनु अनुग्रहु भइओ री ॥अंग 383
- लालु चोलना तै तनि सोहिआ ॥अंग 384
- दूखु घनो जब होते दूरि ॥अंग 384
- साचि नामि मेरा मनु लागा ॥अंग 384
- पावतु रलीआ जोबनि बलीआ ॥अंग 385
- एकु बगीचा पेड घन करिआ ॥अंग 385
- राज लीला तेरै नामि बनाई ॥अंग 385
- तीरथि जाउ त हउ हउ करते ॥अंग 385
- घर महि सूख बाहरि फुनि सूखा ॥अंग 385
- जहा पठावहु तह तह जाइंी ॥अंग 386
- ऊठत बैठत सोवत धिआईऐ ॥अंग 386
- जा कै सिमरनि सूख निवासु ॥अंग 386
- जिसु नीच कउ कोई न जानै ॥अंग 386
- एको एकी नैन निहारउ ॥अंग 386
- कोटि जनम के रहे भवारे ॥अंग 387
- मिटी तिआस अगिआन अंधेरे ॥अंग 387
- सतिगुरु अपना सद सदा सम॑ारे ॥अंग 387
- आपे पेडु बिसथारी साख ॥अंग 387
- उकति सिआनप किछू न जाना ॥अंग 387
- हरि हरि अखर दुइ इह माला ॥अंग 388
- जिस का सभु किछु तिस का होइ ॥अंग 388
- जउ सुप्रसंन होइओ प्रभु मेरा ॥अंग 388
- कामि क्रोधि अहंकारि विगूते ॥अंग 388
- तू मेरा तरंगु हम मीन तुमारे ॥अंग 389
- रोवनहारै झूठु कमाना ॥अंग 389
- सोइ रही प्रभ खबरि न जानी ॥अंग 389
- चरन कमल की आस पिआरे ॥अंग 389
- मनु त्रिपतानो मिटे जंजाल ॥अंग 389
- ठाकुर सिउ जा की बनि आई ॥अंग 390
- जउ मै अपुना सतिगुरु धिआइआ ॥अंग 390
- अनदिनु मूसा लाजु टुकाई ॥अंग 390
- उन कै संगि तू करती केल ॥अंग 390
- अनिक भांति करि सेवा करीऐ ॥अंग 391
- प्रभ की प्रीति सदा सुखु होइ ॥अंग 391
- भूपति होइ कै राजु कमाइआ ॥अंग 391
- इन॑ सिउ प्रीति करी घनेरी ॥अंग 392
- आठ पहर निकटि करि जानै ॥अंग 392
- सगल सूख जपि एकै नाम ॥अंग 392
- आठ पहर उदक इसनानी ॥अंग 393
- जिह पैडै लूटी पनिहारी ॥अंग 393
- साधू संगि सिखाइओ नामु ॥अंग 393
- हरि का नामु रिदै नित धिआई ॥अंग 394
- साधू संगति तरिआ संसारु ॥अंग 394
- मीठी आगिआ पिर की लागी ॥अंग 394
- माथै त्रिकुटी द्रिसटि करूरि ॥अंग 394
- सरब दूख जब बिसरहि सुआमी ॥अंग 394
- नामु जपत मनु तनु सभु हरिआ ॥अंग 395
- गावि लेहि तू गावनहारे ॥अंग 395
- प्रथमे मिटिआ तन का दूख ॥अंग 395
- सतिगुर साचै दीआ भेजि ॥अंग 396
- गुर पूरे राखिआ दे हाथ ॥अंग 396
- मै बंदा बै खरीदु सचु साहिबु मेरा ॥अंग 396
- सरब सुखा मै भालिआ हरि जेवडु न कोई ॥अंग 396
- साई अलखु अपारु भोरी मनि वसै ॥अंग 397
- लाख भगत आराधहि जपते पीउ पीउ ॥अंग 397
- हभे थोक विसारि हिको खिआलु करि ॥अंग 397
- जिन॑ा न विसरै नामु से किनेहिआ ॥अंग 397
- पूरि रहिआ स्रब ठाइ हमारा खसमु सोइ ॥अंग 398
- किआ सोवहि नामु विसारि गाफल गहिलिआ ॥अंग 398
- कोइ न किस ही संगि काहे गरबीऐ ॥अंग 398
- जिसु सिमरत दुखु जाइ सहज सुखु पाईऐ ॥अंग 398
- गोबिंदु गुणी निधानु गुरमुखि जाणीऐ ॥अंग 399
- आवहु मीत इकत्र होइ रस कस सभि भुंचह ॥अंग 399
- उदमु कीआ कराइआ आरंभु रचाइआ ॥अंग 399
- जा का ठाकुरु तुही प्रभ ता के वडभागा ॥अंग 399
- जा प्रभ की हउ चेरुली सो सभ ते ऊचा ॥अंग 400
- संता की होइ दासरी एहु अचारा सिखु री ॥अंग 400
- डीगन डोला तऊ लउ जउ मन के भरमा ॥अंग 400
- सूख सहज आनदु घणा हरि कीरतनु गाउ ॥अंग 400
- चितवउ चितवि सरब सुख पावउ आगै भावउ कि न भावउ ॥अंग 401
- अंतरि गावउ बाहरि गावउ गावउ जागि सवारी ॥अंग 401
- जिस नो तूं असथिरु करि मानहि ते पाहुन दो दाहा ॥अंग 401
- अपुसट बात ते भई सीधरी दूत दुसट सजनई ॥अंग 402
- रे मूड़े लाहे कउ तूं ढीला ढीला तोटे कउ बेगि धाइआ ॥अंग 402
- मिथिआ संगि संगि लपटाए मोह माइआ करि बाधे ॥अंग 402
- निमख काम सुआद कारणि कोटि दिनस दुखु पावहि ॥अंग 403
- लूकि कमानो सोई तुम॑ पेखिओ मूड़ मुगध मुकरानी ॥अंग 403
- अपुने सेवक की आपे राखै आपे नामु जपावै ॥अंग 403
- नटूआ भेख दिखावै बहु बिधि जैसा है ओहु तैसा रे ॥अंग 403
- गुर परसादि मेरै मनि वसिआ जो मागउ सो पावउ रे ॥अंग 404
- चारि बरन चउहा के मरदन खटु दरसन कर तली रे ॥अंग 404
- नीकी जीअ की हरि कथा ऊतम आन सगल रस फीकी रे ॥1॥ रहाउ ॥अंग 404
- हमारी पिआरी अंम्रित धारी गुरि निमख न मन ते टारी रे ॥1॥ रहाउ ॥अंग 404
- नीकी साध संगानी ॥ रहाउ ॥अंग 404
- तिआगि सगल सिआनपा भजु पारब्रहम निरंकारु ॥अंग 405
- दीन बंधप जीअ दाता सरणि राखण जोगु ॥1॥अंग 405
- डोलि डोलि महा दुखु पाइआ बिना साधू संग ॥अंग 405
- उदमु करउ करावहु ठाकुर पेखत साधू संगि ॥अंग 405
- अगम अगोचरु दरसु तेरा सो पाए जिसु मसतकि भागु ॥अंग 406
- सतिगुर बचन तुम॑ारे ॥अंग 406
- बावर सोइ रहे ॥1॥ रहाउ ॥अंग 406
- ओहा प्रेम पिरी ॥1॥ रहाउ ॥अंग 406
- गुरहि दिखाइओ लोइना ॥1॥ रहाउ ॥अंग 407
- हरि हरि नामु अमोला ॥अंग 407
- आपुनी भगति निबाहि ॥अंग 407
- ठाकुर चरण सुहावे ॥अंग 407
- एकु सिमरि मन माही ॥1॥ रहाउ ॥अंग 407
- हरि बिसरत सो मूआ ॥1॥ रहाउ ॥अंग 407
- ओहु नेहु नवेला ॥अंग 407
- मिलु राम पिआरे तुम बिनु धीरजु को न करै ॥1॥ रहाउ ॥अंग 408
- बिकार माइआ मादि सोइओ सूझ बूझ न आवै ॥अंग 408
- बापारि गोविंद नाए ॥अंग 408
- कोऊ बिखम गार तोरै ॥अंग 408
- कामु क्रोधु लोभु तिआगु ॥अंग 408
- हरख सोग बैराग अनंदी खेलु री दिखाइओ ॥1॥ रहाउ ॥अंग 409
- गोबिंद गोबिंद करि हां ॥अंग 409
- मनसा एक मानि हां ॥अंग 409
- हरि हरि हरि गुनी हां ॥अंग 409
- एका ओट गहु हां ॥अंग 410
- मिलि हरि जसु गाईऐ हां ॥अंग 410
- कारन करन तूं हां ॥अंग 410
- ओइ परदेसीआ हां ॥अंग 410
- पंच मनाए पंच रुसाए ॥ पंच वसाए पंच गवाए ॥1॥अंग 430
- मेरे मन हरि सिउ लागी प्रीति ॥अंग 431
- पारब्रहमु प्रभु सिमरीऐ पिआरे दरसन कउ बलि जाउ ॥1॥अंग 431
- अनदो अनदु घणा मै सो प्रभु डीठा राम ॥अंग 452
- अकथा हरि अकथ कथा किछु जाइ न जाणी राम ॥अंग 453
- हरि चरन कमल मनु बेधिआ किछु आन न मीठा राम राजे ॥अंग 453
- जा कउ भए क्रिपाल प्रभ हरि हरि सेई जपात ॥अंग 454
- जल दुध निआई रीति अब दुध आच नही मन ऐसी प्रीति हरे ॥अंग 454
- बनु बनु फिरती खोजती हारी बहु अवगाहि ॥अंग 455
- जा कउ खोजहि असंख मुनी अनेक तपे ॥अंग 455
- उदमु करहु वडभागीहो सिमरहु हरि हरि राइ ॥अंग 456
- नामु जपत गोबिंद नह अलसाईऐ ॥अंग 456
- थिरु संतन सोहागु मरै न जावए ॥अंग 457
- हरि हरि नामु जपंतिआ कछु न कहै जमकालु ॥अंग 457
- मिलउ संतन कै संगि मोहि उधारि लेहु ॥अंग 457
- पुरख पते भगवान ता की सरणि गही ॥अंग 458
- सुभ चिंतन गोबिंद रमण निरमल साधू संग ॥अंग 459
- भिंनी रैनड़ीऐ चामकनि तारे ॥अंग 459
- उठि वंञु वटाऊड़िआ तै किआ चिरु लाइआ ॥अंग 459
- वंञु मेरे आलसा हरि पासि बेनंती ॥अंग 460
- दिनु राति कमाइअड़ो सो आइओ माथै ॥अंग 461
- कमला भ्रम भीति कमला भ्रम भीति हे तीखण मद बिपरीति हे अवध अकारथ जात ॥अंग 461
- गोबिंद गोबिंद गोबिंद संगि नामदेउ मनु लीणा ॥अंग 487
महला 9 (1)
- बिरथा कहउ कउन सिउ मन की ॥अंग 411
भगत कबीर जी (36)
- कवन काजि जगु उपजै बिनसै कहहु मोहि समझाइआ ॥1॥अंग 475
- गज साढे तै तै धोतीआ तिहरे पाइनि तग ॥अंग 476
- बापि दिलासा मेरो कीन॑ा ॥ सेज सुखाली मुखि अंम्रितु दीन॑ा ॥अंग 476
- इकतु पतरि भरि उरकट कुरकट इकतु पतरि भरि पानी ॥अंग 476
- जोगी जती तपी संनिआसी बहु तीरथ भ्रमना ॥अंग 476
- फीलु रबाबी बलदु पखावज कऊआ ताल बजावै ॥अंग 477
- बटूआ एकु बहतरि आधारी एको जिसहि दुआरा ॥अंग 477
- हिंदू तुरक कहा ते आए किनि एह राह चलाई ॥अंग 477
- जब लगु तेलु दीवे मुखि बाती तब सूझै सभु कोई ॥अंग 477
- सनक सनंद अंतु नही पाइआ ॥अंग 478
- बाती सूकी तेलु निखूटा ॥अंग 478
- सुतु अपराध करत है जेते ॥अंग 478
- हज हमारी गोमती तीर ॥अंग 478
- भूली मालनी है एउ ॥अंग 479
- बारह बरस बालपन बीते बीस बरस कछु तपु न कीओ ॥अंग 479
- काहू दीन॑े पाट पटंबर काहू पलघ निवारा ॥अंग 479
- हम मसकीन खुदाई बंदे तुम राजसु मनि भावै ॥अंग 480
- गगन नगरि इक बूंद न बरखै नादु कहा जु समाना ॥अंग 480
- सरपनी ते ऊपरि नही बलीआ ॥अंग 480
- कहा सुआन कउ सिम्रिति सुनाए ॥अंग 481
- लंका सा कोटु समुंद सी खाई ॥अंग 481
- पहिला पूतु पिछैरी माई ॥अंग 481
- बिंदु ते जिनि पिंडु कीआ अगनि कुंड रहाइआ ॥अंग 481
- तनु रैनी मनु पुन रपि करि हउ पाचउ तत बराती ॥अंग 482
- सासु की दुखी ससुर की पिआरी जेठ के नामि डरउ रे ॥अंग 482
- हम घरि सूतु तनहि नित ताना कंठि जनेऊ तुमारे ॥अंग 482
- जगि जीवनु ऐसा सुपने जैसा जीवनु सुपन समानं ॥अंग 482
- रोजा धरै मनावै अलहु सुआदति जीअ संघारै ॥अंग 483
- कीओ सिंगारु मिलन के ताई ॥अंग 483
- हीरै हीरा बेधि पवन मनु सहजे रहिआ समाई ॥अंग 483
- पहिली करूपि कुजाति कुलखनी साहुरै पेईऐ बुरी ॥अंग 483
- मेरी बहुरीआ को धनीआ नाउ ॥अंग 484
- रहु रहु री बहुरीआ घूंघटु जिनि काढै ॥अंग 484
- करवतु भला न करवट तेरी ॥अंग 484
- कोरी को काहू मरमु न जानां ॥अंग 484
- अंतरि मैलु जे तीरथ नावै तिसु बैकुंठ न जानां ॥अंग 484