राग आसा
भोर का राग, उम्मीद का सुर।
आसा का अर्थ ही “उम्मीद” है। राग का समय भोर का है, जब रोशनी आती है मगर दिन की हलचल नहीं शुरू हुई। यह एक तरह की उठाव की धुन है, बिस्तर छोड़ कर खड़े होने का सुर।

“आसा दी वार” इसी राग में बँधी है, और सिख परम्परा में सुबह की कीर्तन-संगति का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। ग्रंथ में यह राग तीन-सौ-सैंतालिस से शुरू होकर चार-सौ-अठ्ठासी तक चलता है।
“भंडा हिकमतु हिकमतु ही जग सारा ।” आसा M1, आसा-दी-वार
इस राग के सब अंग
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