अंग 469, आसा की वार (सो किउ मंदा)

SGGS, Ang
469
आसा की वार, पौड़ी 12 और 13
राग: राग आसा · रचयिता: गुरु नानक देव जी · महला 1
पढ़ने का समय: लगभग 3 मिनट
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॥ सलोक मः १ ॥ पहिला सुचा आपि होइ सुचै बैठा आइ ॥ सुचे अगै रखिओनु कोइ न भिटिओ जाइ ॥ सुचा होइ कै जेविआ लगा पड़णि सलोकु ॥ कुहथी जाई सटिआ किसु एहु लगा दोखु ॥ अंनु देवता पाणी देवता बैसंतरु देवता लूणु पंजवा पाइआ घिरतु ॥ ता होआ पाकु पवित्रु ॥ पापी सिउ तनु गडिआ थुका पईआ तितु ॥ जितु मुखि नामु न ऊचरहि बिनु नावै रस खाहि ॥ नानक एवै जाणीऐ तितु मुखि थुका पाहि ॥१॥

यह सलोक “ritual purity” को आगे expose करता है। एक specific scenario describe कर रहे हैं।

“पहिला सुचा आपि होइ।” पहले “ख़ुद शुद्ध” (sucha) हुआ। “सुचै बैठा आइ।” “शुद्ध” स्थान पर बैठा।

एक pundit-figure है, जो ritual baths और clean clothes के बाद, “pure” position में बैठा है।

“सुचे अगै रखिओनु, कोइ न भिटिओ जाइ।” “शुद्ध” के सामने “रखा,” कोई “छू” नहीं सकता।

भोजन के सामने “purity” के नियम।

“सुचा होइ कै जेविआ, लगा पड़णि सलोकु।” “शुद्ध हो कर खाया,” “सलोक” (मंत्र, vedic recitation) “पढ़ने” लगा।

“कुहथी जाई सटिआ, किसु एहु लगा दोखु।” “कुहथी” (कुहासे, बुरी जगह, latrine) में “फेंक” दिया, अब “किसको दोष”?

punch line: यह “शुद्ध” भोजन, अंत में जाएगा कहाँ? पाचन के बाद, latrine में। तो “purity” क्या ख़ास हुई?

फिर list of ingredients: “अंनु देवता, पाणी देवता।” “अन्न देवता है, पानी देवता।” “बैसंतरु देवता।” “अग्नि देवता।” “लूणु पंजवा पाइआ घिरतु।” “नमक” पाँचवाँ है, और “घी।”

यह सब “elevated” चीज़ें हैं traditionally।

“ता होआ पाकु पवित्रु।” “तब” यह “पाक पवित्र” हुआ।

सब ingredients अच्छे हैं, food prepared with care, “pure।”

“पापी सिउ तनु गडिआ।” मगर “पापी” के “शरीर” से “गड़” गया (combine हुआ)।

“थुका पईआ तितु।” “थूक पड़ी” वहाँ।

यानी पवित्र भोजन भी पापी आदमी के मुँह में जा कर “थूक” बन जाता है। उसके सिस्टम में मिल कर।

“जितु मुखि नामु न ऊचरहि, बिनु नावै रस खाहि।” “जिस मुँह से नाम नहीं उच्चारित,” “बिना नाम के रस खाते हैं।”

“नानक एवै जाणीऐ, तितु मुखि थुका पाहि।” नानक कहते हैं, “ऐसा जानो,” उस मुँह में “थूक पड़ती है।”

यह बहुत harsh image है। मगर point क्या है? यह कि “ritual purity” का काम वहाँ है जहाँ “नाम” अंदर हो। यदि भीतर “नाम” नहीं, तो बाहर कितनी भी purity, useless।

दिल्ली में हम सब हाइजीन को बहुत importance देते हैं, ठीक है। मगर नानक कह रहे हैं, बीच में inner cleanliness को मत भूलो। वही असली है।

देखें: गीता 17.8-10, सात्त्विक, राजसिक, तामसिक आहार
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॥ मः १ ॥ भंडि जमीऐ भंडि निमीऐ भंडि मंगणु वीआहु ॥ भंडहु होवै दोसती भंडहु चलै राहु ॥ भंडु मुआ भंडु भालीऐ भंडि होवै बंधानु ॥ सो किउ मंदा आखीऐ जितु जमहि राजान ॥ भंडहु ही भंडु ऊपजै भंडै बाझु न कोइ ॥ नानक भंडै बाहरा एको सचा सोइ ॥ जितु मुखि सदा सालाहीऐ भागा रती चारि ॥ नानक ते मुख ऊजले तितु सचै दरबारि ॥२॥

यह सलोक नानक का सबसे famous, सबसे feminist statement है। “स्त्री” के सम्मान का सबसे sharp defence।

“भंडि जमीऐ भंडि निमीऐ।” “भंड” (नारी, जिसमें “भंडार” है) से “जन्म लिया,” “भंड” से “गर्भधारित।” “भंडि मंगणु वीआहु।” “भंड” से “मंगनी और विवाह।”

“भंड” शब्द key है। पंजाबी में स्त्री को “भंड” कहा जाता है, क्योंकि वो “भंडार” (storehouse) है। मगर इस word का slight negative connotation भी है, कि कुछ लोग women को कमतर समझते हैं।

नानक उसी word को pick up कर रहे हैं, और celebrate कर रहे हैं।

“भंडहु होवै दोसती, भंडहु चलै राहु।” “भंड” से “दोस्ती” होती है, “भंड” से “रास्ता” चलता है (समाज continues होता है)।

“भंडु मुआ भंडु भालीऐ।” “भंड” मरने पर, फिर “भंड” “भाली” (खोजी) जाती है (शादी फिर होती है)।

यानी एक स्त्री के बिना ज़िंदगी का हर milestone रुक जाता है। हर stage पर एक स्त्री होती है, माँ, बीवी, बेटी, पोती।

फिर पंच line: “सो किउ मंदा आखीऐ, जितु जमहि राजान।” “उसको कैसे बुरा कहें, जिससे राजा जन्म लेते हैं?”

यह सबसे famous Punjabi feminist line है। नानक 500 साल पहले बोल गए।

दिल्ली में आज भी, जब लड़की पैदा होती है, कुछ families में disappointment होती है। नानक का question वही है, “जिससे राजा निकलते हैं, उसको बुरा कैसे?”

“भंडहु ही भंडु ऊपजै, भंडै बाझु न कोइ।” “भंड” से ही “भंड” “उपजता” है, “भंड” बिना कोई नहीं।

यानी हर इंसान (male भी) एक स्त्री से ही आया है। यह biological fact है, पर theological-philosophical बात भी।

“नानक भंडै बाहरा, एको सचा सोइ।” नानक कहते हैं, “भंड” से बाहर सिर्फ़ एक है, “सच्चा” (हरि)।

यानी हरि के अलावा हर existing entity माँ से आई है। यह radical philosophical position है।

closing: “जितु मुखि सदा सालाहीऐ, भागा रती चारि।” “जिस मुँह से सदा प्रशंसा होती है (हरि की), उस मुँह का भाग्य चार गुना (वडा)।”

“नानक ते मुख ऊजले, तितु सचै दरबारि।” नानक कहते हैं, “वो मुँह उज्ज्वल,” “सच्चे दरबार” में।

दिल्ली में आज भी, gender-based discrimination है, हर level पर, subtle से overt। नानक का इस सलोक को रोज़ सुबह gurdwara में पढ़ना, यह एक radical act है, हर रोज़।

देखें: गीता 9.29, “समोऽहं सर्वभूतेषु” (हरि की समदृष्टि)
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॥ पउड़ी ॥ सभु को आखै आपणा जिसु नाही सो चुणि कढीऐ ॥ कीता आपो आपणा आपे ही लेखा संढीऐ ॥ जा रहणा नाही ऐतु जगि ता काइतु गारबि हंढीऐ ॥ मंदा किसै न आखीऐ पड़ि अखरु एहो बुझीऐ ॥ मूरखै नालि न लुझीऐ ॥१९॥

पौड़ी 12 (in actual numbering, this might be 19 in some editions) एक practical wisdom है।

“सभु को आखै आपणा।” सब अपना-अपना कहते हैं। “जिसु नाही सो चुणि कढीऐ।” जिसके पास नहीं, वो “चुन कर निकाला” जाता है।

social observation: सब अपनी “ownership” claim करते हैं, मगर जिसके पास genuine नहीं, वो identify हो जाता है।

“कीता आपो आपणा आपे ही लेखा संढीऐ।” “अपना किया” “अपने ही लेखे” (खाते में) “संधा” (matched) होता है।

karma का statement। तुम्हारा किया, तुम्हारे खाते में।

“जा रहणा नाही ऐतु जगि, ता काइतु गारबि हंढीऐ।” “जब इस जग में रहना ही नहीं,” तब “गर्व” में “क्यों भटकते” हैं?

यह सबसे direct existential question है। हम जानते हैं हम मरेंगे, फिर भी अपने आप को कुछ खास मानने में busy हैं। नानक कह रहे हैं, यह irrational है।

“मंदा किसै न आखीऐ।” “बुरा” किसी को मत कहो। “पड़ि अखरु एहो बुझीऐ।” “अक्षर पढ़ कर” “यह समझ” आती है।

यानी genuine शिक्षा का outcome यह है, किसी को “बुरा” कहना बंद करो।

“मूरखै नालि न लुझीऐ।” “मूर्ख” से “बहस मत करो।”

practical wisdom। अगर सामने वाला कुछ समझने के लिए ready नहीं, energy waste मत करो।

दिल्ली के context में: सोशल मीडिया पर हर रोज़ हम “मूर्खों” से बहस में फँसते हैं। नानक 500 साल पहले बता गए, “लुझीऐ नहीं।” चुपचाप आगे बढ़ो।