आसा-दी-वार का हिस्सा। पूरी 24 पउड़ियों की commentary /asa-di-vaar/ पर है।
अंधी रयति गिआन विहूणी भाहि भरे मुरदारु ॥ गिआनी नचहि वाजे वावहि रूप करहि सीगारु ॥ ऊचे कूकहि वादा गावहि जोधा का वीचारु ॥ मूरख पंडित हिकमति हुजति संजै करहि पिआरु ॥ धरमी धरमु करहि गावावहि मंगहि मोख दुआरु ॥ जती सदावहि जुगति न जाणहि छडि बहहि घर बारु ॥ सभु को पूरा आपे होवै घटि न कोई आखै ॥ पति परवाणा पिछै पाईऐ ता नानक तोलिआ जापै ॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: (इनकी) प्रजा ज्ञान हीन (होने के कारण)।जैसे अंधी हो के तृष्णा (आग) की चट्टी भर रही है (व्यर्थ की मेहनत में लगी हुई है)। जो मनुष्य अपने आप को ज्ञानवान (उपदेषक) कहलवाते हैं।वे नाचते हैं।बाजे बजाते हैं और कई तरह के भेष बदलते हैं और श्रृंगार करते हैं; वे ज्ञानी ऊँचा-ऊँचा चिल्लाते हैं।युद्धों के प्रसंग सुनाते हैं और योद्धाओं की वारों की व्याख्या करते हैं। पढ़े-लिखे मूर्ख निरी चालाकियां करनी और दलीलें देनी ही जानते हैं।(पर) माया इकट्ठी करने में ही जुटे हुए हैं। (जो मनुष्य अपने आप को) धर्मी समझते हैं।वे अपनी ओर से (तो) धर्म का काम करते हैं।पर (सारी) (मेहनत) गवा बैठते हैं।(क्योंकि इसके बदले में) मुक्ति का दर मांगते हैं कि हम मुक्त हो जाएं (भाव।धर्म का काम करते हैं पर निष्काम हो के नहीं।अभी भी वासना के बांधे हैं)। (कई ऐसे हैं जो अपने आप को) जती कहलवाते हैं।पर जती होने की जुगति नहीं जानते (ऐसे ही देखा-देखी) घर-घाट छोड़ जाते हैं। (इस लॅब।पाप।झूठ और काम का इतना प्रभाव है जबा है) (कि जिधर देखो) हरेक जीव अपने आप को पूरा समझदार समझता है।कोई मनुष्य ये नहीं कहता कि मेरे में कोई कमी है।पर। हे नानक ! तभी मनुष्य तोल में (परख की कसौटी पर) पूरा उतरता है अगर तराजू के दूसरे पल्ले में (ईश्वर की दरगाह से मिली हुई) इज्जत रूपी बाँट रखा जाए।अर्थात वही मनुष्य कमी-रहित है।जिसे प्रभू की दरगाह में आदर मिले। 2।
मः 1 ॥ वदी सु वजगि नानका सचा वेखै सोइ ॥ सभनी छाला मारीआ करता करे सु होइ ॥ अगै जाति न जोरु है अगै जीउ नवे ॥ जिन की लेखै पति पवै चंगे सेई केइ ॥3॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ जो बात ईश्वर की ओर से स्थापित की जा चुकी है वही हो के रहेगी।(क्योंकि) वह सच्चा प्रभू (हरेक जीव की खुद) संभाल कर रहा है। सारे जीव अपना-अपना जोर लगाते हैं।पर होता वही है जो करतार करता है। ईश्वर की दरगाह में ना (किसी ऊँच-नीच) जाति (का भेदभाव) है।ना ही (किसी की) जोर-जबरदस्ती (चल सकती) है।क्योंकि वहाँ उन जीवों से वास्ता पड़ता है जो अजनबी हैं (भाव।जो किसी ऊँची जाति व जोर जबर को जानते ही नहीं।इसलिए किसी दबाव में नहीं आते)। वहाँ।वही कोई-कोई मनुष्य ही भले गिने जाते हैं।जिन्हें कर्मों का लेखा होने के समय आदर मिलता है (भाव।जिन्होंने जगत में भले काम किए थे।और इस कारण उन्हें ईश्वर के दर पे आदर मिलता है)। 3।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे प्रभू !) जिन लोगों पर तूने धुर से ही बख्शिश की है।उन्होंने ही मालिक को (भाव।आपको) सिमरा है। इन जीवों के अपने बस में कुछ भी नहीं है (कि आपका सिररन कर सकें)।तूने रंग-बिरंगा जगत पैदा किया है; कई जीवों को आप अपने चरणों में जोड़े रखता है।पर कई जीवों को तूने अपने आप से विछोड़ा हुआ है। जिस (भाग्यशाली) मनुष्य के हृदय में तूने अपने आप की समझ डाल दी है।उसने सतिगुरू की मेहर से आपको पहचान लिया है और वह सहज-स्वभाव ही (अपनी) अस्लियत के साथ ऐक-मेक हैं गया है। 11।
सलोकु मः 1 ॥ दुखु दारू सुखु रोगु भइआ जा सुखु तामि न होई ॥ तूं करता करणा मै नाही जा हउ करी न होई ॥1॥ बलिहारी कुदरति वसिआ ॥ तेरा अंतु न जाई लखिआ ॥1॥ रहाउ ॥ जाति महि जोति जोति महि जाता अकल कला भरपूरि रहिआ ॥ तूं सचा साहिबु सिफति सुआलि॑उ जिनि कीती सो पारि पइआ ॥ कहु नानक करते कीआ बाता जो किछु करणा सु करि रहिआ ॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ (हे प्रभू ! आपकी अजब कुदरति है कि) बिपता (जीवों के रोगों का) इलाज (बन जाती) है।और सुख (उनके लिए) दुख का (कारण) हो जाता है।पर अगर (असली आत्मिक) सुख (जीव को) मिल जाए।तो (दुख) नहीं रहता। हे प्रभू ! आप करणहार करतार है (आप खुद ही इन भेदों को समझता है)।मेरी समर्थता नहीं है (कि मैं समझ सकूँ)।अगर मैं अपने आप को कुछ समझ लूँ (भाव।अगर मैं ये ख्याल करने लग जाऊँ कि मैं आपके भेद को समझ सकता हूँ) तो ये बात फबती नहीं। 1। हे कुदरति में बस रहे करतार ! मैं आपसे सदके हूँ। आपका अंत नहीं पाया जा सकता। 1।रहाउ। सारी सृष्टि में आपका ही नूर बस रहा है।सारे जीवों में आपका ही प्रकाश है।आप सब जगह एक-रस व्यापक है। हे प्रभू ! आप सदा-स्थिर रहने वाला है।आपकी सुंदर सोहानी महानताएं हैं।जिस जिस ने आपके गुण गाए हैं।वह संसार समुंदर से पार हैं गया है। हे नानक ! (आप भी) करतार की सिफत सालाह कर।(और कह कि) प्रभू जो कुछ करना ठीक समझता है वही वह कर रहा है (भाव।उसके कामों में किसी का दख़ल नहीं है)। 1।
मः 2 ॥ जोग सबदं गिआन सबदं बेद सबदं ब्राहमणह ॥ खत्री सबदं सूर सबदं सूद्र सबदं परा क्रितह ॥ सरब सबदं एक सबदं जे को जाणै भेउ ॥ नानकु ता का दासु है सोई निरंजन देउ ॥3॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: महला 2 ॥ जोग का धर्म ज्ञान प्राप्त करना है (ब्रहम की विचार करना है)।ब्राहमण का धर्म वेदों की विचार है। खत्रियों का धर्म सूरमे वाले काम करना है।और शूद्रों का धर्म दूसरों की सेवा करनी। पर सबका मुख्य धर्म ये है कि प्रभू का सिमरन करें।जो मनुष्य इस भेद को समझता है। नानक उसका दास है।वह मनुष्य प्रभू का रूप है। 2।
मः 2 ॥ एक क्रिसनं सरब देवा देव देवा त आतमा ॥ आतमा बासुदेवस्यि जे को जाणै भेउ ॥ नानकु ता का दासु है सोई निरंजन देउ ॥4॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: महला 2॥ एक परमात्मा ही सारे देवताओं की आत्मा है।देवताओं के देवतों की भी आत्मा है। जो मनुष्य प्रभू की आत्मा का भेद जान लेता है। नानक उस मनुष्य का दास है।वह परमात्मा का रूप है। 3।
मः 1 ॥ कुंभे बधा जलु रहै जल बिनु कुंभु न होइ ॥ गिआन का बधा मनु रहै गुर बिनु गिआनु न होइ ॥5॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (जैसे) पानी घड़े (आदि बरतनों) में ही बंधा हुआ (भाव।पड़ा हुआ एक जगह) टिका रह सकता है। (वैसे ही) (गुरू के) ज्ञान (भाव।उपदेश) का बंधा हुआ ही मन (एक जगह) टिका रह सकता है।(अर्थात।विकारों की तरफ नहीं दौड़ता)।(जैसे) पानी के बिना घड़ा नहीं बन सकता (वैसे ही) गुरू के बिना ज्ञान पैदा नहीं हो सकता। 4।
पउड़ी ॥ पड़िआ होवै गुनहगारु ता ओमी साधु न मारीऐ ॥ जेहा घाले घालणा तेवेहो नाउ पचारीऐ ॥ ऐसी कला न खेडीऐ जितु दरगह गइआ हारीऐ ॥ पड़िआ अतै ओमीआ वीचारु अगै वीचारीऐ ॥ मुहि चलै सु अगै मारीऐ ॥12॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ अगर पढ़ा-लिखा मनुष्य मंदकर्मी हो जाए (तो इसे देख के अनपढ़ मनुष्य को घबराना नहीं चाहिए कि पढ़े-लिखे का ये हाल।तो अनपढ़ का क्या बनेगा।क्योंकि अगर) अनपढ़ मनुष्य नेक है तो उसे मार नहीं पड़ती।(निपटारा मनुष्य की कमाई पर होता है।पढ़ने या ना पढ़ने का मूल्य नहीं पड़ता)। मनुष्य जैसी करतूत करता है।उसका वैसा ही नाम बन जाता है; (इसलिए) ऐसी खेल नहीं खेलनी चाहिए जिसके कारण दरगाह में जा के (मानस जनम की) बाजी हार बैठें। मनुष्य चाहे पढ़ा हो चाहे अनपढ़।प्रभू की दरगाह में केवल प्रभू के गुणो की विचार ही कबूल पड़ती है। जो मनुष्य (इस जगत में) अपनी मर्जी के अनुसार ही चलता है।वह आगे जा के मार खाता है। 12।
आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(इनकी) प्रजा ज्ञान हीन (होने के कारण)।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।