अंग 396

अंग
396
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗੁਰੁ ਨਾਨਕ ਜਾ ਕਉ ਭਇਆ ਦਇਆਲਾ ॥ ਸੋ ਜਨੁ ਹੋਆ ਸਦਾ ਨਿਹਾਲਾ ॥੪॥੬॥੧੦੦॥
गुरु नानक जा कउ भइआ दइआला ॥ सो जनु होआ सदा निहाला ॥४॥६॥१००॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह,) जिस मनुष्य पर गुरू दयावान हो जाता है वह मनुष्य आत्मिक आनंद पाता है। 4। 6। 100।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਸਾਚੈ ਦੀਆ ਭੇਜਿ ॥
ਚਿਰੁ ਜੀਵਨੁ ਉਪਜਿਆ ਸੰਜੋਗਿ ॥
ਉਦਰੈ ਮਾਹਿ ਆਇ ਕੀਆ ਨਿਵਾਸੁ ॥
ਮਾਤਾ ਕੈ ਮਨਿ ਬਹੁਤੁ ਬਿਗਾਸੁ ॥੧॥
ਜੰਮਿਆ ਪੂਤੁ ਭਗਤੁ ਗੋਵਿੰਦ ਕਾ ॥
ਪ੍ਰਗਟਿਆ ਸਭ ਮਹਿ ਲਿਖਿਆ ਧੁਰ ਕਾ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਦਸੀ ਮਾਸੀ ਹੁਕਮਿ ਬਾਲਕ ਜਨਮੁ ਲੀਆ ॥
ਮਿਟਿਆ ਸੋਗੁ ਮਹਾ ਅਨੰਦੁ ਥੀਆ ॥
ਗੁਰਬਾਣੀ ਸਖੀ ਅਨੰਦੁ ਗਾਵੈ ॥
ਸਾਚੇ ਸਾਹਿਬ ਕੈ ਮਨਿ ਭਾਵੈ ॥੨॥
ਵਧੀ ਵੇਲਿ ਬਹੁ ਪੀੜੀ ਚਾਲੀ ॥
ਧਰਮ ਕਲਾ ਹਰਿ ਬੰਧਿ ਬਹਾਲੀ ॥
ਮਨ ਚਿੰਦਿਆ ਸਤਿਗੁਰੂ ਦਿਵਾਇਆ ॥
ਭਏ ਅਚਿੰਤ ਏਕ ਲਿਵ ਲਾਇਆ ॥੩॥
ਜਿਉ ਬਾਲਕੁ ਪਿਤਾ ਊਪਰਿ ਕਰੇ ਬਹੁ ਮਾਣੁ ॥
ਬੁਲਾਇਆ ਬੋਲੈ ਗੁਰ ਕੈ ਭਾਣਿ ॥
ਗੁਝੀ ਛੰਨੀ ਨਾਹੀ ਬਾਤ ॥
ਗੁਰੁ ਨਾਨਕੁ ਤੁਠਾ ਕੀਨੀ ਦਾਤਿ ॥੪॥੭॥੧੦੧॥
आसा महला ५ ॥
सतिगुर साचै दीआ भेजि ॥
चिरु जीवनु उपजिआ संजोगि ॥
उदरै माहि आइ कीआ निवासु ॥
माता कै मनि बहुतु बिगासु ॥१॥
जंमिआ पूतु भगतु गोविंद का ॥
प्रगटिआ सभ महि लिखिआ धुर का ॥ रहाउ ॥
दसी मासी हुकमि बालक जनमु लीआ ॥
मिटिआ सोगु महा अनंदु थीआ ॥
गुरबाणी सखी अनंदु गावै ॥
साचे साहिब कै मनि भावै ॥२॥
वधी वेलि बहु पीड़ी चाली ॥
धरम कला हरि बंधि बहाली ॥
मन चिंदिआ सतिगुरू दिवाइआ ॥
भए अचिंत एक लिव लाइआ ॥३॥
जिउ बालकु पिता ऊपरि करे बहु माणु ॥
बुलाइआ बोलै गुर कै भाणि ॥
गुझी छंनी नाही बात ॥
गुरु नानकु तुठा कीनी दाति ॥४॥७॥१०१॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई !) सदा कायम रहने वाले परमात्मा ने गुरू (नानक) को (जगत में) भेजा है उसकी संगति (की बरकति) से (सिखों के दिल में) अॅटल आत्मिक जीवन पैदा हो रहा है। (हे भाई ! जैसे जब माँ के) पेट में (बच्चा) आ निवास करता है तो माँ के मन में बहुत खुशी पैदा होती है (वैसे ही सिख के अंदर अटॅल आत्मिक जीवन आनंद पैदा करता है)। 1। (हे भाई ! गुरू नानक) परमात्मा का भक्त पैदा हुआ (परमात्मा का) पुत्र पैदा हुआ (उसकी बरकति से उसकी शरण आने वाले) सारे जीवों के अंदर धुर-दरगाह के (सेवा-भक्ति के) लेख अंकुरित हो रहे हैं।रहाउ। (हे भाई ! जैसे जिस घर में) परमात्मा के हुकम अनुसार दसवें महीने पुत्र पैदा होता है (तो उस घर में से) ग़म मिट जाता है और बड़ा उत्साह होता है; (वैसे ही जो सत्संगी) सहेली गुरू की सिफत सालाह की बाणी गाती है वह आत्मिक आनंद पाती है और वह सदा स्थिर रहने वाले प्रभू के मन को प्यारी लगती है। 2। ये गुरसिख ही (गुरू की परमात्मा की) बढ़ रही बेल हैं।चल रही पीढ़ी हैं। गुरू उन गुरसिखों में परमात्मा की धर्म-सत्ता पक्की करके टिका देता है। सतिगुरू उन्हें मन-इच्छित फल देता है- (हे भाई ! जो भाग्यशाली मनुष्य गुरू की संगति की बरकति से) एक परमात्मा में सुरति जोड़ते हैं वे चिंता से रहित हो जाते हैं3। (गुरसिख अपने गुरू पर यूँ गर्व करता है) जैसे कोई पुत्र अपने पिता पर माण करता है (वह सिख गुरू से सहायता की उम्मीद भी वैसे ही रखता है जैसे पुत्र पिता से) वह जो कुछ बोलता है गुरू का प्रेरित हुआ गुरू की रजा में ही बोलता है (हे भाई !) अब ये कोई लुकी-छिपी बात नहीं है (हर कोई जानता है कि जिस मनुष्य पर) गुरू नानक दयावान होता है (उसे नाम की) दाति देता है । 4। 7। 101।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਰਾਖਿਆ ਦੇ ਹਾਥ ॥
ਪ੍ਰਗਟੁ ਭਇਆ ਜਨ ਕਾ ਪਰਤਾਪੁ ॥੧॥
ਗੁਰੁ ਗੁਰੁ ਜਪੀ ਗੁਰੂ ਗੁਰੁ ਧਿਆਈ ॥
ਜੀਅ ਕੀ ਅਰਦਾਸਿ ਗੁਰੂ ਪਹਿ ਪਾਈ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਰਨਿ ਪਰੇ ਸਾਚੇ ਗੁਰਦੇਵ ॥
ਪੂਰਨ ਹੋਈ ਸੇਵਕ ਸੇਵ ॥੨॥
ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਜੋਬਨੁ ਰਾਖੈ ਪ੍ਰਾਨ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਕਉ ਕੁਰਬਾਨ ॥੩॥੮॥੧੦੨॥
आसा महला ५ ॥
गुर पूरे राखिआ दे हाथ ॥
प्रगटु भइआ जन का परतापु ॥१॥
गुरु गुरु जपी गुरू गुरु धिआई ॥
जीअ की अरदासि गुरू पहि पाई ॥ रहाउ ॥
सरनि परे साचे गुरदेव ॥
पूरन होई सेवक सेव ॥२॥
जीउ पिंडु जोबनु राखै प्रान ॥
कहु नानक गुर कउ कुरबान ॥३॥८॥१०२॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई !) जिस सेवक को पूरा गुरू अपना हाथ दे के (विकार आदि से बचा के) रखता है उसकी शोभा-उपमा (सारे जगत में) प्रगट हो जाती है। 1। (हे भाई !) मैं सदा गुरू को ही याद करता हूँ; सदा गुरू का ही ध्यान धरता हूं। गुरू से ही मैं अपने मन की मांगी हुई जरूरतें हासिल करता हूँ।रहाउ। (हे भाई !) जो सेवक सदा स्थिर प्रभू के रूप सतिगुरू का आसरा लेते हैं उनकी सेवा (की मेहनत) सफल हो जाती है। 2। (गुरू शरण पड़े सेवक की) जिंद कोशरीर कोजोबन कोप्राणों को (विकार आदि से) बचा के रखता है। हे नानक ! कह, (हे भाई !) अपना आप गुरू के हवाले कर देना चाहिए3। 8। 102।
ਆਸਾ ਘਰੁ ੮ ਕਾਫੀ ਮਹਲਾ ੫
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਮੈ ਬੰਦਾ ਬੈ ਖਰੀਦੁ ਸਚੁ ਸਾਹਿਬੁ ਮੇਰਾ ॥
ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਸਭੁ ਤਿਸ ਦਾ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਹੈ ਤੇਰਾ ॥੧॥
ਮਾਣੁ ਨਿਮਾਣੇ ਤੂੰ ਧਣੀ ਤੇਰਾ ਭਰਵਾਸਾ ॥
ਬਿਨੁ ਸਾਚੇ ਅਨ ਟੇਕ ਹੈ ਸੋ ਜਾਣਹੁ ਕਾਚਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੇਰਾ ਹੁਕਮੁ ਅਪਾਰ ਹੈ ਕੋਈ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਏ ॥
ਜਿਸੁ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਭੇਟਸੀ ਸੋ ਚਲੈ ਰਜਾਏ ॥੨॥
ਚਤੁਰਾਈ ਸਿਆਣਪਾ ਕਿਤੈ ਕਾਮਿ ਨ ਆਈਐ ॥
ਤੁਠਾ ਸਾਹਿਬੁ ਜੋ ਦੇਵੈ ਸੋਈ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ॥੩॥
ਜੇ ਲਖ ਕਰਮ ਕਮਾਈਅਹਿ ਕਿਛੁ ਪਵੈ ਨ ਬੰਧਾ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਕੀਤਾ ਨਾਮੁ ਧਰ ਹੋਰੁ ਛੋਡਿਆ ਧੰਧਾ ॥੪॥੧॥੧੦੩॥
आसा घरु ८ काफी महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मै बंदा बै खरीदु सचु साहिबु मेरा ॥
जीउ पिंडु सभु तिस दा सभु किछु है तेरा ॥१॥
माणु निमाणे तूं धणी तेरा भरवासा ॥
बिनु साचे अन टेक है सो जाणहु काचा ॥१॥ रहाउ ॥
तेरा हुकमु अपार है कोई अंतु न पाए ॥
जिसु गुरु पूरा भेटसी सो चलै रजाए ॥२॥
चतुराई सिआणपा कितै कामि न आईऐ ॥
तुठा साहिबु जो देवै सोई सुखु पाईऐ ॥३॥
जे लख करम कमाईअहि किछु पवै न बंधा ॥
जन नानक कीता नामु धर होरु छोडिआ धंधा ॥४॥१॥१०३॥

हिन्दी अर्थ: आसा घरु ८ काफी महला ५ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! मेरा मालिक सदा कायम रहने वाला है।मैं उसका मूल्य खरीदा ग़ुलाम हूँ। मेरी ये जिंद।मेरा ये शरीर सब कुछ उस मालिक प्रभू का ही दिया हुआ है। हे प्रभू ! मेरे पास जो कुछ भी है सब तेरा ही बख्शा हुआ है। 1। हे प्रभू ! मुझ निमाणे का तू ही माण है।मुझे तेरा ही भरोसा है। (हे भाई ! जिस मनुष्य को) सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के बिना कोई और झाक टिकी रहे।तो समझो कि वह अभी कमजोर जीवन वाला है। 1।रहाउ। हे प्रभू ! तेरा हुकम बेअंत है।कोई जीव तेरे हुकम का अंत नहीं पा सकता। (तेरी मेहर से) जिस मनुष्य को गुरू मिल जाता है।वह तेरे हुकम में चलता है। 2। (हे भाई ! सुखों की खातिर मनुष्य अनेकों) चतुराईआं और समझदारियां (करता है।पर कोई समझदारी।कोई चतुराई) किसी काम नहीं आती; वही सुख प्राप्त किया जा सकता है जो सुख मालिक प्रभू खुद प्रसन्न हो के देता है। 3। (हे भाई ! दुनियां में सुख-दुखों का चक्कर चलता रहता है।दुखों की निर्वित्ती के वास्ते) अगर लाखों ही (निहित धार्मिक) कर्म किए जाएं तो भी (दुखों की राह में) कोई रोक नहीं पड़ सकती। हे दास नानक ! (कह,) मैंने तो परमात्मा के नाम को ही आसरा बनाया है।और (सुखों की खातिर) और दौड़-भाग छोड़ दी है। 4। 1। 103।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸਰਬ ਸੁਖਾ ਮੈ ਭਾਲਿਆ ਹਰਿ ਜੇਵਡੁ ਨ ਕੋਈ ॥
ਗੁਰ ਤੁਠੇ ਤੇ ਪਾਈਐ ਸਚੁ ਸਾਹਿਬੁ ਸੋਈ ॥੧॥
ਬਲਿਹਾਰੀ ਗੁਰ ਆਪਣੇ ਸਦ ਸਦ ਕੁਰਬਾਨਾ ॥
ਨਾਮੁ ਨ ਵਿਸਰਉ ਇਕੁ ਖਿਨੁ ਚਸਾ ਇਹੁ ਕੀਜੈ ਦਾਨਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਭਾਗਠੁ ਸਚਾ ਸੋਇ ਹੈ ਜਿਸੁ ਹਰਿ ਧਨੁ ਅੰਤਰਿ ॥
आसा महला ५ ॥
सरब सुखा मै भालिआ हरि जेवडु न कोई ॥
गुर तुठे ते पाईऐ सचु साहिबु सोई ॥१॥
बलिहारी गुर आपणे सद सद कुरबाना ॥
नामु न विसरउ इकु खिनु चसा इहु कीजै दाना ॥१॥ रहाउ ॥
भागठु सचा सोइ है जिसु हरि धनु अंतरि ॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई !) मैंने (दुनिया के) सारे सुखों को खोज के देखा है परमात्मा के मिलाप के बराबर का और कोई सुख नहीं।और वह सदा कायम रहने वाला मालिक-परमात्मा प्रसन्न हुए गुरू के द्वारा ही मिल सकता है। 1। (हे भाई !) मैं अपने गुरू से सदा सदके होता हूँ सदा कुर्बान जाता हूँ (मैं गुरू के पास अरजोई करता हूँ-हे गुरू !) मुझे ये दान दे कि मैं परमात्मा का नाम एक छिन वास्ते भी एक पल वास्ते भी ना भुलाऊँ। 1।रहाउ। हे भाई ! जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का नाम-धन बसता हो वही (असल) शाहूकार है।

संदर्भ: यह अंग 396 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

दिल्ली की Pollution-Day की शाम, AQI 400, और घर के अंदर कुछ साँस।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 47 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 396” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 397 →, पीछे का: ← अंग 395

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।