अंग 474, आसा की वार (सिम्बल का पेड़)

SGGS, Ang
474
आसा की वार, पौड़ी 21 और 22
राग: राग आसा · रचयिता: गुरु नानक देव जी · महला 1
पढ़ने का समय: लगभग 3 मिनट
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॥ सलोक मः १ ॥ सिमल रुखु सराइरा अति दीरघ अति मुचु ॥ ओइ जि आवहि आस करि जाहि निरासे कितु ॥ फल फिके फुल बकबके कमि न आवहि पत ॥ मिठतु नीवी नानका गुण चंगिआईआ ततु ॥ सभु को निवै आप कउ पर कउ निवै न कोइ ॥ धरि ताराजू तोलीऐ निवै सु गउरा होइ ॥ अपराधी दूणा निवै जो हंता मिरगाहि ॥ सीसि निवाइऐ किआ थीऐ जा रिदै कुसुधे जाहि ॥१॥

यह सलोक नानक की सबसे famous tree-metaphor में से एक है, सिम्बल का पेड़।

“सिमल रुखु सराइरा।” “सिम्बल का पेड़ ‘सराइरा’ (very tall, sky-touching)।” “अति दीरघ अति मुचु।” “बहुत लंबा, बहुत बड़ा।”

सिम्बल यानी silk-cotton tree। पंजाब-haryana में बहुत मिलता है। बहुत ऊँचा, बहुत मोटा, impressive दिखने में।

“ओइ जि आवहि आस करि, जाहि निरासे कितु।” “वो जो उम्मीद कर के आते हैं, क्यों निराश जाते हैं?”

सिम्बल इतना big-impressive है कि पंछी “आस” से आते हैं (कि कुछ फल मिले), मगर…

“फल फिके फुल बकबके।” “फल ‘फीके’ (insipid), फूल ‘बकबके’ (tasteless)।” “कमि न आवहि पत।” “पत्ते भी काम नहीं आते।”

सिम्बल की reality: बड़ा show, मगर actual value कम। फल खाने लायक़ नहीं, फूल भी बेस्वाद, पत्ते भी useless।

यह सबसे sharp observation है। बहुत बड़े-बड़े लोग जो impressive दिखते हैं, मगर genuine value में कुछ नहीं देते।

“मिठतु नीवी नानका, गुण चंगिआईआ ततु।” नानक कहते हैं, “मिठास, नम्रता ही” “अच्छाई का तत्त्व।”

opposite quality praise हो रही है। नम्रता ही “मीठा” है। बड़े-बड़े पेड़ नहीं, छोटे, झुके हुए जो असली “मीठा” फल देते हैं।

“सभु को निवै आप कउ, पर कउ निवै न कोइ।” “सब अपने (फायदे के) लिए झुकते हैं, दूसरे के लिए कोई नहीं झुकता।”

यह precise observation है। “humility” का दिखावा करते हैं, मगर वो भी self-serving है।

दिल्ली के networking culture में यह perfectly applies। हम “polite” बहुत होते हैं, मगर एक “ask” का purpose है पीछे।

“धरि ताराजू तोलीऐ, निवै सु गउरा होइ।” “तराजू पर तोला जाए, झुका हुआ (pan) ‘भारी’ होता है।”

यह beautiful metaphor है। तराजू में जो pan भारी होती है, वो नीचे झुकती है। यानी genuine humility का indicator यह है कि “weight” है, substance है।

“अपराधी दूणा निवै, जो हंता मिरगाहि।” “अपराधी दूना झुकता है, जो (शिकारी) मृग को मारता है।”

और opposite example: शिकारी मृग को मारने के लिए double झुक जाता है। यानी “झुकना” भी छल हो सकता है।

“सीसि निवाइऐ किआ थीऐ, जा रिदै कुसुधे जाहि।” “सिर झुकाने से क्या होगा,” “जब हृदय में ‘कुसुध’ (impurity) हो?”

closing: तो असली humility outer pose नहीं, inner state है। हृदय शुद्ध होना चाहिए, तभी झुकना matter करता है।

दिल्ली में हम सब बहुत “polite gestures” carry करते हैं, “namaste,” “thank you,” “after you।” मगर अंदर क्या है? नानक का question: हृदय में “कुसुधता” तो नहीं?

देखें: गीता 13.7-10, “अमानित्वम् अदम्भित्वम्” (asli humility और दिखावा-रहित)
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॥ पउड़ी ॥ आपे हीरा रतनु आपे जुहर ॥ आपे जंतर जिनसु आपे जोखणहारु ॥ आपे तोलि तोलाइ आपणै हथि करतारु ॥ करतारु आपे लखाएसी आपणी सोझी सार ॥ आपहु जापै तिनी जाणिआ जा कउ नदरि करे करतारु ॥२१॥

पौड़ी 21 एक meditative loop है। हर line में “आपे” (वो ख़ुद)।

“आपे हीरा रतनु आपे जुहर।” “वो ख़ुद हीरा है, ख़ुद रतन है, ख़ुद ‘जौहर’ (gem-trader, expert)।” यानी देखने वाला, देखी जाने वाली चीज़, और देखने का माप, तीनों वही।

“आपे जंतर जिनसु आपे जोखणहारु।” “वो ख़ुद यंत्र (scale, weighing instrument), ख़ुद ‘जिनसु’ (item being weighed), ख़ुद ‘जोखणहारु’ (weigher)।”

यह advaita का beautiful expansion है। तीनों entities (knower, known, knowing) एक ही हैं।

“आपे तोलि तोलाइ, आपणै हथि करतारु।” “ख़ुद तोलता है, तौलवाता है, अपने हाथ में करतार है।”

सारी activity एक hand में। यह “letting go” का foundation है। हम कोई agent नहीं हैं। वो agent है।

“करतारु आपे लखाएसी आपणी सोझी सार।” “करतार ख़ुद ‘लखाएगा’ (दिखाएगा), अपनी ‘सोझी’ (समझ) का ‘सार’ (essence)।”

यानी असली समझ ख़ुद से नहीं आती। वो “दिखाता” है, जब चाहता है।

closing: “आपहु जापै तिनी जाणिआ, जा कउ नदरि करे करतारु।” “अपने आप जापने वाले (genuine seekers) ही जानते हैं, जिन पर करतार नज़र करता है।”

दिल्ली में हम सब “self-knowledge” pursue करते हैं, courses, retreats, books। नानक कह रहे हैं, self-knowledge actually grace है। वो “नज़र करे” तो जान पाओगे।

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॥ पउड़ी ॥ सचा साहिबु एकु तूं जिनि सचो सचु वरताइआ ॥ जिसु तूं देहि तिसु मिलै सचु ता तिनी सचु कमाइआ ॥ सतिगुरि मिलिऐ सचु पाइआ जिन्ह कै हिरदै सचु वसाइआ ॥ मूरख सचु न जाणन्ही मनमुखी जनमु गवाइआ ॥ विचि दुनीआ काहे आइआ ॥२२॥

पौड़ी 22 – यह वही pauri है जो Ang 470 पर भी आई थी। आसा की वार में कुछ pauris repeat होती हैं, या बहुत similar आती हैं। यह वार के structure का part है, कुछ themes बार-बार आते हैं।

“सचा साहिबु एकु तूं।” “सच्चा साहिब एक तू।” “जिनि सचो सचु वरताइआ।” “जिसने सच्चा सच फैलाया।”

opening एक familiar refrain है, “एक सच एक साहिब।”

“जिसु तूं देहि तिसु मिलै सचु, ता तिनी सचु कमाइआ।” “जिसको तू देता है, उसको सच मिलता है, तब उसने सच कमाया।”

सच मिलना भी कृपा से, और कृपा मिलने पर ही कमाया जाता है।

“सतिगुरि मिलिऐ सचु पाइआ, जिन्ह कै हिरदै सचु वसाइआ।” “सतगुरु मिलने पर सच पाया, जिनके हृदय में सच वसाया।”

“मूरख सचु न जाणन्ही, मनमुखी जनमु गवाइआ।” “मूर्ख सच नहीं जानते, मनमुखी जनम गँवाते हैं।”

closing: “विचि दुनीआ काहे आइआ।” “दुनिया में क्यों आए”?

और यह refrain – “हम क्यों आए?” अगर सच नहीं पाया, गुरु से नहीं जुड़े, तो आना ही meaningless।

यह आसा की वार के closing कुछ pauris में बार-बार आता है, urgency को build करने के लिए। हर रोज़ की सुबह की kirtan में सिख इस सवाल को carry करते हैं।