आसा-दी-वार का हिस्सा। पूरी 24 पउड़ियों की commentary /asa-di-vaar/ पर है।
पउड़ी ॥ आपे ही करणा कीओ कल आपे ही तै धारीऐ ॥ देखहि कीता आपणा धरि कची पकी सारीऐ ॥ जो आइआ सो चलसी सभु कोई आई वारीऐ ॥ जिस के जीअ पराण हहि किउ साहिबु मनहु विसारीऐ ॥ आपण हथी आपणा आपे ही काजु सवारीऐ ॥20॥
गुरु अंगद देव जी की शिक्षक-वाली शान्त-दृष्टि यहाँ काम कर रही है। 1539 में गुरु-गद्दी पर बैठने के बाद, उन्होंने गुरमुखी लिपि को व्यवस्थित किया, जिससे आगे की वाणी संग्रहित हो सकी।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी। (हे प्रभू !) तूने खुद ही ये सृष्टि रची है और तूने खुद ही इसमें (जीवात्मा रूपी) सत्ता डाली है। अच्छे-बुरे जीवों को पैदा करके।अपने पैदा किए हुओं की आप खुद ही संभाल कर रहा है। जो भी जीव इस दुनिया में आया है, वह चला जाएगा। अपनी बारी आने पर सभी ने जाना ही होता है। (हे भाई !) जिस प्रभू के दिए हुए ये शरीर और प्राण हैं।उस मालिक को मन से कभी नहीं भुलाना चाहिए। (जब तक ये शरीर और प्राण मिले हुए हैं।उद्यम कर के) अपने हाथों से अपना काम आप ही सँवारना चाहिए (भाव।ये मनुष्य जन्म हरी के सिमरन के साथ सफल करना चाहिए)। 20।
अंगद जी की वाणी कम है, मगर हर एक रचना में एक संयम झलकता है। 1552 तक उनके गुरु-काल में लिपि-व्यवस्था और संगठन का काम सबसे अधिक हुआ।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 2 ॥ (अगर कोई प्रेमी जीव अपने प्यारे के बिना) किसी और में (भी) चित्त जोड़ ले।तो उसके इश्क को सच्चा इश्क नहीं कहा जा सकता। हे नानक ! वही मनुष्य सच्चा आशिक कहा जा सकता है जो हर समय (अपने ही प्रीतम की याद में) डूबा रहे। (अपने प्यारे द्वारा हुए किसी) अच्छे (काम) को देख के कहे कि ये अच्छा काम है।पर बुरे काम को देख के कहे कि बुरा काम है (भाव।अपनी ओर से आए सुख को हस के कबूल करे।पर दुख को देख के घबरा जाए) वह मनुष्य भी। हे नानक ! सच्चा आशिक नहीं कहा जा सकता।क्योंकि वह लेखे गिन-गिन के प्यार की सांझ बनाता है। 1।
गुरु अंगद देव जी की शिक्षक-वाली शान्त-दृष्टि यहाँ काम कर रही है। 1539 में गुरु-गद्दी पर बैठने के बाद, उन्होंने गुरमुखी लिपि को व्यवस्थित किया, जिससे आगे की वाणी संग्रहित हो सकी।
हिन्दी अर्थ: महला 2 ॥ (जो मनुष्य अपने मालिक प्रभू के हुकम के आगे कभी तो) सिर निवाता है और कभी (उसके किए ऊपर) एतराज करता है।वह (मालिक की रजा के राह पर चलने से) बिल्कुल ही वंचित रहता है। हे नानक ! (ऐसे मनुष्य का) सिर झुकाना और ऐतराज दोनों ही झूठे हैं।इनके दोनों में कोई भी बात (मालिक के दर पर) मंजूर नहीं होती। 2।
पउड़ी ॥ जितु सेविऐ सुखु पाईऐ सो साहिबु सदा सम॑ालीऐ ॥ जितु कीता पाईऐ आपणा सा घाल बुरी किउ घालीऐ ॥ मंदा मूलि न कीचई दे लंमी नदरि निहालीऐ ॥ जिउ साहिब नालि न हारीऐ तेवेहा पासा ढालीऐ ॥ किछु लाहे उपरि घालीऐ ॥21॥
अंगद जी की वाणी कम है, मगर हर एक रचना में एक संयम झलकता है। 1552 तक उनके गुरु-काल में लिपि-व्यवस्था और संगठन का काम सबसे अधिक हुआ।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जिस मालिक का सिमरन करने से सुख मिलता है।उस मालिक को सदा याद रखना चाहिए। जब मनुष्य ने अपने किए का फल खुद ही भोगना है तो फिर कोई बुरी कमाई नहीं करनी चाहिए (जिसका बुरा फल भोगना पड़े)। बुरा काम भूल के भी ना करें।गहरी (विचार वाली) नजर मार के देख लें (कि इस बुरे काम का नतीजा क्या निकलेगा)। कोई ऐसा उद्यम ही करना चाहिए जिससे (प्रभू) पति से (प्रीत) ना टूटे। (मानस जन्म पा के) कोई नफे वाली मेहनत ही करनी चाहिए। 21।
सलोकु महला 2 ॥ चाकरु लगै चाकरी नाले गारबु वादु ॥ गला करे घणेरीआ खसम न पाए सादु ॥ आपु गवाइ सेवा करे ता किछु पाए मानु ॥ नानक जिस नो लगा तिसु मिलै लगा सो परवानु ॥1॥
गुरु अंगद देव जी की शिक्षक-वाली शान्त-दृष्टि यहाँ काम कर रही है। 1539 में गुरु-गद्दी पर बैठने के बाद, उन्होंने गुरमुखी लिपि को व्यवस्थित किया, जिससे आगे की वाणी संग्रहित हो सकी।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 2 ॥ जो कोई नौकर अपने मालिक की नौकरी भी करे।और साथ-साथ अपने मालिक के आगे आकड़ भरी बातें भी करे और ऐसी बाहरी बातें मालिक के सामने करे।तब वह नौकर मालिक की खुशी हासिल नहीं कर सकता। मनुष्य अपना आपा मिटा के (मालिक की) सेवा करे तब ही उसको (मालिक के दर से) कुछ आदर मिलता है।तब ही। हे नानक ! वह मनुष्य अपने उस मालिक को मिलता है जिसकी सेवा में लगा हुआ है।(अपना आप गवा के सेवा में) लगा हुआ मनुष्य ही (मालिक के दर पर) कबूल होता है। 1।
अंगद जी की वाणी कम है, मगर हर एक रचना में एक संयम झलकता है। 1552 तक उनके गुरु-काल में लिपि-व्यवस्था और संगठन का काम सबसे अधिक हुआ।
हिन्दी अर्थ: महला 2 ॥ जो कुछ मनुष्य के दिल में होता है वही प्रगट होता है (भाव।जैसी मनुष्य की नीयत होती है वैसे ही उसे फल लगता है)।(अगर अंदर नीयत कुछ और हो।तो उसके उलट) मुंह से कह देना व्यर्थ है। ये कैसी आश्चर्य भरी बात है कि मनुष्य बीजता तो जहर है (भाव।नीयत तो विकारों की तरफ है) (पर उसके फल के रूप में) मांगता अमृत है। 2।
गुरु अंगद देव जी की शिक्षक-वाली शान्त-दृष्टि यहाँ काम कर रही है। 1539 में गुरु-गद्दी पर बैठने के बाद, उन्होंने गुरमुखी लिपि को व्यवस्थित किया, जिससे आगे की वाणी संग्रहित हो सकी।
हिन्दी अर्थ: महला 2॥ कोई भी मनुष्य परख के देख ले।किसी अंजान से लगाई हुई मित्रता कभी सिरे नहीं चढ़ती। क्योंकि उस अंजान का रवईआ वैसा ही रहता है जैसी उसकी समझ होती है; (इसी तरह उस मूर्ख मन के आगे लगने का कभी कोई लाभ नहीं होता।ये मन अपनी समझ अनुसार विकारों में ही लिए फिरता है)। किसी एक चीज में कोई और चीज तभी पड़ सकती है अगर उसमें से पहली पड़ी हुई चीज निकाल ली जाए; (इस तरह इस मन को प्रभू की तरफ जोड़ने के लिए जरूरी है कि इसका पहला स्वभाव तबदील किया जाए)। पति से हूकम किया हुआ कामयाब नहीं हो सकता।उसके आगे तो विनम्रता ही फबती है। हे नानक ! धोखे का काम करने से धोखा ही होता है।(भाव।जितनी देर मनुष्य दुनिया के धंधों में लगा रहता है।तब तक चिंता में ही फसा रहता है।मन) प्रभू की सिफत सालाह करके ही खिड़ाव में आता है।सही मायने में प्रसन्नता पाता है। 3।
महला 2 ॥ नालि इआणे दोसती वडारू सिउ नेहु ॥ पाणी अंदरि लीक जिउ तिस दा थाउ न थेहु ॥4॥
अंगद जी की वाणी कम है, मगर हर एक रचना में एक संयम झलकता है। 1552 तक उनके गुरु-काल में लिपि-व्यवस्था और संगठन का काम सबसे अधिक हुआ।
हिन्दी अर्थ: महला 2॥ अंजान से मित्रता व अपने से बड़े के साथ प्यार- ये ऐसे ही हैं जैसे पानी में लकीर। उस लकीर का कोई निशान नहीं रहता। 4।
महला 2 ॥ होइ इआणा करे कंमु आणि न सकै रासि ॥ जे इक अध चंगी करे दूजी भी वेरासि ॥5॥
गुरु अंगद देव जी की शिक्षक-वाली शान्त-दृष्टि यहाँ काम कर रही है। 1539 में गुरु-गद्दी पर बैठने के बाद, उन्होंने गुरमुखी लिपि को व्यवस्थित किया, जिससे आगे की वाणी संग्रहित हो सकी।
हिन्दी अर्थ: महला 2॥ अगर कोई अंजान हो और वह कोई काम करे।वह काम सिरे नहीं चढ़ सकता; अगर कोई एक-आध काम वह ठीक कर भी ले तो दूसरे काम को बिगाड़ देगा। 5।
अंगद जी की वाणी कम है, मगर हर एक रचना में एक संयम झलकता है। 1552 तक उनके गुरु-काल में लिपि-व्यवस्था और संगठन का काम सबसे अधिक हुआ।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जो नौकर अपने मालिक की मर्जी के मुताबिक चले (तभी समझो।कि) वह मालिक की नौकरी कर रहा है। एक तो उसे बड़ी इज्जत मिलती है।दूसरा तनख्वाह भी मालिक से दोगुनी लेता है। पर। अगर सेवक अपने मालिक की बराबरी करता है।वह मन में शर्मिंदगी ही उठाता है। अपनी पहली तनख्वाह भी गवा बैठता है और सदा मुंह पर जूतियां खाता है। हे नानक ! जिस मालिक का दिया हुआ खाएं।उसकी सदा उपमा करनी चाहिए; मालिक पर हुकम नहीं किया जा सकता।उसके आगे अर्ज करनी ही फबती है। 12।
सलोकु महला 2 ॥ एह किनेही दाति आपस ते जो पाईऐ ॥
गुरु अंगद देव जी की शिक्षक-वाली शान्त-दृष्टि यहाँ काम कर रही है। 1539 में गुरु-गद्दी पर बैठने के बाद, उन्होंने गुरमुखी लिपि को व्यवस्थित किया, जिससे आगे की वाणी संग्रहित हो सकी।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 2॥ अगर कहें कि मैंने अपने प्रयासों से ये चीज प्राप्त की है।तो यह (मालिक की ओर से) बख्शिश नहीं कहलवा सकती।
आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
अंगद जी के समय गुरमुखी ने अपनी रूप-रेखा पायी। उनकी अपनी रचनाएँ कम मगर पठनीय हैं, और बाद के गुरुओं की वाणी को संग्रहित-करने की संरचना उन्हीं की देन है।
इस अंग पर 11 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।