अंग 427

अंग
427
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਏ ਮਨ ਰੂੜੑੇ ਰੰਗੁਲੇ ਤੂੰ ਸਚਾ ਰੰਗੁ ਚੜਾਇ ॥
ਰੂੜੀ ਬਾਣੀ ਜੇ ਰਪੈ ਨਾ ਇਹੁ ਰੰਗੁ ਲਹੈ ਨ ਜਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਮ ਨੀਚ ਮੈਲੇ ਅਤਿ ਅਭਿਮਾਨੀ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਵਿਕਾਰ ॥
ਗੁਰਿ ਪਾਰਸਿ ਮਿਲਿਐ ਕੰਚਨੁ ਹੋਏ ਨਿਰਮਲ ਜੋਤਿ ਅਪਾਰ ॥੨॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਕੋਇ ਨ ਰੰਗੀਐ ਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਰੰਗੁ ਚੜਾਉ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਭੈ ਭਾਇ ਜੋ ਰਤੇ ਸਿਫਤੀ ਸਚਿ ਸਮਾਉ ॥੩॥
ਭੈ ਬਿਨੁ ਲਾਗਿ ਨ ਲਗਈ ਨਾ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਇ ॥
ਬਿਨੁ ਭੈ ਕਰਮ ਕਮਾਵਣੇ ਝੂਠੇ ਠਾਉ ਨ ਕੋਇ ॥੪॥
ਜਿਸ ਨੋ ਆਪੇ ਰੰਗੇ ਸੁ ਰਪਸੀ ਸਤਸੰਗਤਿ ਮਿਲਾਇ ॥
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਤੇ ਸਤਸੰਗਤਿ ਊਪਜੈ ਸਹਜੇ ਸਚਿ ਸੁਭਾਇ ॥੫॥
ਬਿਨੁ ਸੰਗਤੀ ਸਭਿ ਐਸੇ ਰਹਹਿ ਜੈਸੇ ਪਸੁ ਢੋਰ ॥
ਜਿਨਿੑ ਕੀਤੇ ਤਿਸੈ ਨ ਜਾਣਨੑੀ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਸਭਿ ਚੋਰ ॥੬॥
ਇਕਿ ਗੁਣ ਵਿਹਾਝਹਿ ਅਉਗਣ ਵਿਕਣਹਿ ਗੁਰ ਕੈ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥
ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਤੇ ਨਾਉ ਪਾਇਆ ਵੁਠਾ ਅੰਦਰਿ ਆਇ ॥੭॥
ਸਭਨਾ ਕਾ ਦਾਤਾ ਏਕੁ ਹੈ ਸਿਰਿ ਧੰਧੈ ਲਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੇ ਲਾਇ ਸਵਾਰਿਅਨੁ ਸਬਦੇ ਲਏ ਮਿਲਾਇ ॥੮॥੯॥੩੧॥
ए मन रूड़॑े रंगुले तूं सचा रंगु चड़ाइ ॥
रूड़ी बाणी जे रपै ना इहु रंगु लहै न जाइ ॥१॥ रहाउ ॥
हम नीच मैले अति अभिमानी दूजै भाइ विकार ॥
गुरि पारसि मिलिऐ कंचनु होए निरमल जोति अपार ॥२॥
बिनु गुर कोइ न रंगीऐ गुरि मिलिऐ रंगु चड़ाउ ॥
गुर कै भै भाइ जो रते सिफती सचि समाउ ॥३॥
भै बिनु लागि न लगई ना मनु निरमलु होइ ॥
बिनु भै करम कमावणे झूठे ठाउ न कोइ ॥४॥
जिस नो आपे रंगे सु रपसी सतसंगति मिलाइ ॥
पूरे गुर ते सतसंगति ऊपजै सहजे सचि सुभाइ ॥५॥
बिनु संगती सभि ऐसे रहहि जैसे पसु ढोर ॥
जिनि॑ कीते तिसै न जाणन॑ी बिनु नावै सभि चोर ॥६॥
इकि गुण विहाझहि अउगण विकणहि गुर कै सहजि सुभाइ ॥
गुर सेवा ते नाउ पाइआ वुठा अंदरि आइ ॥७॥
सभना का दाता एकु है सिरि धंधै लाइ ॥
नानक नामे लाइ सवारिअनु सबदे लए मिलाइ ॥८॥९॥३१॥

हिन्दी अर्थ: हे सोहणे मन ! हे रंगीले मन ! (तू अपने पर) सदा कायम रहने वाला नाम-रंग चढ़ा। (हे भाई !) अगर (ये मन) सोहणी सिफत सालाह की बाणी से रंगा जाए।तो (इस का) ये रंग कभी नहीं उतरता कभी दूर नहीं होता। 1।रहाउ। हे भाई ! माया के प्यार में विकारों में फस के हम जीव नीच गंदे आचरण वाले और अहंकारी बन जाते हैं। पारस गुरू को मिल के हम सोना बन जाते हैं।हमारे अंदर बेअंत प्रभू की पवित्र ज्योति जाग पड़ती है। 2। हे भाई ! गुरू की शरण पड़े बिना कोई मनुष्य (नाम-रंग से) रंगा नहीं जा सकता।अ्रगर गुरू मिल जाए तो ही नाम-रंग चढ़ता है। जो मनुष्य गुरू के भय-अदब से गुरू के प्रेम के द्वारा रंगे जाते हैं।सिफत सालाह की बरकति से सदा-स्थिर प्रभू में उनकी लीनता हो जाती है। 3। हे भाई ! डर-अदब के बिना (मन रूपी कपड़े को) पाह नहीं लग सकती (पाह के बिना मन-कपड़े को पक्का प्रेम रंग नहीं चढ़ता) मन साफ-सुथरा नहीं हो सकता। इस डर-अदब के बिना (निहित धार्मिक) कर्म किए भी जाएं तो भी (मनुष्य झूठ का प्रेमी ही रहता है।और झूठे को प्रभू की हजूरी में) जगह नहीं मिलती। 4। हे भाई ! साध-संगति में ला के जिस मनुष्य (के मन) को परमात्मा स्वयं ही नाम-रंग चढ़ाता है वही रंगा जाएगा। साध-संगति पूरे गुरू के द्वारा ही मिलती है (जिसे मिलती है वह) आत्मिक अडोलता में।सदा स्थिर प्रभू में।प्रभू प्रेम में (मस्त रहता है)। 5। साध-संगति के बिना सारे मनुष्य पशुओं की तरह घूमते फिरते हैं। जिस परमात्मा ने उन्हें पैदा किया है उसके साथ सांझ नहीं डालते।उसके नाम के बिना सारे उसके चोर हैं। 6। (हे भाई !) कई मनुष्य ऐसे भी हैं जो गुरू के द्वारा आत्मिक अडोलता में टिके रहते हैं।प्रभू प्रेम में जुड़ते हैं।वे परमात्मा के गुण खरीदते हैं (गुणों के बदले) उनके अवगुण बिक जाते हैं (दूर हो जाते हैं)। गुरू की बताई सेवा की बरकति से वे प्रभू का नाम-सौदा प्राप्त कर लेते हैं।परमात्मा उनके अंदर आ बसता है। 7। (पर हे भाई ! किसी के वश की बात नहीं) परमात्मा खुद ही सब जीवों को सब कुछ देने वाला है।वह खुद ही हरेक जीव को धंधे में लगाता है। हे नानक ! उसने खुद ही अपने नाम में जोड़ के जीवों के जीवन सुंदर बनाए हैं उसने आप ही गुरू के शबद द्वारा जीवों को अपने चरणों में जोड़ा है। 8। 9। 31।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਸਭ ਨਾਵੈ ਨੋ ਲੋਚਦੀ ਜਿਸੁ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਸੋ ਪਾਏ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਸਭੁ ਦੁਖੁ ਹੈ ਸੁਖੁ ਤਿਸੁ ਜਿਸੁ ਮੰਨਿ ਵਸਾਏ ॥੧॥
ਤੂੰ ਬੇਅੰਤੁ ਦਇਆਲੁ ਹੈ ਤੇਰੀ ਸਰਣਾਈ ॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਤੇ ਪਾਈਐ ਨਾਮੇ ਵਡਿਆਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਏਕੁ ਹੈ ਬਹੁ ਬਿਧਿ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਉਪਾਈ ॥
ਹੁਕਮੇ ਕਾਰ ਕਰਾਇਦਾ ਦੂਜਾ ਕਿਸੁ ਕਹੀਐ ਭਾਈ ॥੨॥
ਬੁਝਣਾ ਅਬੁਝਣਾ ਤੁਧੁ ਕੀਆ ਇਹ ਤੇਰੀ ਸਿਰਿ ਕਾਰ ॥
ਇਕਨੑਾ ਬਖਸਿਹਿ ਮੇਲਿ ਲੈਹਿ ਇਕਿ ਦਰਗਹ ਮਾਰਿ ਕਢੇ ਕੂੜਿਆਰ ॥੩॥
ਇਕਿ ਧੁਰਿ ਪਵਿਤ ਪਾਵਨ ਹਹਿ ਤੁਧੁ ਨਾਮੇ ਲਾਏ ॥
ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਤੇ ਸੁਖੁ ਊਪਜੈ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਬੁਝਾਏ ॥੪॥
ਇਕਿ ਕੁਚਲ ਕੁਚੀਲ ਵਿਖਲੀ ਪਤੇ ਨਾਵਹੁ ਆਪਿ ਖੁਆਏ ॥
ਨਾ ਓਨ ਸਿਧਿ ਨ ਬੁਧਿ ਹੈ ਨ ਸੰਜਮੀ ਫਿਰਹਿ ਉਤਵਤਾਏ ॥੫॥
ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਜਿਸੁ ਆਪਣੀ ਤਿਸ ਨੋ ਭਾਵਨੀ ਲਾਏ ॥
ਸਤੁ ਸੰਤੋਖੁ ਇਹ ਸੰਜਮੀ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਸਬਦੁ ਸੁਣਾਏ ॥੬॥
ਲੇਖਾ ਪੜਿ ਨ ਪਹੂਚੀਐ ਕਥਿ ਕਹਣੈ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਇ ॥
ਗੁਰ ਤੇ ਕੀਮਤਿ ਪਾਈਐ ਸਚਿ ਸਬਦਿ ਸੋਝੀ ਪਾਇ ॥੭॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਦੇਹੀ ਸੋਧਿ ਤੂੰ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰਿ ॥
ਨਾਨਕ ਇਸੁ ਦੇਹੀ ਵਿਚਿ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਹੈ ਪਾਈਐ ਗੁਰ ਕੈ ਹੇਤਿ ਅਪਾਰਿ ॥੮॥੧੦॥੩੨॥
आसा महला ३ ॥
सभ नावै नो लोचदी जिसु क्रिपा करे सो पाए ॥
बिनु नावै सभु दुखु है सुखु तिसु जिसु मंनि वसाए ॥१॥
तूं बेअंतु दइआलु है तेरी सरणाई ॥
गुर पूरे ते पाईऐ नामे वडिआई ॥१॥ रहाउ ॥
अंतरि बाहरि एकु है बहु बिधि स्रिसटि उपाई ॥
हुकमे कार कराइदा दूजा किसु कहीऐ भाई ॥२॥
बुझणा अबुझणा तुधु कीआ इह तेरी सिरि कार ॥
इकन॑ा बखसिहि मेलि लैहि इकि दरगह मारि कढे कूड़िआर ॥३॥
इकि धुरि पवित पावन हहि तुधु नामे लाए ॥
गुर सेवा ते सुखु ऊपजै सचै सबदि बुझाए ॥४॥
इकि कुचल कुचील विखली पते नावहु आपि खुआए ॥
ना ओन सिधि न बुधि है न संजमी फिरहि उतवताए ॥५॥
नदरि करे जिसु आपणी तिस नो भावनी लाए ॥
सतु संतोखु इह संजमी मनु निरमलु सबदु सुणाए ॥६॥
लेखा पड़ि न पहूचीऐ कथि कहणै अंतु न पाइ ॥
गुर ते कीमति पाईऐ सचि सबदि सोझी पाइ ॥७॥
इहु मनु देही सोधि तूं गुर सबदि वीचारि ॥
नानक इसु देही विचि नामु निधानु है पाईऐ गुर कै हेति अपारि ॥८॥१०॥३२॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ३ ॥ (हे भाई ! दुखों में घबरा के) सारी दुनिया हरि-नाम की चाहत करती है।पर वही मनुष्य हरि-नाम प्राप्त करता है जिस पर प्रभू स्वयं मेहर करता है। हरि-नाम से टूटने पर (जगत में) निरा दुख ही दुख है।सुख सिर्फ उसे है जिसके मन में प्रभू अपना नाम बसाता है। 1। हे प्रभू ! तू बेअंत है।तू दया का श्रोत है।मैं तेरी शरण आया हूँ। (अगर तेरी मेहर हो तो तेरा नाम) पूरे गुरू से मिलता है।और तेरे नाम की बरकति से (लोक-परलोक में) आदर मिलता है। 1।रहाउ। हे भाई ! परमात्मा ने ये कई रंगों की दुनिया पैदा की हुई है।हरेक के अंदर और सारी दुनिया में वह स्वयं ही बसता है। प्रभू अपने हुकम अनुसार ही सब जीवों से काम करवाता है।कोई और ऐसी समर्था वाला नहीं। 2। हे प्रभू ! समझ और बेसमझी।ये खेल तूने ही रची है।हरेक जीव ने वही करना है जो (तेरी सिर कार लिखी है) तूने उसके लिए फरमाया है (तेरे ही हुकम में कोई समझ वाला और कोई बेसमझी वाला काम करता है)। कई जीवों पर तू बख्शिश करता है (और अपने चरणों में जोड़ लेता है) कई माया-ग्रसित जीवों को अपनी हजूरी में से धक्के मार के बाहर निकाल देता है। 3। हे प्रभू ! कई ऐसे हैं जिन्हें तूने धुर से ही पवित्र जीवन वाले बना दिया है।तूने उन्हें अपने नाम में जोड़ा हुआ है। गुरू की बताई सेवा से उन्हें आत्मिक आनंद मिलता है।गुरू उन्हें सदा-स्थिर हरि-नाम में जोड़ के (सही जीवन की) समझ बख्शता है। 4। हे भाई ! कई ऐसे मनुष्य हैं जो कुचरित्र हैं गंदे हैं दुराचारी हैं।उन्हें परमात्मा ने अपने नाम से तोड़ा हुआ है।उन्होंने जिंदगी में कामयाबी नहीं पाई। सद्-बुद्धि नहीं सीखी।वे अच्छी रहन-सहन (रहणी) वाले नहीं बने।डावाँ-डोल भटकते फिरते हैं। 5। हे भाई ! जिस मनुष्य पर प्रभू मेहर की निगाह करता है उसके अंदर अपने नाम की श्रद्धा पैदा करता है।उसको (गुरू के माध्यम से अपनी सिफत सालाह का) शबद सुनाता है। उसका मन पवित्र हो जाता है।सेवा करनी।संतोषी होना- वह मनुष्य इस किस्म की रहणी वाला बन जाता है। 6। (हे भाई ! प्रभू बेअंत गुणों का मालिक है उसके गुणों का) हिसाब करके (गुणों के आखीर तक कोई) पहुँच नहीं सकता।उसके गुण गिन-गिन के बयान कर-कर के गुणों की गिनती खत्म नहीं की जा सकती। उस प्रभू की कद्र-कीमति (सिर्फ) गुरू से ही मिलती है (कि वह बेअंत है बेअंत है)।गुरू अपने शबद में जोड़ता है।गुरू सदा-स्थिर हरि-नाम में जोड़ता है।और सूझ बख्शता है। 7। हे भाई ! तू अपने इस मन को खोज।अपने शरीर को खोज।गुरू के शबद में जुड़ के विचार कर। सारे सुखों का खजाना हरि-नाम शरीर में ही है।गुरू की अपार मेहर से ही मिलता है। 8। 10। 32।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਸਚਿ ਰਤੀਆ ਸੋਹਾਗਣੀ ਜਿਨਾ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਸੀਗਾਰਿ ॥
आसा महला ३ ॥
सचि रतीआ सोहागणी जिना गुर कै सबदि सीगारि ॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ३ ॥ जिन सुहागिन जीव-सि्त्रयों ने गुरू के शबद द्वारा अपना जीवन सुंदर बना लिया।वह सदा-स्थिर प्रभू के नाम-रंग में रंगी गई।

संदर्भ: यह अंग 427 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।

Punjabi Bagh के gurdwara में अरदास के बाद का calm।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 37 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 427” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 428 →, पीछे का: ← अंग 426

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।