अंग
439
राग आसा
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਓਹੁ ਜੇਵ ਸਾਇਰ ਦੇਇ ਲਹਰੀ ਬਿਜੁਲ ਜਿਵੈ ਚਮਕਏ ॥
ਹਰਿ ਬਾਝੁ ਰਾਖਾ ਕੋਇ ਨਾਹੀ ਸੋਇ ਤੁਝਹਿ ਬਿਸਾਰਿਆ ॥
ਸਚੁ ਕਹੈ ਨਾਨਕੁ ਚੇਤਿ ਰੇ ਮਨ ਮਰਹਿ ਹਰਣਾ ਕਾਲਿਆ ॥੧॥
ਭਵਰਾ ਫੂਲਿ ਭਵੰਤਿਆ ਦੁਖੁ ਅਤਿ ਭਾਰੀ ਰਾਮ ॥
ਮੈ ਗੁਰੁ ਪੂਛਿਆ ਆਪਣਾ ਸਾਚਾ ਬੀਚਾਰੀ ਰਾਮ ॥
ਬੀਚਾਰਿ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮੁਝੈ ਪੂਛਿਆ ਭਵਰੁ ਬੇਲੀ ਰਾਤਓ ॥
ਸੂਰਜੁ ਚੜਿਆ ਪਿੰਡੁ ਪੜਿਆ ਤੇਲੁ ਤਾਵਣਿ ਤਾਤਓ ॥
ਜਮ ਮਗਿ ਬਾਧਾ ਖਾਹਿ ਚੋਟਾ ਸਬਦ ਬਿਨੁ ਬੇਤਾਲਿਆ ॥
ਸਚੁ ਕਹੈ ਨਾਨਕੁ ਚੇਤਿ ਰੇ ਮਨ ਮਰਹਿ ਭਵਰਾ ਕਾਲਿਆ ॥੨॥
ਮੇਰੇ ਜੀਅੜਿਆ ਪਰਦੇਸੀਆ ਕਿਤੁ ਪਵਹਿ ਜੰਜਾਲੇ ਰਾਮ ॥
ਸਾਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਮਨਿ ਵਸੈ ਕੀ ਫਾਸਹਿ ਜਮ ਜਾਲੇ ਰਾਮ ॥
ਮਛੁਲੀ ਵਿਛੁੰਨੀ ਨੈਣ ਰੁੰਨੀ ਜਾਲੁ ਬਧਿਕਿ ਪਾਇਆ ॥
ਸੰਸਾਰੁ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਮੀਠਾ ਅੰਤਿ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਇਆ ॥
ਭਗਤਿ ਕਰਿ ਚਿਤੁ ਲਾਇ ਹਰਿ ਸਿਉ ਛੋਡਿ ਮਨਹੁ ਅੰਦੇਸਿਆ ॥
ਸਚੁ ਕਹੈ ਨਾਨਕੁ ਚੇਤਿ ਰੇ ਮਨ ਜੀਅੜਿਆ ਪਰਦੇਸੀਆ ॥੩॥
ਨਦੀਆ ਵਾਹ ਵਿਛੁੰਨਿਆ ਮੇਲਾ ਸੰਜੋਗੀ ਰਾਮ ॥
ਜੁਗੁ ਜੁਗੁ ਮੀਠਾ ਵਿਸੁ ਭਰੇ ਕੋ ਜਾਣੈ ਜੋਗੀ ਰਾਮ ॥
ਕੋਈ ਸਹਜਿ ਜਾਣੈ ਹਰਿ ਪਛਾਣੈ ਸਤਿਗੁਰੂ ਜਿਨਿ ਚੇਤਿਆ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਮ ਹਰਿ ਕੇ ਭਰਮਿ ਭੂਲੇ ਪਚਹਿ ਮੁਗਧ ਅਚੇਤਿਆ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਭਗਤਿ ਨ ਰਿਦੈ ਸਾਚਾ ਸੇ ਅੰਤਿ ਧਾਹੀ ਰੁੰਨਿਆ ॥
ਸਚੁ ਕਹੈ ਨਾਨਕੁ ਸਬਦਿ ਸਾਚੈ ਮੇਲਿ ਚਿਰੀ ਵਿਛੁੰਨਿਆ ॥੪॥੧॥੫॥
ਹਰਿ ਬਾਝੁ ਰਾਖਾ ਕੋਇ ਨਾਹੀ ਸੋਇ ਤੁਝਹਿ ਬਿਸਾਰਿਆ ॥
ਸਚੁ ਕਹੈ ਨਾਨਕੁ ਚੇਤਿ ਰੇ ਮਨ ਮਰਹਿ ਹਰਣਾ ਕਾਲਿਆ ॥੧॥
ਭਵਰਾ ਫੂਲਿ ਭਵੰਤਿਆ ਦੁਖੁ ਅਤਿ ਭਾਰੀ ਰਾਮ ॥
ਮੈ ਗੁਰੁ ਪੂਛਿਆ ਆਪਣਾ ਸਾਚਾ ਬੀਚਾਰੀ ਰਾਮ ॥
ਬੀਚਾਰਿ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮੁਝੈ ਪੂਛਿਆ ਭਵਰੁ ਬੇਲੀ ਰਾਤਓ ॥
ਸੂਰਜੁ ਚੜਿਆ ਪਿੰਡੁ ਪੜਿਆ ਤੇਲੁ ਤਾਵਣਿ ਤਾਤਓ ॥
ਜਮ ਮਗਿ ਬਾਧਾ ਖਾਹਿ ਚੋਟਾ ਸਬਦ ਬਿਨੁ ਬੇਤਾਲਿਆ ॥
ਸਚੁ ਕਹੈ ਨਾਨਕੁ ਚੇਤਿ ਰੇ ਮਨ ਮਰਹਿ ਭਵਰਾ ਕਾਲਿਆ ॥੨॥
ਮੇਰੇ ਜੀਅੜਿਆ ਪਰਦੇਸੀਆ ਕਿਤੁ ਪਵਹਿ ਜੰਜਾਲੇ ਰਾਮ ॥
ਸਾਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਮਨਿ ਵਸੈ ਕੀ ਫਾਸਹਿ ਜਮ ਜਾਲੇ ਰਾਮ ॥
ਮਛੁਲੀ ਵਿਛੁੰਨੀ ਨੈਣ ਰੁੰਨੀ ਜਾਲੁ ਬਧਿਕਿ ਪਾਇਆ ॥
ਸੰਸਾਰੁ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਮੀਠਾ ਅੰਤਿ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਇਆ ॥
ਭਗਤਿ ਕਰਿ ਚਿਤੁ ਲਾਇ ਹਰਿ ਸਿਉ ਛੋਡਿ ਮਨਹੁ ਅੰਦੇਸਿਆ ॥
ਸਚੁ ਕਹੈ ਨਾਨਕੁ ਚੇਤਿ ਰੇ ਮਨ ਜੀਅੜਿਆ ਪਰਦੇਸੀਆ ॥੩॥
ਨਦੀਆ ਵਾਹ ਵਿਛੁੰਨਿਆ ਮੇਲਾ ਸੰਜੋਗੀ ਰਾਮ ॥
ਜੁਗੁ ਜੁਗੁ ਮੀਠਾ ਵਿਸੁ ਭਰੇ ਕੋ ਜਾਣੈ ਜੋਗੀ ਰਾਮ ॥
ਕੋਈ ਸਹਜਿ ਜਾਣੈ ਹਰਿ ਪਛਾਣੈ ਸਤਿਗੁਰੂ ਜਿਨਿ ਚੇਤਿਆ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਮ ਹਰਿ ਕੇ ਭਰਮਿ ਭੂਲੇ ਪਚਹਿ ਮੁਗਧ ਅਚੇਤਿਆ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਭਗਤਿ ਨ ਰਿਦੈ ਸਾਚਾ ਸੇ ਅੰਤਿ ਧਾਹੀ ਰੁੰਨਿਆ ॥
ਸਚੁ ਕਹੈ ਨਾਨਕੁ ਸਬਦਿ ਸਾਚੈ ਮੇਲਿ ਚਿਰੀ ਵਿਛੁੰਨਿਆ ॥੪॥੧॥੫॥
ओहु जेव साइर देइ लहरी बिजुल जिवै चमकए ॥
हरि बाझु राखा कोइ नाही सोइ तुझहि बिसारिआ ॥
सचु कहै नानकु चेति रे मन मरहि हरणा कालिआ ॥१॥
भवरा फूलि भवंतिआ दुखु अति भारी राम ॥
मै गुरु पूछिआ आपणा साचा बीचारी राम ॥
बीचारि सतिगुरु मुझै पूछिआ भवरु बेली रातओ ॥
सूरजु चड़िआ पिंडु पड़िआ तेलु तावणि तातओ ॥
जम मगि बाधा खाहि चोटा सबद बिनु बेतालिआ ॥
सचु कहै नानकु चेति रे मन मरहि भवरा कालिआ ॥२॥
मेरे जीअड़िआ परदेसीआ कितु पवहि जंजाले राम ॥
साचा साहिबु मनि वसै की फासहि जम जाले राम ॥
मछुली विछुंनी नैण रुंनी जालु बधिकि पाइआ ॥
संसारु माइआ मोहु मीठा अंति भरमु चुकाइआ ॥
भगति करि चितु लाइ हरि सिउ छोडि मनहु अंदेसिआ ॥
सचु कहै नानकु चेति रे मन जीअड़िआ परदेसीआ ॥३॥
नदीआ वाह विछुंनिआ मेला संजोगी राम ॥
जुगु जुगु मीठा विसु भरे को जाणै जोगी राम ॥
कोई सहजि जाणै हरि पछाणै सतिगुरू जिनि चेतिआ ॥
बिनु नाम हरि के भरमि भूले पचहि मुगध अचेतिआ ॥
हरि नामु भगति न रिदै साचा से अंति धाही रुंनिआ ॥
सचु कहै नानकु सबदि साचै मेलि चिरी विछुंनिआ ॥४॥१॥५॥
हरि बाझु राखा कोइ नाही सोइ तुझहि बिसारिआ ॥
सचु कहै नानकु चेति रे मन मरहि हरणा कालिआ ॥१॥
भवरा फूलि भवंतिआ दुखु अति भारी राम ॥
मै गुरु पूछिआ आपणा साचा बीचारी राम ॥
बीचारि सतिगुरु मुझै पूछिआ भवरु बेली रातओ ॥
सूरजु चड़िआ पिंडु पड़िआ तेलु तावणि तातओ ॥
जम मगि बाधा खाहि चोटा सबद बिनु बेतालिआ ॥
सचु कहै नानकु चेति रे मन मरहि भवरा कालिआ ॥२॥
मेरे जीअड़िआ परदेसीआ कितु पवहि जंजाले राम ॥
साचा साहिबु मनि वसै की फासहि जम जाले राम ॥
मछुली विछुंनी नैण रुंनी जालु बधिकि पाइआ ॥
संसारु माइआ मोहु मीठा अंति भरमु चुकाइआ ॥
भगति करि चितु लाइ हरि सिउ छोडि मनहु अंदेसिआ ॥
सचु कहै नानकु चेति रे मन जीअड़िआ परदेसीआ ॥३॥
नदीआ वाह विछुंनिआ मेला संजोगी राम ॥
जुगु जुगु मीठा विसु भरे को जाणै जोगी राम ॥
कोई सहजि जाणै हरि पछाणै सतिगुरू जिनि चेतिआ ॥
बिनु नाम हरि के भरमि भूले पचहि मुगध अचेतिआ ॥
हरि नामु भगति न रिदै साचा से अंति धाही रुंनिआ ॥
सचु कहै नानकु सबदि साचै मेलि चिरी विछुंनिआ ॥४॥१॥५॥
हिन्दी अर्थ: (वैसे है भी थोड़ा समय रहने वाला) जैसे समुंद्र से लहरें निकलती है वैसे ही बिजली से चमक निकलती है। परमात्मा (के नाम) के बिना और कोई (सदा साथ निभने वाला) रक्षक नहीं (हे हिरन की तरह खरमस्ती करने वाले मन !) उसे तू भुलाए बैठा है। नानक कहता है, हे काले हिरन ! हे मन ! सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा को सिमर।वरना (इस जगत फुलवाड़ी में मस्त हो के) तू अपने लिए आत्मिक मौत सहेड़ लेगा। 1। हे (हरेक) फूल पर उड़ने वाले भौरे (मन !) (फूल-फूल की सुगंधि लेते फिरने में से) बड़ा भारी दुख निकलता है। मैंने अपने (उस) गुरू से पूछा है जो सदा-स्थिर प्रभू को सदा अपने विचार-मण्डल में टिकाए रखता है। (हे भौरे मन ! तेरी ये हालत) विचार के मैंने गुरू से पूछा है कि ये मन-भंवरा तो वेलों-फूलों पे (दुनिया के सुंदर पदार्थों के रसों में) मस्त हो रहा है (इसका क्या बनेगा। मुझे गुरू ने समझा दिया है कि) जब जिंदगी की रात समाप्त हो जाती है (जब दिन चढ़ जाता है) ये शरीर धराशाही हो जाता है (विकारों में फंसे रहने के कारण जीव ऐसे दुखी होता है जैसे) तेल तौड़ी में डाल के अबाला जाता है। हे (दुनिया के पदार्थों में मस्त हुए) भूत ! स्तिगुरू के शबद से टूट के तू यमराज के रास्ते में बँधा हुआ चोटें ही खाएगा। नानक कहता है, हे मेरे मन ! सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा को सिमर।वरना भंवरे (की तरह फूलों में मस्त हुए मन !) आत्मिक मौत सहेड़ लेगा। 2। हे मेरी परदेसी जीवात्मा ! तू क्यूँ (माया के) जंजाल में फंस रही है। अगर सदा-स्थिर रहने वाला मालिक तेरे मन में बसता हो तो तू (माया के मोह रूपी) जम के पसरे हुए जाल में क्यूँ फसे। (हे मेरी जीवात्मा ! देख) जब शिकारी ने (पानी में) जाल डाला होता है और मछली (चारे की लालच में फस कर जाल में फंस जाती है और पानी से) विछुड़ जाती है तब आँखें भर के रोती है (इसी तरह जीव को) ये जगत मीठा लगता है। माया का मोह मीठा लगता है।पर (फस के) अंत में ये भुलेखा दूर होता है (जब जीवात्मा दुखों के चुंगल में आती है तो मायावी पदार्थ साथ छोड़ जाते हैं)। हे मेरी जीवात्मा ! परमात्मा के चरनों में चित्त जोड़ के भक्ति करके इस तरह अपने मन में से फिक्र-अंदेशे दूर कर ले। नानक कहता है, हे मेरे परदेसी जीयड़े ! हे मेरे मन ! सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा को सिमर। 3। नदियों से विछुड़ी हुई धाराओं का (नदियों से दुबारा) मेल बड़े भाग्यों से ही होता है (इसी तरह माया के मोह में फस के प्रभू से विछुड़े हुए जीव दुबारा सौभाग्य से ही मिलते हैं)। जो कोई विरला (एक आध) मनुष्य प्रभू-चरणों में जुड़ता है वही समझ लेता है कि माया का मोह है तो मीठा पर सदा जहर से भरा रहता है (और जीव को आत्मिक मौत मार देता है)। ऐसा कोई विरला आदमी जिसने अपने गुरू को याद रखा है आत्मिक अडोलता में टिक के इसी अस्लियत को समझता है और परमात्मा से सांझ डालता है। परमात्मा के नाम के बिना माया के मोह की भटकना में गलत रास्ते पर पड़ कर अनेकों मूर्ख गाफिल जीव दुखी होते हैं। जो लोग परमात्मा का नाम नहीं सिमरते।प्रभू की भक्ति नहीं करते।अपने हृदय में सदा-स्थिर प्रभू को नहीं बसाते।वे आखिर जोर-जोर से रोते हैं। नानक कहता है, सदा-स्थिर प्रभू अपनी सिफत सालाह के शबद में जोड़ के चिरों से विछुड़े हुए जीवों को (अपने चरणों में) मिला देता है। 4।
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੩ ਛੰਤ ਘਰੁ ੧ ॥
ਹਮ ਘਰੇ ਸਾਚਾ ਸੋਹਿਲਾ ਸਾਚੈ ਸਬਦਿ ਸੁਹਾਇਆ ਰਾਮ ॥
ਧਨ ਪਿਰ ਮੇਲੁ ਭਇਆ ਪ੍ਰਭਿ ਆਪਿ ਮਿਲਾਇਆ ਰਾਮ ॥
ਪ੍ਰਭਿ ਆਪਿ ਮਿਲਾਇਆ ਸਚੁ ਮੰਨਿ ਵਸਾਇਆ ਕਾਮਣਿ ਸਹਜੇ ਮਾਤੀ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਸੀਗਾਰੀ ਸਚਿ ਸਵਾਰੀ ਸਦਾ ਰਾਵੇ ਰੰਗਿ ਰਾਤੀ ॥
ਆਪੁ ਗਵਾਏ ਹਰਿ ਵਰੁ ਪਾਏ ਤਾ ਹਰਿ ਰਸੁ ਮੰਨਿ ਵਸਾਇਆ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਸਵਾਰੀ ਸਫਲਿਉ ਜਨਮੁ ਸਬਾਇਆ ॥੧॥
ਦੂਜੜੈ ਕਾਮਣਿ ਭਰਮਿ ਭੁਲੀ ਹਰਿ ਵਰੁ ਨ ਪਾਏ ਰਾਮ ॥
ਕਾਮਣਿ ਗੁਣੁ ਨਾਹੀ ਬਿਰਥਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਏ ਰਾਮ ॥
ਬਿਰਥਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਏ ਮਨਮੁਖਿ ਇਆਣੀ ਅਉਗਣਵੰਤੀ ਝੂਰੇ ॥
ਆਪਣਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਤਾ ਪਿਰੁ ਮਿਲਿਆ ਹਦੂਰੇ ॥
ਦੇਖਿ ਪਿਰੁ ਵਿਗਸੀ ਅੰਦਰਹੁ ਸਰਸੀ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਸੁਭਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਕਾਮਣਿ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਣੀ ਮਿਲਿ ਪ੍ਰੀਤਮ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ॥੨॥
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੩ ਛੰਤ ਘਰੁ ੧ ॥
ਹਮ ਘਰੇ ਸਾਚਾ ਸੋਹਿਲਾ ਸਾਚੈ ਸਬਦਿ ਸੁਹਾਇਆ ਰਾਮ ॥
ਧਨ ਪਿਰ ਮੇਲੁ ਭਇਆ ਪ੍ਰਭਿ ਆਪਿ ਮਿਲਾਇਆ ਰਾਮ ॥
ਪ੍ਰਭਿ ਆਪਿ ਮਿਲਾਇਆ ਸਚੁ ਮੰਨਿ ਵਸਾਇਆ ਕਾਮਣਿ ਸਹਜੇ ਮਾਤੀ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਸੀਗਾਰੀ ਸਚਿ ਸਵਾਰੀ ਸਦਾ ਰਾਵੇ ਰੰਗਿ ਰਾਤੀ ॥
ਆਪੁ ਗਵਾਏ ਹਰਿ ਵਰੁ ਪਾਏ ਤਾ ਹਰਿ ਰਸੁ ਮੰਨਿ ਵਸਾਇਆ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਸਵਾਰੀ ਸਫਲਿਉ ਜਨਮੁ ਸਬਾਇਆ ॥੧॥
ਦੂਜੜੈ ਕਾਮਣਿ ਭਰਮਿ ਭੁਲੀ ਹਰਿ ਵਰੁ ਨ ਪਾਏ ਰਾਮ ॥
ਕਾਮਣਿ ਗੁਣੁ ਨਾਹੀ ਬਿਰਥਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਏ ਰਾਮ ॥
ਬਿਰਥਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਏ ਮਨਮੁਖਿ ਇਆਣੀ ਅਉਗਣਵੰਤੀ ਝੂਰੇ ॥
ਆਪਣਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਤਾ ਪਿਰੁ ਮਿਲਿਆ ਹਦੂਰੇ ॥
ਦੇਖਿ ਪਿਰੁ ਵਿਗਸੀ ਅੰਦਰਹੁ ਸਰਸੀ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਸੁਭਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਕਾਮਣਿ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਣੀ ਮਿਲਿ ਪ੍ਰੀਤਮ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ॥੨॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आसा महला ३ छंत घरु १ ॥
हम घरे साचा सोहिला साचै सबदि सुहाइआ राम ॥
धन पिर मेलु भइआ प्रभि आपि मिलाइआ राम ॥
प्रभि आपि मिलाइआ सचु मंनि वसाइआ कामणि सहजे माती ॥
गुर सबदि सीगारी सचि सवारी सदा रावे रंगि राती ॥
आपु गवाए हरि वरु पाए ता हरि रसु मंनि वसाइआ ॥
कहु नानक गुर सबदि सवारी सफलिउ जनमु सबाइआ ॥१॥
दूजड़ै कामणि भरमि भुली हरि वरु न पाए राम ॥
कामणि गुणु नाही बिरथा जनमु गवाए राम ॥
बिरथा जनमु गवाए मनमुखि इआणी अउगणवंती झूरे ॥
आपणा सतिगुरु सेवि सदा सुखु पाइआ ता पिरु मिलिआ हदूरे ॥
देखि पिरु विगसी अंदरहु सरसी सचै सबदि सुभाए ॥
नानक विणु नावै कामणि भरमि भुलाणी मिलि प्रीतम सुखु पाए ॥२॥
आसा महला ३ छंत घरु १ ॥
हम घरे साचा सोहिला साचै सबदि सुहाइआ राम ॥
धन पिर मेलु भइआ प्रभि आपि मिलाइआ राम ॥
प्रभि आपि मिलाइआ सचु मंनि वसाइआ कामणि सहजे माती ॥
गुर सबदि सीगारी सचि सवारी सदा रावे रंगि राती ॥
आपु गवाए हरि वरु पाए ता हरि रसु मंनि वसाइआ ॥
कहु नानक गुर सबदि सवारी सफलिउ जनमु सबाइआ ॥१॥
दूजड़ै कामणि भरमि भुली हरि वरु न पाए राम ॥
कामणि गुणु नाही बिरथा जनमु गवाए राम ॥
बिरथा जनमु गवाए मनमुखि इआणी अउगणवंती झूरे ॥
आपणा सतिगुरु सेवि सदा सुखु पाइआ ता पिरु मिलिआ हदूरे ॥
देखि पिरु विगसी अंदरहु सरसी सचै सबदि सुभाए ॥
नानक विणु नावै कामणि भरमि भुलाणी मिलि प्रीतम सुखु पाए ॥२॥
हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। आसा महला ३ छंत घरु १ ॥ (हे सखी !) मेरे (हृदय-) घर में सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह का गीत चल रहा है।सदा स्थिर प्रभू की सिफत सालाह वाले गुर-शबद ने (मेरे हृदय-घर को) सोहाना बना दिया है। (हे सखी ! उस) जीव-स्त्री का प्रभू पति के साथ मिलाप होता है जिसे प्रभू ने स्वयं ही (अपने चरणों में) जोड़ लिया। प्रभू ने जिस जीव-स्त्री को खुद (अपने चरणों में) जोड़ा।अपना सदा-स्थिर नाम उसके मन में बसा दिया।वह जीव-स्त्री (फिर) आत्मिक अडोलता में मस्त रहती है। गुरू के शबद ने (उस जीव स्त्री के जीवन को) श्रृंगार दिया।सदा-स्थिर हरी नाम ने (उसके जीवन को) सुंदर बना दिया।वह (फिर) प्रभू के प्रेम रंग में रंगी हुई सदा ही (प्रभू-मिलाप का आनंद) लेती है। (जब जीव-स्त्री अपने अंदर से) अहंकार दूर करती है (और अपने अंदर) प्रभू-पति को ढूँढ लेती है तब वह प्रभू के नाम का स्वाद अपने मन में (सदा के लिए) बसा लेती है। हे नानक ! कह,गुरू के शबद की बरकति से जिस जीव-स्त्री का आत्मिक जीवन सोहाना बन जाता है उसकी सारी जिंदगी कामयाब हो जाती है। 1। (हे सखी !) जो जीव-स्त्री (प्रभू के बिना माया आदि की) और ही भटकनों में पड़ के गलत रास्ते पर पड़ जाती है उसे प्रभू-पति का मिलाप नहीं होता। वह जीव-स्त्री (अपने अंदर कोई आत्मिक) गुण पैदा नहीं करती।वह अपनी जिंदगी व्यर्थ गवा देती है। अपने मन के पीछे चलने वाली वह मूर्ख जीव-स्त्री जीवन व्यर्थ गवा देती है अवगुणों से भरी होने के कारण वह अपने अंदर ही अंदर दुखी होती रहती है। पर जब उसने अपने गुरू के द्वारा बताई सेवा करके सदा टिके रहने वाला आत्मिक आनंद ढूँढा तब उसे प्रभू-पति अंग-संग बसता ही मिल गया।(अपने अंदर) प्रभू-पति को देख के वह खिल गई। वह अंतरात्मे आनंद-मगन हो गई।वह सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह वाले गुरू-शबद में प्रभू-प्रेम में लीन हो गई। हे नानक ! प्रभू के नाम से विछुड़ के जीव-स्त्री भटकने के कारण गलत राह पर पड़ी रहती है प्रीतम प्रभू को मिल के आत्मिक आनंद पाती है। 2।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 439 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
CBSE board-exam का दिन सुबह, बच्चा pencil-box check कर रहा, माँ चुप।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 35 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 439” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 440 →, पीछे का: ← अंग 438।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।