अंग 468, आसा की वार (सूतक का खंडन)

SGGS, Ang
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आसा की वार, पौड़ी 11 (सूतक का खंडन)
राग: राग आसा · रचयिता: गुरु नानक देव जी · महला 1
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यह अंग आसा की वार का सबसे famous social-commentary point है, “सूतक” (ritual impurity) का खंडन। हिन्दू परंपरा में जन्म और मृत्यु से connect होने पर एक “सूतक” काल होता है, जब आदमी “अशुद्ध” माना जाता है। नानक एक irrefutable case पेश करते हैं, अगर सूतक मानें, तो हर चीज़ “अशुद्ध” है, क्योंकि जन्म और मृत्यु तो हर जगह हैं।
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॥ सलोक मः १ ॥ जे करि सूतकु मंनीऐ सभ तै सूतकु होइ ॥ गोहे अतै लकड़ी अंदरि कीड़ा होइ ॥ जेते दाणे अंन के जीआ बाझु न कोइ ॥ पहिला पाणी जीउ है जितु हरिआ सभु कोइ ॥ सूतकु किउ करि रखीऐ सूतकु पवै रसोइ ॥ नानक सूतकु एव न उतरै गिआनु उतारे धोइ ॥१॥

यह नानक का सबसे elegant logical demolition है। एक religious belief को ज़मीन-दोस्त करते हैं, with airtight logic।

“जे करि सूतकु मंनीऐ।” अगर “सूतक” मानें (कि कुछ चीज़ें ritually impure हैं)। “सभ तै सूतकु होइ।” तो “सब” में सूतक है।

यह opening statement है। If P, then all P।

फिर examples: “गोहे अतै लकड़ी अंदरि कीड़ा होइ।” “गोबर” और “लकड़ी” के अंदर “कीड़े” होते हैं।

गोबर fuel है, खाना पकाने के लिए। लकड़ी भी। यानी जिस चीज़ पर खाना पकाओ, उसमें भी जीव-हत्या होती है।

“जेते दाणे अंन के, जीआ बाझु न कोइ।” “अनाज के दाने” “जीव बिना” नहीं हैं।

हर अनाज एक जीवित बीज है। अगर “जीव-हत्या” से सूतक है, तो खाना ही असंभव है।

“पहिला पाणी जीउ है, जितु हरिआ सभु कोइ।” सबसे पहले “पानी” “जीव” है (जिससे सब “हरा” (alive) होता है)।

यह advanced scientific observation भी है। पानी ही life का foundation है। तो पानी कैसे “impure” हो सकता है?

“सूतकु किउ करि रखीऐ, सूतकु पवै रसोइ।” “सूतक कैसे रखें,” जब “सूतक रसोई” (kitchen) तक में आ जाता है?

यानी अगर “सूतक” मानें, तो रसोई कभी “शुद्ध” हो ही नहीं सकती। पूरा concept तर्क से fail है।

“नानक सूतकु एव न उतरै, गिआनु उतारे धोइ।” नानक कहते हैं, “सूतक” इस तरह नहीं उतरता, “ज्ञान” “धो कर” “उतारता” है।

यानी ritual purity का concept ही misconceived है। असली impurity अज्ञान है, और उसका remedy ज्ञान।

दिल्ली में आज भी “सूतक” practice है कुछ families में। 13 दिन का sutak जन्म पर, कुछ दिन का death पर। नानक का argument 500 साल पुराना है, मगर equally relevant।

और यह सिर्फ़ Hindu rituals को target नहीं। हर culture में कुछ “ritual purity” notions हैं। नानक एक universal principle establish कर रहे हैं, “external purity vs. internal purity, only internal matters.”

देखें: छांदोग्य उपनिषद् 7.26.2, “आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः” (food purity → mind purity, मगर non-ritualistic sense में) · गीता 13.7-11, “ज्ञान” का definition (real purity = inner)
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॥ मः १ ॥ मन का सूतकु लोभु है जिहवा सूतकु कूड़ु ॥ अखी सूतकु वेखणा पर तृअ पर धन रूपु ॥ कंनी सूतकु कंनि पै लाइतबारी खाहि ॥ नानक हंसा आदमी बधे जम पुरि जाहि ॥२॥

दूसरा सलोक, और यहाँ नानक “असली सूतक” define कर रहे हैं।

“मन का सूतकु लोभु है।” “मन” का सूतक “लोभ” है।

यानी अगर कुछ “impure” है मन में, वो ritual contact नहीं, “लोभ” है।

“जिहवा सूतकु कूड़ु।” “जीभ” का सूतक “कूड़” (झूठ) है।

जिह्वा शुद्ध तब है जब उससे सच निकले। जब झूठ निकले, “सूतक।”

“अखी सूतकु वेखणा, पर तृअ पर धन रूपु।” “आँखों” का सूतक है “देखना” “पराई स्त्री,” “पराया धन,” “रूप।”

यानी अगर आँखें दूसरों की चीज़ें (बीवी, पैसा, beauty) पर “लग” रही हैं, यह “impurity” है।

“कंनी सूतकु कंनि पै, लाइतबारी खाहि।” “कानों” का सूतक है, “कान पर” “लाइतबारी” (gossip, चुगली) “खाना।”

यानी अगर कान चुगली सुनने में busy हैं, यह “impure” हैं।

“नानक हंसा आदमी, बधे जम पुरि जाहि।” नानक कहते हैं, “हंस-जैसा आदमी,” “बँधा हुआ” “यम-पुरी” “जाता” है।

यानी जो आदमी असली sense में “हंस” बन सकता था (शुद्ध, royal), अपनी real impurities के कारण “बँधा हुआ” यमपुरी जाता है।

दिल्ली में हम सब “impurity” से बचने में बहुत effort लगाते हैं, sanitizers, RO water, organic food। नानक कह रहे हैं, internal impurity से सावधान। वो ज़्यादा damaging है।

और जो impurities नानक list कर रहे हैं, lust, greed, gossip, lying, यह आज भी everyone को affect करती हैं। ज़्यादा हम “external purity” पर focus करते हैं, उतना ज़्यादा हम internal impurity से conveniently bach जाते हैं।

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॥ पउड़ी ॥ सति संगति कैसी जाणीऐ ॥ जिथै एको नामु वखाणीऐ ॥ एको नामु हुकमु है नानक सतिगुरि दीआ बुझाइ जीउ ॥११॥

पौड़ी 11 बहुत compact है। यह सब critique के बाद, एक positive direction।

“सति संगति कैसी जाणीऐ।” “सत्संगति” (true company) कैसी पहचानी जाए?

यह key question है। हम सब community ढूँढ़ रहे हैं। मगर कौनसी genuine है, कैसे पता?

“जिथै एको नामु वखाणीऐ।” “जहाँ एक नाम कहा जाए।”

यह simple criterion है। जहाँ हरि का नाम केंद्र में हो, वो सत्संगति।

दिल्ली के context में: हम सब कई groups में हैं, professional, social, family, religious। नानक कह रहे हैं, सबसे important वो group है जहाँ “नाम” centre में है।

यह कोई exclusive religious group की बात नहीं। यह genuine spiritual focus की बात है। चाहे hangout, चाहे satsang, चाहे gym, agar वहाँ “नाम” का orientation है, यह सत्संगति है।

“एको नामु हुकमु है।” “एक नाम का हुकम है।”

यानी एक नाम का “हुकम” (cosmic order) है। पूरी सृष्टि उसी एक “नाम” से चलती है। यह जपजी के “हुकमी हुकम” का echo है।

“नानक सतिगुरि दीआ बुझाइ जीउ।” नानक कहते हैं, “सतगुरु” ने “बुझाया” (समझाया, lit up) है।

यानी यह सब समझ ख़ुद से नहीं आती। सतगुरु से आती है। कृपा से आती है।

इस closing के साथ, नानक एक gentle reminder दे रहे हैं, “मैं भी समझाने वाला नहीं हूँ। सतगुरु ने मुझे भी समझाया। आप भी ऐसी positions में हो जाइए जहाँ सतगुरु आपको समझा सके।”

देखें: जपजी साहिब, “हुकमी हुकम चलाए राहु” (पौड़ी 2)