आसा-दी-वार का हिस्सा। पूरी 24 पउड़ियों की commentary /asa-di-vaar/ पर है।
सतिगुरु भेटे सो सुखु पाए ॥ हरि का नामु मंनि वसाए ॥ नानक नदरि करे सो पाए ॥ आस अंदेसे ते निहकेवलु हउमै सबदि जलाए ॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य को गुरू मिल गया है (असल) सुख वही पाता है। वह (भाग्यशाली) ईश्वर का नाम अपने हृदय में (टिकाता) है। (पर) हे नानक ! गुरू भी उसी को ही मिलता है जिस पे आप दातार मेहर की नजर करता है। उस संसार की आशाओं और फिक्रों से निर्लिप हैं के गुरू के शबद द्वारा अपने अहम् को जला देता है। 2।
पउड़ी ॥ भगत तेरै मनि भावदे दरि सोहनि कीरति गावदे ॥ नानक करमा बाहरे दरि ढोअ न लहन॑ी धावदे ॥ इकि मूलु न बुझनि॑ आपणा अणहोदा आपु गणाइदे ॥ हउ ढाढी का नीच जाति होरि उतम जाति सदाइदे ॥ तिन॑ मंगा जि तुझै धिआइदे ॥9॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे प्रभू !) आपको अपने मन में भगत प्यारे लगते हैं।जो आपकी सिफत सालाह कर रहे हैं और आपके दर पर शोभा पा रहे हैं। हे नानक ! भाग्यहीन मनुष्य भटकते फिरते हैं।उन्हें प्रभू के दर पर जगह नहीं मिलती। (क्योंकि) ये (विचारे) अपने असल को नहीं समझते।(ईश्वरीय गुणों की पूँजी अपने अंदर) हुए बिना ही अपने आप को बड़ा जतलाते हैं। (हे प्रभू !) मैं नीच जाति वाला (आपके दर का) एक अदना सा ढाढी हूँ।और लोग (अपने आप को) ऊँची जाति वाला कहलवाते हैं। जो आपका भजन करते हैं।मैं उनसे (आपका ‘नाम’) मांगता हूँ। 9।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ ये सारा जगत छल रूप है (जैसे मदारी का सारा तमाशा एक छलावा है)।(इसमें कोई) राजा (है।और कई लोग) प्रजा हैं। ये भी (मदारी के रूपए और खोपे आदि दिखाने के तरह) छल ही हैं।(इस जगत में कहीं इन राजाओं के) शामियाने व महल-माढ़ियां (है।ये) भी छल रूप हैं।और इनमें बसने वाला (राजा) भी छल ही है। सोना।चाँदी (और सोने-चाँदी को पहनने वाले भी) भरम ही हैं। ये शारीरिक आकार।(सुंदर-सुंदर) कपड़े और (शरीरों का) बेअंत सुंदर रूप ये भी सारे ही छलावे ही हैं।(प्रभू-मदारी।ये तमाशे आए हुए जीवों को खुश करने के लिए दिखा रहा है)। (प्रभू ने कहीं) मनुष्य (बना दिए।तो कहीं) सि्त्रयां; ये सारे भी छल रूप हैं।जो (इस स्त्री-मर्द वाले संबंध-रूपी छल में) खचित हो के ख्वार हो रहे हैं। (इस दृष्टमान) छल में फसे हुए जीव का छल में ही मोह बन गया है।इसलिए इसे अपने को पैदा करने वाला भूल गया है। (इसे याद नहीं रह गया कि) सारा जगत नाशवंत है।किसी के साथ भी मोह नहीं डालना चाहिए। (ये सारा जगत है तो छल।पर ये) छल (सारे जीवों को) प्यारा लग रहा है।शहद (की तरह) मीठा लगता है।इस तरह ये छल सारे जीवों को डुबो रहा है। (हे प्रभू !) नानक (आपके आगे) अर्ज करता है कि आपके बिना (ये जगत) छल है। 1।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (जगत रूपी छल की ओर से वासना पलट के।जगत की) अस्लियत की समझ तभी आती है जब वह अस्लियत का मालिक (ईश्वर) मनुष्य के हृदय में टिक जाए। तब माया के छल का असर मन से दूर हो जाता है (फिर मन के साथ शरीर भी सुंदर हो जाता है।शारीरिक इन्द्रियां भी गलत राह पर जाने से हट जाती हैं।जैसे) शरीर धुल के साफ हो जाता है। (माया-छल की ओर से मन के विचार हट के।कुदरत की) अस्लियत की समझ तभी आती है।जब मनुष्य उस अस्लियत में मन जोड़ता है। (तभी उस अस्लियत वाले का) नाम सुन के मनुष्य का मन खिलता है और उसे (माया के बंधनों से) स्वतंत्र होने का रास्ता मिल जाता है। जगत के असल।प्रभू की समझ तब ही पड़ती है।जब मनुष्य ईश्वरीय जीवन (गुजारने की) युक्ति जानता हैं।भाव। शरीर रूपी धरती को तैयार करके इसमें प्रभू का नाम बीज दे। सच की परख तभी होती है।जब सच्ची शिक्षा (गुरू से) ले और (उस शिक्षा पर चल के) सब जीवों पर तरस करने की जाच सीखे और (जरूरतमंदों को) कुछ दान-पुन्न करे। उस धुर-अंदर की अस्लियत से तभी जान-पहिचान बनती है जब मनुष्य धुर-अंदर के तीर्थ में टिके। अपने गुरू से उपदेश ले के उस अंदर के तीर्थ में बैठा रहे।वहीं सदा निवास रखे। नानक अर्ज करता है जिन मनुष्यों के हृदय में अस्लियत का मालिक प्रभू टिका हुआ है।उनके सारे दुखों का इलाज वह स्वयं बन जाता है। (क्योंकि वह) सारे विकारों को (उस हृदय में से) धो के निकाल देता है (जहाँ वह बस रहा है)। 2।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ (मेरा ये चित्त करता है कि मुझे संतों के) पैरों की ख़ाक का दान मिले।अगर ये दान मिल जाए।तो माथे पर लगानी चाहिए। (और) लालच।जो माया के जाल में ही फसाता है।छोड़ देना चाहिए।और मन को केवल प्रभू में जोड़ के उसकी भक्ति करनी चाहिए। (क्योंकि) मनुष्य जिस तरह की कार करता है।वैसा ही फल उसे मिल जाता है।पर। संत-जनों के पैरों की ख़ाक तभी मिलती है अगर अच्छे भाग्य हों। (गुरमुखों का आसरा छोड़ के) यदि अपनी होछी सी मति (तुच्छ बुद्धि) की टेक रखें तो (इस के आसरे) की हुई मेहनत व्यर्थ जाती है। 10।
सलोकु मः 1 ॥ सचि कालु कूड़ु वरतिआ कलि कालख बेताल ॥ बीउ बीजि पति लै गए अब किउ उगवै दालि ॥ जे इकु होइ त उगवै रुती हू रुति होइ ॥ नानक पाहै बाहरा कोरै रंगु न सोइ ॥ भै विचि खुंबि चड़ाईऐ सरमु पाहु तनि होइ ॥ नानक भगती जे रपै कूड़ै सोइ न कोइ ॥1॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ (संसारिक जीवों के हृदय में से) सच उड़ गया है और झूठ ही झूठ प्रधान हो रहा है।कलियुग की (पापों की) कालिख के कारण जीव भूतने बन रहे हैं (भाव।जगत का मोह प्रबल हो रहा है।जगत के सृजनहार से सांझ बनाने का ख्याल जीवों के दिलों में से दूर हो रहा है।और सिमरन के बिना जीव मानो भूतने हैं)। जिन्होंने (हरी का नाम) बीज (अपने हृदयों में) बीजा।वे इस जगत से शोभा कमा के गए।पर अब (नाम का) अंकुर फूटने से रह गया है (क्योंकि मन) दाल की तरह (दो-फाड़ हो रहे हैं।भाव।दुचित्तेपन के कारण जीवों का मन नाम में नहीं जुड़ता)। बीज उगता तब ही है।अगर दाना (बीज) साबत हो और बीजने की ऋतु भी फबवीं हो।(इसी तरह रॅब का नाम-अंकुर भी तभी फूटता है अगर मन साबत हो।अगर पूर्ण तौर पर ईश्वर की ओर लगा रहे और समय अमृत बेला भी गवाया ना जाए)। हे नानक ! अगर लाग ना बरती जाए तो कोरे कपड़े को वह (सुंदर पक्का) रंग नहीं चढ़ता (जो लाग बरतने से चढ़ता है।इस तरह अगर इस कोरे मन को रॅब के नाम-रंग में सुंदर रंग देना हो। तो पहले इसे) ईश्वर के डर रूपी खुंब में रखें; फिर मेहनत और उद्यम की पाह दें। (इसके बाद) हे नानक ! अगर (इस मन को) रॅब की भगती में रंगा जाए।तो माया-छल इसके नजदीक भी नहीं फटकती। 1।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (जगत में जीवों के लिए) जीभ का चस्का।मानो।राजा है।पाप मंत्री है और झूठ चौधरी है। (यहाँ लब और पाप के दरबार में) काम नायब है।इसे बुला के सलाह पूछी जाती है।यही इनका बड़ा सलाहकार है।
आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिस मनुष्य को गुरू मिल गया है (असल) सुख वही पाता है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।