अंग
374
राग आसा
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਪ੍ਰਥਮੇ ਤੇਰੀ ਨੀਕੀ ਜਾਤਿ ॥
ਦੁਤੀਆ ਤੇਰੀ ਮਨੀਐ ਪਾਂਤਿ ॥
ਤ੍ਰਿਤੀਆ ਤੇਰਾ ਸੁੰਦਰ ਥਾਨੁ ॥
ਬਿਗੜ ਰੂਪੁ ਮਨ ਮਹਿ ਅਭਿਮਾਨੁ ॥੧॥
ਸੋਹਨੀ ਸਰੂਪਿ ਸੁਜਾਣਿ ਬਿਚਖਨਿ ॥
ਅਤਿ ਗਰਬੈ ਮੋਹਿ ਫਾਕੀ ਤੂੰ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਤਿ ਸੂਚੀ ਤੇਰੀ ਪਾਕਸਾਲ ॥
ਕਰਿ ਇਸਨਾਨੁ ਪੂਜਾ ਤਿਲਕੁ ਲਾਲ ॥
ਗਲੀ ਗਰਬਹਿ ਮੁਖਿ ਗੋਵਹਿ ਗਿਆਨ ॥
ਸਭਿ ਬਿਧਿ ਖੋਈ ਲੋਭਿ ਸੁਆਨ ॥੨॥
ਕਾਪਰ ਪਹਿਰਹਿ ਭੋਗਹਿ ਭੋਗ ॥
ਆਚਾਰ ਕਰਹਿ ਸੋਭਾ ਮਹਿ ਲੋਗ ॥
ਚੋਆ ਚੰਦਨ ਸੁਗੰਧ ਬਿਸਥਾਰ ॥
ਸੰਗੀ ਖੋਟਾ ਕ੍ਰੋਧੁ ਚੰਡਾਲ ॥੩॥
ਅਵਰ ਜੋਨਿ ਤੇਰੀ ਪਨਿਹਾਰੀ ॥
ਇਸੁ ਧਰਤੀ ਮਹਿ ਤੇਰੀ ਸਿਕਦਾਰੀ ॥
ਸੁਇਨਾ ਰੂਪਾ ਤੁਝ ਪਹਿ ਦਾਮ ॥
ਸੀਲੁ ਬਿਗਾਰਿਓ ਤੇਰਾ ਕਾਮ ॥੪॥
ਜਾ ਕਉ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਮਇਆ ਹਰਿ ਰਾਇ ॥
ਸਾ ਬੰਦੀ ਤੇ ਲਈ ਛਡਾਇ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਮਿਲਿ ਹਰਿ ਰਸੁ ਪਾਇਆ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸਫਲ ਓਹ ਕਾਇਆ ॥੫॥
ਸਭਿ ਰੂਪ ਸਭਿ ਸੁਖ ਬਨੇ ਸੁਹਾਗਨਿ ॥
ਅਤਿ ਸੁੰਦਰਿ ਬਿਚਖਨਿ ਤੂੰ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ਦੂਜਾ ॥੧੨॥
ਦੁਤੀਆ ਤੇਰੀ ਮਨੀਐ ਪਾਂਤਿ ॥
ਤ੍ਰਿਤੀਆ ਤੇਰਾ ਸੁੰਦਰ ਥਾਨੁ ॥
ਬਿਗੜ ਰੂਪੁ ਮਨ ਮਹਿ ਅਭਿਮਾਨੁ ॥੧॥
ਸੋਹਨੀ ਸਰੂਪਿ ਸੁਜਾਣਿ ਬਿਚਖਨਿ ॥
ਅਤਿ ਗਰਬੈ ਮੋਹਿ ਫਾਕੀ ਤੂੰ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਤਿ ਸੂਚੀ ਤੇਰੀ ਪਾਕਸਾਲ ॥
ਕਰਿ ਇਸਨਾਨੁ ਪੂਜਾ ਤਿਲਕੁ ਲਾਲ ॥
ਗਲੀ ਗਰਬਹਿ ਮੁਖਿ ਗੋਵਹਿ ਗਿਆਨ ॥
ਸਭਿ ਬਿਧਿ ਖੋਈ ਲੋਭਿ ਸੁਆਨ ॥੨॥
ਕਾਪਰ ਪਹਿਰਹਿ ਭੋਗਹਿ ਭੋਗ ॥
ਆਚਾਰ ਕਰਹਿ ਸੋਭਾ ਮਹਿ ਲੋਗ ॥
ਚੋਆ ਚੰਦਨ ਸੁਗੰਧ ਬਿਸਥਾਰ ॥
ਸੰਗੀ ਖੋਟਾ ਕ੍ਰੋਧੁ ਚੰਡਾਲ ॥੩॥
ਅਵਰ ਜੋਨਿ ਤੇਰੀ ਪਨਿਹਾਰੀ ॥
ਇਸੁ ਧਰਤੀ ਮਹਿ ਤੇਰੀ ਸਿਕਦਾਰੀ ॥
ਸੁਇਨਾ ਰੂਪਾ ਤੁਝ ਪਹਿ ਦਾਮ ॥
ਸੀਲੁ ਬਿਗਾਰਿਓ ਤੇਰਾ ਕਾਮ ॥੪॥
ਜਾ ਕਉ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਮਇਆ ਹਰਿ ਰਾਇ ॥
ਸਾ ਬੰਦੀ ਤੇ ਲਈ ਛਡਾਇ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਮਿਲਿ ਹਰਿ ਰਸੁ ਪਾਇਆ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸਫਲ ਓਹ ਕਾਇਆ ॥੫॥
ਸਭਿ ਰੂਪ ਸਭਿ ਸੁਖ ਬਨੇ ਸੁਹਾਗਨਿ ॥
ਅਤਿ ਸੁੰਦਰਿ ਬਿਚਖਨਿ ਤੂੰ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ਦੂਜਾ ॥੧੨॥
प्रथमे तेरी नीकी जाति ॥
दुतीआ तेरी मनीऐ पांति ॥
त्रितीआ तेरा सुंदर थानु ॥
बिगड़ रूपु मन महि अभिमानु ॥१॥
सोहनी सरूपि सुजाणि बिचखनि ॥
अति गरबै मोहि फाकी तूं ॥१॥ रहाउ ॥
अति सूची तेरी पाकसाल ॥
करि इसनानु पूजा तिलकु लाल ॥
गली गरबहि मुखि गोवहि गिआन ॥
सभि बिधि खोई लोभि सुआन ॥२॥
कापर पहिरहि भोगहि भोग ॥
आचार करहि सोभा महि लोग ॥
चोआ चंदन सुगंध बिसथार ॥
संगी खोटा क्रोधु चंडाल ॥३॥
अवर जोनि तेरी पनिहारी ॥
इसु धरती महि तेरी सिकदारी ॥
सुइना रूपा तुझ पहि दाम ॥
सीलु बिगारिओ तेरा काम ॥४॥
जा कउ द्रिसटि मइआ हरि राइ ॥
सा बंदी ते लई छडाइ ॥
साधसंगि मिलि हरि रसु पाइआ ॥
कहु नानक सफल ओह काइआ ॥५॥
सभि रूप सभि सुख बने सुहागनि ॥
अति सुंदरि बिचखनि तूं ॥१॥ रहाउ दूजा ॥१२॥
दुतीआ तेरी मनीऐ पांति ॥
त्रितीआ तेरा सुंदर थानु ॥
बिगड़ रूपु मन महि अभिमानु ॥१॥
सोहनी सरूपि सुजाणि बिचखनि ॥
अति गरबै मोहि फाकी तूं ॥१॥ रहाउ ॥
अति सूची तेरी पाकसाल ॥
करि इसनानु पूजा तिलकु लाल ॥
गली गरबहि मुखि गोवहि गिआन ॥
सभि बिधि खोई लोभि सुआन ॥२॥
कापर पहिरहि भोगहि भोग ॥
आचार करहि सोभा महि लोग ॥
चोआ चंदन सुगंध बिसथार ॥
संगी खोटा क्रोधु चंडाल ॥३॥
अवर जोनि तेरी पनिहारी ॥
इसु धरती महि तेरी सिकदारी ॥
सुइना रूपा तुझ पहि दाम ॥
सीलु बिगारिओ तेरा काम ॥४॥
जा कउ द्रिसटि मइआ हरि राइ ॥
सा बंदी ते लई छडाइ ॥
साधसंगि मिलि हरि रसु पाइआ ॥
कहु नानक सफल ओह काइआ ॥५॥
सभि रूप सभि सुख बने सुहागनि ॥
अति सुंदरि बिचखनि तूं ॥१॥ रहाउ दूजा ॥१२॥
हिन्दी अर्थ: (हे जीव स्त्री ! देख) पहले तो तेरी (मनुष्य जन्म वाली) बढ़िया जाति है; दूसरा तेरा खानदान भी जाना-माना है; तीसरा तेरा सुंदर शरीर है। पर तेरा रूप कोझा ही रहा (क्योंकि) तेरे मन में अहंकार है। 1। (हे जीव-स्त्री !) तू (देखने में) सुंदर है। रूपवती है। सियानी है चतुर है। पर तू बड़े अहंकार और मोह में फंसी हुई है। 1। रहाउ। (हे जीव-स्त्री !) तेरी बड़ी स्वच्छ (साफ) रसोई है (जिसमें तू अपना भोजन तैयार करती है। बाकी पशु-पक्षी तो बिचारे गंदी-मंदी जगहों पर ही पेट भर लेते हैं)। तू स्नान करके पूजा भी कर सकती है माथे पर तिलक भी लगा लेती है। तू बातों से अपना आप भी जता लेती है (पशु-पक्षियों को तो ये दाति नहीं मिली) मुंह से ज्ञान की बाते भी कर सकती है। पर कुत्ते लोभ ने तेरी ये हरेक किस्म की वडिआई गवा दी है। 2। (हे जीव स्त्री !) तू (सुंदर) कपड़े पहनती है (दुनिया के सारे) भोग भोगती है। जगत में शोभा कमाने के लिए विभिन्न आचरण करती है तू इ़त्र चंदन और अनेको सुगंधियां बरतती हैं। पर चण्डाल क्रोध तेरा बुरा साथी है। 3। (हे जीव स्त्री !) और सारी जूनियां तेरी सेवक हैं। इस धरती पर तेरी ही सरदारी है। तेरे पास सोना है चाँदी है धन-पदार्थ है (और जोनियों के पास यह चीजें नहीं हैं) पर काम-वासना ने तेरा स्वभाव (जो सबसे उच्च श्रेणी वालों को फबता है) बिगाड़ा हुआ है। 4। हे नानक ! जिस जीव स्त्री पर प्रभू-पातशाह की मेहर की नज़र पड़ती है। उसको वह (लोभ। क्रोध काम आदि की) कैद से छुड़ा लेता है। जिस शरीर ने (जीव ने मानस शरीर प्राप्त करके) साध-संगति में मिल के परमात्मा के नाम का स्वाद पाया। हे नानक ! वही शरीर कामयाब है। 5। (हे जीव स्त्री !) अगर तू पति-प्रभू वाली बन जाए तो सारे सोहज और सारे सुख (जो तुझे मिले हुए हैं) तुझे फॅब जाएं; तू सचमुच बड़ी सुंदर और बड़ी सियानी बन जाए1। रहाउ। दूजा। 12।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ਇਕਤੁਕੇ ੨ ॥
ਜੀਵਤ ਦੀਸੈ ਤਿਸੁ ਸਰਪਰ ਮਰਣਾ ॥
ਮੁਆ ਹੋਵੈ ਤਿਸੁ ਨਿਹਚਲੁ ਰਹਣਾ ॥੧॥
ਜੀਵਤ ਮੁਏ ਮੁਏ ਸੇ ਜੀਵੇ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਅਵਖਧੁ ਮੁਖਿ ਪਾਇਆ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਰਸੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਵੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਾਚੀ ਮਟੁਕੀ ਬਿਨਸਿ ਬਿਨਾਸਾ ॥
ਜਿਸੁ ਛੂਟੈ ਤ੍ਰਿਕੁਟੀ ਤਿਸੁ ਨਿਜ ਘਰਿ ਵਾਸਾ ॥੨॥
ਊਚਾ ਚੜੈ ਸੁ ਪਵੈ ਪਇਆਲਾ ॥
ਧਰਨਿ ਪੜੈ ਤਿਸੁ ਲਗੈ ਨ ਕਾਲਾ ॥੩॥
ਭ੍ਰਮਤ ਫਿਰੇ ਤਿਨ ਕਿਛੂ ਨ ਪਾਇਆ ॥
ਸੇ ਅਸਥਿਰ ਜਿਨ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਕਮਾਇਆ ॥੪॥
ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਸਭੁ ਹਰਿ ਕਾ ਮਾਲੁ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਮਿਲਿ ਭਏ ਨਿਹਾਲ ॥੫॥੧੩॥
ਜੀਵਤ ਦੀਸੈ ਤਿਸੁ ਸਰਪਰ ਮਰਣਾ ॥
ਮੁਆ ਹੋਵੈ ਤਿਸੁ ਨਿਹਚਲੁ ਰਹਣਾ ॥੧॥
ਜੀਵਤ ਮੁਏ ਮੁਏ ਸੇ ਜੀਵੇ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਅਵਖਧੁ ਮੁਖਿ ਪਾਇਆ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਰਸੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਵੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਾਚੀ ਮਟੁਕੀ ਬਿਨਸਿ ਬਿਨਾਸਾ ॥
ਜਿਸੁ ਛੂਟੈ ਤ੍ਰਿਕੁਟੀ ਤਿਸੁ ਨਿਜ ਘਰਿ ਵਾਸਾ ॥੨॥
ਊਚਾ ਚੜੈ ਸੁ ਪਵੈ ਪਇਆਲਾ ॥
ਧਰਨਿ ਪੜੈ ਤਿਸੁ ਲਗੈ ਨ ਕਾਲਾ ॥੩॥
ਭ੍ਰਮਤ ਫਿਰੇ ਤਿਨ ਕਿਛੂ ਨ ਪਾਇਆ ॥
ਸੇ ਅਸਥਿਰ ਜਿਨ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਕਮਾਇਆ ॥੪॥
ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਸਭੁ ਹਰਿ ਕਾ ਮਾਲੁ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਮਿਲਿ ਭਏ ਨਿਹਾਲ ॥੫॥੧੩॥
आसा महला ५ इकतुके २ ॥
जीवत दीसै तिसु सरपर मरणा ॥
मुआ होवै तिसु निहचलु रहणा ॥१॥
जीवत मुए मुए से जीवे ॥
हरि हरि नामु अवखधु मुखि पाइआ गुर सबदी रसु अंम्रितु पीवे ॥१॥ रहाउ ॥
काची मटुकी बिनसि बिनासा ॥
जिसु छूटै त्रिकुटी तिसु निज घरि वासा ॥२॥
ऊचा चड़ै सु पवै पइआला ॥
धरनि पड़ै तिसु लगै न काला ॥३॥
भ्रमत फिरे तिन किछू न पाइआ ॥
से असथिर जिन गुर सबदु कमाइआ ॥४॥
जीउ पिंडु सभु हरि का मालु ॥
नानक गुर मिलि भए निहाल ॥५॥१३॥
जीवत दीसै तिसु सरपर मरणा ॥
मुआ होवै तिसु निहचलु रहणा ॥१॥
जीवत मुए मुए से जीवे ॥
हरि हरि नामु अवखधु मुखि पाइआ गुर सबदी रसु अंम्रितु पीवे ॥१॥ रहाउ ॥
काची मटुकी बिनसि बिनासा ॥
जिसु छूटै त्रिकुटी तिसु निज घरि वासा ॥२॥
ऊचा चड़ै सु पवै पइआला ॥
धरनि पड़ै तिसु लगै न काला ॥३॥
भ्रमत फिरे तिन किछू न पाइआ ॥
से असथिर जिन गुर सबदु कमाइआ ॥४॥
जीउ पिंडु सभु हरि का मालु ॥
नानक गुर मिलि भए निहाल ॥५॥१३॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ इकतुके २ ॥ (हे भाई !) जो मनुष्य (माया के मान के आसरे) जीवित दिखता है उसे जरूर आत्मिक मौत हड़प किए रखती है; पर जो मनुष्य (माया के मान से) अछूता है उसे अटॅल आत्मिक जीवन मिला रहता है। 1। (हे भाई !) जो मनुष्य माया के मद में मस्त रहते हैं वे आत्मिक मौत मरे रहते हैं। पर जो मनुष्य माया के मान से अछोह हैं वे आत्मिक जीवन वाले हैं। जिन मनुष्यों ने परमात्मा का नाम-दारू अपने मुंह में रखा (आत्मिक मौत वाला रोग उनके अंदर से दूर हो गया) गुरू के शबद की बरकति से उन्होंने आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस पीया। 1। रहाउ। (हे भाई ! जैसे) कच्चा घड़ा जरूर नाश होने वाला है (वैसे ही माया से भी साथ आखिर अवश्य टूटता है। माया के मान में दूसरोंके साथ खीझना मूर्खता है) जिस मनुष्य के अंदर (माया के मान के कारण पैदा हुई) खीझ नहीं रहती। उसका निवास (सदा) प्रभू-चरणों में रहता है। 2। (हे भाई ! माया में) जो मनुष्य सिर ऊँचा किए रखता है (अकड़ा फिरता है) वह आत्मिक मौत के गड्ढे में पड़ा रहता है। पर। जो मनुष्य सदा विनम्रता धारता है उसे आत्मिक मौत छू नहीं सकती। 3। (हे भाई !) जो मनुष्य (माया की खातिर ही सदा) भटकते फिरते हैं (आत्मिक जीवन की दाति में से) उन्हें कुछ भी नहीं मिलता। पर। जिन्होंने गुरू शबद को (अपने जीवन में) प्रयोग में लिया है वह (माया के मोह की ओर से) अडोल-चित्त रहते हैं। हे नानक ! जिन मनुष्यों ने ये जिंद ये शरीर सब कुछ को परमात्मा की दी हुई दाति समझा है वे गुरू को मिल के सदा खिले माथे रहते हैं (उनकी त्रिकुटी खत्म हो जाती है अंदर की खिझ समाप्त हो जाती है)। 4। 13।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਪੁਤਰੀ ਤੇਰੀ ਬਿਧਿ ਕਰਿ ਥਾਟੀ ॥
ਜਾਨੁ ਸਤਿ ਕਰਿ ਹੋਇਗੀ ਮਾਟੀ ॥੧॥
ਮੂਲੁ ਸਮਾਲਹੁ ਅਚੇਤ ਗਵਾਰਾ ॥
ਇਤਨੇ ਕਉ ਤੁਮੑ ਕਿਆ ਗਰਬੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੀਨਿ ਸੇਰ ਕਾ ਦਿਹਾੜੀ ਮਿਹਮਾਨੁ ॥
ਅਵਰ ਵਸਤੁ ਤੁਝ ਪਾਹਿ ਅਮਾਨ ॥੨॥
ਬਿਸਟਾ ਅਸਤ ਰਕਤੁ ਪਰੇਟੇ ਚਾਮ ॥
ਇਸੁ ਊਪਰਿ ਲੇ ਰਾਖਿਓ ਗੁਮਾਨ ॥੩॥
ਏਕ ਵਸਤੁ ਬੂਝਹਿ ਤਾ ਹੋਵਹਿ ਪਾਕ ॥
ਬਿਨੁ ਬੂਝੇ ਤੂੰ ਸਦਾ ਨਾਪਾਕ ॥੪॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਕਉ ਕੁਰਬਾਨੁ ॥
ਜਿਸ ਤੇ ਪਾਈਐ ਹਰਿ ਪੁਰਖੁ ਸੁਜਾਨੁ ॥੫॥੧੪॥
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ਇਕਤੁਕੇ ਚਉਪਦੇ ॥
ਇਕ ਘੜੀ ਦਿਨਸੁ ਮੋ ਕਉ ਬਹੁਤੁ ਦਿਹਾਰੇ ॥
ਮਨੁ ਨ ਰਹੈ ਕੈਸੇ ਮਿਲਉ ਪਿਆਰੇ ॥੧॥
ਇਕੁ ਪਲੁ ਦਿਨਸੁ ਮੋ ਕਉ ਕਬਹੁ ਨ ਬਿਹਾਵੈ ॥
ਪੁਤਰੀ ਤੇਰੀ ਬਿਧਿ ਕਰਿ ਥਾਟੀ ॥
ਜਾਨੁ ਸਤਿ ਕਰਿ ਹੋਇਗੀ ਮਾਟੀ ॥੧॥
ਮੂਲੁ ਸਮਾਲਹੁ ਅਚੇਤ ਗਵਾਰਾ ॥
ਇਤਨੇ ਕਉ ਤੁਮੑ ਕਿਆ ਗਰਬੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੀਨਿ ਸੇਰ ਕਾ ਦਿਹਾੜੀ ਮਿਹਮਾਨੁ ॥
ਅਵਰ ਵਸਤੁ ਤੁਝ ਪਾਹਿ ਅਮਾਨ ॥੨॥
ਬਿਸਟਾ ਅਸਤ ਰਕਤੁ ਪਰੇਟੇ ਚਾਮ ॥
ਇਸੁ ਊਪਰਿ ਲੇ ਰਾਖਿਓ ਗੁਮਾਨ ॥੩॥
ਏਕ ਵਸਤੁ ਬੂਝਹਿ ਤਾ ਹੋਵਹਿ ਪਾਕ ॥
ਬਿਨੁ ਬੂਝੇ ਤੂੰ ਸਦਾ ਨਾਪਾਕ ॥੪॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਕਉ ਕੁਰਬਾਨੁ ॥
ਜਿਸ ਤੇ ਪਾਈਐ ਹਰਿ ਪੁਰਖੁ ਸੁਜਾਨੁ ॥੫॥੧੪॥
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ਇਕਤੁਕੇ ਚਉਪਦੇ ॥
ਇਕ ਘੜੀ ਦਿਨਸੁ ਮੋ ਕਉ ਬਹੁਤੁ ਦਿਹਾਰੇ ॥
ਮਨੁ ਨ ਰਹੈ ਕੈਸੇ ਮਿਲਉ ਪਿਆਰੇ ॥੧॥
ਇਕੁ ਪਲੁ ਦਿਨਸੁ ਮੋ ਕਉ ਕਬਹੁ ਨ ਬਿਹਾਵੈ ॥
आसा महला ५ ॥
पुतरी तेरी बिधि करि थाटी ॥
जानु सति करि होइगी माटी ॥१॥
मूलु समालहु अचेत गवारा ॥
इतने कउ तुम॑ किआ गरबे ॥१॥ रहाउ ॥
तीनि सेर का दिहाड़ी मिहमानु ॥
अवर वसतु तुझ पाहि अमान ॥२॥
बिसटा असत रकतु परेटे चाम ॥
इसु ऊपरि ले राखिओ गुमान ॥३॥
एक वसतु बूझहि ता होवहि पाक ॥
बिनु बूझे तूं सदा नापाक ॥४॥
कहु नानक गुर कउ कुरबानु ॥
जिस ते पाईऐ हरि पुरखु सुजानु ॥५॥१४॥
आसा महला ५ इकतुके चउपदे ॥
इक घड़ी दिनसु मो कउ बहुतु दिहारे ॥
मनु न रहै कैसे मिलउ पिआरे ॥१॥
इकु पलु दिनसु मो कउ कबहु न बिहावै ॥
पुतरी तेरी बिधि करि थाटी ॥
जानु सति करि होइगी माटी ॥१॥
मूलु समालहु अचेत गवारा ॥
इतने कउ तुम॑ किआ गरबे ॥१॥ रहाउ ॥
तीनि सेर का दिहाड़ी मिहमानु ॥
अवर वसतु तुझ पाहि अमान ॥२॥
बिसटा असत रकतु परेटे चाम ॥
इसु ऊपरि ले राखिओ गुमान ॥३॥
एक वसतु बूझहि ता होवहि पाक ॥
बिनु बूझे तूं सदा नापाक ॥४॥
कहु नानक गुर कउ कुरबानु ॥
जिस ते पाईऐ हरि पुरखु सुजानु ॥५॥१४॥
आसा महला ५ इकतुके चउपदे ॥
इक घड़ी दिनसु मो कउ बहुतु दिहारे ॥
मनु न रहै कैसे मिलउ पिआरे ॥१॥
इकु पलु दिनसु मो कउ कबहु न बिहावै ॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (ये ठीक है कि परमात्मा ने) तेरा ये शरीर बड़ी सियानप से बनाया है। (पर ये भी) सच जान कि (इस शरीर ने आखिर) मिट्टी हो जाना है। 1। हे गाफिल जीव ! हे मूर्ख जीव ! (जिससे तू पैदा हुआ है उस) मूल (-प्रभू) को (हृदय में सदा) संभाल के रख। इस तुच्छ आधार वाले शरीर पर तू क्या गुमान करता है। 1। रहाउ। (तू जगत में एक) मेहमान है जिसे रोजाना का तीन सेर (कच्चा आटा आदि) मिलता है। और सारी चीज तेरे पास अमानत (के तौर पर ही पड़ी) है। 2। (तेरे अंदर की) विष्टा हड्डियां और लहू (आदि बाहरी) चमड़ी से लपेटे हुए हैं पर तू इस पर ही मान किए जा रहा है। 3। अगर तू एक प्रभू के नाम-पदार्थ के साथ सांझ डाल ले तो तू पवित्र जीवन वाला हो जाए। प्रभू के नाम के साथ सांझ डाले बिना तू सदा ही अपवित्र है। 4। हे नानक ! कह, (हे मूर्ख जीव !) उस गुरू से सदके हो जिसके द्वारा सबके दिलों की जानने वाला सर्व-व्यापक परमात्मा मिल सकता है। 5। 14। आसा महला ५ इकतुके चउपदे ॥ (हे भाई ! प्रभू-पति के विछोड़े में) एक पल भी एक दिन भी मुझे (ऐसा प्रतीत होता है कि) कभी खत्म ही नहीं होता। मेरे मन में बड़ी ललक लगी रहती है कि मुझे कोई ऐसा संत मिल जाए जो मुझे प्रभू पति से मिला दे। 1। रहाउ। (हे भाई !) दिन की एक घड़ी भी (प्रभू-पति के विछोड़े में) मुझे कई कई दिनों के बराबर प्रतीत होती है
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 374 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
दिल्ली-यूनिवर्सिटी के North Campus में exam-season की tension।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 54 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 374” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 375 →, पीछे का: ← अंग 373।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।