अंग
424
राग आसा
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਨਾਮੇ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਅਗਨਿ ਬੁਝੈ ਨਾਮੁ ਮਿਲੈ ਤਿਸੈ ਰਜਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਲਿ ਕੀਰਤਿ ਸਬਦੁ ਪਛਾਨੁ ॥
ਏਹਾ ਭਗਤਿ ਚੂਕੈ ਅਭਿਮਾਨੁ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿਐ ਹੋਵੈ ਪਰਵਾਨੁ ॥
ਜਿਨਿ ਆਸਾ ਕੀਤੀ ਤਿਸ ਨੋ ਜਾਨੁ ॥੨॥
ਤਿਸੁ ਕਿਆ ਦੀਜੈ ਜਿ ਸਬਦੁ ਸੁਣਾਏ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਨਾਮੁ ਮੰਨਿ ਵਸਾਏ ॥
ਇਹੁ ਸਿਰੁ ਦੀਜੈ ਆਪੁ ਗਵਾਏ ॥
ਹੁਕਮੈ ਬੂਝੇ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ॥੩॥
ਆਪਿ ਕਰੇ ਤੈ ਆਪਿ ਕਰਾਏ ॥
ਆਪੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਵਸਾਏ ॥
ਆਪਿ ਭੁਲਾਵੈ ਆਪਿ ਮਾਰਗਿ ਪਾਏ ॥
ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਸਚਿ ਸਮਾਏ ॥੪॥
ਸਚਾ ਸਬਦੁ ਸਚੀ ਹੈ ਬਾਣੀ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜੁਗਿ ਜੁਗਿ ਆਖਿ ਵਖਾਣੀ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਮੋਹਿ ਭਰਮਿ ਭੋਲਾਣੀ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਸਭ ਫਿਰੈ ਬਉਰਾਣੀ ॥੫॥
ਤੀਨਿ ਭਵਨ ਮਹਿ ਏਕਾ ਮਾਇਆ ॥
ਮੂਰਖਿ ਪੜਿ ਪੜਿ ਦੂਜਾ ਭਾਉ ਦ੍ਰਿੜਾਇਆ ॥
ਬਹੁ ਕਰਮ ਕਮਾਵੈ ਦੁਖੁ ਸਬਾਇਆ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥੬॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਮੀਠਾ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰਿ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਭੋਗੇ ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ॥
ਸਹਜਿ ਅਨੰਦਿ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰਿ ॥
ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸਦਾ ਸਚਿ ਪਿਆਰਿ ॥੭॥
ਹਰਿ ਜਪਿ ਪੜੀਐ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰਿ ॥
ਹਰਿ ਜਪਿ ਪੜੀਐ ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ॥
ਹਰਿ ਜਪੀਐ ਭਇ ਸਚਿ ਪਿਆਰਿ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਗੁਰਮਤਿ ਉਰ ਧਾਰਿ ॥੮॥੩॥੨੫॥
ਕਲਿ ਕੀਰਤਿ ਸਬਦੁ ਪਛਾਨੁ ॥
ਏਹਾ ਭਗਤਿ ਚੂਕੈ ਅਭਿਮਾਨੁ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿਐ ਹੋਵੈ ਪਰਵਾਨੁ ॥
ਜਿਨਿ ਆਸਾ ਕੀਤੀ ਤਿਸ ਨੋ ਜਾਨੁ ॥੨॥
ਤਿਸੁ ਕਿਆ ਦੀਜੈ ਜਿ ਸਬਦੁ ਸੁਣਾਏ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਨਾਮੁ ਮੰਨਿ ਵਸਾਏ ॥
ਇਹੁ ਸਿਰੁ ਦੀਜੈ ਆਪੁ ਗਵਾਏ ॥
ਹੁਕਮੈ ਬੂਝੇ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ॥੩॥
ਆਪਿ ਕਰੇ ਤੈ ਆਪਿ ਕਰਾਏ ॥
ਆਪੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਵਸਾਏ ॥
ਆਪਿ ਭੁਲਾਵੈ ਆਪਿ ਮਾਰਗਿ ਪਾਏ ॥
ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਸਚਿ ਸਮਾਏ ॥੪॥
ਸਚਾ ਸਬਦੁ ਸਚੀ ਹੈ ਬਾਣੀ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜੁਗਿ ਜੁਗਿ ਆਖਿ ਵਖਾਣੀ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਮੋਹਿ ਭਰਮਿ ਭੋਲਾਣੀ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਸਭ ਫਿਰੈ ਬਉਰਾਣੀ ॥੫॥
ਤੀਨਿ ਭਵਨ ਮਹਿ ਏਕਾ ਮਾਇਆ ॥
ਮੂਰਖਿ ਪੜਿ ਪੜਿ ਦੂਜਾ ਭਾਉ ਦ੍ਰਿੜਾਇਆ ॥
ਬਹੁ ਕਰਮ ਕਮਾਵੈ ਦੁਖੁ ਸਬਾਇਆ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥੬॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਮੀਠਾ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰਿ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਭੋਗੇ ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ॥
ਸਹਜਿ ਅਨੰਦਿ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰਿ ॥
ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸਦਾ ਸਚਿ ਪਿਆਰਿ ॥੭॥
ਹਰਿ ਜਪਿ ਪੜੀਐ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰਿ ॥
ਹਰਿ ਜਪਿ ਪੜੀਐ ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ॥
ਹਰਿ ਜਪੀਐ ਭਇ ਸਚਿ ਪਿਆਰਿ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਗੁਰਮਤਿ ਉਰ ਧਾਰਿ ॥੮॥੩॥੨੫॥
नामे त्रिसना अगनि बुझै नामु मिलै तिसै रजाई ॥१॥ रहाउ ॥
कलि कीरति सबदु पछानु ॥
एहा भगति चूकै अभिमानु ॥
सतिगुरु सेविऐ होवै परवानु ॥
जिनि आसा कीती तिस नो जानु ॥२॥
तिसु किआ दीजै जि सबदु सुणाए ॥
करि किरपा नामु मंनि वसाए ॥
इहु सिरु दीजै आपु गवाए ॥
हुकमै बूझे सदा सुखु पाए ॥३॥
आपि करे तै आपि कराए ॥
आपे गुरमुखि नामु वसाए ॥
आपि भुलावै आपि मारगि पाए ॥
सचै सबदि सचि समाए ॥४॥
सचा सबदु सची है बाणी ॥
गुरमुखि जुगि जुगि आखि वखाणी ॥
मनमुखि मोहि भरमि भोलाणी ॥
बिनु नावै सभ फिरै बउराणी ॥५॥
तीनि भवन महि एका माइआ ॥
मूरखि पड़ि पड़ि दूजा भाउ द्रिड़ाइआ ॥
बहु करम कमावै दुखु सबाइआ ॥
सतिगुरु सेवि सदा सुखु पाइआ ॥६॥
अंम्रितु मीठा सबदु वीचारि ॥
अनदिनु भोगे हउमै मारि ॥
सहजि अनंदि किरपा धारि ॥
नामि रते सदा सचि पिआरि ॥७॥
हरि जपि पड़ीऐ गुर सबदु वीचारि ॥
हरि जपि पड़ीऐ हउमै मारि ॥
हरि जपीऐ भइ सचि पिआरि ॥
नानक नामु गुरमति उर धारि ॥८॥३॥२५॥
कलि कीरति सबदु पछानु ॥
एहा भगति चूकै अभिमानु ॥
सतिगुरु सेविऐ होवै परवानु ॥
जिनि आसा कीती तिस नो जानु ॥२॥
तिसु किआ दीजै जि सबदु सुणाए ॥
करि किरपा नामु मंनि वसाए ॥
इहु सिरु दीजै आपु गवाए ॥
हुकमै बूझे सदा सुखु पाए ॥३॥
आपि करे तै आपि कराए ॥
आपे गुरमुखि नामु वसाए ॥
आपि भुलावै आपि मारगि पाए ॥
सचै सबदि सचि समाए ॥४॥
सचा सबदु सची है बाणी ॥
गुरमुखि जुगि जुगि आखि वखाणी ॥
मनमुखि मोहि भरमि भोलाणी ॥
बिनु नावै सभ फिरै बउराणी ॥५॥
तीनि भवन महि एका माइआ ॥
मूरखि पड़ि पड़ि दूजा भाउ द्रिड़ाइआ ॥
बहु करम कमावै दुखु सबाइआ ॥
सतिगुरु सेवि सदा सुखु पाइआ ॥६॥
अंम्रितु मीठा सबदु वीचारि ॥
अनदिनु भोगे हउमै मारि ॥
सहजि अनंदि किरपा धारि ॥
नामि रते सदा सचि पिआरि ॥७॥
हरि जपि पड़ीऐ गुर सबदु वीचारि ॥
हरि जपि पड़ीऐ हउमै मारि ॥
हरि जपीऐ भइ सचि पिआरि ॥
नानक नामु गुरमति उर धारि ॥८॥३॥२५॥
हिन्दी अर्थ: (हे भाई ! माया की) तृष्णा की अग्नि परमात्मा के नाम से ही बुझती है।ये नाम उस मालिक की रजा के अनुसार मिलता है (गुरू के द्वारा)। 1।रहाउ। (हे भाई ! इस विकार-ग्रसित) जगत में परमात्मा की सिफत सालाह करता रह।गुरू के शबद से जान-पहचान बनाए रख। परमात्मा की भक्ति ही है (जिसकी बरकति से मन में से) अहंकार दूर होता है। और गुरू की बताई सेवा करने से मनुष्य परमात्मा की हजूरी में कबूल हो जाता है। (हे भाई ! इन आशाओं के जाल में से निकलने के लिए) उस परमात्मा से गहरी सांझ बना जिसने आशा (मनुष्य के मन में) पैदा की है। 2। उसे कौन सी भेटा देनी चाहिए-(हे भाई !) जो (गुरू अपना) शबद सुनाता है और मेहर करके परमात्मा का नाम (हमारे) मन में बसाता है (हे भाई !) स्वै भाव दूर करके अपना ये सिर (गुरू के आगे) भेट करना चाहिए (जो मनुष्य अपने आप को गुरू के हवाले करता है वह) परमात्मा की रजा को समझ के सदा आत्मिक आनंद में रहता है। 3। (हे भाई ! सब जीवों में व्यापक हो के) परमात्मा सब कुछ स्वयं ही कर रहा है।और स्वयं ही जीवों से करवाता है। वह स्वयं ही गुरू के द्वारा (मनुष्य के मन में अपना) नाम बसाता है। परमात्मा स्वयं ही कुमार्ग पर डालता है स्वयं ही सही रास्ते पर लाता है (जिसे सही रास्ते पर लाता है वह मनुष्य) सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह के शबद में जुड़ के सदा-स्थिर हरि-नाम में लीन रहता है। 4। (हे भाई !) सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह का शबद ही सदा स्थिर प्रभू के सिफत सालाह की बाणी ही हरेक युग में दुनिया गुरू के माध्यम से उचारती आई है (और माया के मोह के भ्रम से बचती आई है)।पर। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (हरेक युग में ही) माया के मोह में फसा रहा।माया की भटकना में पड़ के गलत रास्ते पर पड़ा रहा। (हे भाई !) परमात्मा के नाम से टूट के (हरेक युग में ही) पागल हो के दुनिया भटकती रही है। 5। (हे भाई !) तीनों ही भवनों में एक ही माया का प्रभाव चला आ रहा है। मूर्ख मनुष्य ने (गुरू से टूट के स्मृतियों-शास्त्रों आदि को) पढ़-पढ़ के (अपने अंदर बल्कि) माया का प्यार ही पक्का किया। मूर्ख मनुष्य (गुरू से टूट के शास्त्रों अनुसार निहित) अनेकों धार्मिक कर्म करता है और निरा दुख ही सहेड़ता है। गुरूकी बताई सेवा करके ही मनुष्य सदा टिके रहने वाले आत्मिक आनंद का रस लेता है। 6। हे भाई ! गुरू के शबद को विचार के (और। अपने अंदर से) अहंकार दूर करके (भाग्यशाली मनुष्य) आत्मिक जीवन देने वाला स्वादिष्ट नाम रस हर वक्त पा सकता है। (गुरू) कृपा करके उसको आत्मिक अडोलता में आत्मिक आनंद में टिकाए रखता है। (हे भाई !) परमात्मा के नाम-रंग में रंगे हुए मनुष्य सदा प्रभॅ-प्यार में मगन रहते हैं सदा-स्थिर हरि-नाम में लीन रहते हैं। 7। हे भाई ! गुरू के शबद को अपनी सोच-मण्डल में टिका केपरमात्मा का नाम ही पढ़ना चाहिए। (और अंदर से) अहंकार दूर करके परमात्मा के नाम का ही जाप करना चाहिए परमात्मा के डर-अदब में रहके सदा-स्थिर हरी के प्रेम में मस्त हो के हरी-नाम का जाप ही करना चाहिए। हे नानक ! (कह, हे भाई !) गुरू की मति ले कर परमात्मा का नाम अपने हृदय में टिकाए रख। 8। 3। 25।
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਰਾਗੁ ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੩ ਅਸਟਪਦੀਆ ਘਰੁ ੮ ਕਾਫੀ ॥
ਗੁਰ ਤੇ ਸਾਂਤਿ ਊਪਜੈ ਜਿਨਿ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਅਗਨਿ ਬੁਝਾਈ ॥
ਗੁਰ ਤੇ ਨਾਮੁ ਪਾਈਐ ਵਡੀ ਵਡਿਆਈ ॥੧॥
ਏਕੋ ਨਾਮੁ ਚੇਤਿ ਮੇਰੇ ਭਾਈ ॥
ਜਗਤੁ ਜਲੰਦਾ ਦੇਖਿ ਕੈ ਭਜਿ ਪਏ ਸਰਣਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰ ਤੇ ਗਿਆਨੁ ਊਪਜੈ ਮਹਾ ਤਤੁ ਬੀਚਾਰਾ ॥
ਗੁਰ ਤੇ ਘਰੁ ਦਰੁ ਪਾਇਆ ਭਗਤੀ ਭਰੇ ਭੰਡਾਰਾ ॥੨॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈਐ ਬੂਝੈ ਵੀਚਾਰਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਭਗਤਿ ਸਲਾਹ ਹੈ ਅੰਤਰਿ ਸਬਦੁ ਅਪਾਰਾ ॥੩॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੂਖੁ ਊਪਜੈ ਦੁਖੁ ਕਦੇ ਨ ਹੋਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਉਮੈ ਮਾਰੀਐ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਈ ॥੪॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਆਪੁ ਗਇਆ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਸੋਝੀ ਪਾਈ ॥
ਨਿਰਮਲ ਜੋਤਿ ਪਸਰਿ ਰਹੀ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਮਿਲਾਈ ॥੫॥
ਪੂਰੈ ਗੁਰਿ ਸਮਝਾਇਆ ਮਤਿ ਊਤਮ ਹੋਈ ॥
ਅੰਤਰੁ ਸੀਤਲੁ ਸਾਂਤਿ ਹੋਇ ਨਾਮੇ ਸੁਖੁ ਹੋਈ ॥੬॥
ਪੂਰਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਤਾਂ ਮਿਲੈ ਜਾਂ ਨਦਰਿ ਕਰੇਈ ॥
ਕਿਲਵਿਖ ਪਾਪ ਸਭ ਕਟੀਅਹਿ ਫਿਰਿ ਦੁਖੁ ਬਿਘਨੁ ਨ ਹੋਈ ॥੭॥
ਰਾਗੁ ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੩ ਅਸਟਪਦੀਆ ਘਰੁ ੮ ਕਾਫੀ ॥
ਗੁਰ ਤੇ ਸਾਂਤਿ ਊਪਜੈ ਜਿਨਿ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਅਗਨਿ ਬੁਝਾਈ ॥
ਗੁਰ ਤੇ ਨਾਮੁ ਪਾਈਐ ਵਡੀ ਵਡਿਆਈ ॥੧॥
ਏਕੋ ਨਾਮੁ ਚੇਤਿ ਮੇਰੇ ਭਾਈ ॥
ਜਗਤੁ ਜਲੰਦਾ ਦੇਖਿ ਕੈ ਭਜਿ ਪਏ ਸਰਣਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰ ਤੇ ਗਿਆਨੁ ਊਪਜੈ ਮਹਾ ਤਤੁ ਬੀਚਾਰਾ ॥
ਗੁਰ ਤੇ ਘਰੁ ਦਰੁ ਪਾਇਆ ਭਗਤੀ ਭਰੇ ਭੰਡਾਰਾ ॥੨॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈਐ ਬੂਝੈ ਵੀਚਾਰਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਭਗਤਿ ਸਲਾਹ ਹੈ ਅੰਤਰਿ ਸਬਦੁ ਅਪਾਰਾ ॥੩॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੂਖੁ ਊਪਜੈ ਦੁਖੁ ਕਦੇ ਨ ਹੋਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਉਮੈ ਮਾਰੀਐ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਈ ॥੪॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਆਪੁ ਗਇਆ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਸੋਝੀ ਪਾਈ ॥
ਨਿਰਮਲ ਜੋਤਿ ਪਸਰਿ ਰਹੀ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਮਿਲਾਈ ॥੫॥
ਪੂਰੈ ਗੁਰਿ ਸਮਝਾਇਆ ਮਤਿ ਊਤਮ ਹੋਈ ॥
ਅੰਤਰੁ ਸੀਤਲੁ ਸਾਂਤਿ ਹੋਇ ਨਾਮੇ ਸੁਖੁ ਹੋਈ ॥੬॥
ਪੂਰਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਤਾਂ ਮਿਲੈ ਜਾਂ ਨਦਰਿ ਕਰੇਈ ॥
ਕਿਲਵਿਖ ਪਾਪ ਸਭ ਕਟੀਅਹਿ ਫਿਰਿ ਦੁਖੁ ਬਿਘਨੁ ਨ ਹੋਈ ॥੭॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु आसा महला ३ असटपदीआ घरु ८ काफी ॥
गुर ते सांति ऊपजै जिनि त्रिसना अगनि बुझाई ॥
गुर ते नामु पाईऐ वडी वडिआई ॥१॥
एको नामु चेति मेरे भाई ॥
जगतु जलंदा देखि कै भजि पए सरणाई ॥१॥ रहाउ ॥
गुर ते गिआनु ऊपजै महा ततु बीचारा ॥
गुर ते घरु दरु पाइआ भगती भरे भंडारा ॥२॥
गुरमुखि नामु धिआईऐ बूझै वीचारा ॥
गुरमुखि भगति सलाह है अंतरि सबदु अपारा ॥३॥
गुरमुखि सूखु ऊपजै दुखु कदे न होई ॥
गुरमुखि हउमै मारीऐ मनु निरमलु होई ॥४॥
सतिगुरि मिलिऐ आपु गइआ त्रिभवण सोझी पाई ॥
निरमल जोति पसरि रही जोती जोति मिलाई ॥५॥
पूरै गुरि समझाइआ मति ऊतम होई ॥
अंतरु सीतलु सांति होइ नामे सुखु होई ॥६॥
पूरा सतिगुरु तां मिलै जां नदरि करेई ॥
किलविख पाप सभ कटीअहि फिरि दुखु बिघनु न होई ॥७॥
रागु आसा महला ३ असटपदीआ घरु ८ काफी ॥
गुर ते सांति ऊपजै जिनि त्रिसना अगनि बुझाई ॥
गुर ते नामु पाईऐ वडी वडिआई ॥१॥
एको नामु चेति मेरे भाई ॥
जगतु जलंदा देखि कै भजि पए सरणाई ॥१॥ रहाउ ॥
गुर ते गिआनु ऊपजै महा ततु बीचारा ॥
गुर ते घरु दरु पाइआ भगती भरे भंडारा ॥२॥
गुरमुखि नामु धिआईऐ बूझै वीचारा ॥
गुरमुखि भगति सलाह है अंतरि सबदु अपारा ॥३॥
गुरमुखि सूखु ऊपजै दुखु कदे न होई ॥
गुरमुखि हउमै मारीऐ मनु निरमलु होई ॥४॥
सतिगुरि मिलिऐ आपु गइआ त्रिभवण सोझी पाई ॥
निरमल जोति पसरि रही जोती जोति मिलाई ॥५॥
पूरै गुरि समझाइआ मति ऊतम होई ॥
अंतरु सीतलु सांति होइ नामे सुखु होई ॥६॥
पूरा सतिगुरु तां मिलै जां नदरि करेई ॥
किलविख पाप सभ कटीअहि फिरि दुखु बिघनु न होई ॥७॥
हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। रागु आसा महला ३ असटपदीआ घरु ८ काफी ॥ हे मेरे भाई ! जिस गुरू ने (मेरी) तृष्णा की आग बुझा दी है (तू भी उसकी शरण पड़)।गुरू के पास से ही आत्मिक ठंढ प्राप्त होती है। हे भाई ! गुरूसे ही परमात्मा का नाम मिलता है (जिसकी बरकति से लोक-परलोक में) बड़ा आदर प्राप्त होता है। 1। हे मेरे भाई ! (अगर तू विकारों की आग से बचना चाहता है तो) एक परमात्मा का नाम सिमरता रह। जगत को (विकारों में) जलता देख के मैं तो दौड़ के (गुरू की) शरण आ पड़ा हूँ (जिसने मुझे नाम की दाति बख्श दी है)। 1।रहाउ। हे भाई ! गुरू से आत्मिक जीवन की सूझ प्राप्त होती है।आत्मिक जीवन की सूझ ही सबसे बड़ी अस्लियत है और श्रेष्ठ विचार है। (हे भाई ! मुझे तो) गुरू से ही परमात्मा का ठिकाना मिला है और (मेरे अंदर) परमात्मा की भक्ति के खजाने भर गए हैं। 2। हे मेरे भाई ! गुरू की शरण पड़ने से ही प्रभू का नाम सिमरा जा सकता है (गुरू की शरण पड़ कर ही मनुष्य) इस विचार को समझ सकता है। गुरू की शरण आने से परमात्मा की भक्ति सिफत सालाह प्राप्त होती है।हृदय में बेअंत प्रभू के सिफत सालाह का शबद आ बसता है। 3। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है उसके अंदर आत्मिक आनंद पैदा हो जाता है।उसे कभी भी कोई दुख नहीं छू सकता। गुरू की शरण पड़ने से (अंदर से) अहंकार दूर कर सकते हैं।मन पवित्र हो जाता है। 4। हे भाई ! यदि गुरू मिल जाए तो अहँकार का नाश हो जाता है।यह बात समझ में आ जाती है कि परमात्मा तीनों ही भवनों में व्यापक है। हर जगह परमात्मा की पवित्र ज्योति प्रकाशमान है।(इस तरह) परमात्मा की जोति में सुरति जुड़ जाती है। 5। हे भाई ! (जिस मनुष्य को) पूरे गुरू ने (आत्मिक जीवन की) समझ बख्श दी (उस की) अक्ल श्रेष्ठ हो जाती है। उसका दिल (विकारों की सड़न से बच के) ठंडा-ठार हुआ रहता है।हरि नाम से उसको आनंद प्राप्त होता है। 6।(पर। हे भाई !) पूरा गुरू भी तभी मिलता है जब परमात्मा स्वयं मेहर की निगाह करता है। (जिस को गुरू मिल जाता है उसके) सारे पाप-विकार काटे जाते हैं।उसे फिर कोई दुख नहीं व्याप्तता।उसके जीवन सफर में कोई रुकावट नहीं प्ड़ती। 7।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 424 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
दिल्ली-यूनिवर्सिटी के North Campus में exam-season की tension।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 47 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 424” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 425 →, पीछे का: ← अंग 423।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।