अंग 402

अंग
402
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਪੁਤ੍ਰ ਕਲਤ੍ਰ ਗ੍ਰਿਹ ਸਗਲ ਸਮਗ੍ਰੀ ਸਭ ਮਿਥਿਆ ਅਸਨਾਹਾ ॥੧॥
ਰੇ ਮਨ ਕਿਆ ਕਰਹਿ ਹੈ ਹਾ ਹਾ ॥
ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਦੇਖੁ ਜੈਸੇ ਹਰਿਚੰਦਉਰੀ ਇਕੁ ਰਾਮ ਭਜਨੁ ਲੈ ਲਾਹਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੈਸੇ ਬਸਤਰ ਦੇਹ ਓਢਾਨੇ ਦਿਨ ਦੋਇ ਚਾਰਿ ਭੋਰਾਹਾ ॥
ਭੀਤਿ ਊਪਰੇ ਕੇਤਕੁ ਧਾਈਐ ਅੰਤਿ ਓਰਕੋ ਆਹਾ ॥੨॥
ਜੈਸੇ ਅੰਭ ਕੁੰਡ ਕਰਿ ਰਾਖਿਓ ਪਰਤ ਸਿੰਧੁ ਗਲਿ ਜਾਹਾ ॥
ਆਵਗਿ ਆਗਿਆ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਕੀ ਉਠਿ ਜਾਸੀ ਮੁਹਤ ਚਸਾਹਾ ॥੩॥
ਰੇ ਮਨ ਲੇਖੈ ਚਾਲਹਿ ਲੇਖੈ ਬੈਸਹਿ ਲੇਖੈ ਲੈਦਾ ਸਾਹਾ ॥
ਸਦਾ ਕੀਰਤਿ ਕਰਿ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਕੀ ਉਬਰੇ ਸਤਿਗੁਰ ਚਰਣ ਓਟਾਹਾ ॥੪॥੧॥੧੨੩॥
पुत्र कलत्र ग्रिह सगल समग्री सभ मिथिआ असनाहा ॥१॥
रे मन किआ करहि है हा हा ॥
द्रिसटि देखु जैसे हरिचंदउरी इकु राम भजनु लै लाहा ॥१॥ रहाउ ॥
जैसे बसतर देह ओढाने दिन दोइ चारि भोराहा ॥
भीति ऊपरे केतकु धाईऐ अंति ओरको आहा ॥२॥
जैसे अंभ कुंड करि राखिओ परत सिंधु गलि जाहा ॥
आवगि आगिआ पारब्रहम की उठि जासी मुहत चसाहा ॥३॥
रे मन लेखै चालहि लेखै बैसहि लेखै लैदा साहा ॥
सदा कीरति करि नानक हरि की उबरे सतिगुर चरण ओटाहा ॥४॥१॥१२३॥

हिन्दी अर्थ: पुत्र स्त्री घर का सारा सामान- इनसे मोह सारा झूठा है। 1। हे मेरे मन ! (माया का पसारा देख के क्या खुशियां मना रहा है तू) क्या आहा आहा करता फिरता है। ध्यान से देख ! ये सारा पसारा धूँएं के पहाड़ जैसा है।परमात्मा का भजन किया कर।सिर्फ इसी से (मनुष्य जीवन में) लाभ (कमाया जा सकता है)। 1।रहाउ। हे मन ! (ये जगत पसारा यूँ ही है) जैसे शरीर पर पहने हुए कपड़े।दो चार दिनों में ही पुराने हो जाते हैं। हे मन ! दीवार पर कहाँ तक दौड़ सकते हैं।आखिर उसका आखिरी सिरा आ ही जाता है (जिंदगी के गिने-चुने स्वाश अवश्य ही समाप्त होने हैं)। 2। हे मन ! (ये उम्र ऐसे ही है) जैसे पानी का कुण्ड बना के रखा हो।और उसमें नमक पड़ते सार ही वह गल जाता है। हे मन ! जब (जिसे) परमात्मा का हुकम (बुलावा) आएगा।वह उसी वक्त उठ के चल पड़ेगा। 3। हे मेरे मन ! तू अपने गिने-चुने स्वासों के अंदर ही जगत में चलता फिरता है और बैठता है (गिने-चुने) लेख के मुताबिक ही तू सांस लेता है।(ये आखिर समाप्त हो जाने हैं)। हे नानक ! सदा परमात्मा की सिफत सालाह करता रह।जो मनुष्य गुरू के चरणों का आसरा लेते हैं (और प्रभू की सिफत सालाह करते हैं) वह (माया के मोह में फंसने से) बच जाते हैं। 4। 1। 123।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਅਪੁਸਟ ਬਾਤ ਤੇ ਭਈ ਸੀਧਰੀ ਦੂਤ ਦੁਸਟ ਸਜਨਈ ॥
ਅੰਧਕਾਰ ਮਹਿ ਰਤਨੁ ਪ੍ਰਗਾਸਿਓ ਮਲੀਨ ਬੁਧਿ ਹਛਨਈ ॥੧॥
ਜਉ ਕਿਰਪਾ ਗੋਬਿੰਦ ਭਈ ॥
ਸੁਖ ਸੰਪਤਿ ਹਰਿ ਨਾਮ ਫਲ ਪਾਏ ਸਤਿਗੁਰ ਮਿਲਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮੋਹਿ ਕਿਰਪਨ ਕਉ ਕੋਇ ਨ ਜਾਨਤ ਸਗਲ ਭਵਨ ਪ੍ਰਗਟਈ ॥
ਸੰਗਿ ਬੈਠਨੋ ਕਹੀ ਨ ਪਾਵਤ ਹੁਣਿ ਸਗਲ ਚਰਣ ਸੇਵਈ ॥੨॥
ਆਢ ਆਢ ਕਉ ਫਿਰਤ ਢੂੰਢਤੇ ਮਨ ਸਗਲ ਤ੍ਰਿਸਨ ਬੁਝਿ ਗਈ ॥
ਏਕੁ ਬੋਲੁ ਭੀ ਖਵਤੋ ਨਾਹੀ ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਸੀਤਲਈ ॥੩॥
ਏਕ ਜੀਹ ਗੁਣ ਕਵਨ ਵਖਾਨੈ ਅਗਮ ਅਗਮ ਅਗਮਈ ॥
ਦਾਸੁ ਦਾਸ ਦਾਸ ਕੋ ਕਰੀਅਹੁ ਜਨ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਸਰਣਈ ॥੪॥੨॥੧੨੪॥
आसा महला ५ ॥
अपुसट बात ते भई सीधरी दूत दुसट सजनई ॥
अंधकार महि रतनु प्रगासिओ मलीन बुधि हछनई ॥१॥
जउ किरपा गोबिंद भई ॥
सुख संपति हरि नाम फल पाए सतिगुर मिलई ॥१॥ रहाउ ॥
मोहि किरपन कउ कोइ न जानत सगल भवन प्रगटई ॥
संगि बैठनो कही न पावत हुणि सगल चरण सेवई ॥२॥
आढ आढ कउ फिरत ढूंढते मन सगल त्रिसन बुझि गई ॥
एकु बोलु भी खवतो नाही साधसंगति सीतलई ॥३॥
एक जीह गुण कवन वखानै अगम अगम अगमई ॥
दासु दास दास को करीअहु जन नानक हरि सरणई ॥४॥२॥१२४॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई ! जब गुरू से मिलाप हुआ तो मेरी हरेक) उलट बात भी सीधी हो गई (मेरे पहले) बुरे वैरी (अब) सज्जन-मित्र बन गए। (मेरे मन के) घुप अंधेरे में (गुरू का बख्शा हुआ ज्ञान-) रतन चमक पड़ा है।(विकारों से) मैली हो चुकी मेरी अकल साफ-सुथरी हो गई। 1। हे भाई ! जब मेरे पर गोबिंद की कृपा हुई। मैं सतिगुरू को मिला (और सतिगुरू के मिलाप की बरकति से) फल (के तौर पर) मुझे आत्मिक आनंद की दौलत और परमात्मा के नाम की प्राप्ति हो गई। 1।रहाउ। (हे भाई ! गुरू से मिलाप के पहले) मुझ नकारे को कोई नहीं था जानता।अब मैं सारे भवनों में श्रेष्ठ हो गया हूँ। (पहले) मैं किसी के पास बैठने के काबिल नहीं था।अब सारी लुकाई मेरे चरणों की सेवा करने लग पड़ी है। 2। (हे भाई ! गुरू-मिलाप से पहले तृष्णा अधीन हो के) मैं आधी-आधी दमड़ी को ढूँढता-फिरता था (गुरू की बरकति से) मेरे मन की सारी तृष्णा बुझ गई है। पहले मैं (किसी का) एक भी (कड़वा) बोल सह नहीं सकता था।साध-संगति के सदका अब मेरा दिल ठंडा-ठार हो गया है। 3। (हे भाई ! गोबिंद की अपार कृपा से मुझे सतिगुरू मिला।उस गोबिंद के) कौन-कौन से गुण (उपकार) मेरी ये एक जीभ बयान करे।वह अपहुँच है अपहुँच है अपहुँच है (उसके सारे गुण-उपकार बताए नहीं जा सकते)। हे नानक ! (सिर्फ यही कहता रह -) हे हरी ! मैं दास तेरी शरण आया हूँ।मुझे अपने दासों के दासों का दास बनाए रख। 4। 2। 124।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਰੇ ਮੂੜੇ ਲਾਹੇ ਕਉ ਤੂੰ ਢੀਲਾ ਢੀਲਾ ਤੋਟੇ ਕਉ ਬੇਗਿ ਧਾਇਆ ॥
ਸਸਤ ਵਖਰੁ ਤੂੰ ਘਿੰਨਹਿ ਨਾਹੀ ਪਾਪੀ ਬਾਧਾ ਰੇਨਾਇਆ ॥੧॥
ਸਤਿਗੁਰ ਤੇਰੀ ਆਸਾਇਆ ॥
ਪਤਿਤ ਪਾਵਨੁ ਤੇਰੋ ਨਾਮੁ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਮੈ ਏਹਾ ਓਟਾਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੰਧਣ ਵੈਣ ਸੁਣਹਿ ਉਰਝਾਵਹਿ ਨਾਮੁ ਲੈਤ ਅਲਕਾਇਆ ॥
ਨਿੰਦ ਚਿੰਦ ਕਉ ਬਹੁਤੁ ਉਮਾਹਿਓ ਬੂਝੀ ਉਲਟਾਇਆ ॥੨॥
ਪਰ ਧਨ ਪਰ ਤਨ ਪਰ ਤੀ ਨਿੰਦਾ ਅਖਾਧਿ ਖਾਹਿ ਹਰਕਾਇਆ ॥
ਸਾਚ ਧਰਮ ਸਿਉ ਰੁਚਿ ਨਹੀ ਆਵੈ ਸਤਿ ਸੁਨਤ ਛੋਹਾਇਆ ॥੩॥
ਦੀਨ ਦਇਆਲ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਪ੍ਰਭ ਠਾਕੁਰ ਭਗਤ ਟੇਕ ਹਰਿ ਨਾਇਆ ॥
ਨਾਨਕ ਆਹਿ ਸਰਣ ਪ੍ਰਭ ਆਇਓ ਰਾਖੁ ਲਾਜ ਅਪਨਾਇਆ ॥੪॥੩॥੧੨੫॥
आसा महला ५ ॥
रे मूड़े लाहे कउ तूं ढीला ढीला तोटे कउ बेगि धाइआ ॥
ससत वखरु तूं घिंनहि नाही पापी बाधा रेनाइआ ॥१॥
सतिगुर तेरी आसाइआ ॥
पतित पावनु तेरो नामु पारब्रहम मै एहा ओटाइआ ॥१॥ रहाउ ॥
गंधण वैण सुणहि उरझावहि नामु लैत अलकाइआ ॥
निंद चिंद कउ बहुतु उमाहिओ बूझी उलटाइआ ॥२॥
पर धन पर तन पर ती निंदा अखाधि खाहि हरकाइआ ॥
साच धरम सिउ रुचि नही आवै सति सुनत छोहाइआ ॥३॥
दीन दइआल क्रिपाल प्रभ ठाकुर भगत टेक हरि नाइआ ॥
नानक आहि सरण प्रभ आइओ राखु लाज अपनाइआ ॥४॥३॥१२५॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे (मेरे) मूर्ख (मन) ! (आत्मिक जीवन के) लाभ (वाले काम) के लिए तू बहुत आलसी है पर (आत्मिक जीवन की राशि के) घाटे वास्ते तू जल्दी उठ दौड़ता है ! हे पापी ! तू सस्ता सौदा लेता नहीं।(विकारों के) करजे के बोझमें बंधा हुआ है। 1। हे गुरू ! मुझे तेरी (सहायता) की उम्मीद है। हे परमात्मा ! (मैं विकारी तो बहुत हूँ।पर) मुझे यही सहारा है कि तेरा नाम विकारों में गिरे हुए को पवित्र करने वाला है। 1।रहाउ। हे मूर्ख ! तू गंदे गीत सुनता है और (सुन के) मस्त होता है।परमात्मा का नाम लेते हुए तू आलस करता है किसी की निंदा की सोच से भी तुझे बहुत चाव चढ़ता है।हे मूर्ख ! तूने हरेक बात उलटी ही समझी हुई है। 2। हे मूर्ख ! तू पराया धन (चुराता है)।पराया रूप (बुरी निगाह से ताकता है)।पराई निंदा (करता है।तू लोभ से) हलकाया हुआ है।वही चीजें खाता है जो तुझे नहीं खानी चाहिए। हे मूर्ख ! सदा साथ निभने वाले धर्म के साथ तेरा प्यार नहीं पड़ता।सच-उपदेश सुनने में तुझे खिझ लगती है। 3। हे नानक ! (कह,) रे दीनों पर दया करने वाले ठाकुर ! हे कृपा के घर प्रभू ! तेरे भक्तों को तेरे नाम का सहारा है। हे प्रभू ! मैं चाहत करके तेरी शरण आया हूँ।मुझे अपना दास बना के मेरी लाज रख (मुझे मंद-कर्मों से बचाए रख)। 4। 3। 125।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮਿਥਿਆ ਸੰਗਿ ਸੰਗਿ ਲਪਟਾਏ ਮੋਹ ਮਾਇਆ ਕਰਿ ਬਾਧੇ ॥
ਜਹ ਜਾਨੋ ਸੋ ਚੀਤਿ ਨ ਆਵੈ ਅਹੰਬੁਧਿ ਭਏ ਆਂਧੇ ॥੧॥
ਮਨ ਬੈਰਾਗੀ ਕਿਉ ਨ ਅਰਾਧੇ ॥
ਕਾਚ ਕੋਠਰੀ ਮਾਹਿ ਤੂੰ ਬਸਤਾ ਸੰਗਿ ਸਗਲ ਬਿਖੈ ਕੀ ਬਿਆਧੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮੇਰੀ ਮੇਰੀ ਕਰਤ ਦਿਨੁ ਰੈਨਿ ਬਿਹਾਵੈ ਪਲੁ ਖਿਨੁ ਛੀਜੈ ਅਰਜਾਧੇ ॥
आसा महला ५ ॥
मिथिआ संगि संगि लपटाए मोह माइआ करि बाधे ॥
जह जानो सो चीति न आवै अहंबुधि भए आंधे ॥१॥
मन बैरागी किउ न अराधे ॥
काच कोठरी माहि तूं बसता संगि सगल बिखै की बिआधे ॥१॥ रहाउ ॥
मेरी मेरी करत दिनु रैनि बिहावै पलु खिनु छीजै अरजाधे ॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (दुर्भाग्यशाली मनुष्य) झूठे साथियों की संगति में मस्त रहता है माया के मोह में बंधा रहता है। (ये जगत छोड़ के) जहाँ (आखिर) े जाना है वह जगह (इसके) ख्याल में कभी नहीं आती।अहंम् में अंधा हुआ रहता है। 1। हे मेरे मन ! तू माया के मोह से उपराम हो के परमात्मा की आराधना क्यूँ नहीं करता। (तेरा ये शरीर) कच्ची कोठड़ी (है जिसमें तू बस रहा है। ) तेरे साथ सारे विषौ-विकारों के रोग चिपके हुए हैं। 1।रहाउ। ‘ये मेरी मल्कियत है ये मेरी जयदाद है’ -ये कहते हुए ही (दुर्भाग्यशाली मनुष्य का) दिन गुजर जाता है (इसी तरह फिर) रात गुजर जाती है।पल-पल छिन-छिन कर कर के इसकी उम्र घटती जाती है।

संदर्भ: यह अंग 402 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

सीस-गंज साहिब के बाहर Chandni Chowk की भीड़ और अंदर का shrine, दोनों एक साथ।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 37 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 402” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 403 →, पीछे का: ← अंग 401

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।