अंग 392

अंग
392
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸੰਚਤ ਸੰਚਤ ਥੈਲੀ ਕੀਨੑੀ ॥
ਪ੍ਰਭਿ ਉਸ ਤੇ ਡਾਰਿ ਅਵਰ ਕਉ ਦੀਨੑੀ ॥੧॥
ਕਾਚ ਗਗਰੀਆ ਅੰਭ ਮਝਰੀਆ ॥
ਗਰਬਿ ਗਰਬਿ ਉਆਹੂ ਮਹਿ ਪਰੀਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਿਰਭਉ ਹੋਇਓ ਭਇਆ ਨਿਹੰਗਾ ॥
ਚੀਤਿ ਨ ਆਇਓ ਕਰਤਾ ਸੰਗਾ ॥
ਲਸਕਰ ਜੋੜੇ ਕੀਆ ਸੰਬਾਹਾ ॥
ਨਿਕਸਿਆ ਫੂਕ ਤ ਹੋਇ ਗਇਓ ਸੁਆਹਾ ॥੨॥
ਊਚੇ ਮੰਦਰ ਮਹਲ ਅਰੁ ਰਾਨੀ ॥
ਹਸਤਿ ਘੋੜੇ ਜੋੜੇ ਮਨਿ ਭਾਨੀ ॥
ਵਡ ਪਰਵਾਰੁ ਪੂਤ ਅਰੁ ਧੀਆ ॥
ਮੋਹਿ ਪਚੇ ਪਚਿ ਅੰਧਾ ਮੂਆ ॥੩॥
ਜਿਨਹਿ ਉਪਾਹਾ ਤਿਨਹਿ ਬਿਨਾਹਾ ॥
ਰੰਗ ਰਸਾ ਜੈਸੇ ਸੁਪਨਾਹਾ ॥
ਸੋਈ ਮੁਕਤਾ ਤਿਸੁ ਰਾਜੁ ਮਾਲੁ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਜਿਸੁ ਖਸਮੁ ਦਇਆਲੁ ॥੪॥੩੫॥੮੬॥
संचत संचत थैली कीन॑ी ॥
प्रभि उस ते डारि अवर कउ दीन॑ी ॥१॥
काच गगरीआ अंभ मझरीआ ॥
गरबि गरबि उआहू महि परीआ ॥१॥ रहाउ ॥
निरभउ होइओ भइआ निहंगा ॥
चीति न आइओ करता संगा ॥
लसकर जोड़े कीआ संबाहा ॥
निकसिआ फूक त होइ गइओ सुआहा ॥२॥
ऊचे मंदर महल अरु रानी ॥
हसति घोड़े जोड़े मनि भानी ॥
वड परवारु पूत अरु धीआ ॥
मोहि पचे पचि अंधा मूआ ॥३॥
जिनहि उपाहा तिनहि बिनाहा ॥
रंग रसा जैसे सुपनाहा ॥
सोई मुकता तिसु राजु मालु ॥
नानक दास जिसु खसमु दइआलु ॥४॥३५॥८६॥

हिन्दी अर्थ: जोड़-जोड़ के (अगर उसने) खजाना (भी) बना लिया (तो भी क्या हुआ। ) परमात्मा ने (आखिर) उससे छीन के किसी और को दे दिया (मौत के समय वह अपने साथ तो ना ले जा सका)। 1। (हे भाई ! ये मानस शरीर पानी में पड़ी हुई) कच्ची मिट्टी की गागर (जैसा है जो हवा से उछल-उछल के) पानी में ही (गलती जाती है।) (इस तरह मनुष्य भी) अहंकार कर-करके उसी (संसार-समुंद्र) में ही डूब जाता है (अपना आत्मिक जीवन गर्क कर लेता है)। 1।रहाउ। (हे भाई ! राज के गुमान में यदि वह मौत से) निडर हो गया निधड़क हो गया चिक्त में करतार संग नहीं आया (यदि उसने) फौजें जमां कर कर के बड़ा सारा लश्कर बना लिया (तो भी क्या हुआ।) जब (आखिरी समय) उसके श्वास निकल गए तो (उसका) शरीर मिट्टी हो गया। 2। (हे भाई ! यदि उसको) ऊँचे महल-माढ़ियां (रहने के लिए मिल गए) और (सुंदर) रानी (मिल गई। अगर उसने) हाथी घोड़े (बढ़िया) मन-भाते कपड़े (इकट्ठे कर लिए। यदि वह) पुत्रो-बेटियों वाला बड़े परिवार वाला बन गया। तो भी तो (माया के) मोह में ख्वार हो हो के (वह) माया के मोह में (अंधा हो के) आत्मिक मौत ही सहेड़ बैठा। 3। (हे भाई !) जिस परमात्मा ने (उसे) पैदा किया था उसी ने उसको नाश भी कर दिया। उसके भोगे हुए रंग-तमाशे और मौज-मेले सपने की ही तरह हो गए। वही मनुष्य (माया के मोह से) बचा रहता है उसके पास (सदा कायम रहने वाला) राज और धन है हे दास नानक ! (कह,)जिस पर पति प्रभू दयावान होता है (और जिसे अपने नाम का खजाना बख्शता है)। 4। 35। 86।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਇਨੑ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਕਰੀ ਘਨੇਰੀ ॥
ਜਉ ਮਿਲੀਐ ਤਉ ਵਧੈ ਵਧੇਰੀ ॥
ਗਲਿ ਚਮੜੀ ਜਉ ਛੋਡੈ ਨਾਹੀ ॥
ਲਾਗਿ ਛੁਟੋ ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਪਾਈ ॥੧॥
ਜਗ ਮੋਹਨੀ ਹਮ ਤਿਆਗਿ ਗਵਾਈ ॥
ਨਿਰਗੁਨੁ ਮਿਲਿਓ ਵਜੀ ਵਧਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਐਸੀ ਸੁੰਦਰਿ ਮਨ ਕਉ ਮੋਹੈ ॥
ਬਾਟਿ ਘਾਟਿ ਗ੍ਰਿਹਿ ਬਨਿ ਬਨਿ ਜੋਹੈ ॥
ਮਨਿ ਤਨਿ ਲਾਗੈ ਹੋਇ ਕੈ ਮੀਠੀ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਮੈ ਖੋਟੀ ਡੀਠੀ ॥੨॥
ਅਗਰਕ ਉਸ ਕੇ ਵਡੇ ਠਗਾਊ ॥
ਛੋਡਹਿ ਨਾਹੀ ਬਾਪ ਨ ਮਾਊ ॥
ਮੇਲੀ ਅਪਨੇ ਉਨਿ ਲੇ ਬਾਂਧੇ ॥
ਗੁਰ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਮੈ ਸਗਲੇ ਸਾਧੇ ॥੩॥
ਅਬ ਮੋਰੈ ਮਨਿ ਭਇਆ ਅਨੰਦ ॥
ਭਉ ਚੂਕਾ ਟੂਟੇ ਸਭਿ ਫੰਦ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਾਇਆ ॥
ਘਰੁ ਸਗਲਾ ਮੈ ਸੁਖੀ ਬਸਾਇਆ ॥੪॥੩੬॥੮੭॥
आसा महला ५ ॥
इन॑ सिउ प्रीति करी घनेरी ॥
जउ मिलीऐ तउ वधै वधेरी ॥
गलि चमड़ी जउ छोडै नाही ॥
लागि छुटो सतिगुर की पाई ॥१॥
जग मोहनी हम तिआगि गवाई ॥
निरगुनु मिलिओ वजी वधाई ॥१॥ रहाउ ॥
ऐसी सुंदरि मन कउ मोहै ॥
बाटि घाटि ग्रिहि बनि बनि जोहै ॥
मनि तनि लागै होइ कै मीठी ॥
गुर प्रसादि मै खोटी डीठी ॥२॥
अगरक उस के वडे ठगाऊ ॥
छोडहि नाही बाप न माऊ ॥
मेली अपने उनि ले बांधे ॥
गुर किरपा ते मै सगले साधे ॥३॥
अब मोरै मनि भइआ अनंद ॥
भउ चूका टूटे सभि फंद ॥
कहु नानक जा सतिगुरु पाइआ ॥
घरु सगला मै सुखी बसाइआ ॥४॥३६॥८७॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई !)अगर इस (माया) से ज्यादा प्रीति करें तो ज्यों-ज्यों इससे साथ बनाते जाते हैं, त्यों-त्यों इससे मोह बढ़ता जाता है। (आखिर) जब ये गले से चिपकी हुई छोड़ती ही नहीं। तब सतिगुरू के चरणों में लग के इससे निजात पाते हैं। 1। जब से ही मैंने सारे जगत को मोहने वाली माया (के मोह) को त्याग के परे फेंक दिया है (हे भाई ! गुरू की कृपा से जब से) मुझे माया के तीन गुणों के प्रभाच से ऊपर रहने वाला परमात्मा मिला है मेरे अंदर उत्साह भरी अवस्था प्रबल हो गई है। । 1।रहाउ। (हे भाई ! ये माया) ऐसी सुन्दर है कि (मनुष्य के) मन को (तुरन्त) मोह लेती है। रास्ते में (चलते हुए) पत्तन से (गुजरते हुए) घर में (बैठे हुए) जंगल-जंगल में (भटकते हुए भी ये मन को मोहने के लिए) ताक लगाए रखती है। मीठी बन के ये मन में तन में आ चिपकती है। पर मैंने गुरू की कृपा से देख लिया है कि ये बड़ी खोटी है। 2। (हे भाई ! कामादिक) उस माया के मुहासब (भी) बड़े ठॅग हैं। माँ हो पिता हो किसी को भी ठगने से नहीं बख्शते। जिन-जिन ने इनके साथ मेल-मुलाकात रखी।उनको इन चौधरियों ने अच्छी तरह बांध लिया। पर मैंने गुरू की कृपा से इन सभी को काबू कर लिया है। 3। हे नानक ! जब से मुझे सतिगुरू मिल गए हैं तब से अब मेरे मन में आनंद बना रहता है (मेरे अंदर से इन कामादिक चौधरियों का) डर-भय उतर गया है इनके डाले हुए सारे जाल टूट गए हैं। (मेरी सारी ज्ञानेन्द्रियों वाला परिवार इनकी मार से बच के आत्मिक आनंद ले रहा है) मैंने अब अपना सारा घर सुखी बसा लिया है । 4। 36। 87।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਨਿਕਟਿ ਕਰਿ ਜਾਨੈ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕਾ ਕੀਆ ਮੀਠਾ ਮਾਨੈ ॥
ਏਕੁ ਨਾਮੁ ਸੰਤਨ ਆਧਾਰੁ ॥
ਹੋਇ ਰਹੇ ਸਭ ਕੀ ਪਗ ਛਾਰੁ ॥੧॥
ਸੰਤ ਰਹਤ ਸੁਨਹੁ ਮੇਰੇ ਭਾਈ ॥
ਉਆ ਕੀ ਮਹਿਮਾ ਕਥਨੁ ਨ ਜਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਵਰਤਣਿ ਜਾ ਕੈ ਕੇਵਲ ਨਾਮ ॥
ਅਨਦ ਰੂਪ ਕੀਰਤਨੁ ਬਿਸ੍ਰਾਮ ॥
ਮਿਤ੍ਰ ਸਤ੍ਰੁ ਜਾ ਕੈ ਏਕ ਸਮਾਨੈ ॥
ਪ੍ਰਭ ਅਪੁਨੇ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਜਾਨੈ ॥੨॥
ਕੋਟਿ ਕੋਟਿ ਅਘ ਕਾਟਨਹਾਰਾ ॥
ਦੁਖ ਦੂਰਿ ਕਰਨ ਜੀਅ ਕੇ ਦਾਤਾਰਾ ॥
ਸੂਰਬੀਰ ਬਚਨ ਕੇ ਬਲੀ ॥
ਕਉਲਾ ਬਪੁਰੀ ਸੰਤੀ ਛਲੀ ॥੩॥
ਤਾ ਕਾ ਸੰਗੁ ਬਾਛਹਿ ਸੁਰਦੇਵ ॥
ਅਮੋਘ ਦਰਸੁ ਸਫਲ ਜਾ ਕੀ ਸੇਵ ॥
ਕਰ ਜੋੜਿ ਨਾਨਕੁ ਕਰੇ ਅਰਦਾਸਿ ॥
ਮੋਹਿ ਸੰਤਹ ਟਹਲ ਦੀਜੈ ਗੁਣਤਾਸਿ ॥੪॥੩੭॥੮੮॥
आसा महला ५ ॥
आठ पहर निकटि करि जानै ॥
प्रभ का कीआ मीठा मानै ॥
एकु नामु संतन आधारु ॥
होइ रहे सभ की पग छारु ॥१॥
संत रहत सुनहु मेरे भाई ॥
उआ की महिमा कथनु न जाई ॥१॥ रहाउ ॥
वरतणि जा कै केवल नाम ॥
अनद रूप कीरतनु बिस्राम ॥
मित्र सत्रु जा कै एक समानै ॥
प्रभ अपुने बिनु अवरु न जानै ॥२॥
कोटि कोटि अघ काटनहारा ॥
दुख दूरि करन जीअ के दातारा ॥
सूरबीर बचन के बली ॥
कउला बपुरी संती छली ॥३॥
ता का संगु बाछहि सुरदेव ॥
अमोघ दरसु सफल जा की सेव ॥
कर जोड़ि नानकु करे अरदासि ॥
मोहि संतह टहल दीजै गुणतासि ॥४॥३७॥८८॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ परमात्मा का भक्त परमात्मा को आठों पहर अपने नजदीक बसता समझता है। जो कुछ परमात्मा करता है उसको मीठा करके मानता है। (हे भाई !) परमात्मा का नाम ही संत-जनों (की जिंदगी) का आसरा (बना रहता) है। संत-जन सबके पैरों की धूड़ बने रहते हैं। 1। हे मेरे भाई ! (परमात्मा के) संत की जीवन-जुगति सुन (उसका जीवन इतना ऊँचा है कि) उसका बड़प्पन बयान नहीं किया जा सकता। 1।रहाउ। (हे भाई ! संत वह है) जिसके हृदय में सिर्फ हरि सिमरन का ही आहर टिका रहता है। सदा आनंद में रहने वाले परमात्मा की सिफत सालाह ही (संत की जिंदगी का) सहारा है। (हे भाई ! संत वह है) जिसे मित्र और शत्रु एक ही जैसे (मित्र ही) लगते हैं (क्योंकि संत सब जीवों में) अपने प्रभू के बिना किसी और को (बसता) नहीं समझता। 2। (हे भाई ! परमात्मा का संत औरों के) करोड़ों ही पाप दूर करने की ताकत रखता है। (हे भाई !) परमात्मा के संत (दूसरों के) दुख दूर करने के योग्य हो जाते हैं वह (लोगों को) आत्मिक जीवन देने की समर्था रखते हैं। (प्रभू के संत विकारों के मुकाबले में) शूरवीर होते हैं।किए वचनों की पालना करते हैं। (संतों की निगाह में ये माया भी बेचारी से प्रतीत होती है) इस बेचारी माया को संतों ने अपने वश में कर लिया होता है। 3। (हे भाई !) परमात्मा के संत का मिलाप आकाशी देवते भी तलाश्ते रहते हैं। संत का दर्शन व्यर्थ नहीं जाता।संत की सेवा जरूर फल देती है। (हे भाई !) नानक (दोनों) हाथ जोड़ के अरजोई करता है, हे गुणों के खजाने प्रभू ! मुझे संत जनों की सेवा की दाति बख्श। 4। 37। 88।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸਗਲ ਸੂਖ ਜਪਿ ਏਕੈ ਨਾਮ ॥
ਸਗਲ ਧਰਮ ਹਰਿ ਕੇ ਗੁਣ ਗਾਮ ॥
ਮਹਾ ਪਵਿਤ੍ਰ ਸਾਧ ਕਾ ਸੰਗੁ ॥
आसा महला ५ ॥
सगल सूख जपि एकै नाम ॥
सगल धरम हरि के गुण गाम ॥
महा पवित्र साध का संगु ॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (गुरू की संगति में रह के) परमात्मा का नाम जपके सारे सुख प्राप्त हो जाते हैं। (हे भाई !) परमात्मा की सिफत सालाह करने में ही और सारे धर्म आ जाते हैं। (हे भाई !) गुरू की संगति बहुत पवित्र करने वाली है।

संदर्भ: यह अंग 392 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

startup की 14-घंटे की रात, founder अकेले laptop पर।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 58 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 392” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 393 →, पीछे का: ← अंग 391

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।