अंग
419
राग आसा
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਜੋਗੀ ਭੋਗੀ ਕਾਪੜੀ ਕਿਆ ਭਵਹਿ ਦਿਸੰਤਰ ॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਨ ਚੀਨੑਹੀ ਤਤੁ ਸਾਰੁ ਨਿਰੰਤਰ ॥੩॥
ਪੰਡਿਤ ਪਾਧੇ ਜੋਇਸੀ ਨਿਤ ਪੜ੍ਹਹਿ ਪੁਰਾਣਾ ॥
ਅੰਤਰਿ ਵਸਤੁ ਨ ਜਾਣਨੑੀ ਘਟਿ ਬ੍ਰਹਮੁ ਲੁਕਾਣਾ ॥੪॥
ਇਕਿ ਤਪਸੀ ਬਨ ਮਹਿ ਤਪੁ ਕਰਹਿ ਨਿਤ ਤੀਰਥ ਵਾਸਾ ॥
ਆਪੁ ਨ ਚੀਨਹਿ ਤਾਮਸੀ ਕਾਹੇ ਭਏ ਉਦਾਸਾ ॥੫॥
ਇਕਿ ਬਿੰਦੁ ਜਤਨ ਕਰਿ ਰਾਖਦੇ ਸੇ ਜਤੀ ਕਹਾਵਹਿ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਸਬਦ ਨ ਛੂਟਹੀ ਭ੍ਰਮਿ ਆਵਹਿ ਜਾਵਹਿ ॥੬॥
ਇਕਿ ਗਿਰਹੀ ਸੇਵਕ ਸਾਧਿਕਾ ਗੁਰਮਤੀ ਲਾਗੇ ॥
ਨਾਮੁ ਦਾਨੁ ਇਸਨਾਨੁ ਦ੍ਰਿੜੁ ਹਰਿ ਭਗਤਿ ਸੁ ਜਾਗੇ ॥੭॥
ਗੁਰ ਤੇ ਦਰੁ ਘਰੁ ਜਾਣੀਐ ਸੋ ਜਾਇ ਸਿਞਾਣੈ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਨ ਵੀਸਰੈ ਸਾਚੇ ਮਨੁ ਮਾਨੈ ॥੮॥੧੪॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਨ ਚੀਨੑਹੀ ਤਤੁ ਸਾਰੁ ਨਿਰੰਤਰ ॥੩॥
ਪੰਡਿਤ ਪਾਧੇ ਜੋਇਸੀ ਨਿਤ ਪੜ੍ਹਹਿ ਪੁਰਾਣਾ ॥
ਅੰਤਰਿ ਵਸਤੁ ਨ ਜਾਣਨੑੀ ਘਟਿ ਬ੍ਰਹਮੁ ਲੁਕਾਣਾ ॥੪॥
ਇਕਿ ਤਪਸੀ ਬਨ ਮਹਿ ਤਪੁ ਕਰਹਿ ਨਿਤ ਤੀਰਥ ਵਾਸਾ ॥
ਆਪੁ ਨ ਚੀਨਹਿ ਤਾਮਸੀ ਕਾਹੇ ਭਏ ਉਦਾਸਾ ॥੫॥
ਇਕਿ ਬਿੰਦੁ ਜਤਨ ਕਰਿ ਰਾਖਦੇ ਸੇ ਜਤੀ ਕਹਾਵਹਿ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਸਬਦ ਨ ਛੂਟਹੀ ਭ੍ਰਮਿ ਆਵਹਿ ਜਾਵਹਿ ॥੬॥
ਇਕਿ ਗਿਰਹੀ ਸੇਵਕ ਸਾਧਿਕਾ ਗੁਰਮਤੀ ਲਾਗੇ ॥
ਨਾਮੁ ਦਾਨੁ ਇਸਨਾਨੁ ਦ੍ਰਿੜੁ ਹਰਿ ਭਗਤਿ ਸੁ ਜਾਗੇ ॥੭॥
ਗੁਰ ਤੇ ਦਰੁ ਘਰੁ ਜਾਣੀਐ ਸੋ ਜਾਇ ਸਿਞਾਣੈ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਨ ਵੀਸਰੈ ਸਾਚੇ ਮਨੁ ਮਾਨੈ ॥੮॥੧੪॥
जोगी भोगी कापड़ी किआ भवहि दिसंतर ॥
गुर का सबदु न चीन॑ही ततु सारु निरंतर ॥३॥
पंडित पाधे जोइसी नित पड़्हहि पुराणा ॥
अंतरि वसतु न जाणन॑ी घटि ब्रहमु लुकाणा ॥४॥
इकि तपसी बन महि तपु करहि नित तीरथ वासा ॥
आपु न चीनहि तामसी काहे भए उदासा ॥५॥
इकि बिंदु जतन करि राखदे से जती कहावहि ॥
बिनु गुर सबद न छूटही भ्रमि आवहि जावहि ॥६॥
इकि गिरही सेवक साधिका गुरमती लागे ॥
नामु दानु इसनानु द्रिड़ु हरि भगति सु जागे ॥७॥
गुर ते दरु घरु जाणीऐ सो जाइ सिञाणै ॥
नानक नामु न वीसरै साचे मनु मानै ॥८॥१४॥
गुर का सबदु न चीन॑ही ततु सारु निरंतर ॥३॥
पंडित पाधे जोइसी नित पड़्हहि पुराणा ॥
अंतरि वसतु न जाणन॑ी घटि ब्रहमु लुकाणा ॥४॥
इकि तपसी बन महि तपु करहि नित तीरथ वासा ॥
आपु न चीनहि तामसी काहे भए उदासा ॥५॥
इकि बिंदु जतन करि राखदे से जती कहावहि ॥
बिनु गुर सबद न छूटही भ्रमि आवहि जावहि ॥६॥
इकि गिरही सेवक साधिका गुरमती लागे ॥
नामु दानु इसनानु द्रिड़ु हरि भगति सु जागे ॥७॥
गुर ते दरु घरु जाणीऐ सो जाइ सिञाणै ॥
नानक नामु न वीसरै साचे मनु मानै ॥८॥१४॥
हिन्दी अर्थ: जोगी और लीरें पहनने वाले फकीर बेकार में ही देश-देशांतरों का रटन करते हैं। वे सतिगुरू के शबद को नहीं खोजते।वे एक रस श्रेष्ठ अस्लियत को नहीं खोजते। 3। पण्डित पांधे (शिक्षक) और ज्योतिषी नित्य पुराण आदि पुस्तकें ही पढ़ते रहते हैं। परमात्मा हृदय में छुपा हुआ है।ये लोग अंदर बसती नाम-वस्तु को नहीं पहचानते। 4। अनेकों लोग तपी बने हुए हैं।जंगलों में (जा के) तप साध रहे हैं।और सदा तीर्थों पर निवास रखते हैं। (तपों के कारण वे) क्रोध से भरे रहते हैं।अपने आत्मिक जीवन को नहीं खोजते।त्यागी बनने का उनहें कोई लाभ नहीं होता। 5। अनेकों लोग ऐसे हैं जो यतन करके वीर्य को रोक के रखते हैं।और अपने आप को जती कहलाते हैं। पर गुरू के शबद के बिना वे भी (क्रोधादिक तामसी स्वभाव से) निजात नहीं पाते।(जती होने की ही) भटकना में पड़ कर जनम-मरन के चक्कर में पड़े रहते हैं। 6। (पर) अनेकों गृहस्ती ऐसे हैं जो सेवा करते हैं सेवा के साधन करते हैं।और गुरू की दी हुई मति पर चलते हैं वे नाम जपते हैं। औरों को नाम जपने के लिए प्रेरित करते हैं।अपना आचरण पवित्र रखते हैं।वे परमात्मा की भक्ति में अपने आप को द्ढ़ करके (विकारों के हमलों की ओर से) सुचेत रहते हैं। 7। हे नानक ! परमात्मा का दर परमात्मा का घर गुरू के द्वारा (गुरू की शरण पड़ के ही) पहचाना जा सकता है।वही मनुष्य पहचानता है जो गुरू के पास जाता है। उसे परमात्मा का नाम नहीं बिसरता।उसका मन सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा (की याद) में रम जाता है। 8। 14।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਮਨਸਾ ਮਨਹਿ ਸਮਾਇਲੇ ਭਉਜਲੁ ਸਚਿ ਤਰਣਾ ॥
ਆਦਿ ਜੁਗਾਦਿ ਦਇਆਲੁ ਤੂ ਠਾਕੁਰ ਤੇਰੀ ਸਰਣਾ ॥੧॥
ਤੂ ਦਾਤੌ ਹਮ ਜਾਚਿਕਾ ਹਰਿ ਦਰਸਨੁ ਦੀਜੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈਐ ਮਨ ਮੰਦਰੁ ਭੀਜੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕੂੜਾ ਲਾਲਚੁ ਛੋਡੀਐ ਤਉ ਸਾਚੁ ਪਛਾਣੈ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਸਮਾਈਐ ਪਰਮਾਰਥੁ ਜਾਣੈ ॥੨॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਰਾਜਾ ਲੋਭੀਆ ਲੁਭਤਉ ਲੋਭਾਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਲੋਭੁ ਨਿਵਾਰੀਐ ਹਰਿ ਸਿਉ ਬਣਿ ਆਈ ॥੩॥
ਕਲਰਿ ਖੇਤੀ ਬੀਜੀਐ ਕਿਉ ਲਾਹਾ ਪਾਵੈ ॥
ਮਨਮੁਖੁ ਸਚਿ ਨ ਭੀਜਈ ਕੂੜੁ ਕੂੜਿ ਗਡਾਵੈ ॥੪॥
ਲਾਲਚੁ ਛੋਡਹੁ ਅੰਧਿਹੋ ਲਾਲਚਿ ਦੁਖੁ ਭਾਰੀ ॥
ਸਾਚੌ ਸਾਹਿਬੁ ਮਨਿ ਵਸੈ ਹਉਮੈ ਬਿਖੁ ਮਾਰੀ ॥੫॥
ਦੁਬਿਧਾ ਛੋਡਿ ਕੁਵਾਟੜੀ ਮੂਸਹੁਗੇ ਭਾਈ ॥
ਅਹਿਨਿਸਿ ਨਾਮੁ ਸਲਾਹੀਐ ਸਤਿਗੁਰ ਸਰਣਾਈ ॥੬॥
ਮਨਮੁਖ ਪਥਰੁ ਸੈਲੁ ਹੈ ਧ੍ਰਿਗੁ ਜੀਵਣੁ ਫੀਕਾ ॥
ਜਲ ਮਹਿ ਕੇਤਾ ਰਾਖੀਐ ਅਭ ਅੰਤਰਿ ਸੂਕਾ ॥੭॥
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਹੈ ਪੂਰੈ ਗੁਰਿ ਦੀਆ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਨ ਵੀਸਰੈ ਮਥਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਆ ॥੮॥੧੫॥
ਮਨਸਾ ਮਨਹਿ ਸਮਾਇਲੇ ਭਉਜਲੁ ਸਚਿ ਤਰਣਾ ॥
ਆਦਿ ਜੁਗਾਦਿ ਦਇਆਲੁ ਤੂ ਠਾਕੁਰ ਤੇਰੀ ਸਰਣਾ ॥੧॥
ਤੂ ਦਾਤੌ ਹਮ ਜਾਚਿਕਾ ਹਰਿ ਦਰਸਨੁ ਦੀਜੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈਐ ਮਨ ਮੰਦਰੁ ਭੀਜੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕੂੜਾ ਲਾਲਚੁ ਛੋਡੀਐ ਤਉ ਸਾਚੁ ਪਛਾਣੈ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਸਮਾਈਐ ਪਰਮਾਰਥੁ ਜਾਣੈ ॥੨॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਰਾਜਾ ਲੋਭੀਆ ਲੁਭਤਉ ਲੋਭਾਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਲੋਭੁ ਨਿਵਾਰੀਐ ਹਰਿ ਸਿਉ ਬਣਿ ਆਈ ॥੩॥
ਕਲਰਿ ਖੇਤੀ ਬੀਜੀਐ ਕਿਉ ਲਾਹਾ ਪਾਵੈ ॥
ਮਨਮੁਖੁ ਸਚਿ ਨ ਭੀਜਈ ਕੂੜੁ ਕੂੜਿ ਗਡਾਵੈ ॥੪॥
ਲਾਲਚੁ ਛੋਡਹੁ ਅੰਧਿਹੋ ਲਾਲਚਿ ਦੁਖੁ ਭਾਰੀ ॥
ਸਾਚੌ ਸਾਹਿਬੁ ਮਨਿ ਵਸੈ ਹਉਮੈ ਬਿਖੁ ਮਾਰੀ ॥੫॥
ਦੁਬਿਧਾ ਛੋਡਿ ਕੁਵਾਟੜੀ ਮੂਸਹੁਗੇ ਭਾਈ ॥
ਅਹਿਨਿਸਿ ਨਾਮੁ ਸਲਾਹੀਐ ਸਤਿਗੁਰ ਸਰਣਾਈ ॥੬॥
ਮਨਮੁਖ ਪਥਰੁ ਸੈਲੁ ਹੈ ਧ੍ਰਿਗੁ ਜੀਵਣੁ ਫੀਕਾ ॥
ਜਲ ਮਹਿ ਕੇਤਾ ਰਾਖੀਐ ਅਭ ਅੰਤਰਿ ਸੂਕਾ ॥੭॥
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਹੈ ਪੂਰੈ ਗੁਰਿ ਦੀਆ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਨ ਵੀਸਰੈ ਮਥਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਆ ॥੮॥੧੫॥
आसा महला १ ॥
मनसा मनहि समाइले भउजलु सचि तरणा ॥
आदि जुगादि दइआलु तू ठाकुर तेरी सरणा ॥१॥
तू दातौ हम जाचिका हरि दरसनु दीजै ॥
गुरमुखि नामु धिआईऐ मन मंदरु भीजै ॥१॥ रहाउ ॥
कूड़ा लालचु छोडीऐ तउ साचु पछाणै ॥
गुर कै सबदि समाईऐ परमारथु जाणै ॥२॥
इहु मनु राजा लोभीआ लुभतउ लोभाई ॥
गुरमुखि लोभु निवारीऐ हरि सिउ बणि आई ॥३॥
कलरि खेती बीजीऐ किउ लाहा पावै ॥
मनमुखु सचि न भीजई कूड़ु कूड़ि गडावै ॥४॥
लालचु छोडहु अंधिहो लालचि दुखु भारी ॥
साचौ साहिबु मनि वसै हउमै बिखु मारी ॥५॥
दुबिधा छोडि कुवाटड़ी मूसहुगे भाई ॥
अहिनिसि नामु सलाहीऐ सतिगुर सरणाई ॥६॥
मनमुख पथरु सैलु है ध्रिगु जीवणु फीका ॥
जल महि केता राखीऐ अभ अंतरि सूका ॥७॥
हरि का नामु निधानु है पूरै गुरि दीआ ॥
नानक नामु न वीसरै मथि अंम्रितु पीआ ॥८॥१५॥
मनसा मनहि समाइले भउजलु सचि तरणा ॥
आदि जुगादि दइआलु तू ठाकुर तेरी सरणा ॥१॥
तू दातौ हम जाचिका हरि दरसनु दीजै ॥
गुरमुखि नामु धिआईऐ मन मंदरु भीजै ॥१॥ रहाउ ॥
कूड़ा लालचु छोडीऐ तउ साचु पछाणै ॥
गुर कै सबदि समाईऐ परमारथु जाणै ॥२॥
इहु मनु राजा लोभीआ लुभतउ लोभाई ॥
गुरमुखि लोभु निवारीऐ हरि सिउ बणि आई ॥३॥
कलरि खेती बीजीऐ किउ लाहा पावै ॥
मनमुखु सचि न भीजई कूड़ु कूड़ि गडावै ॥४॥
लालचु छोडहु अंधिहो लालचि दुखु भारी ॥
साचौ साहिबु मनि वसै हउमै बिखु मारी ॥५॥
दुबिधा छोडि कुवाटड़ी मूसहुगे भाई ॥
अहिनिसि नामु सलाहीऐ सतिगुर सरणाई ॥६॥
मनमुख पथरु सैलु है ध्रिगु जीवणु फीका ॥
जल महि केता राखीऐ अभ अंतरि सूका ॥७॥
हरि का नामु निधानु है पूरै गुरि दीआ ॥
नानक नामु न वीसरै मथि अंम्रितु पीआ ॥८॥१५॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला १ ॥ (हे भाई ! अपने मन में से उठता) मायावी विचार मन में ही लीन कर दे (मन के पीछे लगने से संसार समुंद्र से पार नहीं लांघ सकते)।सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा में जुड़ के ही संसार समुंद्र से पार लांघ सकते हैं। हे सृष्टि के आदि प्रभू ! हे युगों से भी पहले के प्रभू ! हे सबके पालने वाले प्रभू ! तू सब जीवों पे दया करने वाला है।मैं तेरी शरण आया हूँ (मुझे मन की प्रेरणा से बचा)। 1। हे हरी ! तू सब जीवों को दातें देने वाला है।हम जीव (तेरे दर पर) मंगते हैं।(हमें) दर्शन दे। गुरू की शरण पड़ के ही परमात्मा का नाम सिमरा जा सकता है।(जो सिमरता है।उसके) मन का मन्दिर (हरि-नाम से) भीग जाता है। 1।रहाउ। (हे भाई ! माया का) बुरा लालच छोड़ देना चाहिए (मनुष्य जब लालच छोड़ देता है) तब सदा स्थिर प्रभू से सांझ पा लेता है। गुरू के शबद द्वारा ही (परमात्मा के नाम में) लीन हो सकते हैं (जो लीन होता है) वह जीवन के सबसे ऊँचे मनोरथ को समझ लेता है। 2। ये (माया का) लोभी मन (शरीर नगर का) राजा (बन बैठता है) लोभ में फसा हुआ (सदा) माया का लोभ करता रहता है। गुरू की शरण पड़ के ही ये लोभ दूर किया जा सकता है (जो मनुष्य लोभ दूर कर लेता है।उसकी) परमात्मा से प्रीत बन जाती है। 3। अगर कॅलर में खेती बीजी जाए।तो बीजने वाला उसमें से कोई लाभ नहीं कमा सकता। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू में रच-मिच नहीं सकता।झूठ झूठ में ही मिलता है। 4। हे माया-मोह में अंधे हुए जीवो ! माया का लालच छोड़ दो ! लालच में (फसने से) भारी दुख सहना पड़ता है। जिस मनुष्य के मन में (लालच की जगह) सदा-स्थिर मालिक बस जाता है।वह अहंकार के जहर को मार लेता है (उस अहंकार को मार देता है जो आत्मिक मौत का कारण बनती है)। 5। हे भाई ! दुविधा त्याग दो।ये गलत रास्ता है (इस रास्ते पर चल के) लूटे जाओगे। (माया-मोह के रास्ते की जगह) सतिगुरू की शरण पड़ कर दिन रात परमात्मा के नाम की सिफत सालाह करनी चाहिए। 6। मन के मुरीद मनुष्य (का हृदय) पत्थर है चट्टान है (पत्थर व चट्टान की तरह सख़्त है)।उसका जीवन बेस्वाद रहता है धिक्कारयोग्य है। पत्थर को जितनी भी देर पानी में रखो।तो भी वह अंदर से सूखा ही रहता है (मनमुख का हृदय सत्संग में आ के भी द्रवित नहीं होता)। 7। परमात्मा का नाम (सारे आत्मिक गुणों का) खजाना है।जिस मनुष्य को पूरे गुरू ने नाम दे दिया।वह। हे नानक ! सदा जप-जप के आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस पीता है।उसे परमात्मा का नाम कभी भूलता नहीं। 8। 15।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਚਲੇ ਚਲਣਹਾਰ ਵਾਟ ਵਟਾਇਆ ॥
ਧੰਧੁ ਪਿਟੇ ਸੰਸਾਰੁ ਸਚੁ ਨ ਭਾਇਆ ॥੧॥
ਕਿਆ ਭਵੀਐ ਕਿਆ ਢੂਢੀਐ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਦਿਖਾਇਆ ॥
ਮਮਤਾ ਮੋਹੁ ਵਿਸਰਜਿਆ ਅਪਨੈ ਘਰਿ ਆਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਚਿ ਮਿਲੈ ਸਚਿਆਰੁ ਕੂੜਿ ਨ ਪਾਈਐ ॥
ਸਚੇ ਸਿਉ ਚਿਤੁ ਲਾਇ ਬਹੁੜਿ ਨ ਆਈਐ ॥੨॥
ਮੋਇਆ ਕਉ ਕਿਆ ਰੋਵਹੁ ਰੋਇ ਨ ਜਾਣਹੂ ॥
ਰੋਵਹੁ ਸਚੁ ਸਲਾਹਿ ਹੁਕਮੁ ਪਛਾਣਹੂ ॥੩॥
ਹੁਕਮੀ ਵਜਹੁ ਲਿਖਾਇ ਆਇਆ ਜਾਣੀਐ ॥
ਲਾਹਾ ਪਲੈ ਪਾਇ ਹੁਕਮੁ ਸਿਞਾਣੀਐ ॥੪॥
ਚਲੇ ਚਲਣਹਾਰ ਵਾਟ ਵਟਾਇਆ ॥
ਧੰਧੁ ਪਿਟੇ ਸੰਸਾਰੁ ਸਚੁ ਨ ਭਾਇਆ ॥੧॥
ਕਿਆ ਭਵੀਐ ਕਿਆ ਢੂਢੀਐ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਦਿਖਾਇਆ ॥
ਮਮਤਾ ਮੋਹੁ ਵਿਸਰਜਿਆ ਅਪਨੈ ਘਰਿ ਆਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਚਿ ਮਿਲੈ ਸਚਿਆਰੁ ਕੂੜਿ ਨ ਪਾਈਐ ॥
ਸਚੇ ਸਿਉ ਚਿਤੁ ਲਾਇ ਬਹੁੜਿ ਨ ਆਈਐ ॥੨॥
ਮੋਇਆ ਕਉ ਕਿਆ ਰੋਵਹੁ ਰੋਇ ਨ ਜਾਣਹੂ ॥
ਰੋਵਹੁ ਸਚੁ ਸਲਾਹਿ ਹੁਕਮੁ ਪਛਾਣਹੂ ॥੩॥
ਹੁਕਮੀ ਵਜਹੁ ਲਿਖਾਇ ਆਇਆ ਜਾਣੀਐ ॥
ਲਾਹਾ ਪਲੈ ਪਾਇ ਹੁਕਮੁ ਸਿਞਾਣੀਐ ॥੪॥
आसा महला १ ॥
चले चलणहार वाट वटाइआ ॥
धंधु पिटे संसारु सचु न भाइआ ॥१॥
किआ भवीऐ किआ ढूढीऐ गुर सबदि दिखाइआ ॥
ममता मोहु विसरजिआ अपनै घरि आइआ ॥१॥ रहाउ ॥
सचि मिलै सचिआरु कूड़ि न पाईऐ ॥
सचे सिउ चितु लाइ बहुड़ि न आईऐ ॥२॥
मोइआ कउ किआ रोवहु रोइ न जाणहू ॥
रोवहु सचु सलाहि हुकमु पछाणहू ॥३॥
हुकमी वजहु लिखाइ आइआ जाणीऐ ॥
लाहा पलै पाइ हुकमु सिञाणीऐ ॥४॥
चले चलणहार वाट वटाइआ ॥
धंधु पिटे संसारु सचु न भाइआ ॥१॥
किआ भवीऐ किआ ढूढीऐ गुर सबदि दिखाइआ ॥
ममता मोहु विसरजिआ अपनै घरि आइआ ॥१॥ रहाउ ॥
सचि मिलै सचिआरु कूड़ि न पाईऐ ॥
सचे सिउ चितु लाइ बहुड़ि न आईऐ ॥२॥
मोइआ कउ किआ रोवहु रोइ न जाणहू ॥
रोवहु सचु सलाहि हुकमु पछाणहू ॥३॥
हुकमी वजहु लिखाइ आइआ जाणीऐ ॥
लाहा पलै पाइ हुकमु सिञाणीऐ ॥४॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला १ ॥ (पर जिन्हें परमात्मा का नाम ठीक नहीं लगता वह) परदेसी जीव जीवन के सही रास्ते से भटक के चले जा रहे हैं। (माया के मोह में फसा) जगत वही काम दुखी हो-हो के करता है जो गले में माया के जंजाल डाले जाता है।(माया-मोहे) जगत को सदा स्थिर प्रभू का नाम प्यारा नहीं लगता। 1। (जिसको परमात्मा ने) गुरू के शबद द्वारा (अपना आप) दिखा दिया।उसकी भटकना समाप्त हो जाती है।उसे किसी और जगह सुख तलाशने की जरूरत नहीं पड़ती। उसने अपने अंदर से माया की ममता दूर कर दी।माया का मोह त्याग दिया।वह उस घर में आ टिका जो सदा के लिए उसका अपना बन गया (प्रभू चरणों में लीन हो गया)। 1।रहाउ। सच का व्यापारी जीव सदा-सिथर प्रभू में जुड़ के (प्रभू को) मिल जाता है।झूठे पदार्थों के मोह में लगने से प्रभू नहीं मिलता। सदा-स्थिर परमात्मा में चित्त जोड़ने से बार-बार जनम में नहीं आते। 2। हे भाई ! तुम मरे सम्बंधियों को रोते हो (उनकी खातिर वैराग करते हो) ये व्यर्थ कर्म है।दरअसल तुम्हें वैराग में आने की समझ ही नहीं। परमात्मा की सिफत सालाह करो।(ये बात) समझो (कि पैदा होना मरना) परमात्मा का हुकम है (इस तरह दुनिया की ओर से) वैराग करने की जाच सीखो। ये बात समझनी चाहिए कि हरेक जीव परमात्मा की रजा में ही रोजी लिखा के जगत में आता है।उसकी रजा को पहचानना चाहिए। इस तरह जीवन लाभ मिलता है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 419 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
Rajiv Chowk metro station की platform पर 9 PM की भीड़।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 42 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 419” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 420 →, पीछे का: ← अंग 418।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।