अंग 378

अंग
378
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ਦੁਪਦੇ ॥
ਭਈ ਪਰਾਪਤਿ ਮਾਨੁਖ ਦੇਹੁਰੀਆ ॥
ਗੋਬਿੰਦ ਮਿਲਣ ਕੀ ਇਹ ਤੇਰੀ ਬਰੀਆ ॥
ਅਵਰਿ ਕਾਜ ਤੇਰੈ ਕਿਤੈ ਨ ਕਾਮ ॥
ਮਿਲੁ ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਭਜੁ ਕੇਵਲ ਨਾਮ ॥੧॥
ਸਰੰਜਾਮਿ ਲਾਗੁ ਭਵਜਲ ਤਰਨ ਕੈ ॥
ਜਨਮੁ ਬ੍ਰਿਥਾ ਜਾਤ ਰੰਗਿ ਮਾਇਆ ਕੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਪੁ ਤਪੁ ਸੰਜਮੁ ਧਰਮੁ ਨ ਕਮਾਇਆ ॥
ਸੇਵਾ ਸਾਧ ਨ ਜਾਨਿਆ ਹਰਿ ਰਾਇਆ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਹਮ ਨੀਚ ਕਰੰਮਾ ॥
ਸਰਣਿ ਪਰੇ ਕੀ ਰਾਖਹੁ ਸਰਮਾ ॥੨॥੨੯॥
आसा महला ५ दुपदे ॥
भई परापति मानुख देहुरीआ ॥
गोबिंद मिलण की इह तेरी बरीआ ॥
अवरि काज तेरै कितै न काम ॥
मिलु साधसंगति भजु केवल नाम ॥१॥
सरंजामि लागु भवजल तरन कै ॥
जनमु ब्रिथा जात रंगि माइआ कै ॥१॥ रहाउ ॥
जपु तपु संजमु धरमु न कमाइआ ॥
सेवा साध न जानिआ हरि राइआ ॥
कहु नानक हम नीच करंमा ॥
सरणि परे की राखहु सरमा ॥२॥२९॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ दुपदे ॥ हे भाई ! तुझे मनुष्य जनम के सोहणे शरीर की प्राप्ति हुई है। यही है समय परमात्मा को मिलने का। तेरे और और काम (परमात्मा को मिलने के रास्ते में) तेरे किसी काम नहीं आएंगे। (इस वास्ते) साध-संगति में (भी) बैठा कर (और वहाँ) सिर्फ परमात्मा के नाम का भजन किया कर। 1। (हे भाई !) संसार समुंद्र में से (सही सलामत आत्मिक जीवन लेकर) पार लांघने के आहर में (भी) लग। माया के मोह में (फस) के तेरा मनुष्य जनम व्यर्थ जा रहा है। 1।रहाउ। हे नानक ! कह, हे प्रभू पातशाह ! मैंने कोई जप नहीं किया।मैंने कोई तप नहीं किया।मैंने कोई संजम नहीं साधा; मैंने ऐसा कोई धर्म भी नहीं किया (मुझे किसी जप तप संजम आदि का सहारा-गुमान नहीं है)। हे प्रभू पातशाह ! मैंने तो तेरे संत जनों की सेवा करने की जाच नहीं सीखीं। मैं बड़ा नीच कर्मों वाला हूँ (पर मैं तेरी शरण आ पड़ा हूँ)। शरण पड़े की लाज रखना। 2। 29।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਤੁਝ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨਾਹੀ ਮੈ ਦੂਜਾ ਤੂੰ ਮੇਰੇ ਮਨ ਮਾਹੀ ॥
ਤੂੰ ਸਾਜਨੁ ਸੰਗੀ ਪ੍ਰਭੁ ਮੇਰਾ ਕਾਹੇ ਜੀਅ ਡਰਾਹੀ ॥੧॥
ਤੁਮਰੀ ਓਟ ਤੁਮਾਰੀ ਆਸਾ ॥
ਬੈਠਤ ਊਠਤ ਸੋਵਤ ਜਾਗਤ ਵਿਸਰੁ ਨਾਹੀ ਤੂੰ ਸਾਸ ਗਿਰਾਸਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਰਾਖੁ ਰਾਖੁ ਸਰਣਿ ਪ੍ਰਭ ਅਪਨੀ ਅਗਨਿ ਸਾਗਰ ਵਿਕਰਾਲਾ ॥
ਨਾਨਕ ਕੇ ਸੁਖਦਾਤੇ ਸਤਿਗੁਰ ਹਮ ਤੁਮਰੇ ਬਾਲ ਗੁਪਾਲਾ ॥੨॥੩੦॥
आसा महला ५ ॥
तुझ बिनु अवरु नाही मै दूजा तूं मेरे मन माही ॥
तूं साजनु संगी प्रभु मेरा काहे जीअ डराही ॥१॥
तुमरी ओट तुमारी आसा ॥
बैठत ऊठत सोवत जागत विसरु नाही तूं सास गिरासा ॥१॥ रहाउ ॥
राखु राखु सरणि प्रभ अपनी अगनि सागर विकराला ॥
नानक के सुखदाते सतिगुर हम तुमरे बाल गुपाला ॥२॥३०॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हर वक्त ऐसी अरदास करा कर-) हे प्रभू ! तेरे बिना मेरा और कोई सहारा नहीं।तू सदा मेरे मन में बसता रह। तू ही मेरा सज्जन है।तू ही मेरा साथी है तू ही मेरा मालिक है, हे मेरी जिंदे ! तू क्यों डरती है।। 1। हे गोपाल ! मुझे तेरा ही सहारा है।मुझे तेरी मदद की उम्मीद रहती है। (हे प्रभू ! मेहर कर) बैठते-उठते-सोते-जागते।हरेक श्वास से।हरेक ग्रास के साथ मुझे तू कभी ना भूले। 1।रहाउ। हे प्रभू ! ये आग का समुंद्र (संसार बड़ा) डरावना है (इससे बचने के लिए) मुझे अपनी शरण में सदा टिकाए रख। हे गुपाल ! हे सतिगुरू ! हे नानक के सुखदाते प्रभू ! मैं तेरा (अंजान) बच्चा हूँ। 2। 30।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਰਿ ਜਨ ਲੀਨੇ ਪ੍ਰਭੂ ਛਡਾਇ ॥
ਪ੍ਰੀਤਮ ਸਿਉ ਮੇਰੋ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ਤਾਪੁ ਮੁਆ ਬਿਖੁ ਖਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪਾਲਾ ਤਾਊ ਕਛੂ ਨ ਬਿਆਪੈ ਰਾਮ ਨਾਮ ਗੁਨ ਗਾਇ ॥
ਡਾਕੀ ਕੋ ਚਿਤਿ ਕਛੂ ਨ ਲਾਗੈ ਚਰਨ ਕਮਲ ਸਰਨਾਇ ॥੧॥
ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਭਏ ਕਿਰਪਾਲਾ ਹੋਏ ਆਪਿ ਸਹਾਇ ॥
ਗੁਨ ਨਿਧਾਨ ਨਿਤਿ ਗਾਵੈ ਨਾਨਕੁ ਸਹਸਾ ਦੁਖੁ ਮਿਟਾਇ ॥੨॥੩੧॥
आसा महला ५ ॥
हरि जन लीने प्रभू छडाइ ॥
प्रीतम सिउ मेरो मनु मानिआ तापु मुआ बिखु खाइ ॥१॥ रहाउ ॥
पाला ताऊ कछू न बिआपै राम नाम गुन गाइ ॥
डाकी को चिति कछू न लागै चरन कमल सरनाइ ॥१॥
संत प्रसादि भए किरपाला होए आपि सहाइ ॥
गुन निधान निति गावै नानकु सहसा दुखु मिटाइ ॥२॥३१॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई !) परमात्मा अपने भक्तों को (माया-डायन के पँजे से) स्वयं बचा लेता है। (गुरू की कृपा से) मेरा मन भी प्रीतम परमात्मा से गिझा गया है।मेरा भी (माया का) ताप (ऐसे) खत्म हो गया है (जैसे कोई प्राणी) जहर खा के मर जाता है। 1।रहाउ। (हे भाई !) परमात्मा के सुंदर चरणों का आसरा लेने से (मनुष्य के) चिक्त पर (माया-) डायन को कोई जोर नहीं चलता। परमात्मा के सिफत सालाह के गीत गा-गा के ना माया की लालच जोर डाल सकती है।ना ही माया का सहम दबाव डालता है। 1। (हे भाई !) गुरू की कृपा से (परमात्मा मेरे पर) दयावान हो गया है (माया डायन से बचने के लिए मेरा) मेरा खुद सहाई बना हुआ है। अब (गुरू की कृपा से) नानक (माया का) सहम और दुख दूर कर करके गुणों के खजाने परमात्मा के गुण सदा गाता रहता है। 2। 31।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਅਉਖਧੁ ਖਾਇਓ ਹਰਿ ਕੋ ਨਾਉ ॥
ਸੁਖ ਪਾਏ ਦੁਖ ਬਿਨਸਿਆ ਥਾਉ ॥੧॥
ਤਾਪੁ ਗਇਆ ਬਚਨਿ ਗੁਰ ਪੂਰੇ ॥
ਅਨਦੁ ਭਇਆ ਸਭਿ ਮਿਟੇ ਵਿਸੂਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਸਗਲ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਨਾਨਕ ਮਨਿ ਧਿਆਇਆ ॥੨॥੩੨॥
आसा महला ५ ॥
अउखधु खाइओ हरि को नाउ ॥
सुख पाए दुख बिनसिआ थाउ ॥१॥
तापु गइआ बचनि गुर पूरे ॥
अनदु भइआ सभि मिटे विसूरे ॥१॥ रहाउ ॥
जीअ जंत सगल सुखु पाइआ ॥
पारब्रहमु नानक मनि धिआइआ ॥२॥३२॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई !) जिस मनुष्य ने परमात्मा के नाम की दवाई खाई (उसके अंदर माया का मोह) दुखों का सोमा सूख गया और उसने आत्मिक आनंद पा लिए। 1। (हे भाई ! पूरे गुरू के उपदेश की बरकति से नाम-दवाई खा के माया-मोह का) ताप उतर जाता है। आत्मिक आनंद पैदा होता है।सारे चिंता-फिक्र मिट जाते हैं। 1।रहाउ। उन सभी ने आतिमक आनंद प्राप्त किया। हे नानक ! (गुरू के उपदेश द्वारा) जिस जिस मनुष्य ने परमात्मा अपने मन में सिमरा।2। 32।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਬਾਂਛਤ ਨਾਹੀ ਸੁ ਬੇਲਾ ਆਈ ॥
ਬਿਨੁ ਹੁਕਮੈ ਕਿਉ ਬੁਝੈ ਬੁਝਾਈ ॥੧॥
ਠੰਢੀ ਤਾਤੀ ਮਿਟੀ ਖਾਈ ॥
ਓਹੁ ਨ ਬਾਲਾ ਬੂਢਾ ਭਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਸਾਧ ਸਰਣਾਈ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਭਉ ਪਾਰਿ ਪਰਾਈ ॥੨॥੩੩॥
आसा महला ५ ॥
बांछत नाही सु बेला आई ॥
बिनु हुकमै किउ बुझै बुझाई ॥१॥
ठंढी ताती मिटी खाई ॥
ओहु न बाला बूढा भाई ॥१॥ रहाउ ॥
नानक दास साध सरणाई ॥
गुर प्रसादि भउ पारि पराई ॥२॥३३॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई !) जिसे कोई भी पसंद नहीं करतामौत का वह समय जरूर आ जाता है (मनुष्य फिर भी नहीं समझता कि मौत जरूर आनी है) जब परमात्मा का हुकम ना हो जीव को कितना ही समझाओ ये नहीं समझता। 1। (मरे शरीर को) जल प्रवाह किया जाता है।आग जला देती है।या (दबाने से) मिट्टी खा जाती है। 1। हे भाई ! जीवात्मा (परमात्मा की अंश है जो) ना कभी बालक है ना कभी बुढा है (वह कभी नहीं मरता।शरीर ही कभी बालक है कभी जवान है।कभी बुढा है और फिर मर जाता है।रहाउ। हे दास नानक ! गुरू की शरण पड़ते ही। गुरू की कृपा से ही मनुष्य (मौत के) डर-सहम से पार लांघ सकता है। 2। 33।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਆਤਮ ਪਰਗਾਸੁ ॥
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਹਰਿ ਚਰਣ ਨਿਵਾਸੁ ॥੧॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਨਿਤਿ ਜਪਿ ਮਨ ਮੇਰੇ ॥
ਸੀਤਲ ਸਾਂਤਿ ਸਦਾ ਸੁਖ ਪਾਵਹਿ ਕਿਲਵਿਖ ਜਾਹਿ ਸਭੇ ਮਨ ਤੇਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜਾ ਕੇ ਪੂਰਨ ਕਰਮ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਭੇਟੇ ਪੂਰਨ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ॥੨॥੩੪॥
ਦੂਜੇ ਘਰ ਕੇ ਚਉਤੀਸ ॥
आसा महला ५ ॥
सदा सदा आतम परगासु ॥
साधसंगति हरि चरण निवासु ॥१॥
राम नाम निति जपि मन मेरे ॥
सीतल सांति सदा सुख पावहि किलविख जाहि सभे मन तेरे ॥१॥ रहाउ ॥
कहु नानक जा के पूरन करम ॥
सतिगुर भेटे पूरन पारब्रहम ॥२॥३४॥
दूजे घर के चउतीस ॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई !) उसे सदा कायम रहने वाला आत्मिक जीवन का प्रकाश मिल जाता है। साध-संगति में रहके जिस मनुष्य का मन परमात्मा के चरणों में टिका रहता है 1। हे मेरे मन ! सदा परमात्मा का नाम जपा कर। हे मन ! (नाम की बरकति से) तेरे सारे पाप दूर हो जाएंगे।तेरा स्वै ठंडा-ठार हो जाएगा।तेरे अंदर शांति पैदा हो जाएगी।तू सदा आत्मिक आनंद पाता रहेगा। 1।रहाउ। (पर) हे नानक ! कह -जिस मनुष्य के पूरे भाग्य जागते हैं वह ही सतिगुरू को मिलता है और सब गुणों से भरपूर परमात्मा को मिलता है। 2। 34। नोट। दूसरे घर के चौतीस।आरंभ में शीर्षक आया था, घरु २ महला ५।घर दूसरे के संगह में 34 शबद हैं।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜਾ ਕਾ ਹਰਿ ਸੁਆਮੀ ਪ੍ਰਭੁ ਬੇਲੀ ॥
आसा महला ५ ॥
जा का हरि सुआमी प्रभु बेली ॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई !) सब जीवों का मालिक हरी प्रभू जिस मनुष्य का मददगार बन जाता है।

संदर्भ: यह अंग 378 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Sangam Vihar में सुबह 4 बजे जब रसोई शुरू होती है।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 49 पंक्तियों का है, 7 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 378” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 379 →, पीछे का: ← अंग 377

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।