अंग
434
राग आसा
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਜੀਅ ਜੰਤ ਸਭ ਸਾਰੀ ਕੀਤੇ ਪਾਸਾ ਢਾਲਣਿ ਆਪਿ ਲਗਾ ॥੨੬॥
ਭਭੈ ਭਾਲਹਿ ਸੇ ਫਲੁ ਪਾਵਹਿ ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਜਿਨੑ ਕਉ ਭਉ ਪਇਆ ॥
ਮਨਮੁਖ ਫਿਰਹਿ ਨ ਚੇਤਹਿ ਮੂੜੇ ਲਖ ਚਉਰਾਸੀਹ ਫੇਰੁ ਪਇਆ ॥੨੭॥
ਮੰਮੈ ਮੋਹੁ ਮਰਣੁ ਮਧੁਸੂਦਨੁ ਮਰਣੁ ਭਇਆ ਤਬ ਚੇਤਵਿਆ ॥
ਕਾਇਆ ਭੀਤਰਿ ਅਵਰੋ ਪੜਿਆ ਮੰਮਾ ਅਖਰੁ ਵੀਸਰਿਆ ॥੨੮॥
ਯਯੈ ਜਨਮੁ ਨ ਹੋਵੀ ਕਦ ਹੀ ਜੇ ਕਰਿ ਸਚੁ ਪਛਾਣੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਖੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੂਝੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਏਕੋ ਜਾਣੈ ॥੨੯॥
ਰਾਰੈ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਸਭ ਅੰਤਰਿ ਜੇਤੇ ਕੀਏ ਜੰਤਾ ॥
ਜੰਤ ਉਪਾਇ ਧੰਧੈ ਸਭ ਲਾਏ ਕਰਮੁ ਹੋਆ ਤਿਨ ਨਾਮੁ ਲਇਆ ॥੩੦॥
ਲਲੈ ਲਾਇ ਧੰਧੈ ਜਿਨਿ ਛੋਡੀ ਮੀਠਾ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਕੀਆ ॥
ਖਾਣਾ ਪੀਣਾ ਸਮ ਕਰਿ ਸਹਣਾ ਭਾਣੈ ਤਾ ਕੈ ਹੁਕਮੁ ਪਇਆ ॥੩੧॥
ਵਵੈ ਵਾਸੁਦੇਉ ਪਰਮੇਸਰੁ ਵੇਖਣ ਕਉ ਜਿਨਿ ਵੇਸੁ ਕੀਆ ॥
ਵੇਖੈ ਚਾਖੈ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਜਾਣੈ ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ॥੩੨॥
ੜਾੜੈ ਰਾੜਿ ਕਰਹਿ ਕਿਆ ਪ੍ਰਾਣੀ ਤਿਸਹਿ ਧਿਆਵਹੁ ਜਿ ਅਮਰੁ ਹੋਆ ॥ ਤਿਸਹਿ ਧਿਆਵਹੁ ਸਚਿ ਸਮਾਵਹੁ ਓਸੁ ਵਿਟਹੁ ਕੁਰਬਾਣੁ ਕੀਆ ॥੩੩॥
ਹਾਹੈ ਹੋਰੁ ਨ ਕੋਈ ਦਾਤਾ ਜੀਅ ਉਪਾਇ ਜਿਨਿ ਰਿਜਕੁ ਦੀਆ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਵਹੁ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਸਮਾਵਹੁ ਅਨਦਿਨੁ ਲਾਹਾ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਲੀਆ ॥੩੪॥
ਆਇੜੈ ਆਪਿ ਕਰੇ ਜਿਨਿ ਛੋਡੀ ਜੋ ਕਿਛੁ ਕਰਣਾ ਸੁ ਕਰਿ ਰਹਿਆ ॥
ਕਰੇ ਕਰਾਏ ਸਭ ਕਿਛੁ ਜਾਣੈ ਨਾਨਕ ਸਾਇਰ ਇਵ ਕਹਿਆ ॥੩੫॥੧॥
ਭਭੈ ਭਾਲਹਿ ਸੇ ਫਲੁ ਪਾਵਹਿ ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਜਿਨੑ ਕਉ ਭਉ ਪਇਆ ॥
ਮਨਮੁਖ ਫਿਰਹਿ ਨ ਚੇਤਹਿ ਮੂੜੇ ਲਖ ਚਉਰਾਸੀਹ ਫੇਰੁ ਪਇਆ ॥੨੭॥
ਮੰਮੈ ਮੋਹੁ ਮਰਣੁ ਮਧੁਸੂਦਨੁ ਮਰਣੁ ਭਇਆ ਤਬ ਚੇਤਵਿਆ ॥
ਕਾਇਆ ਭੀਤਰਿ ਅਵਰੋ ਪੜਿਆ ਮੰਮਾ ਅਖਰੁ ਵੀਸਰਿਆ ॥੨੮॥
ਯਯੈ ਜਨਮੁ ਨ ਹੋਵੀ ਕਦ ਹੀ ਜੇ ਕਰਿ ਸਚੁ ਪਛਾਣੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਖੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੂਝੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਏਕੋ ਜਾਣੈ ॥੨੯॥
ਰਾਰੈ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਸਭ ਅੰਤਰਿ ਜੇਤੇ ਕੀਏ ਜੰਤਾ ॥
ਜੰਤ ਉਪਾਇ ਧੰਧੈ ਸਭ ਲਾਏ ਕਰਮੁ ਹੋਆ ਤਿਨ ਨਾਮੁ ਲਇਆ ॥੩੦॥
ਲਲੈ ਲਾਇ ਧੰਧੈ ਜਿਨਿ ਛੋਡੀ ਮੀਠਾ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਕੀਆ ॥
ਖਾਣਾ ਪੀਣਾ ਸਮ ਕਰਿ ਸਹਣਾ ਭਾਣੈ ਤਾ ਕੈ ਹੁਕਮੁ ਪਇਆ ॥੩੧॥
ਵਵੈ ਵਾਸੁਦੇਉ ਪਰਮੇਸਰੁ ਵੇਖਣ ਕਉ ਜਿਨਿ ਵੇਸੁ ਕੀਆ ॥
ਵੇਖੈ ਚਾਖੈ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਜਾਣੈ ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ॥੩੨॥
ੜਾੜੈ ਰਾੜਿ ਕਰਹਿ ਕਿਆ ਪ੍ਰਾਣੀ ਤਿਸਹਿ ਧਿਆਵਹੁ ਜਿ ਅਮਰੁ ਹੋਆ ॥ ਤਿਸਹਿ ਧਿਆਵਹੁ ਸਚਿ ਸਮਾਵਹੁ ਓਸੁ ਵਿਟਹੁ ਕੁਰਬਾਣੁ ਕੀਆ ॥੩੩॥
ਹਾਹੈ ਹੋਰੁ ਨ ਕੋਈ ਦਾਤਾ ਜੀਅ ਉਪਾਇ ਜਿਨਿ ਰਿਜਕੁ ਦੀਆ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਵਹੁ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਸਮਾਵਹੁ ਅਨਦਿਨੁ ਲਾਹਾ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਲੀਆ ॥੩੪॥
ਆਇੜੈ ਆਪਿ ਕਰੇ ਜਿਨਿ ਛੋਡੀ ਜੋ ਕਿਛੁ ਕਰਣਾ ਸੁ ਕਰਿ ਰਹਿਆ ॥
ਕਰੇ ਕਰਾਏ ਸਭ ਕਿਛੁ ਜਾਣੈ ਨਾਨਕ ਸਾਇਰ ਇਵ ਕਹਿਆ ॥੩੫॥੧॥
जीअ जंत सभ सारी कीते पासा ढालणि आपि लगा ॥२६॥
भभै भालहि से फलु पावहि गुर परसादी जिन॑ कउ भउ पइआ ॥
मनमुख फिरहि न चेतहि मूड़े लख चउरासीह फेरु पइआ ॥२७॥
मंमै मोहु मरणु मधुसूदनु मरणु भइआ तब चेतविआ ॥
काइआ भीतरि अवरो पड़िआ मंमा अखरु वीसरिआ ॥२८॥
ययै जनमु न होवी कद ही जे करि सचु पछाणै ॥
गुरमुखि आखै गुरमुखि बूझै गुरमुखि एको जाणै ॥२९॥
रारै रवि रहिआ सभ अंतरि जेते कीए जंता ॥
जंत उपाइ धंधै सभ लाए करमु होआ तिन नामु लइआ ॥३०॥
ललै लाइ धंधै जिनि छोडी मीठा माइआ मोहु कीआ ॥
खाणा पीणा सम करि सहणा भाणै ता कै हुकमु पइआ ॥३१॥
ववै वासुदेउ परमेसरु वेखण कउ जिनि वेसु कीआ ॥
वेखै चाखै सभु किछु जाणै अंतरि बाहरि रवि रहिआ ॥३२॥
ड़ाड़ै राड़ि करहि किआ प्राणी तिसहि धिआवहु जि अमरु होआ ॥ तिसहि धिआवहु सचि समावहु ओसु विटहु कुरबाणु कीआ ॥३३॥
हाहै होरु न कोई दाता जीअ उपाइ जिनि रिजकु दीआ ॥
हरि नामु धिआवहु हरि नामि समावहु अनदिनु लाहा हरि नामु लीआ ॥३४॥
आइड़ै आपि करे जिनि छोडी जो किछु करणा सु करि रहिआ ॥
करे कराए सभ किछु जाणै नानक साइर इव कहिआ ॥३५॥१॥
भभै भालहि से फलु पावहि गुर परसादी जिन॑ कउ भउ पइआ ॥
मनमुख फिरहि न चेतहि मूड़े लख चउरासीह फेरु पइआ ॥२७॥
मंमै मोहु मरणु मधुसूदनु मरणु भइआ तब चेतविआ ॥
काइआ भीतरि अवरो पड़िआ मंमा अखरु वीसरिआ ॥२८॥
ययै जनमु न होवी कद ही जे करि सचु पछाणै ॥
गुरमुखि आखै गुरमुखि बूझै गुरमुखि एको जाणै ॥२९॥
रारै रवि रहिआ सभ अंतरि जेते कीए जंता ॥
जंत उपाइ धंधै सभ लाए करमु होआ तिन नामु लइआ ॥३०॥
ललै लाइ धंधै जिनि छोडी मीठा माइआ मोहु कीआ ॥
खाणा पीणा सम करि सहणा भाणै ता कै हुकमु पइआ ॥३१॥
ववै वासुदेउ परमेसरु वेखण कउ जिनि वेसु कीआ ॥
वेखै चाखै सभु किछु जाणै अंतरि बाहरि रवि रहिआ ॥३२॥
ड़ाड़ै राड़ि करहि किआ प्राणी तिसहि धिआवहु जि अमरु होआ ॥ तिसहि धिआवहु सचि समावहु ओसु विटहु कुरबाणु कीआ ॥३३॥
हाहै होरु न कोई दाता जीअ उपाइ जिनि रिजकु दीआ ॥
हरि नामु धिआवहु हरि नामि समावहु अनदिनु लाहा हरि नामु लीआ ॥३४॥
आइड़ै आपि करे जिनि छोडी जो किछु करणा सु करि रहिआ ॥
करे कराए सभ किछु जाणै नानक साइर इव कहिआ ॥३५॥१॥
हिन्दी अर्थ: सारे जीव-जंतु नर्दें बनीं हुई हैं।प्रभू खुद पासे फेंकता है (कई नरदें पुगती जाती हैं।कई उन चारों खानों के चक्कर में ही पड़ी रहती हैं। )। 26। गुरू की कृपा से जिन मनुष्यों के मन में परमात्मा का डर टिक जाता है (भाव।जिन्हें ये समझ आ जाती है कि परमात्मा हमारे अंग-संग बसता है और हमारे हरेक काम को देखता है) वह मनुष्य उसका दर्शन करने का यत्न करते हैं।और (अपने यत्नों का) फल हासिल कर लेते हैं। पर (पढ़ी हुई विद्या के आसरे अपने आप को समझदार समझने वाले) जो मूर्ख लोग अपने मन के पीछे चलते हैं।वे और ही तरफ भटकते हैं।परमात्मा को याद नहीं करते।उन्हें चौरासी लाख जूनियों का चक्कर नसीब होता है। 27। माया का मोह मनुष्य की आत्मिक मौत (का मूल होता) है (मनुष्य सारी उम्र इस मोह में फंसा रहता है) जब मौत सिर पर आती है।तब परमात्मा को याद करने का ख्याल आता है । जब तक जीवित रहा (पढ़ी हुई विद्या के आसरे) और ही बातें पढ़ता रहा।ना मौत याद आई ना मधुसूदन (परमात्मा) याद आया। 28। (हे मन ! अपनी विद्या का आसरा लेने की जगह) अगर मनुष्य गुरू के बताए रास्ते पर चल के सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा को हर जगह देखे। परमात्मा की सिफत सालाह करता रहे।परमात्मा को सर्व-व्यापक समझे।और परमात्मा के साथ गहरी जान-पहचान बनाए।तो उसे दुबारा कभी जनम-मरण का चक्कर नहीं मिलता। 29। जितने भी जीव (सृष्टि में परमात्मा ने) पैदा किए हुए हैं।उन सबके अंदर प्रभू स्वयं मौजूद है। जीव पैदा करके सबको परमात्मा ने माया की किरत-कार में लगाया हुआ है।जिन पे उसकी मेहर होती है।वही उसका नाम सिमरते हैं (हे मन ! विद्या भी दाति है।पर प्रभू का नाम सबसे ऊँची दाति है।पढ़ा होने का गुमान ना किए जा)। 30। जिस परमात्मा ने (अपनी रची सृष्टि) माया की किरत-कार में लगाई हुई है।जिस ने (जीवों के वास्ते) माया का मोह मीठा बना दिया है। उसी की ही रजा में उसका हुकम चलता है।और जीवों को खाने-पीने के पदार्थ (भाव।सुख) और उसी तरह दुख भी सहने को मिलते हैं (मालिक की रजा को समझना सबसे ऊँची विद्या है)। 31। परमात्मा परमेश्वर खुद ही है जिसने तमाशा देखने के लिए ये जगत रचा है। हरेक जीव की अच्छी संभाल करता है (हरेक के दिल की) सब बातें जानता है।और अंदर-बाहर हर जगह व्यापक है (हे मन ! अगर तू पढ़ा हुआ है।तो भेद समझ)। 32। हे प्राणी ! (अगर तू पढ़-लिख गया है तो इस विद्या के आसरे) झगड़े आदि करने से कोई (आत्मिक) लाभ नहीं होगा।उस परमात्मा को सिमरो जो सदा कायम रहने वाला है।उसे सिमरो। उस सदा स्थिर प्रभू में लीन हुए रहो।(वही मनुष्य असली पढ़ा पण्डित है जिसने) उस परमात्मा (की याद) से (अपने अहंकार को) वार दिया है। 33। जिस परमात्मा ने (सृष्टि के) जीव पैदा करके सबको रिजक पहुँचाया हुआ है।(उसके बिना) कोई और दातें देने वाला नहीं। (हे मन !) उसी हरी का नाम सिमरते रहो।उस हरी के नाम में सदा टिके रहो।(वही है पढ़ा पण्डित जिस ने) हर समय हरी-नाम सिमरन का लाभ कमाया है। 34। जिस परमात्मा ने (ये सारी सृष्टि) खुद पैदा की हुई है।वह जो कुछ करना ठीक समझता है वही कुछ किए जा रहा है। परमात्मा खुद सब कुछ करता है।खुद ही सब कुछ जीवों से करवाता है।(हरेक के दिल की भावना) खुद ही जानता है। हे कवि नानक ! (कह, जो मनुष्य सच-मुच पढ़ा हुआ है जो सच-मुच पण्डित है।उसने परमात्मा के बारे में यूँ ही समझा है और) यूँ ही कहा है (वह अपनी विद्या का अहंकार करने की जगह इसको परमात्मा द्वारा मिली दाति समझता है)। 35। 1।
ਰਾਗੁ ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੩ ਪਟੀ
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਅਯੋ ਅੰਙੈ ਸਭੁ ਜਗੁ ਆਇਆ ਕਾਖੈ ਘੰਙੈ ਕਾਲੁ ਭਇਆ ॥
ਰੀਰੀ ਲਲੀ ਪਾਪ ਕਮਾਣੇ ਪੜਿ ਅਵਗਣ ਗੁਣ ਵੀਸਰਿਆ ॥੧॥
ਮਨ ਐਸਾ ਲੇਖਾ ਤੂੰ ਕੀ ਪੜਿਆ ॥
ਲੇਖਾ ਦੇਣਾ ਤੇਰੈ ਸਿਰਿ ਰਹਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਿਧੰਙਾਇਐ ਸਿਮਰਹਿ ਨਾਹੀ ਨੰਨੈ ਨਾ ਤੁਧੁ ਨਾਮੁ ਲਇਆ ॥
ਛਛੈ ਛੀਜਹਿ ਅਹਿਨਿਸਿ ਮੂੜੇ ਕਿਉ ਛੂਟਹਿ ਜਮਿ ਪਾਕੜਿਆ ॥੨॥
ਬਬੈ ਬੂਝਹਿ ਨਾਹੀ ਮੂੜੇ ਭਰਮਿ ਭੁਲੇ ਤੇਰਾ ਜਨਮੁ ਗਇਆ ॥
ਅਣਹੋਦਾ ਨਾਉ ਧਰਾਇਓ ਪਾਧਾ ਅਵਰਾ ਕਾ ਭਾਰੁ ਤੁਧੁ ਲਇਆ ॥੩॥
ਜਜੈ ਜੋਤਿ ਹਿਰਿ ਲਈ ਤੇਰੀ ਮੂੜੇ ਅੰਤਿ ਗਇਆ ਪਛੁਤਾਵਹਿਗਾ ॥
ਏਕੁ ਸਬਦੁ ਤੂੰ ਚੀਨਹਿ ਨਾਹੀ ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਜੂਨੀ ਆਵਹਿਗਾ ॥੪॥
ਤੁਧੁ ਸਿਰਿ ਲਿਖਿਆ ਸੋ ਪੜੁ ਪੰਡਿਤ ਅਵਰਾ ਨੋ ਨ ਸਿਖਾਲਿ ਬਿਖਿਆ ॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਅਯੋ ਅੰਙੈ ਸਭੁ ਜਗੁ ਆਇਆ ਕਾਖੈ ਘੰਙੈ ਕਾਲੁ ਭਇਆ ॥
ਰੀਰੀ ਲਲੀ ਪਾਪ ਕਮਾਣੇ ਪੜਿ ਅਵਗਣ ਗੁਣ ਵੀਸਰਿਆ ॥੧॥
ਮਨ ਐਸਾ ਲੇਖਾ ਤੂੰ ਕੀ ਪੜਿਆ ॥
ਲੇਖਾ ਦੇਣਾ ਤੇਰੈ ਸਿਰਿ ਰਹਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਿਧੰਙਾਇਐ ਸਿਮਰਹਿ ਨਾਹੀ ਨੰਨੈ ਨਾ ਤੁਧੁ ਨਾਮੁ ਲਇਆ ॥
ਛਛੈ ਛੀਜਹਿ ਅਹਿਨਿਸਿ ਮੂੜੇ ਕਿਉ ਛੂਟਹਿ ਜਮਿ ਪਾਕੜਿਆ ॥੨॥
ਬਬੈ ਬੂਝਹਿ ਨਾਹੀ ਮੂੜੇ ਭਰਮਿ ਭੁਲੇ ਤੇਰਾ ਜਨਮੁ ਗਇਆ ॥
ਅਣਹੋਦਾ ਨਾਉ ਧਰਾਇਓ ਪਾਧਾ ਅਵਰਾ ਕਾ ਭਾਰੁ ਤੁਧੁ ਲਇਆ ॥੩॥
ਜਜੈ ਜੋਤਿ ਹਿਰਿ ਲਈ ਤੇਰੀ ਮੂੜੇ ਅੰਤਿ ਗਇਆ ਪਛੁਤਾਵਹਿਗਾ ॥
ਏਕੁ ਸਬਦੁ ਤੂੰ ਚੀਨਹਿ ਨਾਹੀ ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਜੂਨੀ ਆਵਹਿਗਾ ॥੪॥
ਤੁਧੁ ਸਿਰਿ ਲਿਖਿਆ ਸੋ ਪੜੁ ਪੰਡਿਤ ਅਵਰਾ ਨੋ ਨ ਸਿਖਾਲਿ ਬਿਖਿਆ ॥
रागु आसा महला ३ पटी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अयो अंङै सभु जगु आइआ काखै घंङै कालु भइआ ॥
रीरी लली पाप कमाणे पड़ि अवगण गुण वीसरिआ ॥१॥
मन ऐसा लेखा तूं की पड़िआ ॥
लेखा देणा तेरै सिरि रहिआ ॥१॥ रहाउ ॥
सिधंङाइऐ सिमरहि नाही नंनै ना तुधु नामु लइआ ॥
छछै छीजहि अहिनिसि मूड़े किउ छूटहि जमि पाकड़िआ ॥२॥
बबै बूझहि नाही मूड़े भरमि भुले तेरा जनमु गइआ ॥
अणहोदा नाउ धराइओ पाधा अवरा का भारु तुधु लइआ ॥३॥
जजै जोति हिरि लई तेरी मूड़े अंति गइआ पछुतावहिगा ॥
एकु सबदु तूं चीनहि नाही फिरि फिरि जूनी आवहिगा ॥४॥
तुधु सिरि लिखिआ सो पड़ु पंडित अवरा नो न सिखालि बिखिआ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अयो अंङै सभु जगु आइआ काखै घंङै कालु भइआ ॥
रीरी लली पाप कमाणे पड़ि अवगण गुण वीसरिआ ॥१॥
मन ऐसा लेखा तूं की पड़िआ ॥
लेखा देणा तेरै सिरि रहिआ ॥१॥ रहाउ ॥
सिधंङाइऐ सिमरहि नाही नंनै ना तुधु नामु लइआ ॥
छछै छीजहि अहिनिसि मूड़े किउ छूटहि जमि पाकड़िआ ॥२॥
बबै बूझहि नाही मूड़े भरमि भुले तेरा जनमु गइआ ॥
अणहोदा नाउ धराइओ पाधा अवरा का भारु तुधु लइआ ॥३॥
जजै जोति हिरि लई तेरी मूड़े अंति गइआ पछुतावहिगा ॥
एकु सबदु तूं चीनहि नाही फिरि फिरि जूनी आवहिगा ॥४॥
तुधु सिरि लिखिआ सो पड़ु पंडित अवरा नो न सिखालि बिखिआ ॥
हिन्दी अर्थ: रागु आसा महला ३ पटी ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (ये) सारा जगत (जो) अस्तित्व में आया हुआ है।(इसके सिर पर) मौत (भी) मौजूद है (पर जीव मौत को भुला के) अवगुण पैदा करने वाली बातें पढ़ के गुण विसार देते हैं।और पाप कमाते रहते हैं। 1। हे मन ! (सिर्फ) ऐसा लेखा पढ़ने का तुझे कोई लाभ नहीं हो सकता (जिसमें उलझ के तू जीवन का सही रास्ता ना सीख सका। गलत रास्ते पर ही पड़ा रहा) और अपने किए कर्मों का हिसाब तेरे सिर पे टिका ही रहा।रहाउ। (हे मन ! सिर्फ दुनियावी लेखे सीखने की कोशिशें करने से) तू (परमात्मा को) याद नहीं करता।तू परमात्मा का नाम याद नहीं करता। हे मूर्ख ! (प्रभू को भुला के) दिन रात तेरा (आत्मिक जीवन) कमजोर हो रहा है।जब जम ने (इस खुनामी के कारण) पकड़ लिया।तो उससे खलासी कैसे होगी। 2। हे मूर्ख ! (सिर्फ दुनियावी लेखे पढ़ने-पढ़ाने में उलझ के) तू (जीवन का सही रास्ता) नहीं समझता।इसी भुलेखे में गलत रास्ते पर पड़ के तू अपना मानस जीवन व्यर्थ गवा रहा है। (आत्मिक जीवन का रास्ता बताने वाले शिक्षक के) गुण तेरे में नहीं हैं।(फिर भी) तूने अपना नाम शिक्षक।पण्डित रखाया हुआ है।तूने अपने चेलों को जीवन-राह सिखाने की जिंमेवारी का भार अपने ऊपर उठाया हुआ है। 3। हेमूर्ख ! (निरे मायावी लेखे वाले पत्रों ने आत्मिक जीवन सिखाने वाली) तेरी बुद्धि छीन ली है।आखिरी समय जब तू यहाँ से जाने लगेगा तब तू पछताएगा। (अब इस समय) तू प्रभू की सिफत सालाह की बाणी के साथ सांझ नहीं डालता।(नतीजा ये निकलेगा कि) बार-बार जूनियों में पड़ा रहेगा। 4। हे पण्डित ! तेरे अपने माथे पे जो (माया का) लेख लिखा हुआ है।पहले तू उस लेख को पढ़ (भाव।पिछले किए कर्मों के अनुसार जो संसकार तेरे अंदर इकट्ठे हुए पड़े हैं।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 434 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
Holi के दूसरे दिन (puddva), सब रंग धुल चुके, और घर का calm।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 31 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 434” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 435 →, पीछे का: ← अंग 433।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।