अंग
438
राग आसा
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਰਾਗੁ ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੧ ਛੰਤ ਘਰੁ ੨
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਤੂੰ ਸਭਨੀ ਥਾਈ ਜਿਥੈ ਹਉ ਜਾਈ ਸਾਚਾ ਸਿਰਜਣਹਾਰੁ ਜੀਉ ॥
ਸਭਨਾ ਕਾ ਦਾਤਾ ਕਰਮ ਬਿਧਾਤਾ ਦੂਖ ਬਿਸਾਰਣਹਾਰੁ ਜੀਉ ॥
ਦੂਖ ਬਿਸਾਰਣਹਾਰੁ ਸੁਆਮੀ ਕੀਤਾ ਜਾ ਕਾ ਹੋਵੈ ॥
ਕੋਟ ਕੋਟੰਤਰ ਪਾਪਾ ਕੇਰੇ ਏਕ ਘੜੀ ਮਹਿ ਖੋਵੈ ॥
ਹੰਸ ਸਿ ਹੰਸਾ ਬਗ ਸਿ ਬਗਾ ਘਟ ਘਟ ਕਰੇ ਬੀਚਾਰੁ ਜੀਉ ॥
ਤੂੰ ਸਭਨੀ ਥਾਈ ਜਿਥੈ ਹਉ ਜਾਈ ਸਾਚਾ ਸਿਰਜਣਹਾਰੁ ਜੀਉ ॥੧॥
ਜਿਨੑ ਇਕ ਮਨਿ ਧਿਆਇਆ ਤਿਨੑ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਤੇ ਵਿਰਲੇ ਸੰਸਾਰਿ ਜੀਉ ॥
ਤਿਨ ਜਮੁ ਨੇੜਿ ਨ ਆਵੈ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਕਮਾਵੈ ਕਬਹੁ ਨ ਆਵਹਿ ਹਾਰਿ ਜੀਉ ॥
ਤੇ ਕਬਹੁ ਨ ਹਾਰਹਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਗੁਣ ਸਾਰਹਿ ਤਿਨੑ ਜਮੁ ਨੇੜਿ ਨ ਆਵੈ ॥
ਜੰਮਣੁ ਮਰਣੁ ਤਿਨੑਾ ਕਾ ਚੂਕਾ ਜੋ ਹਰਿ ਲਾਗੇ ਪਾਵੈ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਹਰਿ ਰਸੁ ਹਰਿ ਫਲੁ ਪਾਇਆ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਉਰ ਧਾਰਿ ਜੀਉ ॥
ਜਿਨੑ ਇਕ ਮਨਿ ਧਿਆਇਆ ਤਿਨੑ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਤੇ ਵਿਰਲੇ ਸੰਸਾਰਿ ਜੀਉ ॥੨॥
ਜਿਨਿ ਜਗਤੁ ਉਪਾਇਆ ਧੰਧੈ ਲਾਇਆ ਤਿਸੈ ਵਿਟਹੁ ਕੁਰਬਾਣੁ ਜੀਉ ॥
ਤਾ ਕੀ ਸੇਵ ਕਰੀਜੈ ਲਾਹਾ ਲੀਜੈ ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਪਾਈਐ ਮਾਣੁ ਜੀਉ ॥
ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਮਾਨੁ ਸੋਈ ਜਨੁ ਪਾਵੈ ਜੋ ਨਰੁ ਏਕੁ ਪਛਾਣੈ ॥
ਓਹੁ ਨਵ ਨਿਧਿ ਪਾਵੈ ਗੁਰਮਤਿ ਹਰਿ ਧਿਆਵੈ ਨਿਤ ਹਰਿ ਗੁਣ ਆਖਿ ਵਖਾਣੈ ॥
ਅਹਿਨਿਸਿ ਨਾਮੁ ਤਿਸੈ ਕਾ ਲੀਜੈ ਹਰਿ ਊਤਮੁ ਪੁਰਖੁ ਪਰਧਾਨੁ ਜੀਉ ॥
ਜਿਨਿ ਜਗਤੁ ਉਪਾਇਆ ਧੰਧੈ ਲਾਇਆ ਹਉ ਤਿਸੈ ਵਿਟਹੁ ਕੁਰਬਾਨੁ ਜੀਉ ॥੩॥
ਨਾਮੁ ਲੈਨਿ ਸਿ ਸੋਹਹਿ ਤਿਨ ਸੁਖ ਫਲ ਹੋਵਹਿ ਮਾਨਹਿ ਸੇ ਜਿਣਿ ਜਾਹਿ ਜੀਉ ॥
ਤਿਨ ਫਲ ਤੋਟਿ ਨ ਆਵੈ ਜਾ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਜੇ ਜੁਗ ਕੇਤੇ ਜਾਹਿ ਜੀਉ ॥
ਜੇ ਜੁਗ ਕੇਤੇ ਜਾਹਿ ਸੁਆਮੀ ਤਿਨ ਫਲ ਤੋਟਿ ਨ ਆਵੈ ॥
ਤਿਨੑ ਜਰਾ ਨ ਮਰਣਾ ਨਰਕਿ ਨ ਪਰਣਾ ਜੋ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਵੈ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਕਰਹਿ ਸਿ ਸੂਕਹਿ ਨਾਹੀ ਨਾਨਕ ਪੀੜ ਨ ਖਾਹਿ ਜੀਉ ॥
ਨਾਮੁ ਲੈਨਿੑ ਸਿ ਸੋਹਹਿ ਤਿਨੑ ਸੁਖ ਫਲ ਹੋਵਹਿ ਮਾਨਹਿ ਸੇ ਜਿਣਿ ਜਾਹਿ ਜੀਉ ॥੪॥੧॥੪॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਤੂੰ ਸਭਨੀ ਥਾਈ ਜਿਥੈ ਹਉ ਜਾਈ ਸਾਚਾ ਸਿਰਜਣਹਾਰੁ ਜੀਉ ॥
ਸਭਨਾ ਕਾ ਦਾਤਾ ਕਰਮ ਬਿਧਾਤਾ ਦੂਖ ਬਿਸਾਰਣਹਾਰੁ ਜੀਉ ॥
ਦੂਖ ਬਿਸਾਰਣਹਾਰੁ ਸੁਆਮੀ ਕੀਤਾ ਜਾ ਕਾ ਹੋਵੈ ॥
ਕੋਟ ਕੋਟੰਤਰ ਪਾਪਾ ਕੇਰੇ ਏਕ ਘੜੀ ਮਹਿ ਖੋਵੈ ॥
ਹੰਸ ਸਿ ਹੰਸਾ ਬਗ ਸਿ ਬਗਾ ਘਟ ਘਟ ਕਰੇ ਬੀਚਾਰੁ ਜੀਉ ॥
ਤੂੰ ਸਭਨੀ ਥਾਈ ਜਿਥੈ ਹਉ ਜਾਈ ਸਾਚਾ ਸਿਰਜਣਹਾਰੁ ਜੀਉ ॥੧॥
ਜਿਨੑ ਇਕ ਮਨਿ ਧਿਆਇਆ ਤਿਨੑ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਤੇ ਵਿਰਲੇ ਸੰਸਾਰਿ ਜੀਉ ॥
ਤਿਨ ਜਮੁ ਨੇੜਿ ਨ ਆਵੈ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਕਮਾਵੈ ਕਬਹੁ ਨ ਆਵਹਿ ਹਾਰਿ ਜੀਉ ॥
ਤੇ ਕਬਹੁ ਨ ਹਾਰਹਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਗੁਣ ਸਾਰਹਿ ਤਿਨੑ ਜਮੁ ਨੇੜਿ ਨ ਆਵੈ ॥
ਜੰਮਣੁ ਮਰਣੁ ਤਿਨੑਾ ਕਾ ਚੂਕਾ ਜੋ ਹਰਿ ਲਾਗੇ ਪਾਵੈ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਹਰਿ ਰਸੁ ਹਰਿ ਫਲੁ ਪਾਇਆ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਉਰ ਧਾਰਿ ਜੀਉ ॥
ਜਿਨੑ ਇਕ ਮਨਿ ਧਿਆਇਆ ਤਿਨੑ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਤੇ ਵਿਰਲੇ ਸੰਸਾਰਿ ਜੀਉ ॥੨॥
ਜਿਨਿ ਜਗਤੁ ਉਪਾਇਆ ਧੰਧੈ ਲਾਇਆ ਤਿਸੈ ਵਿਟਹੁ ਕੁਰਬਾਣੁ ਜੀਉ ॥
ਤਾ ਕੀ ਸੇਵ ਕਰੀਜੈ ਲਾਹਾ ਲੀਜੈ ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਪਾਈਐ ਮਾਣੁ ਜੀਉ ॥
ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਮਾਨੁ ਸੋਈ ਜਨੁ ਪਾਵੈ ਜੋ ਨਰੁ ਏਕੁ ਪਛਾਣੈ ॥
ਓਹੁ ਨਵ ਨਿਧਿ ਪਾਵੈ ਗੁਰਮਤਿ ਹਰਿ ਧਿਆਵੈ ਨਿਤ ਹਰਿ ਗੁਣ ਆਖਿ ਵਖਾਣੈ ॥
ਅਹਿਨਿਸਿ ਨਾਮੁ ਤਿਸੈ ਕਾ ਲੀਜੈ ਹਰਿ ਊਤਮੁ ਪੁਰਖੁ ਪਰਧਾਨੁ ਜੀਉ ॥
ਜਿਨਿ ਜਗਤੁ ਉਪਾਇਆ ਧੰਧੈ ਲਾਇਆ ਹਉ ਤਿਸੈ ਵਿਟਹੁ ਕੁਰਬਾਨੁ ਜੀਉ ॥੩॥
ਨਾਮੁ ਲੈਨਿ ਸਿ ਸੋਹਹਿ ਤਿਨ ਸੁਖ ਫਲ ਹੋਵਹਿ ਮਾਨਹਿ ਸੇ ਜਿਣਿ ਜਾਹਿ ਜੀਉ ॥
ਤਿਨ ਫਲ ਤੋਟਿ ਨ ਆਵੈ ਜਾ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਜੇ ਜੁਗ ਕੇਤੇ ਜਾਹਿ ਜੀਉ ॥
ਜੇ ਜੁਗ ਕੇਤੇ ਜਾਹਿ ਸੁਆਮੀ ਤਿਨ ਫਲ ਤੋਟਿ ਨ ਆਵੈ ॥
ਤਿਨੑ ਜਰਾ ਨ ਮਰਣਾ ਨਰਕਿ ਨ ਪਰਣਾ ਜੋ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਵੈ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਕਰਹਿ ਸਿ ਸੂਕਹਿ ਨਾਹੀ ਨਾਨਕ ਪੀੜ ਨ ਖਾਹਿ ਜੀਉ ॥
ਨਾਮੁ ਲੈਨਿੑ ਸਿ ਸੋਹਹਿ ਤਿਨੑ ਸੁਖ ਫਲ ਹੋਵਹਿ ਮਾਨਹਿ ਸੇ ਜਿਣਿ ਜਾਹਿ ਜੀਉ ॥੪॥੧॥੪॥
रागु आसा महला १ छंत घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तूं सभनी थाई जिथै हउ जाई साचा सिरजणहारु जीउ ॥
सभना का दाता करम बिधाता दूख बिसारणहारु जीउ ॥
दूख बिसारणहारु सुआमी कीता जा का होवै ॥
कोट कोटंतर पापा केरे एक घड़ी महि खोवै ॥
हंस सि हंसा बग सि बगा घट घट करे बीचारु जीउ ॥
तूं सभनी थाई जिथै हउ जाई साचा सिरजणहारु जीउ ॥१॥
जिन॑ इक मनि धिआइआ तिन॑ सुखु पाइआ ते विरले संसारि जीउ ॥
तिन जमु नेड़ि न आवै गुर सबदु कमावै कबहु न आवहि हारि जीउ ॥
ते कबहु न हारहि हरि हरि गुण सारहि तिन॑ जमु नेड़ि न आवै ॥
जंमणु मरणु तिन॑ा का चूका जो हरि लागे पावै ॥
गुरमति हरि रसु हरि फलु पाइआ हरि हरि नामु उर धारि जीउ ॥
जिन॑ इक मनि धिआइआ तिन॑ सुखु पाइआ ते विरले संसारि जीउ ॥२॥
जिनि जगतु उपाइआ धंधै लाइआ तिसै विटहु कुरबाणु जीउ ॥
ता की सेव करीजै लाहा लीजै हरि दरगह पाईऐ माणु जीउ ॥
हरि दरगह मानु सोई जनु पावै जो नरु एकु पछाणै ॥
ओहु नव निधि पावै गुरमति हरि धिआवै नित हरि गुण आखि वखाणै ॥
अहिनिसि नामु तिसै का लीजै हरि ऊतमु पुरखु परधानु जीउ ॥
जिनि जगतु उपाइआ धंधै लाइआ हउ तिसै विटहु कुरबानु जीउ ॥३॥
नामु लैनि सि सोहहि तिन सुख फल होवहि मानहि से जिणि जाहि जीउ ॥
तिन फल तोटि न आवै जा तिसु भावै जे जुग केते जाहि जीउ ॥
जे जुग केते जाहि सुआमी तिन फल तोटि न आवै ॥
तिन॑ जरा न मरणा नरकि न परणा जो हरि नामु धिआवै ॥
हरि हरि करहि सि सूकहि नाही नानक पीड़ न खाहि जीउ ॥
नामु लैनि॑ सि सोहहि तिन॑ सुख फल होवहि मानहि से जिणि जाहि जीउ ॥४॥१॥४॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तूं सभनी थाई जिथै हउ जाई साचा सिरजणहारु जीउ ॥
सभना का दाता करम बिधाता दूख बिसारणहारु जीउ ॥
दूख बिसारणहारु सुआमी कीता जा का होवै ॥
कोट कोटंतर पापा केरे एक घड़ी महि खोवै ॥
हंस सि हंसा बग सि बगा घट घट करे बीचारु जीउ ॥
तूं सभनी थाई जिथै हउ जाई साचा सिरजणहारु जीउ ॥१॥
जिन॑ इक मनि धिआइआ तिन॑ सुखु पाइआ ते विरले संसारि जीउ ॥
तिन जमु नेड़ि न आवै गुर सबदु कमावै कबहु न आवहि हारि जीउ ॥
ते कबहु न हारहि हरि हरि गुण सारहि तिन॑ जमु नेड़ि न आवै ॥
जंमणु मरणु तिन॑ा का चूका जो हरि लागे पावै ॥
गुरमति हरि रसु हरि फलु पाइआ हरि हरि नामु उर धारि जीउ ॥
जिन॑ इक मनि धिआइआ तिन॑ सुखु पाइआ ते विरले संसारि जीउ ॥२॥
जिनि जगतु उपाइआ धंधै लाइआ तिसै विटहु कुरबाणु जीउ ॥
ता की सेव करीजै लाहा लीजै हरि दरगह पाईऐ माणु जीउ ॥
हरि दरगह मानु सोई जनु पावै जो नरु एकु पछाणै ॥
ओहु नव निधि पावै गुरमति हरि धिआवै नित हरि गुण आखि वखाणै ॥
अहिनिसि नामु तिसै का लीजै हरि ऊतमु पुरखु परधानु जीउ ॥
जिनि जगतु उपाइआ धंधै लाइआ हउ तिसै विटहु कुरबानु जीउ ॥३॥
नामु लैनि सि सोहहि तिन सुख फल होवहि मानहि से जिणि जाहि जीउ ॥
तिन फल तोटि न आवै जा तिसु भावै जे जुग केते जाहि जीउ ॥
जे जुग केते जाहि सुआमी तिन फल तोटि न आवै ॥
तिन॑ जरा न मरणा नरकि न परणा जो हरि नामु धिआवै ॥
हरि हरि करहि सि सूकहि नाही नानक पीड़ न खाहि जीउ ॥
नामु लैनि॑ सि सोहहि तिन॑ सुख फल होवहि मानहि से जिणि जाहि जीउ ॥४॥१॥४॥
हिन्दी अर्थ: रागु आसा महला १ छंत घरु २ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे प्रभू मैं जहाँ भी जाता हूँ तू सब जगह मौजूद है।तू सदा-स्थिर रहने वाला है।तू सारे जगत को पैदा करने वाला है। तू जीवों के किए कर्मों के अनुसार पैदा करने वाला है और सब दुखों का नाश करने वाला है। जिस प्रभू का किया हुआ ही सब कुछ होता है वह सबका मालिक है वह सबके दुख नाश करने के समर्थ है। जीवों के पापों के ढेरों के ढेर एक पलक में नाश कर देता है। जीव चाहे श्रेष्ठ से श्रेष्ठ हों चाहे निखिध से निखिध।प्रभू हरेक की संभाल करता है। हे प्रभू ! मैं जहाँ भी जाता हूँ।तू हर जगह मौजूद है तू सदा-स्थिर रहने वाला है।तू सबको पैदा करने वाला है। 1। जिन मनुष्यों ने एकाग्र हो के प्रभू को सिमरा है उन्होंने आत्मिक आनंद पाया है।पर ऐसे लोग संसार में बहुत-बहुत कम हैं। जो जो लोग गुरू का शबद कमाते हैं (भाव।गुरू के शबद अनुसार जीवन बनाते हैं) जम उनके नजदीक नहीं फटकता (उन्हें मौत का डर नहीं सता सकता) वे कभी भी मानस जनम की बाजी हार के नहीं आते। जो मनुष्य परमात्मा का गुण हृदय में बसाते हैं।वे (विकारों से मुकाबले में) कभी नहीं हारते।आत्मिक मौत तो उनके नजदीक नहीं फटकती। जो लोग परमात्मा के चरणों में लगते हैं उनके जनम-मरन का चक्कर खत्म हो जाता है। गुरू की मति ले के जिन्होंने प्रभू के नाम का रस चखा है।नाम फल प्राप्त किया है।प्रभू का नाम हृदय में टिकाया है। एकाग्र हो के प्रभू को सिमरा है उन्होंने आत्मिक आनंद पाया है।पर ऐसे लोग जगत में विरले ही हैं। 2। मैं उस प्रभू से सदके हूँ जिसने जगत पैदा किया है ओर इसे माया की दौड़-भाग में लगा दिया है। (हे भाई !) उस प्रभू की सेवा-भक्ति करनी चाहिए।यही लाभ जगत में कमाना चाहिए।(इस तरह) प्रभू की दरगाह में आदर मिलता है। वही मनुष्य परमात्मा की हजूरी में आदर पाता है जो एक परमात्मा को (अपने अंग-संग) पहचानता है। जो मनुष्य गुरू की मति ले के प्रभू का सिमरन करता है परमात्मा की सिफत सालाह करता है वह (मानो) जगत के नौ खजाने हासिल करलेता है। (हे भाई !) दिन-रात उस परमात्मा का नाम सिमरना चाहिए जो सबसे श्रेष्ठ है जो सबमें व्यापक है जो सबसे बड़ा है। मैं उस परमात्मा से सदके जाता हूँ जिसने जगत पैदा किया है और इसे माया की दौड़-भाग में लगा रखा है। 3। जो मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरते हैं वह (लोक-परलोक में) शोभा पाते हैं।उनको आत्मिक आनंद रूपी फल मिलता है।वे (हर जगह) आदर पाते हैं। वे (मनुष्य जन्म की बाजी) जीत के (यहाँ से) जाते हैं।उनको (आत्मिक सुख का) फल इतना मिलता है कि परमात्मा की रजा के अनुसार वह कभी भी घटता नहीं चाहे अनेकों युग बीत जाएं। हे प्रभू स्वामी ! भले ही अनेकों ही युग बीत जाएं सिमरन करने वालों को आत्मिक आनन्द का मिला फल कभी नहीं कम होता। जो जो आदमी हरी का नाम सिमरता है उन्हें प्राप्त हुई उच्च आत्मिक अवस्था को ना बुढ़ापा आता है ना मौत सताती है।वह कभी नर्क में भी नहीं पड़ते। हे नानक ! जो लोग परमात्मा का नाम सिमरन करते हैं वे कभी सूखते नहीं हैं (भाव।उनका अंतरात्मक खिलाव कभी सूखता नहीं।आनंद कभी खत्म नहीं होता) वे कभी दुखी नहीं होते। जो मनुष्य नाम सिमरते हैं वे (लोक-परलोक में) शोभा पाते हैं।उन्हें आत्मिक आनंद रूपी फल मिलता है।वे (हर जगह) आदर पाते हैं।वे (मनुष्य जनम की बाजी) जीत के (यहाँ से) जाते हैं। 4। 1। 4।
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੧ ਛੰਤ ਘਰੁ ੩ ॥
ਤੂੰ ਸੁਣਿ ਹਰਣਾ ਕਾਲਿਆ ਕੀ ਵਾੜੀਐ ਰਾਤਾ ਰਾਮ ॥
ਬਿਖੁ ਫਲੁ ਮੀਠਾ ਚਾਰਿ ਦਿਨ ਫਿਰਿ ਹੋਵੈ ਤਾਤਾ ਰਾਮ ॥
ਫਿਰਿ ਹੋਇ ਤਾਤਾ ਖਰਾ ਮਾਤਾ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਪਰਤਾਪਏ ॥
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੧ ਛੰਤ ਘਰੁ ੩ ॥
ਤੂੰ ਸੁਣਿ ਹਰਣਾ ਕਾਲਿਆ ਕੀ ਵਾੜੀਐ ਰਾਤਾ ਰਾਮ ॥
ਬਿਖੁ ਫਲੁ ਮੀਠਾ ਚਾਰਿ ਦਿਨ ਫਿਰਿ ਹੋਵੈ ਤਾਤਾ ਰਾਮ ॥
ਫਿਰਿ ਹੋਇ ਤਾਤਾ ਖਰਾ ਮਾਤਾ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਪਰਤਾਪਏ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आसा महला १ छंत घरु ३ ॥
तूं सुणि हरणा कालिआ की वाड़ीऐ राता राम ॥
बिखु फलु मीठा चारि दिन फिरि होवै ताता राम ॥
फिरि होइ ताता खरा माता नाम बिनु परतापए ॥
आसा महला १ छंत घरु ३ ॥
तूं सुणि हरणा कालिआ की वाड़ीऐ राता राम ॥
बिखु फलु मीठा चारि दिन फिरि होवै ताता राम ॥
फिरि होइ ताता खरा माता नाम बिनु परतापए ॥
हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। आसा महला १ छंत घरु ३ ॥ हे काले हिरन ! (हे काले हिरन की तरह संसार रूपी वन में बेपरवाह हो के खरमस्तियां करने वाले मन !) तू (मेरी बात) सुन ! तू इस (जगत-) फुलवाड़ी में क्यों मस्त हो रहा है। (इस फुलवाड़ी का) फल जहर है।(भाव।आत्मिक मैत पैदा करता है) ये थोड़े दिन ही स्वादिष्ट लगता है।फिर ये दुखदाई बन जाता है। जिस में तू इतना मस्त है ये आखिर दुखदाई हो जाता है।परमात्मा के नाम के बिना ये बहुत दुख देता है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 438 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
दिल्ली का summer-shaadi, मंडप के बीच bride-groom, और परिवार की उम्मीदें।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 31 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 438” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 439 →, पीछे का: ← अंग 437।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।