अंग
394
राग आसा
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਲਾਲ ਜਵੇਹਰ ਭਰੇ ਭੰਡਾਰ ॥
ਤੋਟਿ ਨ ਆਵੈ ਜਪਿ ਨਿਰੰਕਾਰ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਸਬਦੁ ਪੀਵੈ ਜਨੁ ਕੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਤਾ ਕੀ ਪਰਮ ਗਤਿ ਹੋਇ ॥੨॥੪੧॥੯੨॥
ਤੋਟਿ ਨ ਆਵੈ ਜਪਿ ਨਿਰੰਕਾਰ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਸਬਦੁ ਪੀਵੈ ਜਨੁ ਕੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਤਾ ਕੀ ਪਰਮ ਗਤਿ ਹੋਇ ॥੨॥੪੧॥੯੨॥
लाल जवेहर भरे भंडार ॥
तोटि न आवै जपि निरंकार ॥
अंम्रित सबदु पीवै जनु कोइ ॥
नानक ता की परम गति होइ ॥२॥४१॥९२॥
तोटि न आवै जपि निरंकार ॥
अंम्रित सबदु पीवै जनु कोइ ॥
नानक ता की परम गति होइ ॥२॥४१॥९२॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (उच्च आत्मिक जीवन वाले गुण।मानो) हीरे जवाहरात हैं। परमात्मा का नाम जप-जप के मनुष्य के अंदर इनके खजाने भर जाते हैं और कभी इनकी कमी नहीं रहती। गुरू का शबद आत्मिक जीवन देने वाला जल (अमृत) है।जो भी मनुष्य ये नाम-जल पीता है उसकी सबसे उच्च आत्मिक अवस्था बन जाती है। 2। 41। 92।
ਆਸਾ ਘਰੁ ੭ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਰਿਦੈ ਨਿਤ ਧਿਆਈ ॥
ਸੰਗੀ ਸਾਥੀ ਸਗਲ ਤਰਾਂਈ ॥੧॥
ਗੁਰੁ ਮੇਰੈ ਸੰਗਿ ਸਦਾ ਹੈ ਨਾਲੇ ॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਤਿਸੁ ਸਦਾ ਸਮੑਾਲੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੇਰਾ ਕੀਆ ਮੀਠਾ ਲਾਗੈ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਨਾਨਕੁ ਮਾਂਗੈ ॥੨॥੪੨॥੯੩॥
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਰਿਦੈ ਨਿਤ ਧਿਆਈ ॥
ਸੰਗੀ ਸਾਥੀ ਸਗਲ ਤਰਾਂਈ ॥੧॥
ਗੁਰੁ ਮੇਰੈ ਸੰਗਿ ਸਦਾ ਹੈ ਨਾਲੇ ॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਤਿਸੁ ਸਦਾ ਸਮੑਾਲੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੇਰਾ ਕੀਆ ਮੀਠਾ ਲਾਗੈ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਨਾਨਕੁ ਮਾਂਗੈ ॥੨॥੪੨॥੯੩॥
आसा घरु ७ महला ५ ॥
हरि का नामु रिदै नित धिआई ॥
संगी साथी सगल तरांई ॥१॥
गुरु मेरै संगि सदा है नाले ॥
सिमरि सिमरि तिसु सदा सम॑ाले ॥१॥ रहाउ ॥
तेरा कीआ मीठा लागै ॥
हरि नामु पदारथु नानकु मांगै ॥२॥४२॥९३॥
हरि का नामु रिदै नित धिआई ॥
संगी साथी सगल तरांई ॥१॥
गुरु मेरै संगि सदा है नाले ॥
सिमरि सिमरि तिसु सदा सम॑ाले ॥१॥ रहाउ ॥
तेरा कीआ मीठा लागै ॥
हरि नामु पदारथु नानकु मांगै ॥२॥४२॥९३॥
हिन्दी अर्थ: आसा घरु ७ महला ५ ॥ (हे भाई ! अंग-संग बसते गुरू की ही कृपा से) मैं परमात्मा का नाम सदा अपने हृदय में ध्याता हूँ (इस तरह मैं संसार-समुंद्र से पार लांघने के योग्य हो रहा हूँ) अपने संगियों-साथियों (ज्ञानेन्द्रियों) को पार लंघाने के काबिल बन रहा हूँ। 1। (हे भाई ! मेरा) गुरू सदा मेरे साथ बसता है मेरे अंग-संग रहता है (प्रभू की कृपा से) मैं उस (परमात्मा) को सदा सिमर के सदा अपने दिल में बसाए रखता हूँ। 1। (हे प्रभू ! ये तेरे मिलाए हुए गुरू की मेहर ही है कि) मुझे तेरा किया हुआ हरेक काम अच्छा लग रहा है और (तेरा दास) नानक तेरे से (तेरी) सबसे कीमती वस्तु तेरा नाम मांग रहा है। 2। 42। 93।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸਾਧੂ ਸੰਗਤਿ ਤਰਿਆ ਸੰਸਾਰੁ ॥
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਮਨਹਿ ਆਧਾਰੁ ॥੧॥
ਚਰਨ ਕਮਲ ਗੁਰਦੇਵ ਪਿਆਰੇ ॥
ਪੂਜਹਿ ਸੰਤ ਹਰਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ਪਿਆਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਾ ਕੈ ਮਸਤਕਿ ਲਿਖਿਆ ਭਾਗੁ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਤਾ ਕਾ ਥਿਰੁ ਸੋਹਾਗੁ ॥੨॥੪੩॥੯੪॥
ਸਾਧੂ ਸੰਗਤਿ ਤਰਿਆ ਸੰਸਾਰੁ ॥
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਮਨਹਿ ਆਧਾਰੁ ॥੧॥
ਚਰਨ ਕਮਲ ਗੁਰਦੇਵ ਪਿਆਰੇ ॥
ਪੂਜਹਿ ਸੰਤ ਹਰਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ਪਿਆਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਾ ਕੈ ਮਸਤਕਿ ਲਿਖਿਆ ਭਾਗੁ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਤਾ ਕਾ ਥਿਰੁ ਸੋਹਾਗੁ ॥੨॥੪੩॥੯੪॥
आसा महला ५ ॥
साधू संगति तरिआ संसारु ॥
हरि का नामु मनहि आधारु ॥१॥
चरन कमल गुरदेव पिआरे ॥
पूजहि संत हरि प्रीति पिआरे ॥१॥ रहाउ ॥
जा कै मसतकि लिखिआ भागु ॥
कहु नानक ता का थिरु सोहागु ॥२॥४३॥९४॥
साधू संगति तरिआ संसारु ॥
हरि का नामु मनहि आधारु ॥१॥
चरन कमल गुरदेव पिआरे ॥
पूजहि संत हरि प्रीति पिआरे ॥१॥ रहाउ ॥
जा कै मसतकि लिखिआ भागु ॥
कहु नानक ता का थिरु सोहागु ॥२॥४३॥९४॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे भाई ! (जो भी मनुष्य निम्रता धार के गुरू की संगति करता है) गुरू की संगति की बरकति से वह संसार समुंद्र से पार लांघ जाता है (क्योंकि) परमात्मा का नाम उसके मन का आसरा बना रहता है। 1। गुरदेव के सुंदर प्यारे कोमल चरण (हे भाई !) हरी के संत जन प्रीति से पूजते रहते हैं। 1।रहाउ। हे नानक ! जिस मनुष्य के माथे पे (पूर्बले जन्मों के कर्मों के) लिखे लेख जाग पड़ते हैं उसको मिली ये सौभाग्यता (गुरू की संगति की बरकति से) सदैव कायम रहती है। 2। 43। 94।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮੀਠੀ ਆਗਿਆ ਪਿਰ ਕੀ ਲਾਗੀ ॥
ਸਉਕਨਿ ਘਰ ਕੀ ਕੰਤਿ ਤਿਆਗੀ ॥
ਪ੍ਰਿਅ ਸੋਹਾਗਨਿ ਸੀਗਾਰਿ ਕਰੀ ॥
ਮਨ ਮੇਰੇ ਕੀ ਤਪਤਿ ਹਰੀ ॥੧॥
ਭਲੋ ਭਇਓ ਪ੍ਰਿਅ ਕਹਿਆ ਮਾਨਿਆ ॥
ਸੂਖੁ ਸਹਜੁ ਇਸੁ ਘਰ ਕਾ ਜਾਨਿਆ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਉ ਬੰਦੀ ਪ੍ਰਿਅ ਖਿਜਮਤਦਾਰ ॥
ਓਹੁ ਅਬਿਨਾਸੀ ਅਗਮ ਅਪਾਰ ॥
ਲੇ ਪਖਾ ਪ੍ਰਿਅ ਝਲਉ ਪਾਏ ॥
ਭਾਗਿ ਗਏ ਪੰਚ ਦੂਤ ਲਾਵੇ ॥੨॥
ਨਾ ਮੈ ਕੁਲੁ ਨਾ ਸੋਭਾਵੰਤ ॥
ਕਿਆ ਜਾਨਾ ਕਿਉ ਭਾਨੀ ਕੰਤ ॥
ਮੋਹਿ ਅਨਾਥ ਗਰੀਬ ਨਿਮਾਨੀ ॥
ਕੰਤ ਪਕਰਿ ਹਮ ਕੀਨੀ ਰਾਨੀ ॥੩॥
ਜਬ ਮੁਖਿ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਸਾਜਨੁ ਲਾਗਾ ॥
ਸੂਖ ਸਹਜ ਮੇਰਾ ਧਨੁ ਸੋਹਾਗਾ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਮੋਰੀ ਪੂਰਨ ਆਸਾ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਮੇਲੀ ਪ੍ਰਭ ਗੁਣਤਾਸਾ ॥੪॥੧॥੯੫॥
ਮੀਠੀ ਆਗਿਆ ਪਿਰ ਕੀ ਲਾਗੀ ॥
ਸਉਕਨਿ ਘਰ ਕੀ ਕੰਤਿ ਤਿਆਗੀ ॥
ਪ੍ਰਿਅ ਸੋਹਾਗਨਿ ਸੀਗਾਰਿ ਕਰੀ ॥
ਮਨ ਮੇਰੇ ਕੀ ਤਪਤਿ ਹਰੀ ॥੧॥
ਭਲੋ ਭਇਓ ਪ੍ਰਿਅ ਕਹਿਆ ਮਾਨਿਆ ॥
ਸੂਖੁ ਸਹਜੁ ਇਸੁ ਘਰ ਕਾ ਜਾਨਿਆ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਉ ਬੰਦੀ ਪ੍ਰਿਅ ਖਿਜਮਤਦਾਰ ॥
ਓਹੁ ਅਬਿਨਾਸੀ ਅਗਮ ਅਪਾਰ ॥
ਲੇ ਪਖਾ ਪ੍ਰਿਅ ਝਲਉ ਪਾਏ ॥
ਭਾਗਿ ਗਏ ਪੰਚ ਦੂਤ ਲਾਵੇ ॥੨॥
ਨਾ ਮੈ ਕੁਲੁ ਨਾ ਸੋਭਾਵੰਤ ॥
ਕਿਆ ਜਾਨਾ ਕਿਉ ਭਾਨੀ ਕੰਤ ॥
ਮੋਹਿ ਅਨਾਥ ਗਰੀਬ ਨਿਮਾਨੀ ॥
ਕੰਤ ਪਕਰਿ ਹਮ ਕੀਨੀ ਰਾਨੀ ॥੩॥
ਜਬ ਮੁਖਿ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਸਾਜਨੁ ਲਾਗਾ ॥
ਸੂਖ ਸਹਜ ਮੇਰਾ ਧਨੁ ਸੋਹਾਗਾ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਮੋਰੀ ਪੂਰਨ ਆਸਾ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਮੇਲੀ ਪ੍ਰਭ ਗੁਣਤਾਸਾ ॥੪॥੧॥੯੫॥
आसा महला ५ ॥
मीठी आगिआ पिर की लागी ॥
सउकनि घर की कंति तिआगी ॥
प्रिअ सोहागनि सीगारि करी ॥
मन मेरे की तपति हरी ॥१॥
भलो भइओ प्रिअ कहिआ मानिआ ॥
सूखु सहजु इसु घर का जानिआ ॥ रहाउ ॥
हउ बंदी प्रिअ खिजमतदार ॥
ओहु अबिनासी अगम अपार ॥
ले पखा प्रिअ झलउ पाए ॥
भागि गए पंच दूत लावे ॥२॥
ना मै कुलु ना सोभावंत ॥
किआ जाना किउ भानी कंत ॥
मोहि अनाथ गरीब निमानी ॥
कंत पकरि हम कीनी रानी ॥३॥
जब मुखि प्रीतमु साजनु लागा ॥
सूख सहज मेरा धनु सोहागा ॥
कहु नानक मोरी पूरन आसा ॥
सतिगुर मेली प्रभ गुणतासा ॥४॥१॥९५॥
मीठी आगिआ पिर की लागी ॥
सउकनि घर की कंति तिआगी ॥
प्रिअ सोहागनि सीगारि करी ॥
मन मेरे की तपति हरी ॥१॥
भलो भइओ प्रिअ कहिआ मानिआ ॥
सूखु सहजु इसु घर का जानिआ ॥ रहाउ ॥
हउ बंदी प्रिअ खिजमतदार ॥
ओहु अबिनासी अगम अपार ॥
ले पखा प्रिअ झलउ पाए ॥
भागि गए पंच दूत लावे ॥२॥
ना मै कुलु ना सोभावंत ॥
किआ जाना किउ भानी कंत ॥
मोहि अनाथ गरीब निमानी ॥
कंत पकरि हम कीनी रानी ॥३॥
जब मुखि प्रीतमु साजनु लागा ॥
सूख सहज मेरा धनु सोहागा ॥
कहु नानक मोरी पूरन आसा ॥
सतिगुर मेली प्रभ गुणतासा ॥४॥१॥९५॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे सखी ! गुरू की कृपा से जब से) मुझे प्रभू पति की रजा मीठी लग रही है (तब से) प्रभू-पति ने मेरा हृदय-घर कब्जा करके बैठी मेरी सौतन (माया) से मेरी खलासी करा दी है। प्यारे ने सोहागनि बना के मुझे (मेरे आत्मिक जीवन को) सुंदर बना दिया है। और मेरे मन की (तृष्णा की) तपस दूर कर दी है। 1। (हे सखी !) मेरे भाग्य जाग गए हैं (कि गुरू की कृपा से) मैंने प्यारे (प्रभू पति) की रजा (मीठी कर के) माननी आरम्भ कर दी है। अब मेरे इस हृदय घर में बसते सुख और आत्मिक अडोलता से मेरी गहरी सांझ बन गई है। 1।रहाउ। (हे सखी ! अब) मैं प्यारे प्रभू-पति की दासी बन गई हूँ सेवादारनी बन गई हूँ। (हे सखी ! मेरा) वह (पति) कभी मरने वाला नहीं।अपहुँच और बेअंत है। (हे सखी ! गुरू की कृपा से जब से) पंखा (हाथ में) पकड़ के उसके पैरों में खड़े हो के मैं उस प्यारे को झलती रहती हूँ (तब से मेरे आत्मिक जीवन की जड़ें) काटने वाले कामादिक पाँचों विकार भाग गए हैं। 2। (हे सखी !) मेरा ना कोई ऊँचा खानदान है।ना (किसी गुण की बरकति से) मैं शोभा की मालिक हूँ। मुझे पता नहीं कि मैं कैसे प्रभू-पति को अच्छी लग रही हूँ। (हे सखी ! ये गुरू पातशह ही की मेहर है कि) मुझ अनाथ को।गरीबनी को।निमाणी को। कंत प्रभू ने (बाँह से) पकड़ के अपनी रानी बना लिया है। 3। (हे सहेलिए ! जब से) मुझे मेरा सज्जन प्रीतम मिला है। मेरे अंदर आनंद बन रहा है आत्मिक अडोलता पैदा हो गई है।मेरे भाग्य जाग पड़े हैं। हे नानक ! कह, (हे सखिए ! प्रभू-पति के मिलाप की) मेरी आस पूरी हो गई है। सतिगुरू ने ही मुझे गुणों के खजाने उस प्रभू से मिलाया है। 4। 1। 95।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮਾਥੈ ਤ੍ਰਿਕੁਟੀ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਕਰੂਰਿ ॥
ਬੋਲੈ ਕਉੜਾ ਜਿਹਬਾ ਕੀ ਫੂੜਿ ॥
ਸਦਾ ਭੂਖੀ ਪਿਰੁ ਜਾਨੈ ਦੂਰਿ ॥੧॥
ਐਸੀ ਇਸਤ੍ਰੀ ਇਕ ਰਾਮਿ ਉਪਾਈ ॥
ਉਨਿ ਸਭੁ ਜਗੁ ਖਾਇਆ ਹਮ ਗੁਰਿ ਰਾਖੇ ਮੇਰੇ ਭਾਈ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪਾਇ ਠਗਉਲੀ ਸਭੁ ਜਗੁ ਜੋਹਿਆ ॥
ਬ੍ਰਹਮਾ ਬਿਸਨੁ ਮਹਾਦੇਉ ਮੋਹਿਆ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮਿ ਲਗੇ ਸੇ ਸੋਹਿਆ ॥੨॥
ਵਰਤ ਨੇਮ ਕਰਿ ਥਾਕੇ ਪੁਨਹਚਰਨਾ ॥
ਤਟ ਤੀਰਥ ਭਵੇ ਸਭ ਧਰਨਾ ॥
ਸੇ ਉਬਰੇ ਜਿ ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਸਰਨਾ ॥੩॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਸਭੋ ਜਗੁ ਬਾਧਾ ॥
ਹਉਮੈ ਪਚੈ ਮਨਮੁਖ ਮੂਰਾਖਾ ॥
ਗੁਰ ਨਾਨਕ ਬਾਹ ਪਕਰਿ ਹਮ ਰਾਖਾ ॥੪॥੨॥੯੬॥
ਮਾਥੈ ਤ੍ਰਿਕੁਟੀ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਕਰੂਰਿ ॥
ਬੋਲੈ ਕਉੜਾ ਜਿਹਬਾ ਕੀ ਫੂੜਿ ॥
ਸਦਾ ਭੂਖੀ ਪਿਰੁ ਜਾਨੈ ਦੂਰਿ ॥੧॥
ਐਸੀ ਇਸਤ੍ਰੀ ਇਕ ਰਾਮਿ ਉਪਾਈ ॥
ਉਨਿ ਸਭੁ ਜਗੁ ਖਾਇਆ ਹਮ ਗੁਰਿ ਰਾਖੇ ਮੇਰੇ ਭਾਈ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪਾਇ ਠਗਉਲੀ ਸਭੁ ਜਗੁ ਜੋਹਿਆ ॥
ਬ੍ਰਹਮਾ ਬਿਸਨੁ ਮਹਾਦੇਉ ਮੋਹਿਆ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮਿ ਲਗੇ ਸੇ ਸੋਹਿਆ ॥੨॥
ਵਰਤ ਨੇਮ ਕਰਿ ਥਾਕੇ ਪੁਨਹਚਰਨਾ ॥
ਤਟ ਤੀਰਥ ਭਵੇ ਸਭ ਧਰਨਾ ॥
ਸੇ ਉਬਰੇ ਜਿ ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਸਰਨਾ ॥੩॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਸਭੋ ਜਗੁ ਬਾਧਾ ॥
ਹਉਮੈ ਪਚੈ ਮਨਮੁਖ ਮੂਰਾਖਾ ॥
ਗੁਰ ਨਾਨਕ ਬਾਹ ਪਕਰਿ ਹਮ ਰਾਖਾ ॥੪॥੨॥੯੬॥
आसा महला ५ ॥
माथै त्रिकुटी द्रिसटि करूरि ॥
बोलै कउड़ा जिहबा की फूड़ि ॥
सदा भूखी पिरु जानै दूरि ॥१॥
ऐसी इसत्री इक रामि उपाई ॥
उनि सभु जगु खाइआ हम गुरि राखे मेरे भाई ॥ रहाउ ॥
पाइ ठगउली सभु जगु जोहिआ ॥
ब्रहमा बिसनु महादेउ मोहिआ ॥
गुरमुखि नामि लगे से सोहिआ ॥२॥
वरत नेम करि थाके पुनहचरना ॥
तट तीरथ भवे सभ धरना ॥
से उबरे जि सतिगुर की सरना ॥३॥
माइआ मोहि सभो जगु बाधा ॥
हउमै पचै मनमुख मूराखा ॥
गुर नानक बाह पकरि हम राखा ॥४॥२॥९६॥
माथै त्रिकुटी द्रिसटि करूरि ॥
बोलै कउड़ा जिहबा की फूड़ि ॥
सदा भूखी पिरु जानै दूरि ॥१॥
ऐसी इसत्री इक रामि उपाई ॥
उनि सभु जगु खाइआ हम गुरि राखे मेरे भाई ॥ रहाउ ॥
पाइ ठगउली सभु जगु जोहिआ ॥
ब्रहमा बिसनु महादेउ मोहिआ ॥
गुरमुखि नामि लगे से सोहिआ ॥२॥
वरत नेम करि थाके पुनहचरना ॥
तट तीरथ भवे सभ धरना ॥
से उबरे जि सतिगुर की सरना ॥३॥
माइआ मोहि सभो जगु बाधा ॥
हउमै पचै मनमुख मूराखा ॥
गुर नानक बाह पकरि हम राखा ॥४॥२॥९६॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई ! उस माया-स्त्री के) माथे पे त्रिकुटी (पड़ी रहती) है उसकी निगाह गुस्से से भरी रहती है वह (सदा) कड़वा बोलती है। जीभ भी कटु है (सारे जगत के आत्मिक जीवन को हड़प करके भी) वह भूखी की भूखी रहती है (जगत में आ रहे सब जीवों को हड़पने को तैयार रहती है) वह (माया-स्त्री) प्रभू-पति को कहीं दूर बसता समझती है (प्रभू-पति की परवाह ही नहीं करती)। 1। हे मेरे भाई ! परमात्मा ने (माया) एक ऐसा स्त्री पैदा की हुई है कि उसने सारे जगत को खा लिया है (अपने काबू में किया हुआ है)।मुझे तो गुरू ने (उस माया स्त्री से) बचा के रखा है। 1।रहाउ। (हे भाई ! माया-स्त्री ने) ठॅगबूटी खिला के सारे जगत को अपनी ताक में रखा हुआ है। (जीव की भी क्या बिसात।उसने तो) ब्रहमा को।विष्णु को।शिव को अपने मोह में फंसाया हुआ है। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ के परमात्मा के नाम में जुड़े रहते हैं (उससे बच के) सोहने आत्मिक जीवन वाले बने रहते हैं। 2। (हे भाई ! अनेकों लोग) वर्त रख-रख के धार्मिक नियम निबाह-निबाह के और (किए पापों के प्रभाव मिटाने के लिए) पछतावे के तौर पर धार्मिक रस्में कर-कर के थक गए। अनेकों तीर्थों पर सारी धरती पर भटक चुके (पर इस माया-स्त्री से ना बच सके)। (हे भाई !) सिर्फ वही लोग बचते हैं जो गुरू की शरण पड़ते हैं। 3। (हे भाई !) सारा जगत माया के मोह में बंधा पड़ा है। अपने मन के पीछे चलने वाला मूर्ख मनुष्य अहंकार में दुखी होता रहता है। हे नानक ! (कह,) हे गुरू ! मुझे तूने ही मेरी बाँह पकड़ के (इसके पँजे से) बचाया है। 4। 2। 96।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸਰਬ ਦੂਖ ਜਬ ਬਿਸਰਹਿ ਸੁਆਮੀ ॥
ਈਹਾ ਊਹਾ ਕਾਮਿ ਨ ਪ੍ਰਾਨੀ ॥੧॥
ਸੰਤ ਤ੍ਰਿਪਤਾਸੇ ਹਰਿ ਹਰਿ ਧੵਾਇ ॥
ਸਰਬ ਦੂਖ ਜਬ ਬਿਸਰਹਿ ਸੁਆਮੀ ॥
ਈਹਾ ਊਹਾ ਕਾਮਿ ਨ ਪ੍ਰਾਨੀ ॥੧॥
ਸੰਤ ਤ੍ਰਿਪਤਾਸੇ ਹਰਿ ਹਰਿ ਧੵਾਇ ॥
आसा महला ५ ॥
सरब दूख जब बिसरहि सुआमी ॥
ईहा ऊहा कामि न प्रानी ॥१॥
संत त्रिपतासे हरि हरि धॵाइ ॥
सरब दूख जब बिसरहि सुआमी ॥
ईहा ऊहा कामि न प्रानी ॥१॥
संत त्रिपतासे हरि हरि धॵाइ ॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे मालिक प्रभू ! जब (किसी जीव के मन में से) तू बिसर जाता है तो उसे सारे दुख आ घेरते हैं। वह जीव लोक-परलोक में किसी काम नहीं आता (उसका जीवन व्यर्थ हो जाता है)। 1। वह (तेरे) संत-जन तेरा हरि-नाम सिमर-सिमर के (माया की तृष्णा की ओर से) तृप्त रहते हैं।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 394 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
WhatsApp-family-group पर सुबह की good-morning messages का flood।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 56 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 394” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 395 →, पीछे का: ← अंग 393।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।