अंग 393

अंग
393
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਜਿਸੁ ਭੇਟਤ ਲਾਗੈ ਪ੍ਰਭ ਰੰਗੁ ॥੧॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਓਇ ਆਨੰਦ ਪਾਵੈ ॥
ਜਿਸੁ ਸਿਮਰਤ ਮਨਿ ਹੋਇ ਪ੍ਰਗਾਸਾ ਤਾ ਕੀ ਗਤਿ ਮਿਤਿ ਕਹਨੁ ਨ ਜਾਵੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਵਰਤ ਨੇਮ ਮਜਨ ਤਿਸੁ ਪੂਜਾ ॥
ਬੇਦ ਪੁਰਾਨ ਤਿਨਿ ਸਿੰਮ੍ਰਿਤਿ ਸੁਨੀਜਾ ॥
ਮਹਾ ਪੁਨੀਤ ਜਾ ਕਾ ਨਿਰਮਲ ਥਾਨੁ ॥
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਜਾ ਕੈ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ॥੨॥
ਪ੍ਰਗਟਿਓ ਸੋ ਜਨੁ ਸਗਲੇ ਭਵਨ ॥
ਪਤਿਤ ਪੁਨੀਤ ਤਾ ਕੀ ਪਗ ਰੇਨ ॥
ਜਾ ਕਉ ਭੇਟਿਓ ਹਰਿ ਹਰਿ ਰਾਇ ॥
ਤਾ ਕੀ ਗਤਿ ਮਿਤਿ ਕਥਨੁ ਨ ਜਾਇ ॥੩॥
ਆਠ ਪਹਰ ਕਰ ਜੋੜਿ ਧਿਆਵਉ ॥
ਉਨ ਸਾਧਾ ਕਾ ਦਰਸਨੁ ਪਾਵਉ ॥
ਮੋਹਿ ਗਰੀਬ ਕਉ ਲੇਹੁ ਰਲਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਆਇ ਪਏ ਸਰਣਾਇ ॥੪॥੩੮॥੮੯॥
जिसु भेटत लागै प्रभ रंगु ॥१॥
गुर प्रसादि ओइ आनंद पावै ॥
जिसु सिमरत मनि होइ प्रगासा ता की गति मिति कहनु न जावै ॥१॥ रहाउ ॥
वरत नेम मजन तिसु पूजा ॥
बेद पुरान तिनि सिंम्रिति सुनीजा ॥
महा पुनीत जा का निरमल थानु ॥
साधसंगति जा कै हरि हरि नामु ॥२॥
प्रगटिओ सो जनु सगले भवन ॥
पतित पुनीत ता की पग रेन ॥
जा कउ भेटिओ हरि हरि राइ ॥
ता की गति मिति कथनु न जाइ ॥३॥
आठ पहर कर जोड़ि धिआवउ ॥
उन साधा का दरसनु पावउ ॥
मोहि गरीब कउ लेहु रलाइ ॥
नानक आइ पए सरणाइ ॥४॥३८॥८९॥

हिन्दी अर्थ: गुरू को मिलने से परमात्मा का प्रेम (दिल में) पैदा हो जाता है। 1। वह मनुष्य अनेकों किस्म के आत्मिक आनंद भोगता है। (हे भाई !) गुरू की कृपा से जिस मनुष्य के मन में प्रभू-नाम सिमरने से (आत्मिक जीवन का) प्रकाश हो जाता है उसकी उच्च आत्मिक अवस्था बयान नहीं की जा सकती।उसका आत्मिक बड़प्पन बताया नहीं जा सकता। 1।रहाउ। उसने सारे बर्त-नेमसारे तीर्थ-स्नान और सारी ही पूजा आदि कर लिए। उसने जैसे वेद-पुराण-स्मृतियां आदि सारे ही धर्म-पुस्तकें सुन लीं। उस मनुष्य का हृदय-स्थल बहुत पवित्र-निर्मल हो जाता है (हे भाई !) गुरू की संगति की बरकति से जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का नाम आ बसता है 2। वह मनुष्य सारे भवनों में शिरोमणी हो जाता है। उस मनुष्य के चरणों की धूड़ विकारों में गिरे हुए अनेकों लोगों को पवित्र करने की समर्था रखती है। (हे भाई ! गुरू की कृपा से) जिस मनुष्य को प्रभू-पातशाह मिल जाता है उस मनुष्य की ऊँची आत्मिक अवस्था उस मनुष्य का आत्मिक बड़प्पन बयान नहीं किया जा सकता।3। आठों पहर दोनों हाथ जोड़ के तेरा ध्यान धरता रहूँ। मैं उनके दर्शन करता रहूँ और मुझ गरीब को उनकी संगति में मिला दे हे नानक ! (कह, हे प्रभू ! जो गुरसिख गुरू की कृपा से) तेरी शरण आ पड़े हैं। 4। 38। 89।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਉਦਕ ਇਸਨਾਨੀ ॥
ਸਦ ਹੀ ਭੋਗੁ ਲਗਾਇ ਸੁਗਿਆਨੀ ॥
ਬਿਰਥਾ ਕਾਹੂ ਛੋਡੈ ਨਾਹੀ ॥
ਬਹੁਰਿ ਬਹੁਰਿ ਤਿਸੁ ਲਾਗਹ ਪਾਈ ॥੧॥
ਸਾਲਗਿਰਾਮੁ ਹਮਾਰੈ ਸੇਵਾ ॥
ਪੂਜਾ ਅਰਚਾ ਬੰਦਨ ਦੇਵਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਘੰਟਾ ਜਾ ਕਾ ਸੁਨੀਐ ਚਹੁ ਕੁੰਟ ॥
ਆਸਨੁ ਜਾ ਕਾ ਸਦਾ ਬੈਕੁੰਠ ॥
ਜਾ ਕਾ ਚਵਰੁ ਸਭ ਊਪਰਿ ਝੂਲੈ ॥
ਤਾ ਕਾ ਧੂਪੁ ਸਦਾ ਪਰਫੁਲੈ ॥੨॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਸੰਪਟੁ ਹੈ ਰੇ ਜਾ ਕਾ ॥
ਅਭਗ ਸਭਾ ਸੰਗਿ ਹੈ ਸਾਧਾ ॥
ਆਰਤੀ ਕੀਰਤਨੁ ਸਦਾ ਅਨੰਦ ॥
ਮਹਿਮਾ ਸੁੰਦਰ ਸਦਾ ਬੇਅੰਤ ॥੩॥
ਜਿਸਹਿ ਪਰਾਪਤਿ ਤਿਸ ਹੀ ਲਹਨਾ ॥
ਸੰਤ ਚਰਨ ਓਹੁ ਆਇਓ ਸਰਨਾ ॥
ਹਾਥਿ ਚੜਿਓ ਹਰਿ ਸਾਲਗਿਰਾਮੁ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰਿ ਕੀਨੋ ਦਾਨੁ ॥੪॥੩੯॥੯੦॥
आसा महला ५ ॥
आठ पहर उदक इसनानी ॥
सद ही भोगु लगाइ सुगिआनी ॥
बिरथा काहू छोडै नाही ॥
बहुरि बहुरि तिसु लागह पाई ॥१॥
सालगिरामु हमारै सेवा ॥
पूजा अरचा बंदन देवा ॥१॥ रहाउ ॥
घंटा जा का सुनीऐ चहु कुंट ॥
आसनु जा का सदा बैकुंठ ॥
जा का चवरु सभ ऊपरि झूलै ॥
ता का धूपु सदा परफुलै ॥२॥
घटि घटि संपटु है रे जा का ॥
अभग सभा संगि है साधा ॥
आरती कीरतनु सदा अनंद ॥
महिमा सुंदर सदा बेअंत ॥३॥
जिसहि परापति तिस ही लहना ॥
संत चरन ओहु आइओ सरना ॥
हाथि चड़िओ हरि सालगिरामु ॥
कहु नानक गुरि कीनो दानु ॥४॥३९॥९०॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ वह (जलों-थलों में हर जगह बसने वाला हरी सालिगराम) आठों पहर ही पानियों का स्नान करने वाला है। (सब जीवों के अंदर बैठ के) सदा ही भोग लगाता रहता है (पदार्थ छकता रहता है)। हरेक के दिल की अच्छी तरह जानने वाला वह हरि-सालिगराम, जो किसी की भी दर्द-पीड़ा नहीं रहने देता। (हे पण्डित !) हम उस (हरी-सालिगराम) के पैरों में बारंबार पड़ते हैं1। (हे पण्डित !) परमात्मा-देव की सेवा-भक्ति हमारे घर में सलिगराम (की पूजा) है। (हरि-नाम-सिमरन ही हमारे वास्ते सालिगराम की) पूजा।सुगंधि भेट व नमस्कार है। 1।रहाउ। (हे पण्डित !) उस (हरि-सालिग्राम की रजा) का घण्टा (सिर्फ मन्दिर में सुने जाने की जगह) सारे जगत में ही सुना जाता है। (साध-संगति रूप) बैकुंठ में उसका निवास सदा ही टिका रहता है। सब जीवों पर उसका (पवन) -चक्र झूल रहा है। (सारी बनस्पति) सदैव फूल दे रही है यही है उसके वास्ते धूप। 2। हरेक का हृदय ही उसका (ठाकुरों वाला) डब्बा है।(हे पण्डित !) हरेक शरीर में वह बस रहा है। उसकी संत-सभा कभी खत्म होने वाली नहीं।साध-संगति में वह हर वक्त बसता है। जहाँ उसकी सदा आनन्द देने वाली सिफत सालाह हो रही है।ये सिफत सालाह उसकी ही आरती है। उस बेअंत और सुंदर (हरी-सालिगराम) की सदा महिमा हो रही है। 3। हे पण्डित !) जिस मनुष्य के भाग्यों में उस (हरी-सालिगराम) की प्राप्ति लिखी है उसी को वह मिलता है। वह मनुष्य संतों क चरणों में लगता है वह संतों के शरण पड़ा रहता है। उसे हरी-सालिगराम मिल जाता है। हे नानक ! कह, जिस मनुष्य को गुरू ने (नाम की) दाति बख्शी।4। 39। 90।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ਪੰਚਪਦਾ ॥
ਜਿਹ ਪੈਡੈ ਲੂਟੀ ਪਨਿਹਾਰੀ ॥
ਸੋ ਮਾਰਗੁ ਸੰਤਨ ਦੂਰਾਰੀ ॥੧॥
ਸਤਿਗੁਰ ਪੂਰੈ ਸਾਚੁ ਕਹਿਆ ॥
ਨਾਮ ਤੇਰੇ ਕੀ ਮੁਕਤੇ ਬੀਥੀ ਜਮ ਕਾ ਮਾਰਗੁ ਦੂਰਿ ਰਹਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਹ ਲਾਲਚ ਜਾਗਾਤੀ ਘਾਟ ॥
ਦੂਰਿ ਰਹੀ ਉਹ ਜਨ ਤੇ ਬਾਟ ॥੨॥
ਜਹ ਆਵਟੇ ਬਹੁਤ ਘਨ ਸਾਥ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਕੇ ਸੰਗੀ ਸਾਧ ॥੩॥
ਚਿਤ੍ਰ ਗੁਪਤੁ ਸਭ ਲਿਖਤੇ ਲੇਖਾ ॥
ਭਗਤ ਜਨਾ ਕਉ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਨ ਪੇਖਾ ॥੪॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜਿਸੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ॥
ਵਾਜੇ ਤਾ ਕੈ ਅਨਹਦ ਤੂਰਾ ॥੫॥੪੦॥੯੧॥
आसा महला ५ पंचपदा ॥
जिह पैडै लूटी पनिहारी ॥
सो मारगु संतन दूरारी ॥१॥
सतिगुर पूरै साचु कहिआ ॥
नाम तेरे की मुकते बीथी जम का मारगु दूरि रहिआ ॥१॥ रहाउ ॥
जह लालच जागाती घाट ॥
दूरि रही उह जन ते बाट ॥२॥
जह आवटे बहुत घन साथ ॥
पारब्रहम के संगी साध ॥३॥
चित्र गुपतु सभ लिखते लेखा ॥
भगत जना कउ द्रिसटि न पेखा ॥४॥
कहु नानक जिसु सतिगुरु पूरा ॥
वाजे ता कै अनहद तूरा ॥५॥४०॥९१॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ पंचपदा ॥ (हे भाई !) विकारों में फंसी हुई जीव-स्त्री जिस जीवन-रास्ते में (आत्मिक जीवन की राशि-पूँजी) लुटा बैठती है। वह रास्ता संत-जनों से दूर रह जाता है। 1। हे प्रभू ! पूरे गुरू ने जिस मनुष्य को तेरा सदा स्थिर रहने वाला उपदेश दे दिया। जम दूतों (आत्मिक मौत) वाला रास्ता उस मनुष्य से दूर किनारे रह जाता है उसको तेरे नाम की बरकति से जीवन-सफर में खुला रास्ता मिल जाता है। 1।रहाउ। (हे भाई !) जहाँ लालची महसूलिए का पत्तन है (जहाँ जम-महसूलिये किए कर्मों के बारे में फटकार लगाते हैं) वह रास्ता संत-जनों से परे रह जाता है। 2। (हे भाई !) जिस जीवन-यात्रा में (माया में ग्रसित जीवों के) अनेकों ही काफले (किए मंद-कर्मों के कारण) दुखी होते रहते हैं। गुरमुखि मनुष्य (उस सफर में) परमात्मा के सत्संगी बने रहते हैं (इस करके गुरमुखों को कोई दुख नहीं व्याप्ता)। 3। (हे भाई ! माया ग्रसित जीवों के किए कर्मों का लेखा लिखने वाले) चित्र-गुप्त सब जीवों के किए कर्मों का हिसाब लिखते रहते हैं। पर परमात्मा की भक्ति करने वाले लोगों की तरफ वे आँख उठा के भी नहीं देख सकते। 4। हे नानक ! कह, जिस मनुष्य को पूरा गुरू मिल जाता है उसके हृदय में सदा प्रभू की सिफत सालाह के एक-रस बाजे बजते रहते हैं (इस वास्ते) उसे विकारों की प्रेरना नहीं सुनती। 5। 40। 91।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ਦੁਪਦਾ ੧ ॥
ਸਾਧੂ ਸੰਗਿ ਸਿਖਾਇਓ ਨਾਮੁ ॥
ਸਰਬ ਮਨੋਰਥ ਪੂਰਨ ਕਾਮ ॥
ਬੁਝਿ ਗਈ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਹਰਿ ਜਸਹਿ ਅਘਾਨੇ ॥
ਜਪਿ ਜਪਿ ਜੀਵਾ ਸਾਰਿਗਪਾਨੇ ॥੧॥
ਕਰਨ ਕਰਾਵਨ ਸਰਨਿ ਪਰਿਆ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦਿ ਸਹਜ ਘਰੁ ਪਾਇਆ ਮਿਟਿਆ ਅੰਧੇਰਾ ਚੰਦੁ ਚੜਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
आसा महला ५ दुपदा १ ॥
साधू संगि सिखाइओ नामु ॥
सरब मनोरथ पूरन काम ॥
बुझि गई त्रिसना हरि जसहि अघाने ॥
जपि जपि जीवा सारिगपाने ॥१॥
करन करावन सरनि परिआ ॥
गुर परसादि सहज घरु पाइआ मिटिआ अंधेरा चंदु चड़िआ ॥१॥ रहाउ ॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ दुपदा १ ॥ (हे भाई ! जिन मनुष्यों को) गुरू अपनी संगति में रख के परमात्मा का नाम सिमरन सिखाता है। उनके सारे मनोरथ सारे काम सफल हो जाते हैं (उनके अंदर से तृष्णा की आग) बुझ जाती है। वह परमात्मा की सिफत-सालाह में टिक के (माया की ओर से) तृप्त रहते हैं। (हे भाई !) मैं ज्यों-ज्यों परमात्मा का नाम जपता हूँ।मेरे अंदर आत्मिक जीवन पैदा होता है। 1। (हे भाई ! जो भी मनुष्य) गुरू की किरपा से उस परमात्मा की शरण पड़ जाता है (जो सब कुछ करने व सब कुछ कराने की ताकत रखने वाला है) वह मनुष्य वह आत्मिक ठिकाना तलाश लेता है।जहाँ उसे आत्मिक अडोलता मिली रहती है।(उसके अंदर से माया के मोह का) अंधेरा दूर हो जाता है (उसके अंदर।मानो) चंद्रमा चढ़ जाता है (आत्मिक जीवन की रौशनी हो जाती है)। 1।

संदर्भ: यह अंग 393 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

दिल्ली-NCR की office-canteen की 1 बजे की दोपहर।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 54 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 393” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 394 →, पीछे का: ← अंग 392

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।