अंग
440
राग आसा
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਪਿਰੁ ਸੰਗਿ ਕਾਮਣਿ ਜਾਣਿਆ ਗੁਰਿ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਈ ਰਾਮ ॥
ਅੰਤਰਿ ਸਬਦਿ ਮਿਲੀ ਸਹਜੇ ਤਪਤਿ ਬੁਝਾਈ ਰਾਮ ॥
ਸਬਦਿ ਤਪਤਿ ਬੁਝਾਈ ਅੰਤਰਿ ਸਾਂਤਿ ਆਈ ਸਹਜੇ ਹਰਿ ਰਸੁ ਚਾਖਿਆ ॥
ਮਿਲਿ ਪ੍ਰੀਤਮ ਅਪਣੇ ਸਦਾ ਰੰਗੁ ਮਾਣੇ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਸੁਭਾਖਿਆ ॥
ਪੜਿ ਪੜਿ ਪੰਡਿਤ ਮੋਨੀ ਥਾਕੇ ਭੇਖੀ ਮੁਕਤਿ ਨ ਪਾਈ ॥
ਨਾਨਕ ਬਿਨੁ ਭਗਤੀ ਜਗੁ ਬਉਰਾਨਾ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਈ ॥੩॥
ਸਾ ਧਨ ਮਨਿ ਅਨਦੁ ਭਇਆ ਹਰਿ ਜੀਉ ਮੇਲਿ ਪਿਆਰੇ ਰਾਮ ॥
ਸਾ ਧਨ ਹਰਿ ਕੈ ਰਸਿ ਰਸੀ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਅਪਾਰੇ ਰਾਮ ॥
ਸਬਦਿ ਅਪਾਰੇ ਮਿਲੇ ਪਿਆਰੇ ਸਦਾ ਗੁਣ ਸਾਰੇ ਮਨਿ ਵਸੇ ॥
ਸੇਜ ਸੁਹਾਵੀ ਜਾ ਪਿਰਿ ਰਾਵੀ ਮਿਲਿ ਪ੍ਰੀਤਮ ਅਵਗਣ ਨਸੇ ॥
ਜਿਤੁ ਘਰਿ ਨਾਮੁ ਹਰਿ ਸਦਾ ਧਿਆਈਐ ਸੋਹਿਲੜਾ ਜੁਗ ਚਾਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸਦਾ ਅਨਦੁ ਹੈ ਹਰਿ ਮਿਲਿਆ ਕਾਰਜ ਸਾਰੇ ॥੪॥੧॥੬॥
ਅੰਤਰਿ ਸਬਦਿ ਮਿਲੀ ਸਹਜੇ ਤਪਤਿ ਬੁਝਾਈ ਰਾਮ ॥
ਸਬਦਿ ਤਪਤਿ ਬੁਝਾਈ ਅੰਤਰਿ ਸਾਂਤਿ ਆਈ ਸਹਜੇ ਹਰਿ ਰਸੁ ਚਾਖਿਆ ॥
ਮਿਲਿ ਪ੍ਰੀਤਮ ਅਪਣੇ ਸਦਾ ਰੰਗੁ ਮਾਣੇ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਸੁਭਾਖਿਆ ॥
ਪੜਿ ਪੜਿ ਪੰਡਿਤ ਮੋਨੀ ਥਾਕੇ ਭੇਖੀ ਮੁਕਤਿ ਨ ਪਾਈ ॥
ਨਾਨਕ ਬਿਨੁ ਭਗਤੀ ਜਗੁ ਬਉਰਾਨਾ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਮਿਲਾਈ ॥੩॥
ਸਾ ਧਨ ਮਨਿ ਅਨਦੁ ਭਇਆ ਹਰਿ ਜੀਉ ਮੇਲਿ ਪਿਆਰੇ ਰਾਮ ॥
ਸਾ ਧਨ ਹਰਿ ਕੈ ਰਸਿ ਰਸੀ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਅਪਾਰੇ ਰਾਮ ॥
ਸਬਦਿ ਅਪਾਰੇ ਮਿਲੇ ਪਿਆਰੇ ਸਦਾ ਗੁਣ ਸਾਰੇ ਮਨਿ ਵਸੇ ॥
ਸੇਜ ਸੁਹਾਵੀ ਜਾ ਪਿਰਿ ਰਾਵੀ ਮਿਲਿ ਪ੍ਰੀਤਮ ਅਵਗਣ ਨਸੇ ॥
ਜਿਤੁ ਘਰਿ ਨਾਮੁ ਹਰਿ ਸਦਾ ਧਿਆਈਐ ਸੋਹਿਲੜਾ ਜੁਗ ਚਾਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸਦਾ ਅਨਦੁ ਹੈ ਹਰਿ ਮਿਲਿਆ ਕਾਰਜ ਸਾਰੇ ॥੪॥੧॥੬॥
पिरु संगि कामणि जाणिआ गुरि मेलि मिलाई राम ॥
अंतरि सबदि मिली सहजे तपति बुझाई राम ॥
सबदि तपति बुझाई अंतरि सांति आई सहजे हरि रसु चाखिआ ॥
मिलि प्रीतम अपणे सदा रंगु माणे सचै सबदि सुभाखिआ ॥
पड़ि पड़ि पंडित मोनी थाके भेखी मुकति न पाई ॥
नानक बिनु भगती जगु बउराना सचै सबदि मिलाई ॥३॥
सा धन मनि अनदु भइआ हरि जीउ मेलि पिआरे राम ॥
सा धन हरि कै रसि रसी गुर कै सबदि अपारे राम ॥
सबदि अपारे मिले पिआरे सदा गुण सारे मनि वसे ॥
सेज सुहावी जा पिरि रावी मिलि प्रीतम अवगण नसे ॥
जितु घरि नामु हरि सदा धिआईऐ सोहिलड़ा जुग चारे ॥
नानक नामि रते सदा अनदु है हरि मिलिआ कारज सारे ॥४॥१॥६॥
अंतरि सबदि मिली सहजे तपति बुझाई राम ॥
सबदि तपति बुझाई अंतरि सांति आई सहजे हरि रसु चाखिआ ॥
मिलि प्रीतम अपणे सदा रंगु माणे सचै सबदि सुभाखिआ ॥
पड़ि पड़ि पंडित मोनी थाके भेखी मुकति न पाई ॥
नानक बिनु भगती जगु बउराना सचै सबदि मिलाई ॥३॥
सा धन मनि अनदु भइआ हरि जीउ मेलि पिआरे राम ॥
सा धन हरि कै रसि रसी गुर कै सबदि अपारे राम ॥
सबदि अपारे मिले पिआरे सदा गुण सारे मनि वसे ॥
सेज सुहावी जा पिरि रावी मिलि प्रीतम अवगण नसे ॥
जितु घरि नामु हरि सदा धिआईऐ सोहिलड़ा जुग चारे ॥
नानक नामि रते सदा अनदु है हरि मिलिआ कारज सारे ॥४॥१॥६॥
हिन्दी अर्थ: (हे सखी !) जिस जीव-स्त्री को गुरू ने प्रभू चरणों में जोड़ दिया उसने प्रभू-पति को अपने अंग-संग बसता पहचान लिया। वह अंतरात्मे गुरू के शबद की बरकति से प्रभू के साथ एक-मेक हो गई।आत्मिक अडोलता में टिक के उसने (अपने अंदर से विकारों वाली) तपश बुझा ली। (हे सखी ! जिस जीव-स्त्री ने) गुरू के शबद की सहायता से अपने अंदर से विकारों वाली तपश बुझा ली।उसके अंदर ठंड पड़ गई।आत्मिक अडोलता में टिक के उसने हरि नाम का स्वाद चख लिया। अपने प्रभू-प्रीतम को मिल के वह सदा प्रेम-रंग भोगती है।सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह वाले गुर-शबद में जुड़ के उसकी बोली मीठी हो जाती है। (हे सखी !) पण्डित (धार्मिक पुस्तकें) पढ़-पढ़ के।मौनधारी (समाधियां लगा लगा के) (जोगी जंगम आदि साधु) भेष धार-धार के थक गए (इन तरीकों से किसी ने माया के बंधनों से) निजात हासिल नहीं की। हे नानक ! परमात्मा की भक्ति के बिना जगत (माया के मोह में) झल्ला हुआ फिरता है।सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह वाले गुर-शबद की बरकति से प्रभू चरणों में मिलाप हासिल कर लेता है। 3। (हे सखी !) जिस जीव-स्त्री को प्यारे हरी प्रभू ने अपने चरणों में जोड़ लिया उसके मन में उमंग पैदा हो जाती है। वह जीव-स्त्री अपार प्रभू की सिफत सालाह वाले गुरू-शबद के द्वारा परमात्मा के प्रेम-रस में भीगी रहती है। अपार प्रभू की सिफत सालाह वाले शबद की बरकति से वह जीव-स्त्री प्यारे प्रभू को मिल जाती है।सदा उसके गुण अपने हृदय में संभाल के रखती है।प्रभू के गुण उसके मन में टिके रहते हैं। जब से प्रभू-पति ने उसे अपने चरणों से जोड़ लिया उस (के हृदय) की सेज सुंदर बन गई।प्रीतम प्रभू को मिल के उसके सारे अवगुण दूर हो गए। (हे सखी !) जिस (हृदय-) घर में परमात्मा का नाम सदा सिमरा जाता है वहाँ सदा ही (जैसे) खुशियों के गीत गाए जा रहे होते हैं। हे नानक ! जो जीव परमात्मा के नाम-रंग में रंगे जाते हैं उनके अंदर सदा आनंद बना रहता है।प्रभू-चरणों में मिल के वह अपने सारे काम संवार लेते हैं। 4। 1। 6।
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੩ ਛੰਤ ਘਰੁ ੩ ॥
ਸਾਜਨ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰੀਤਮਹੁ ਤੁਮ ਸਹ ਕੀ ਭਗਤਿ ਕਰੇਹੋ ॥
ਗੁਰੁ ਸੇਵਹੁ ਸਦਾ ਆਪਣਾ ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਲੇਹੋ ॥
ਭਗਤਿ ਕਰਹੁ ਤੁਮ ਸਹੈ ਕੇਰੀ ਜੋ ਸਹ ਪਿਆਰੇ ਭਾਵਏ ॥
ਆਪਣਾ ਭਾਣਾ ਤੁਮ ਕਰਹੁ ਤਾ ਫਿਰਿ ਸਹ ਖੁਸੀ ਨ ਆਵਏ ॥
ਭਗਤਿ ਭਾਵ ਇਹੁ ਮਾਰਗੁ ਬਿਖੜਾ ਗੁਰ ਦੁਆਰੈ ਕੋ ਪਾਵਏ ॥
ਕਹੈ ਨਾਨਕੁ ਜਿਸੁ ਕਰੇ ਕਿਰਪਾ ਸੋ ਹਰਿ ਭਗਤੀ ਚਿਤੁ ਲਾਵਏ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਮਨ ਬੈਰਾਗੀਆ ਤੂੰ ਬੈਰਾਗੁ ਕਰਿ ਕਿਸੁ ਦਿਖਾਵਹਿ ॥
ਹਰਿ ਸੋਹਿਲਾ ਤਿਨੑ ਸਦ ਸਦਾ ਜੋ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵਹਿ ॥
ਕਰਿ ਬੈਰਾਗੁ ਤੂੰ ਛੋਡਿ ਪਾਖੰਡੁ ਸੋ ਸਹੁ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਜਾਣਏ ॥
ਜਲਿ ਥਲਿ ਮਹੀਅਲਿ ਏਕੋ ਸੋਈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੁਕਮੁ ਪਛਾਣਏ ॥
ਜਿਨਿ ਹੁਕਮੁ ਪਛਾਤਾ ਹਰੀ ਕੇਰਾ ਸੋਈ ਸਰਬ ਸੁਖ ਪਾਵਏ ॥
ਇਵ ਕਹੈ ਨਾਨਕੁ ਸੋ ਬੈਰਾਗੀ ਅਨਦਿਨੁ ਹਰਿ ਲਿਵ ਲਾਵਏ ॥੨॥
ਜਹ ਜਹ ਮਨ ਤੂੰ ਧਾਵਦਾ ਤਹ ਤਹ ਹਰਿ ਤੇਰੈ ਨਾਲੇ ॥
ਮਨ ਸਿਆਣਪ ਛੋਡੀਐ ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਸਮਾਲੇ ॥
ਸਾਥਿ ਤੇਰੈ ਸੋ ਸਹੁ ਸਦਾ ਹੈ ਇਕੁ ਖਿਨੁ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਹੇ ॥
ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੇ ਤੇਰੇ ਪਾਪ ਕਟੇ ਅੰਤਿ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਵਹੇ ॥
ਸਾਚੇ ਨਾਲਿ ਤੇਰਾ ਗੰਢੁ ਲਾਗੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਦਾ ਸਮਾਲੇ ॥
ਇਉ ਕਹੈ ਨਾਨਕੁ ਜਹ ਮਨ ਤੂੰ ਧਾਵਦਾ ਤਹ ਹਰਿ ਤੇਰੈ ਸਦਾ ਨਾਲੇ ॥੩॥
ਸਤਿਗੁਰ ਮਿਲਿਐ ਧਾਵਤੁ ਥੰਮਿੑਆ ਨਿਜ ਘਰਿ ਵਸਿਆ ਆਏ ॥
ਨਾਮੁ ਵਿਹਾਝੇ ਨਾਮੁ ਲਏ ਨਾਮਿ ਰਹੇ ਸਮਾਏ ॥
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੩ ਛੰਤ ਘਰੁ ੩ ॥
ਸਾਜਨ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰੀਤਮਹੁ ਤੁਮ ਸਹ ਕੀ ਭਗਤਿ ਕਰੇਹੋ ॥
ਗੁਰੁ ਸੇਵਹੁ ਸਦਾ ਆਪਣਾ ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਲੇਹੋ ॥
ਭਗਤਿ ਕਰਹੁ ਤੁਮ ਸਹੈ ਕੇਰੀ ਜੋ ਸਹ ਪਿਆਰੇ ਭਾਵਏ ॥
ਆਪਣਾ ਭਾਣਾ ਤੁਮ ਕਰਹੁ ਤਾ ਫਿਰਿ ਸਹ ਖੁਸੀ ਨ ਆਵਏ ॥
ਭਗਤਿ ਭਾਵ ਇਹੁ ਮਾਰਗੁ ਬਿਖੜਾ ਗੁਰ ਦੁਆਰੈ ਕੋ ਪਾਵਏ ॥
ਕਹੈ ਨਾਨਕੁ ਜਿਸੁ ਕਰੇ ਕਿਰਪਾ ਸੋ ਹਰਿ ਭਗਤੀ ਚਿਤੁ ਲਾਵਏ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਮਨ ਬੈਰਾਗੀਆ ਤੂੰ ਬੈਰਾਗੁ ਕਰਿ ਕਿਸੁ ਦਿਖਾਵਹਿ ॥
ਹਰਿ ਸੋਹਿਲਾ ਤਿਨੑ ਸਦ ਸਦਾ ਜੋ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵਹਿ ॥
ਕਰਿ ਬੈਰਾਗੁ ਤੂੰ ਛੋਡਿ ਪਾਖੰਡੁ ਸੋ ਸਹੁ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਜਾਣਏ ॥
ਜਲਿ ਥਲਿ ਮਹੀਅਲਿ ਏਕੋ ਸੋਈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੁਕਮੁ ਪਛਾਣਏ ॥
ਜਿਨਿ ਹੁਕਮੁ ਪਛਾਤਾ ਹਰੀ ਕੇਰਾ ਸੋਈ ਸਰਬ ਸੁਖ ਪਾਵਏ ॥
ਇਵ ਕਹੈ ਨਾਨਕੁ ਸੋ ਬੈਰਾਗੀ ਅਨਦਿਨੁ ਹਰਿ ਲਿਵ ਲਾਵਏ ॥੨॥
ਜਹ ਜਹ ਮਨ ਤੂੰ ਧਾਵਦਾ ਤਹ ਤਹ ਹਰਿ ਤੇਰੈ ਨਾਲੇ ॥
ਮਨ ਸਿਆਣਪ ਛੋਡੀਐ ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਸਮਾਲੇ ॥
ਸਾਥਿ ਤੇਰੈ ਸੋ ਸਹੁ ਸਦਾ ਹੈ ਇਕੁ ਖਿਨੁ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਹੇ ॥
ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੇ ਤੇਰੇ ਪਾਪ ਕਟੇ ਅੰਤਿ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਵਹੇ ॥
ਸਾਚੇ ਨਾਲਿ ਤੇਰਾ ਗੰਢੁ ਲਾਗੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਦਾ ਸਮਾਲੇ ॥
ਇਉ ਕਹੈ ਨਾਨਕੁ ਜਹ ਮਨ ਤੂੰ ਧਾਵਦਾ ਤਹ ਹਰਿ ਤੇਰੈ ਸਦਾ ਨਾਲੇ ॥੩॥
ਸਤਿਗੁਰ ਮਿਲਿਐ ਧਾਵਤੁ ਥੰਮਿੑਆ ਨਿਜ ਘਰਿ ਵਸਿਆ ਆਏ ॥
ਨਾਮੁ ਵਿਹਾਝੇ ਨਾਮੁ ਲਏ ਨਾਮਿ ਰਹੇ ਸਮਾਏ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आसा महला ३ छंत घरु ३ ॥
साजन मेरे प्रीतमहु तुम सह की भगति करेहो ॥
गुरु सेवहु सदा आपणा नामु पदारथु लेहो ॥
भगति करहु तुम सहै केरी जो सह पिआरे भावए ॥
आपणा भाणा तुम करहु ता फिरि सह खुसी न आवए ॥
भगति भाव इहु मारगु बिखड़ा गुर दुआरै को पावए ॥
कहै नानकु जिसु करे किरपा सो हरि भगती चितु लावए ॥१॥
मेरे मन बैरागीआ तूं बैरागु करि किसु दिखावहि ॥
हरि सोहिला तिन॑ सद सदा जो हरि गुण गावहि ॥
करि बैरागु तूं छोडि पाखंडु सो सहु सभु किछु जाणए ॥
जलि थलि महीअलि एको सोई गुरमुखि हुकमु पछाणए ॥
जिनि हुकमु पछाता हरी केरा सोई सरब सुख पावए ॥
इव कहै नानकु सो बैरागी अनदिनु हरि लिव लावए ॥२॥
जह जह मन तूं धावदा तह तह हरि तेरै नाले ॥
मन सिआणप छोडीऐ गुर का सबदु समाले ॥
साथि तेरै सो सहु सदा है इकु खिनु हरि नामु समालहे ॥
जनम जनम के तेरे पाप कटे अंति परम पदु पावहे ॥
साचे नालि तेरा गंढु लागै गुरमुखि सदा समाले ॥
इउ कहै नानकु जह मन तूं धावदा तह हरि तेरै सदा नाले ॥३॥
सतिगुर मिलिऐ धावतु थंमि॑आ निज घरि वसिआ आए ॥
नामु विहाझे नामु लए नामि रहे समाए ॥
आसा महला ३ छंत घरु ३ ॥
साजन मेरे प्रीतमहु तुम सह की भगति करेहो ॥
गुरु सेवहु सदा आपणा नामु पदारथु लेहो ॥
भगति करहु तुम सहै केरी जो सह पिआरे भावए ॥
आपणा भाणा तुम करहु ता फिरि सह खुसी न आवए ॥
भगति भाव इहु मारगु बिखड़ा गुर दुआरै को पावए ॥
कहै नानकु जिसु करे किरपा सो हरि भगती चितु लावए ॥१॥
मेरे मन बैरागीआ तूं बैरागु करि किसु दिखावहि ॥
हरि सोहिला तिन॑ सद सदा जो हरि गुण गावहि ॥
करि बैरागु तूं छोडि पाखंडु सो सहु सभु किछु जाणए ॥
जलि थलि महीअलि एको सोई गुरमुखि हुकमु पछाणए ॥
जिनि हुकमु पछाता हरी केरा सोई सरब सुख पावए ॥
इव कहै नानकु सो बैरागी अनदिनु हरि लिव लावए ॥२॥
जह जह मन तूं धावदा तह तह हरि तेरै नाले ॥
मन सिआणप छोडीऐ गुर का सबदु समाले ॥
साथि तेरै सो सहु सदा है इकु खिनु हरि नामु समालहे ॥
जनम जनम के तेरे पाप कटे अंति परम पदु पावहे ॥
साचे नालि तेरा गंढु लागै गुरमुखि सदा समाले ॥
इउ कहै नानकु जह मन तूं धावदा तह हरि तेरै सदा नाले ॥३॥
सतिगुर मिलिऐ धावतु थंमि॑आ निज घरि वसिआ आए ॥
नामु विहाझे नामु लए नामि रहे समाए ॥
हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। आसा महला ३ छंत घरु ३ ॥ हे मेरे (सत्संगी) सज्जनो प्यारो ! तुम प्रभू पति की भक्ति सदा करते रहा करो। सदा अपने गुरू की शरण पड़े रहो (और गुरू से) सबसे कीमती चीज हरि नाम हासिल करो। (हे सज्जनो !) तुम प्रभू-पति की ही भगती करते रहो।ये भगती प्यारे प्रभू-पति को पसंद आती है। अगर (इस जीवन सफर में) तुम अपनी ही मर्जी करते रहोगे तो प्रभू-पति की प्रसन्नता तुम्हें नहीं मिलेगी।(पर। हे प्यारो !) भक्ति का और प्रेम का ये रास्ता बहुत मुश्किलों भरा है।कोई विरला मनुष्य ही ये रास्ता ढूँढता है जो गुरू के दर पर आ गिरता है। नानक कहता है,जिस मनुष्य पर प्रभू (खुद) कृपा करता है वह मनुष्य अपना मन प्रभू की भक्ति में जोड़ता है। 1। हे वैराग में आए हुए मेरे मन ! तू वैराग करके किसे दिखाता है।(इस ऊपर-ऊपर से दिखाए वैराग से तेरे अंदर आत्मिक आनंद नहीं बन सकेगा)। हे मन ! जो मनुष्य परमात्मा के गुण गाते रहते हैं।उनके अंदर सदा ही उमंग व चाव बना रहता है। हे मेरे मन ! (बाहरी दिखावे वाले वैराग का) पाखण्ड छोड़ के (और।अपने अंदर) मिलने की चाहत पैदा कर (क्योंकि) वह पति प्रभू (अंदर की) हरेक बात जानता है। वह प्रभू खुद ही जल में धरती में आकाश में (हर जगह समाया हुआ है) जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है वह उस प्रभू की रजा को समझता है। हे मेरे मन ! जिस मनुष्य ने परमात्मा की रजा समझ ली वही सारे आनंद प्राप्त करता है। नानक (तुझे) ऐसे बताता है कि इस तरह के मिलाप की चाहत रखने वाला मनुष्य हर समय प्रभू-चरणों में सुरति जोड़े रखता है। 2। हे मेरे मन ! जहाँ-जहाँ तू दौड़ता-फिरता है वहाँ-वहाँ ही परमात्मा तेरे साथ ही रहता है (अगर तू उसे अपने साथ बसा हुआ देखना चाहता है तो) हे मन ! अपनी चतुराई (का आसरा) छोड़ देना चाहिए।हे मन ! गुरू का शबद अपने अंदर संभाल के रख (फिर तुझे दिख जाएगा कि) वह पति-प्रभू सदा तेरे साथ रहता है।(हे मन !) अगर तू एक छिन के वास्ते भी परमात्मा का नाम अपने अंदर बसाए। तो तेरे अनेकों जन्मों के पाप काटे जाएं।और अंत में तू सबसे ऊँचा दर्जा हासिल कर ले। (हे मन !) गुरू की शरण पड़ के तू सदा परमात्मा को अपने अंदर बसाए रख।(इस तरह उस) सदा कायम रहने वाले परमात्मा के साथ तेरा पक्का प्यार बन जाएगा। नानक तुझे ये बताता है कि हे मन ! जहाँ-जहाँ तू भटकता फिरता है वहाँ-वहाँ परमात्मा सदा तेरे साथ ही रहता है। 3। (हे भाई !) अगर गुरू मिल जाए तो ये भटकता मन (भटकने से) रुक जाता है।ये प्रभू-चरणों में आ टिकता है। (फिर ये) परमात्मा के नाम का सौदा करता है (भाव) परमात्मा का नाम जपता रहता है।नाम में लीन रहता है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 440 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
IIT-JEE result का दिन, परिवार phones के पास बैठा।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 34 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 440” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 441 →, पीछे का: ← अंग 439।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।