॥ सलोक मः १ ॥ हउ विचि आइआ हउ विचि गइआ ॥ हउ विचि जमिआ हउ विचि मुआ ॥ हउ विचि दिता हउ विचि लइआ ॥ हउ विचि खटिआ हउ विचि गइआ ॥ हउ विचि सचिआरु कूड़िआरु ॥ हउ विचि पाप पुंन वीचारु ॥ हउ विचि नरकि सुरगि अवतारु ॥ हउ विचि हसै हउ विचि रोवै ॥ हउ विचि भरीऐ हउ विचि धोवै ॥ हउ विचि जाती जिनसी खोवै ॥ हउ विचि मूरखु हउ विचि सिआणा ॥ मोखु मुकति की सार न जाणा ॥ हउ विचि माइआ हउ विचि छाइआ ॥ हउमै करि करि जंत उपाइआ ॥ हउमै बूझै ता दरु सूझै ॥ गिआन विहूणा कथि कथि लूझै ॥ नानक हुकमी लिखीऐ लेखु ॥ जेहा वेखहि तेहा वेखु ॥१॥
॥ मः १ ॥ हउमै एहा जाति है हउमै करमु कमाहि ॥ हउमै एयी बंधना फिरि फिरि जोनी पाहि ॥ हउमै किथहु ऊपजै किति संजमि इह जाइ ॥ हउमै एहो हुकमु है पइऐ किरति फिराहि ॥ हउमै दीरघ रोगु है दारू भी इसु माहि ॥ किरपा करे जे आपणी ता गुर का सबदु कमाहि ॥ नानकु कहै सुणहु जनहु इतु संजमि दुख जाहि ॥२॥
दूसरा सलोक भी अहंकार पर focus है, मगर इसमें cure भी है।
“हउमै एहा जाति है।” अहंकार ही “जाति” है। यानी हम सब की “जाति” एक है, अहंकार। यह नानक का radical statement है कि असली division caste में नहीं, अहंकार में है।
“हउमै करमु कमाहि।” अहंकार में ही “कर्म” करते हैं। और “हउमै एयी बंधना।” अहंकार ही “बँधन” है। “फिरि फिरि जोनी पाहि।” बार-बार “जोनि” (born again) में पड़ते हैं।
rebirth का mechanism यहाँ बहुत clear है, अहंकार से कर्म, कर्म से बँधन, बँधन से पुनर्जन्म।
फिर एक important question: “हउमै किथहु ऊपजै, किति संजमि इह जाइ।” अहंकार कहाँ से पैदा होता है, कौनसे “संजम” (अनुशासन) से जाता है?
यह real philosophical inquiry है। कुछ नहीं assume कर रहे।
जवाब: “हउमै एहो हुकमु है।” यह अहंकार “हुकम” है। यानी पूरी system यही है, हम अहंकार में पैदा होते हैं। “पइऐ किरति फिराहि।” अपने “कर्म” (karma) के मुताबिक़ “फिरते” हैं।
फिर सबसे important line: “हउमै दीरघ रोगु है, दारू भी इसु माहि।” अहंकार “दीर्घ रोग” (chronic disease) है, मगर “दारू” (medicine) भी इसी के “माहि” (अंदर) है।
यह बहुत precise medical-spiritual statement है। बीमारी और इलाज दोनों एक ही जगह बैठे हैं। यानी अहंकार ही problem है, और अहंकार के साथ honest होना ही solution।
“किरपा करे जे आपणी, ता गुर का सबदु कमाहि।” अगर वो (हरि) कृपा करें, तो गुरु का “शबद कमाते” हैं।
यानी ख़ुद के effort से नहीं, कृपा से। और कृपा का sign यह है कि गुरु के शबद में attraction पैदा होती है।
“नानकु कहै सुणहु जनहु, इतु संजमि दुख जाहि।” नानक कहते हैं, सुनो लोगो, इसी “संजम” से दुख जाते हैं।
दिल्ली में हम सब “stress management,” “anger management,” “ego management” सीख रहे हैं। नानक 500 साल पहले बता गए, अहंकार को “manage” नहीं करना है। उसको “observe” करना है, गुरु-शबद के through। तब वो ख़ुद से ढीला पड़ता है।
॥ पउड़ी ॥ सेव कीती संतोखीईं जिनी सचो सचु धिआइआ ॥ ओनी मंदै पैरु न रखिओ करि सुक्रितु धरमु कमाइआ ॥ ओनी दुनीआ तोड़े बंधना अंनु पाणी थोड़ा खाइआ ॥ तूं बखसीसी अगला नित देवहि चड़हि सवाइआ ॥ वडिआई वडा पाइआ ॥४॥
पौड़ी 4 एक positive portrait बना रही है। उन लोगों का जो “संतोखी” हैं।
“सेव कीती संतोखीईं।” सेवा “संतोषियों” ने की। “जिनी सचो सचु धिआइआ।” जिन्होंने “सच” का “सच” ध्याया।
“संतोख” (contentment) शब्द key है। यानी जिनको “और चाहिए, और चाहिए” वाली mentality से बाहर निकलना आ गया।
“ओनी मंदै पैरु न रखिओ।” उन्होंने “मंदे” (बुरे) पर पैर नहीं रखा। “करि सुक्रितु धरमु कमाइआ।” “सुकृति” (अच्छे कर्म) और “धर्म” “कमाया।”
नानक एक specific behavior pattern describe कर रहे हैं। संतोषी आदमी बुरे कामों से ख़ुद distance रखता है। यह moralistic command नहीं, यह observation है।
“ओनी दुनीआ तोड़े बंधना।” उन्होंने “दुनिया के बँधन तोड़े।” “अंनु पाणी थोड़ा खाइआ।” “अन्न-पानी थोड़ा खाया।”
simplicity की prescription। consumption कम, freedom ज़्यादा।
“तूं बखसीसी अगला।” तू “बख़्शीश” (दान) देने वाला सबसे आगे है। “नित देवहि चड़हि सवाइआ।” रोज़ देता है, बढ़ता जाता है।
यह paradox है। संतोषी जो “कम” लेते हैं, उन्हें हरि “ज़्यादा” देता है। और हरि की देन का supply ख़त्म नहीं होता।
“वडिआई वडा पाइआ।” “बड़े” को “वडिआई” (greatness) पाई। यानी हरि की वडिआई जानने वाला आदमी, ख़ुद भी वडा हो जाता है। यह spiritual osmosis है।
दिल्ली में आज bear “lifestyle minimalism” का trend है। मगर वो mostly aesthetic है। नानक 500 साल पहले genuine version बता गए, “थोड़ा खाना” साथ “बहुत देना।” यह संतोष की definition है।
यह सलोक नानक का सबसे famous “हउमै” (अहंकार) analysis है। 18 लाइनें, हर एक में “हउ विचि” यानी “मैं में।”
हर पंक्ति एक different aspect बता रही है। “हउ विचि आइआ, हउ विचि गइआ।” अहंकार में आया, अहंकार में गया। यह birth-death cycle है।
“हउ विचि जमिआ, हउ विचि मुआ।” जन्म लिया अहंकार में, मरा अहंकार में।
फिर daily activities: “दिता-लइआ” (देना-लेना), “खटिआ-गइआ” (कमाया-गँवाया), “हसै-रोवै” (हँसना-रोना), “भरीऐ-धोवै” (भरना-धोना)।
फिर social positions: “सचिआरु-कूड़िआरु” (सच्चा-झूठा), “जाती जिनसी” (caste-वर्ण), “मूरखु-सिआणा” (मूर्ख-समझदार)।
फिर moral judgments: “पाप-पुंन” (पाप-पुण्य), “नरकि-सुरगि” (नरक-स्वर्ग)।
नानक एक exhaustive list बना रहे हैं। हम कितना भी सोचें, हर activity, हर judgment, हर category, सब “अहंकार” के अंदर है।
“माइआ” (illusion) भी अहंकार में, “छाइआ” (shadow) भी अहंकार में।
“हउमै करि करि जंत उपाइआ।” अहंकार ही ने “जंत” (जीवों) को बनाया। यानी individual identity अहंकार से ही पैदा होती है।
अब solution: “हउमै बूझै ता दरु सूझै।” अहंकार को “बूझे” (समझे, पहचाने), तब “द्वार” (way) “सूझे” (दिखे)।
यह pivot है। अहंकार को मारना नहीं, उसको “देखना” है। जब आप अपने अहंकार को observe करते हो, उसी moment उसका grip ढीला होता है।
“गिआन विहूणा कथि कथि लूझै।” ज्ञान-विहीन कह-कह कर “लूझता” (जलता, struggle करता) है। यानी जो आदमी अहंकार को observe नहीं कर पाता, वो बस बातें करता रहता है, और अंदर ही अंदर जलता है।
“नानक हुकमी लिखीऐ लेखु।” नानक कहते हैं, हुकम से ही “लेख” लिखा जाता है। “जेहा वेखहि तेहा वेखु।” जैसा देखोगे, वैसा होगा।
closing वाली बात बहुत powerful है। यदि अहंकार से देखोगे, अहंकार-ग्रस्त दुनिया दिखेगी। यदि “देखने” को observe करना सीखोगे, असली reality दिखेगी।
दिल्ली में हम सब “self-improvement” में busy हैं। और अधिकतर “improvement” अहंकार को मज़बूत करती है। नानक कह रहे हैं, यह सबसे subtle trap है। बस “देखो,” अहंकार ख़ुद कमज़ोर होगा।