॥ सलोक मः १ ॥ नानक गुरु न चेतनी मनि आपणै सुचेत ॥ छुटे तिल बूआड़ जिउ सुंञे अंदरि खेत ॥ खेतै अंदरि छुटिआ कहु नानक सउ नाह ॥ फलीअहि फुलीअहि बपुड़े भी तन विचि सुआह ॥१॥
॥ मः १ ॥ चरे पहिरुआ जागै हुआ जिसु लागै सबदु ॥ नदरी रोग न पवै आचारी सिरि गुरमुखि सबदु ॥२॥
दूसरा सलोक भी M1 का। एक watchful image: “चरे पहिरुआ जागै हुआ।” चार पहर (24 घंटे के 4 भाग) “पहरुआ” (पहरेदार) जागा हुआ हो।
यानी जिसके अंदर 24 घंटे एक “चौकीदार” जाग रहा है। यह सिमरण की state है।
“जिसु लागै सबदु।” जिसको “शबद” (गुरु-वाणी) लग गई।
नानक कह रहे हैं, real सतर्कता शबद के साथ आती है। शबद ही inner alarm bell है, जो याद दिलाता रहता है।
“नदरी रोग न पवै।” “नज़र” का रोग नहीं पड़ता। यानी “नज़र-दोष,” “envious eye,” “बुरी नज़र,” ये सब नहीं लगते।
दिल्ली में लोग आज भी “नज़र” से डरते हैं। काला धागा, नींबू-मिर्च, etc. नानक एक different protection बता रहे हैं, अंदर शबद का होना।
“आचारी सिरि गुरमुखि सबदु।” “आचार” (conduct) के सिर पर, गुरमुख (गुरु-orientations) का शबद होना चाहिए।
यानी हर action के पीछे एक guiding principle चाहिए, और वो principle गुरु से आना चाहिए।
॥ पउड़ी ॥ नाइ मंनिऐ पति ऊपजै सालाही सचु सूतु ॥ दरगह अंदरि पाईऐ तगु न तूटसि पूत ॥ नाइ मंनिऐ सुखु पाइआ ता दूख न लागहि देहि ॥ नदरी पावै कूकरु सुणि कै नदरी पावै देहि ॥ राजे हिकमति केहीआ करि करि नाम चलावनि ॥ तेरै हुकमु बिनु लखु लखु नकती के दान दिवावनि ॥३॥
पौड़ी 3 का mood सामाजिक है। नानक “name” और “authority” पर बात कर रहे हैं।
“नाइ मंनिऐ पति ऊपजै।” “नाम” मानने से “पति” (इज़्ज़त) पैदा होती है। “सालाही सचु सूतु।” सच की प्रशंसा एक “सूत” (धागा) है।
जनेऊ की reference है। हिन्दू tradition में “सूत” (sacred thread, यज्ञोपवीत) एक status symbol है। नानक एक नया “सूत” propose कर रहे हैं, सच की प्रशंसा का धागा।
“दरगह अंदरि पाईऐ तगु न तूटसि पूत।” “दरगाह” (divine court) में पाया जाएगा “तग” (धागा) जो “नहीं टूटेगा।” “पूत” (पुत्र, या protected one)।
यानी पारंपरिक जनेऊ शरीर पर है, टूट सकता है। मगर सच का धागा divine court में valid है, टूटेगा नहीं।
“नदरी पावै कूकरु सुणि कै नदरी पावै देहि।” “नदर” (कृपा-दृष्टि) मिलती है, “कूकरु” (कुत्ता) भी सुनकर “देहि” (शरीर, या प्राप्त) पा लेता है।
यह radical है। नानक कह रहे हैं, हरि की कृपा-दृष्टि class-based नहीं। यदि कुत्ता भी “सुनता” है, उसको भी मिल सकता है। यह बहुत inclusive theology है।
“राजे हिकमति केहीआ करि करि नाम चलावनि।” राजा “हिकमत” (clever schemes) कर के कैसे-कैसे “नाम चलाते” हैं।
राजा अपना “नाम” famous करने के लिए कितने scheme बनाते हैं। मगर…
“तेरै हुकमु बिनु लखु लखु नकती के दान दिवावनि।” तेरे हुकम के बिना, लाख-लाख “नकटी” (नक-कटी, disgraced) के दान भी “दिवाते” हैं।
यानी हरि के हुकम के बिना, राजा कितने ही दान करवा लें, उनके दान “disgraceful” हैं।
दिल्ली में हम सब बहुत “philanthropy” देखते हैं। CSR, donation, बड़े-बड़े events। नानक 500 साल पहले pointed बात कर रहे हैं, हरि की मर्ज़ी नहीं, तो सब show है।
॥ सलोक मः १ ॥ सिख मती बाहरा रवदा रहै दरीआउ ॥ तीरथु पुरबु न मंनई आपहु सुधा खवाउ ॥ नानक अंधा होइ कै दसे राहै सभसु मुहाए साथि ॥ अगै गइआ मुहे मुहि पाहि सु ऐसा आगू जापै ॥१॥
और यह सलोक। आसा की वार के सबसे famous सलोकों में से एक।
“सिख मती बाहरा।” “शिक्षा” (सीख) और “मती” (बुद्धि) से “बाहर” (outside, बिना)। “रवदा रहै दरीआउ।” मगर “दरिया” की तरह “बहता” रहता है।
यानी कोई आदमी है जिसके पास न genuine सीख है, न समझ। मगर वो धाराप्रवाह बोलता है, खाली बातें।
“तीरथु पुरबु न मंनई।” तीर्थ, पर्व, कुछ नहीं मानता। “आपहु सुधा खवाउ।” अपने आप को “सुधा” (शुद्ध) “खवाता” (बताता) है।
यह religious phony का portrait है। बाहर से बहुत स्वच्छ-सा दिखता है, मगर अंदर…
फिर एक devastating line: “नानक अंधा होइ कै दसे राहै।” अंधा होकर रास्ता बताता है।
यह सबसे sharp critique है। एक आदमी जिसके पास ख़ुद वृषद नहीं, “guru” बन रहा है, दूसरों को “रास्ता” बता रहा है।
“सभसु मुहाए साथि।” साथ चलने वाले सब को “मुहाए” (लूटा गया, ठगा गया)।
मतलब अंधा गाइड पूरी party को gutter में ले जाता है। यह सबसे dangerous situation है, क्योंकि सब “रास्ता” trust कर के चल रहे हैं।
“अगै गइआ मुहे मुहि पाहि।” आगे गए, “मुँह पर मुँह” (face to face confrontation, या मुँह के बल) “पाते” हैं।
यानी final destination पर, अंधा गाइड भी, और उसके followers भी, “मुँह के बल” गिरते हैं।
“सु ऐसा आगू जापै।” ऐसा “आगू” (leader) पहचान में आता है।
दिल्ली के context में: यह सबसे relevant critique है आज भी। हर field में, हर sphere में, “self-styled” gurus, coaches, leaders, जो ख़ुद unclear हैं, मगर बड़े confident हो कर दूसरों को रास्ता दिखा रहे हैं।
spiritual world में भी same problem है। नानक कह रहे हैं, ऐसे “अंधे गुरुओं” से बच कर रहो। और अगर ख़ुद किसी position में हो, तो ख़ुद से पूछो, “क्या मैंने सच में रास्ता देखा है? या मैं भी अंधा हूँ?”
नानक एक खेत का image use कर रहे हैं। “छुटे तिल बूआड़ जिउ।” जैसे “तिल” (sesame seeds) “बूआड़” (वीरान, बंजर खेत में, या abandoned तिल) “छूटे” हुए हैं।
यानी खेत में कुछ तिल हैं, मगर किसान ध्यान नहीं देता। वो छूटे हुए, अकेले उगते रहते हैं।
“सुंञे अंदरि खेत।” “सूना” (खाली, अनदेखा) खेत के अंदर।
फिर एक interesting line: “खेतै अंदरि छुटिआ कहु नानक सउ नाह।” खेत में छूटे हुए (अनदेखे), नानक कहते हैं, “सौ नाह” (एक सौ नाह – sense unclear, possibly “सौ बार स्वामी”)। यानी जैसे एक उपेक्षित बीज, सौ बार “स्वामी” को याद करे, फिर भी कुछ नहीं।
“फलीअहि फुलीअहि बपुड़े।” “बपुड़े” (बेचारे) फलते-फूलते हैं। “भी तन विचि सुआह।” मगर शरीर के अंदर “सुआह” (राख) ही है।
यह metaphor harsh है। नानक उन लोगों के बारे में बोल रहे हैं जो ख़ुद को “सुचेत” (आत्म-निर्भर) समझते हैं, गुरु को नहीं याद करते। वो खेत में छूटे हुए तिल जैसे हैं, बाहर से दिखते हैं फले-फूले, मगर अंदर ख़ाली।
दिल्ली में हम सब “self-made” बनना चाहते हैं। मगर नानक कह रहे हैं, अगर “गुरु” (आदर्श, guidance) से connection नहीं, तो बाहर का फूलना भी राख है।