आसा-दी-वार का हिस्सा। पूरी 24 पउड़ियों की commentary /asa-di-vaar/ पर है।
महला 2 ॥ जे सउ चंदा उगवहि सूरज चड़हि हजार ॥ एते चानण होदिआं गुर बिनु घोर अंधार ॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: महला 2॥ यदि (एक) सौ चंद्रमा चढ़ जाएं और हजार सूरज चढ़ जाएं। और इतने प्रकाश के बावजूद (भाव।प्रकाश करने वाले जितने भी ग्रह सूर्य व चंद्रमा अपनी रोशनी देने लगें।पर) गुरू के बिना (फिर भी) घोर अंधकार ही है। 2।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ हे नानक ! (जो मनुष्य) गुरू को याद नहीं करते अपने आप में चतुर (बने हुए) हैं। वे ऐसे हैं जैसे किसी सूंने खेत में अंदर से जले हुए तिल पड़े हुए हैं जिनका कोई मालिक नहीं बनता। हे नानक ! (बेशक) कह कि खेत के मालिकाना बगैर पड़े हुए (निखसमें) उन बुआड़ के तिलों के सौ खसम हैं। वे विचारे फूलते हैं (भाव।उनमें फल भी लगते हैं)।फलते भी हैं।फिर भी उनके तन में (भाव।उनकी फली में तिलों की जगह) राख ही होती है। नोट।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ अकाल-पुरख ने अपने आप ही खुद को साजा (बनाया)।और खुद ही अपने आप को प्रसिद्ध किया। फिर उसने कुदरत रची (और उस में) आसन जमा के (भाव।कुदरत में व्यापक हो के।इस जगत का) खुद तमाशा देखने लग पड़ा। (हे प्रभू !) आप खुद ही (जीवों को) दातें देने वाला है और स्वयं ही (इनको बनाने वाला है।(आप) खुद ही प्रसन्न हैं के (जीवों को) देता है और बख्शिशें करता है। तु सब जीवों के जीओं की जानने वाला है।जिंद और शरीर दे कर (आप खुद ही) ले लेगा (भाव।आप खुद ही जीवात्मा और उसका लिबास शरीर देता है।खुद वापस ले लेता है)। आप (कुदरति में) आसन जमा के तमाशा देख रहा है। 1।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ हे सच्चे पातशाह ! आपके (पैदा किए हुए) खंड और ब्रहमंड सच्चे हैं (भाव।खंड और ब्रहमण्ड साजने वाला आपका ये सिलसिला सदा के लिए अटॅल है)। आपके (द्वारा बनाए हुए चौदह) लोक और (ये बेअंत) आकार भी सदा स्थिर रहने वाले हैं; आपके काम और सारी विरासतें नाश-रहित हैं। हे पातशाह ! आपकी बादशाही और आपका दरबार अटॅल हैं। आपका हुकम और आपका (शाही) फुरमान भी अटॅल हैं। आपकी बख्शिश सदा के लिए स्थिर है।और आपकी बख्शिशों के निशान भी (भाव।ये बेअंत पदार्थ जो आप जीवों को दे रहा है) सदा के वास्ते कायम हैं। लाखों-करोड़ों जीव।जो आपको सिमर रहे हैं।सच्चे हैं (भाव।बेअंत जीवों का आपको सिमरना- ये भी आपका एक ऐसा चलाया हुआ काम है जो सदा के लिए स्थिर है)। (ये खंड-ब्रहमंड-लोक-आकार-जीव जंतु आदि) सारे ही सच्चे हरी के ताण और जोर में हैं (भाव।इन सबकी हस्ती।सबका आसरा प्रभू खुद ही है)। आपकी सिफत-सालाह करनी आपका एक अॅटल सिलसिला है; हे सच्चे पातशाह ! ये सारी रचना ही आपका एक ना समाप्त होने वाला प्रबंध है। हे नानक ! जो जीव उस अविनाशी प्रभू को सिमरते हैं।वे भी उसका रूप हैं; पर जो जनम-मरन के चक्कर में पड़े हुए हैं।वे (अभी) बिल्कुल कच्चे हैं (भाव।उस असल जोति का रूप नहीं हुए)। 1।
मः 1 ॥ वडी वडिआई जा वडा नाउ ॥ वडी वडिआई जा सचु निआउ ॥ वडी वडिआई जा निहचल थाउ ॥ वडी वडिआई जाणै आलाउ ॥ वडी वडिआई बुझै सभि भाउ ॥ वडी वडिआई जा पुछि न दाति ॥ वडी वडिआई जा आपे आपि ॥ नानक कार न कथनी जाइ ॥ कीता करणा सरब रजाइ ॥2॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ उस प्रभू की सिफत नहीं की जा सकती जिसका बहुत नाम है (बहुत यशष्वी है)। प्रभू का एक ये बड़ा गुण है कि उसका नाम (सदा) अटॅल है। उसकी ये एक बड़ी सिफत है कि उसका आसन अडोल है। प्रभू की ये एक बड़ी वडिआई है कि वह सारे जीवों की अरदासों को जानता है और वह सभी के दिलों के भावों को समझता है। ईश्वर की ये एक महानता है कि वह किसी की सलाह ले के (जीवों को) दातें नहीं दे रहा (अपने आप बेअंत दातें बख्शता है) (क्योंकि) उस जैसा और कोई नहीं। हे नानक ! ईश्वर की कुदरति बयान नहीं की जा सकती। सारी रचना उसने अपने हुकम में रची है। 2।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: महला 2॥ ये जगत प्रभू के रहने की जगह है।प्रभू इसमें बस रहा है। कई जीवों को अपने हुकम अनुसार (इस संसार-सागर में से बचा के) अपने चरणों में जोड़ लेता है और कई जीवों को अपने हुकम अनुसार ही इसमें डुबो देता है। कई जीवों को अपनी रजा अनुसार माया के मोह में से निकाल लेता है।कईयों को इसी में फसाए रखता है। ये बात भी बताई नहीं जा सकती कि रॅब किस का बेड़ा पार करता है। हे नानक ! जिस (भाग्यशाली) मनुष्य को प्रकाश बख्शता है।उसको गुरू के द्वारा समझ पड़ जाती है। 3।
पउड़ी ॥ नानक जीअ उपाइ कै लिखि नावै धरमु बहालिआ ॥ ओथै सचे ही सचि निबड़ै चुणि वखि कढे जजमालिआ ॥ थाउ न पाइनि कूड़िआर मुह काल॑ै दोजकि चालिआ ॥ तेरै नाइ रते से जिणि गए हारि गए सि ठगण वालिआ ॥ लिखि नावै धरमु बहालिआ ॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे नानक ! जीवों को पैदा करके परमात्मा ने धर्म-राज को (उनके सिर पर) मुकरॅर किया हुआ है कि जीवों के किए कर्मों का लेखा लिखता रहे। धर्मराज की कचहरी में निरोल सत्य द्वारा (जीवों के कर्मों का) निबेड़ा होता है (भाव।वहां निर्णय का माप ‘निरोल सच’ है।जिनके पल्ले ‘सच’ होता है उनको आदर मिलता है और) बुरे कामों वाले जीव चुन के अलग कर दिए जाते हैं। झूठ-ठॅगी करने वाले जीवों को वहाँ ठिकाना नहीं मिलता; काला मुंह करके उन्हें नरक में धकेल दिया जाता है। (हे प्रभू !) जो मनुष्य आपके नाम में रंगे हुए हैं।वे (यहाँ से) बाजी जीत के जाते हैं और ठॅगी करने वाले बंदे (मानस जनम की बाजी) हार के जाते हैं। (तूने हे प्रभू !) धर्म-राज को (जीवों के किए कर्मों का) लेखा लिखने के लिए (उन पर) नियुक्त किया हुआ है। 2।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ कई नाद और कई वेद; बेअंत जीव और जीवों के कई भेद; जीवों के व अन्य पदार्थों के कई रूप और कई रंग – ये सब कुछ देख के विस्माद अवस्था बन रही है। कई जंतु (सदा) नंगे ही घूम रहे हैं;
आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “महला 2॥ यदि (एक) सौ चंद्रमा चढ़ जाएं और हजार सूरज चढ़ जाएं।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।