अंग 387

अंग
387
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਰਾਮ ਰਾਮਾ ਰਾਮਾ ਗੁਨ ਗਾਵਉ ॥
ਸੰਤ ਪ੍ਰਤਾਪਿ ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗੇ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਵਉ ਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਗਲ ਸਮਗ੍ਰੀ ਜਾ ਕੈ ਸੂਤਿ ਪਰੋਈ ॥
ਘਟ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਰਵਿਆ ਸੋਈ ॥੨॥
ਓਪਤਿ ਪਰਲਉ ਖਿਨ ਮਹਿ ਕਰਤਾ ॥
ਆਪਿ ਅਲੇਪਾ ਨਿਰਗੁਨੁ ਰਹਤਾ ॥੩॥
ਕਰਨ ਕਰਾਵਨ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥
ਅਨੰਦ ਕਰੈ ਨਾਨਕ ਕਾ ਸੁਆਮੀ ॥੪॥੧੩॥੬੪॥
राम रामा रामा गुन गावउ ॥
संत प्रतापि साध कै संगे हरि हरि नामु धिआवउ रे ॥१॥ रहाउ ॥
सगल समग्री जा कै सूति परोई ॥
घट घट अंतरि रविआ सोई ॥२॥
ओपति परलउ खिन महि करता ॥
आपि अलेपा निरगुनु रहता ॥३॥
करन करावन अंतरजामी ॥
अनंद करै नानक का सुआमी ॥४॥१३॥६४॥

हिन्दी अर्थ: मैं परमातमा के सुंदर गुण गाता रहता हूँ। हे भाई ! गुरू के बख्शे प्रताप की बरकति से गुरू की संगति में रहके मैं सदा परमात्मा का नाम सिमरता रहता हूँ 1।रहाउ। (हे भाई ! गुरू के बख्शे प्रताप की बरकति से मुझे यह निश्चय है कि) जिस (की रजा) के धागे में सारे पदार्थ परोए हुए हैं। वह परमात्मा ही हरेक शरीर के अंदर बस रहा है2। (हे भाई ! गुरू की संगति में टिके रहने के सदका अब मैं जानता हूँ कि) परमात्मा एक पल में सारे जगत की उत्पत्ति और नाश कर सकता है। (सारे जगत में व्यापक होता हुआ भी) प्रभू स्वयं सबसे अलग रहता है और माया के तीन गुणों के प्रभाव से मुक्त है। 3। (हे भाई ! गुरू के प्रताप की बरकति से मुझे ये यकीन बन गया है कि) हरेक के दिल की जानने वाला परमात्मा (सब में व्यापक हो के) सब कुछ करने व जीवों से करवाने की स्मर्था रखता है ( इतनाव्यस्त होते हुए भी) मुझ नानक का पति-प्रभू सदा प्रसन्न रहता है। 4। 13। 64।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਕੋਟਿ ਜਨਮ ਕੇ ਰਹੇ ਭਵਾਰੇ ॥
ਦੁਲਭ ਦੇਹ ਜੀਤੀ ਨਹੀ ਹਾਰੇ ॥੧॥
ਕਿਲਬਿਖ ਬਿਨਾਸੇ ਦੁਖ ਦਰਦ ਦੂਰਿ ॥
ਭਏ ਪੁਨੀਤ ਸੰਤਨ ਕੀ ਧੂਰਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕੇ ਸੰਤ ਉਧਾਰਨ ਜੋਗ ॥
ਤਿਸੁ ਭੇਟੇ ਜਿਸੁ ਧੁਰਿ ਸੰਜੋਗ ॥੨॥
ਮਨਿ ਆਨੰਦੁ ਮੰਤ੍ਰੁ ਗੁਰਿ ਦੀਆ ॥
ਤ੍ਰਿਸਨ ਬੁਝੀ ਮਨੁ ਨਿਹਚਲੁ ਥੀਆ ॥੩॥
ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਨਉ ਨਿਧਿ ਸਿਧਿ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਤੇ ਪਾਈ ਬੁਧਿ ॥੪॥੧੪॥੬੫॥
आसा महला ५ ॥
कोटि जनम के रहे भवारे ॥
दुलभ देह जीती नही हारे ॥१॥
किलबिख बिनासे दुख दरद दूरि ॥
भए पुनीत संतन की धूरि ॥१॥ रहाउ ॥
प्रभ के संत उधारन जोग ॥
तिसु भेटे जिसु धुरि संजोग ॥२॥
मनि आनंदु मंत्रु गुरि दीआ ॥
त्रिसन बुझी मनु निहचलु थीआ ॥३॥
नामु पदारथु नउ निधि सिधि ॥
नानक गुर ते पाई बुधि ॥४॥१४॥६५॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई ! जिनको संत जनों की चरण-धूड़ प्राप्त हुई।उनके) करोड़ों जन्मों के चक्कर खत्म हो गए। उन्होंने मुश्किल से मिले इस मानस जनम की बाजी जीत ली।(उन्होंने माया के हाथों) हार नहीं खाई। 1। (हे भाई ! उनके सारे) पाप नष्ट हो गए, दुख कलेश दूर हो गए। जिन अति भाग्यशाली मनुष्यों को) संत जनों की चरण धूड़ (मिल गई वह) पवित्र जीवन वाले हो गए। 1।रहाउ। (हे भाई !) परमात्मा की भक्ति करने वाले संत-जन औरों को भी विकारों से बचाने की स्मर्था रखते हैं। पर संत-जन मिलते सिर्फ उस मनुष्य को ही हैं जिसके भाग्यों में धुर-दरगाह से मिलाप के लेख लिखे होते हैं। 2। (हे भाई ! जिस मनुष्य को) गुरू ने उपदेश दे दिया उसके मन में (सदा) आनंद बना रहता है। (उसके अंदर से माया की) तृष्णा (की आग) बुझ जाती है।उसका मन (माया के हमलों के मुकाबले में) डोलने से हट जाता है। 3। उसे सबसे कीमती पदार्थ परमात्मा का नाम मिल जाता है, दुनिया के सारे नौ खजाने मिल जाते हैं और करामाती ताकतें प्राप्त हो जाती हैं (भाव।उसे दुनिया के धन-पदार्थ और रिद्धियों-सिद्धियों की लालसा नहीं रह जाती)। हे नानक ! जिस मनुष्य ने गुरू से (सही आत्मिक जीवन की) सूझ प्राप्त कर ली4। 14। 65।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮਿਟੀ ਤਿਆਸ ਅਗਿਆਨ ਅੰਧੇਰੇ ॥
ਸਾਧ ਸੇਵਾ ਅਘ ਕਟੇ ਘਨੇਰੇ ॥੧॥
ਸੂਖ ਸਹਜ ਆਨੰਦੁ ਘਨਾ ॥
ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਤੇ ਭਏ ਮਨ ਨਿਰਮਲ ਹਰਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸੁਨਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬਿਨਸਿਓ ਮਨ ਕਾ ਮੂਰਖੁ ਢੀਠਾ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕਾ ਭਾਣਾ ਲਾਗਾ ਮੀਠਾ ॥੨॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਕੇ ਚਰਣ ਗਹੇ ॥
ਕੋਟਿ ਜਨਮ ਕੇ ਪਾਪ ਲਹੇ ॥੩॥
ਰਤਨ ਜਨਮੁ ਇਹੁ ਸਫਲ ਭਇਆ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਕਰੀ ਮਇਆ ॥੪॥੧੫॥੬੬॥
आसा महला ५ ॥
मिटी तिआस अगिआन अंधेरे ॥
साध सेवा अघ कटे घनेरे ॥१॥
सूख सहज आनंदु घना ॥
गुर सेवा ते भए मन निरमल हरि हरि हरि हरि नामु सुना ॥१॥ रहाउ ॥
बिनसिओ मन का मूरखु ढीठा ॥
प्रभ का भाणा लागा मीठा ॥२॥
गुर पूरे के चरण गहे ॥
कोटि जनम के पाप लहे ॥३॥
रतन जनमु इहु सफल भइआ ॥
कहु नानक प्रभ करी मइआ ॥४॥१५॥६६॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई ! जो मनुष्य हरी नाम सुनते हैं उनके अंदर से पहले) अज्ञानता के अंधेरे के कारण पैदा हुई माया की तृष्णा मिट जाती है। गुरू की (बताई) सेवा के कारण उनके अनेकों ही पाप कट जाते हैं। 1। उन्हें बड़ा सुख आनंद प्राप्त होता है (उनके अंदर) आत्मिक अडोलता बनी रहती है। (हे भाई ! जो मनुष्य) सदा परमात्मा का नाम सुनते रहते हैं (सिफत सालाह करते सुनते रहते हैं) गुरू द्वारा बताई (इस) सेवा की बरकति से उनके मन पवित्र हो जाते हैं। 1।रहाउ। (हे भाई ! हरि नाम सुनने वालों के) मन की मूर्खता और ढीठता नाश हो जाती है। उन्हें परमात्मा की रजा प्यारी लगने लग पड़ती है (फिर वे उस रजा के आगे अड़ते नहीं।जैसे पहले मूर्खता के कारण अड़ते थे)। 2। (हे भाई !) जिन लोगों ने पूरे गुरू के चरण पकड़ लिए हैं उनके (पिछले) करोड़ों जन्मों के किए पाप उतर जाते हैं। 3। उनका ये कीमती मानस जनम कामयाब हो जाता है – (हे नानक !) कह, (जिन मनुष्यों पर) परमात्मा ने (अपने नाम के दाति की) मेहर की । 4। 15। 16।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਅਪਨਾ ਸਦ ਸਦਾ ਸਮੑਾਰੇ ॥
ਗੁਰ ਕੇ ਚਰਨ ਕੇਸ ਸੰਗਿ ਝਾਰੇ ॥੧॥
ਜਾਗੁ ਰੇ ਮਨ ਜਾਗਨਹਾਰੇ ॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਅਵਰੁ ਨ ਆਵਸਿ ਕਾਮਾ ਝੂਠਾ ਮੋਹੁ ਮਿਥਿਆ ਪਸਾਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰ ਕੀ ਬਾਣੀ ਸਿਉ ਰੰਗੁ ਲਾਇ ॥
ਗੁਰੁ ਕਿਰਪਾਲੁ ਹੋਇ ਦੁਖੁ ਜਾਇ ॥੨॥
ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਦੂਜਾ ਨਾਹੀ ਥਾਉ ॥
ਗੁਰੁ ਦਾਤਾ ਗੁਰੁ ਦੇਵੈ ਨਾਉ ॥੩॥
ਗੁਰੁ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਪਰਮੇਸਰੁ ਆਪਿ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਜਾਪਿ ॥੪॥੧੬॥੬੭॥
आसा महला ५ ॥
सतिगुरु अपना सद सदा सम॑ारे ॥
गुर के चरन केस संगि झारे ॥१॥
जागु रे मन जागनहारे ॥
बिनु हरि अवरु न आवसि कामा झूठा मोहु मिथिआ पसारे ॥१॥ रहाउ ॥
गुर की बाणी सिउ रंगु लाइ ॥
गुरु किरपालु होइ दुखु जाइ ॥२॥
गुर बिनु दूजा नाही थाउ ॥
गुरु दाता गुरु देवै नाउ ॥३॥
गुरु पारब्रहमु परमेसरु आपि ॥
आठ पहर नानक गुर जापि ॥४॥१६॥६७॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे मन ! अपने सतिगुरू को सदा ही (अपने अंदर) संभाल के रख। (हे भाई !) गुरू के चरणों को अपने केसों से झाड़ा कर (गुरू-दर पर विनम्रता से पड़ा रह)। 1। हे जागने योग्य मन ! (माया के मोह की नींद में से) सुचेत हो। परमात्मा के नाम के बिना और कोई (पदार्थ) तेरे काम नहीं आएगा।(परिवार का) मोह और (माया का) पसारा ये कोई भी साथ निभाने वाले नहीं हैं। 1।रहाउ। (हे भाई !) सतिगुरू की बाणी से प्यार जोड़। जिस मनुष्य पर गुरू दयावान होता है उसका हरेक दुख दूर हो जाता है। 2। (हे भाई !) गुरू के बिना और कोई जगह नहीं (जहाँ माया के मोह की नींद में सोए मन को जगाया जा सके)। गुरू (परमात्मा का) नाम बख्शता है।गुरू नाम की दाति देने के समर्थ है (नाम की दाति दे के सोए हुए मन को जगा देता है)। 3। गुरू पारब्रहम (का रूप) है गुरू परमेश्वर (का रूप) है। हे नानक ! (कह,हे भाई !) आठों पहर (हर वक्त) गुरू को याद रख।4। 16। 67।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਆਪੇ ਪੇਡੁ ਬਿਸਥਾਰੀ ਸਾਖ ॥
ਅਪਨੀ ਖੇਤੀ ਆਪੇ ਰਾਖ ॥੧॥
ਜਤ ਕਤ ਪੇਖਉ ਏਕੈ ਓਹੀ ॥
ਘਟ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਆਪੇ ਸੋਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਆਪੇ ਸੂਰੁ ਕਿਰਣਿ ਬਿਸਥਾਰੁ ॥
ਸੋਈ ਗੁਪਤੁ ਸੋਈ ਆਕਾਰੁ ॥੨॥
ਸਰਗੁਣ ਨਿਰਗੁਣ ਥਾਪੈ ਨਾਉ ॥
ਦੁਹ ਮਿਲਿ ਏਕੈ ਕੀਨੋ ਠਾਉ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰਿ ਭ੍ਰਮੁ ਭਉ ਖੋਇਆ ॥
ਅਨਦ ਰੂਪੁ ਸਭੁ ਨੈਨ ਅਲੋਇਆ ॥੪॥੧੭॥੬੮॥
आसा महला ५ ॥
आपे पेडु बिसथारी साख ॥
अपनी खेती आपे राख ॥१॥
जत कत पेखउ एकै ओही ॥
घट घट अंतरि आपे सोई ॥१॥ रहाउ ॥
आपे सूरु किरणि बिसथारु ॥
सोई गुपतु सोई आकारु ॥२॥
सरगुण निरगुण थापै नाउ ॥
दुह मिलि एकै कीनो ठाउ ॥३॥
कहु नानक गुरि भ्रमु भउ खोइआ ॥
अनद रूपु सभु नैन अलोइआ ॥४॥१७॥६८॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई ! ये जगत।मानो।एक बड़े फैलाव वाला वृक्ष है) परमात्मा खुद ही (इस जगत-वृक्ष को सहारा देने वाला) बड़ा तना है (जगत-पसारा उस वृक्ष की) शाखाओं का फैलाव फैला हुआ है। (हे भाई ! ये जगत) परमात्मा की (बीजी हुई) फसल है।स्वयं ही वह इस फसल का रखवाला है। 1। (हे भाई !) मैं जिधर-किधर देखता हूँ मुझे एक परमात्मा ही दिखता है। वह परमात्मा स्वयं ही हरेक शरीर में बस रहा है। 1।रहाउ। (हे भाई !) परमात्मा स्वयं ही सूर्य है (और ये जगत।मानो।उसकी) किरणों का बिखराव है। वह स्वयं ही अदृश्य (रूप में) है और स्वयं ही ये दिखाई देता पसारा है। 2। (हे भाई ! अपने अदृश्य और दृष्टमान रूपों का) निर्गुण और सर्गुण नाम वह प्रभू स्वयं ही स्थापित करता है (दोनों में फर्क नाम-मात्र को ही है।कहने को ही है)। इन दोनों (रूपों) ने मिल के एक परमात्मा में ही ठिकाना बनाया हुआ है (इन दोनों का ठिकाना परमात्मा स्वयं ही है)। 3। हे नानक ! कह, गुरू ने (जिस मनुष्य के अंदर से माया वाली) भटकना और डर दूर कर दी उसने हर जगह उस परमात्मा को ही अपनी आँखों से देख लिया जो सदा ही आनंद में रहता है। 4। 17। 68।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਉਕਤਿ ਸਿਆਨਪ ਕਿਛੂ ਨ ਜਾਨਾ ॥
आसा महला ५ ॥
उकति सिआनप किछू न जाना ॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे प्रभू ! मैं कोई दलील (देनी) नहीं जानता।मैं कोई समझदारी (की बात करनी) नहीं जानता (जिससे मैं तुझे खुश कर सकूँ।

संदर्भ: यह अंग 387 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Janmashtami की मधुर रात, मंदिर में 12 बजे का दर्शन।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 54 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 387” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 388 →, पीछे का: ← अंग 386

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।