अंग
385
राग आसा
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ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਏਕੁ ਦਿਖਾਇਆ ॥੪॥੩॥੫੪॥
अंतरि बाहरि एकु दिखाइआ ॥४॥३॥५४॥
हिन्दी अर्थ: (गुरू ने उसको) उसके अंदर और बाहर सारे जगत में एक परमात्मा ही बसता दिखा दिया है (इस वास्ते वह दुनिया से प्यार करने वाला सलूक भी रखता है और निर्मोही रहके सुरति अंदर रहके सुरति को अंदर बसते प्रभू में भी जोड़े रखता है)। 4। 3। 54।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਪਾਵਤੁ ਰਲੀਆ ਜੋਬਨਿ ਬਲੀਆ ॥
ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਮਾਟੀ ਸੰਗਿ ਰਲੀਆ ॥੧॥
ਕਾਨ ਕੁੰਡਲੀਆ ਬਸਤ੍ਰ ਓਢਲੀਆ ॥
ਸੇਜ ਸੁਖਲੀਆ ਮਨਿ ਗਰਬਲੀਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤਲੈ ਕੁੰਚਰੀਆ ਸਿਰਿ ਕਨਿਕ ਛਤਰੀਆ ॥
ਹਰਿ ਭਗਤਿ ਬਿਨਾ ਲੇ ਧਰਨਿ ਗਡਲੀਆ ॥੨॥
ਰੂਪ ਸੁੰਦਰੀਆ ਅਨਿਕ ਇਸਤਰੀਆ ॥
ਹਰਿ ਰਸ ਬਿਨੁ ਸਭਿ ਸੁਆਦ ਫਿਕਰੀਆ ॥੩॥
ਮਾਇਆ ਛਲੀਆ ਬਿਕਾਰ ਬਿਖਲੀਆ ॥
ਸਰਣਿ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਪੁਰਖ ਦਇਅਲੀਆ ॥੪॥੪॥੫੫॥
ਪਾਵਤੁ ਰਲੀਆ ਜੋਬਨਿ ਬਲੀਆ ॥
ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਮਾਟੀ ਸੰਗਿ ਰਲੀਆ ॥੧॥
ਕਾਨ ਕੁੰਡਲੀਆ ਬਸਤ੍ਰ ਓਢਲੀਆ ॥
ਸੇਜ ਸੁਖਲੀਆ ਮਨਿ ਗਰਬਲੀਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤਲੈ ਕੁੰਚਰੀਆ ਸਿਰਿ ਕਨਿਕ ਛਤਰੀਆ ॥
ਹਰਿ ਭਗਤਿ ਬਿਨਾ ਲੇ ਧਰਨਿ ਗਡਲੀਆ ॥੨॥
ਰੂਪ ਸੁੰਦਰੀਆ ਅਨਿਕ ਇਸਤਰੀਆ ॥
ਹਰਿ ਰਸ ਬਿਨੁ ਸਭਿ ਸੁਆਦ ਫਿਕਰੀਆ ॥੩॥
ਮਾਇਆ ਛਲੀਆ ਬਿਕਾਰ ਬਿਖਲੀਆ ॥
ਸਰਣਿ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਪੁਰਖ ਦਇਅਲੀਆ ॥੪॥੪॥੫੫॥
आसा महला ५ ॥
पावतु रलीआ जोबनि बलीआ ॥
नाम बिना माटी संगि रलीआ ॥१॥
कान कुंडलीआ बसत्र ओढलीआ ॥
सेज सुखलीआ मनि गरबलीआ ॥१॥ रहाउ ॥
तलै कुंचरीआ सिरि कनिक छतरीआ ॥
हरि भगति बिना ले धरनि गडलीआ ॥२॥
रूप सुंदरीआ अनिक इसतरीआ ॥
हरि रस बिनु सभि सुआद फिकरीआ ॥३॥
माइआ छलीआ बिकार बिखलीआ ॥
सरणि नानक प्रभ पुरख दइअलीआ ॥४॥४॥५५॥
पावतु रलीआ जोबनि बलीआ ॥
नाम बिना माटी संगि रलीआ ॥१॥
कान कुंडलीआ बसत्र ओढलीआ ॥
सेज सुखलीआ मनि गरबलीआ ॥१॥ रहाउ ॥
तलै कुंचरीआ सिरि कनिक छतरीआ ॥
हरि भगति बिना ले धरनि गडलीआ ॥२॥
रूप सुंदरीआ अनिक इसतरीआ ॥
हरि रस बिनु सभि सुआद फिकरीआ ॥३॥
माइआ छलीआ बिकार बिखलीआ ॥
सरणि नानक प्रभ पुरख दइअलीआ ॥४॥४॥५५॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई ! जब तक) जवानी में (शारीरिक) शक्ति मिली हुई है (मनुष्य बेपरवाह हो के) मौजें करता है। अंत में शरीर मिट्टी के साथ मिल जाता है।(और जीवात्मा) परमातमा के नाम के बिना (खाली हाथ) ही रह जाती है। 1। (हे भाई ! मनुष्य) कानों में (सोने के) कुण्डल पहन के (सुंदर-सुंदर) कपड़े पहनता है। नर्म-नर्म बिस्तरों पर (सोता है)।(और इन मिले हुए सुखों का अपने) मन में गुमान करता है (पर ये नहीं समझता कि ये शरीर आखिर मिट्टी हो जाना है।ये पदार्थ यहीं रह जाने हैं।सदा का साथ निभाने वाला सिर्फ परमात्मा का नाम ही है)। 1।रहाउ। (हे भाई ! मनुष्य को यदि सवारी करने के वास्ते अपने) नीचे हाथी (भी मिला हुआ है।और उसके) सिर पर सोने का छत्र झूल रहा है। (तो भी शरीर आखिर) धरती में ही मिलाया जाता है (इन पदार्थों के गुमान में मनुष्य) परमात्मा की भक्ति से वंचित ही रह जाता है। 2। (हे भाई ! अगर) सुंदर रूप वाली अनेक सि्त्रयां (भी मिली हुई हों तो भी क्या हुआ।) परमात्मा के नाम के स्वाद के मुकाबले में (दुनिया वाले ये) सारे स्वाद फीके हैं। 3। (हे भाई ! याद रखो कि) माया ठगने वाली ही है (आत्मिक जीवन का सरमाया लूट लेती है)।(दुनिया के विषौ-) विकार जहर भरे हैं (आत्मिक मौत का कारण बनते हैं)। हे नानक ! (कह,) हे प्रभू ! हे दयालु पुरख !मैं तेरी शरण आया हूँ (मुझे इस माया से इन विकारों से बचाए रख)। 4। 4। 55।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਏਕੁ ਬਗੀਚਾ ਪੇਡ ਘਨ ਕਰਿਆ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਤਹਾ ਮਹਿ ਫਲਿਆ ॥੧॥
ਐਸਾ ਕਰਹੁ ਬੀਚਾਰੁ ਗਿਆਨੀ ॥
ਜਾ ਤੇ ਪਾਈਐ ਪਦੁ ਨਿਰਬਾਨੀ ॥
ਆਸਿ ਪਾਸਿ ਬਿਖੂਆ ਕੇ ਕੁੰਟਾ ਬੀਚਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਹੈ ਭਾਈ ਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਿੰਚਨਹਾਰੇ ਏਕੈ ਮਾਲੀ ॥
ਖਬਰਿ ਕਰਤੁ ਹੈ ਪਾਤ ਪਤ ਡਾਲੀ ॥੨॥
ਸਗਲ ਬਨਸਪਤਿ ਆਣਿ ਜੜਾਈ ॥
ਸਗਲੀ ਫੂਲੀ ਨਿਫਲ ਨ ਕਾਈ ॥੩॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਫਲੁ ਨਾਮੁ ਜਿਨਿ ਗੁਰ ਤੇ ਪਾਇਆ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਤਰੀ ਤਿਨਿ ਮਾਇਆ ॥੪॥੫॥੫੬॥
ਏਕੁ ਬਗੀਚਾ ਪੇਡ ਘਨ ਕਰਿਆ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਤਹਾ ਮਹਿ ਫਲਿਆ ॥੧॥
ਐਸਾ ਕਰਹੁ ਬੀਚਾਰੁ ਗਿਆਨੀ ॥
ਜਾ ਤੇ ਪਾਈਐ ਪਦੁ ਨਿਰਬਾਨੀ ॥
ਆਸਿ ਪਾਸਿ ਬਿਖੂਆ ਕੇ ਕੁੰਟਾ ਬੀਚਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਹੈ ਭਾਈ ਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਿੰਚਨਹਾਰੇ ਏਕੈ ਮਾਲੀ ॥
ਖਬਰਿ ਕਰਤੁ ਹੈ ਪਾਤ ਪਤ ਡਾਲੀ ॥੨॥
ਸਗਲ ਬਨਸਪਤਿ ਆਣਿ ਜੜਾਈ ॥
ਸਗਲੀ ਫੂਲੀ ਨਿਫਲ ਨ ਕਾਈ ॥੩॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਫਲੁ ਨਾਮੁ ਜਿਨਿ ਗੁਰ ਤੇ ਪਾਇਆ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਤਰੀ ਤਿਨਿ ਮਾਇਆ ॥੪॥੫॥੫੬॥
आसा महला ५ ॥
एकु बगीचा पेड घन करिआ ॥
अंम्रित नामु तहा महि फलिआ ॥१॥
ऐसा करहु बीचारु गिआनी ॥
जा ते पाईऐ पदु निरबानी ॥
आसि पासि बिखूआ के कुंटा बीचि अंम्रितु है भाई रे ॥१॥ रहाउ ॥
सिंचनहारे एकै माली ॥
खबरि करतु है पात पत डाली ॥२॥
सगल बनसपति आणि जड़ाई ॥
सगली फूली निफल न काई ॥३॥
अंम्रित फलु नामु जिनि गुर ते पाइआ ॥
नानक दास तरी तिनि माइआ ॥४॥५॥५६॥
एकु बगीचा पेड घन करिआ ॥
अंम्रित नामु तहा महि फलिआ ॥१॥
ऐसा करहु बीचारु गिआनी ॥
जा ते पाईऐ पदु निरबानी ॥
आसि पासि बिखूआ के कुंटा बीचि अंम्रितु है भाई रे ॥१॥ रहाउ ॥
सिंचनहारे एकै माली ॥
खबरि करतु है पात पत डाली ॥२॥
सगल बनसपति आणि जड़ाई ॥
सगली फूली निफल न काई ॥३॥
अंम्रित फलु नामु जिनि गुर ते पाइआ ॥
नानक दास तरी तिनि माइआ ॥४॥५॥५६॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे भाई ! ये जगत एक बग़ीचा है जिस में (सृजनहार माली ने) बेअंत पौधे लगाए हुए हैं (रंग-बिरंगे जीव पैदा किए हुए हैं। इनमें से इनके अंदर) आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल (सींचा जा रहा) है।उनमें (ऊँचे आत्मिक जीवन का) डर लग रहा है। 1। हे ज्ञानवान मनुष्य ! कोई ऐसी विचार कर जिसकी बरकति से वह (आत्मिक) दर्जा प्राप्त हो जाए जहाँ कोई वासना ना छू सके। हे भाई ! तेरे चारों तरफ (माया के मोह के) जहर के चश्मे (चल रहे हैं जो आत्मिक मौत ले आते हैं; पर तेरे) अंदर (नाम-) अमृत (का चश्मा चल रहा है)। 1।रहाउ। (हे भाई ! आत्मिक जीवन के वास्ते नाम-जल) सींचने वाले उस एक (सृजनहार-) माली को (अपने हृदय में संभाल के रखो) जो हरेक बूटे के पत्र पत्र डाली-डाली की संभाल करता है (जो हरेक जीव के आत्मिक जीवन के हरेक पहलू का ख्याल रखता है)। 2। (हे भाई ! उस माली ने इस जगत-बगीचे में) सारी बनस्पति ला के सजा दी है (रंग-बिरंगे जीव पैदा करके संसार-बग़ीचे को सुंदर बना दिया है)। सारी बनस्पति फल-फूल रही है।कोई भी पौधा फल से खाली नहीं (हरेक जीव माया के मकसद से लगा हुआ है)। 3। जिस मनुष्य ने गुरू से आत्मिक जीवन देने वाला नाम-फल प्राप्त कर लिया है(पर) हे दास नानक ! (कह,) उसने माया (की नदी) पार कर ली है। 4। 5। 56।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਰਾਜ ਲੀਲਾ ਤੇਰੈ ਨਾਮਿ ਬਨਾਈ ॥
ਜੋਗੁ ਬਨਿਆ ਤੇਰਾ ਕੀਰਤਨੁ ਗਾਈ ॥੧॥
ਸਰਬ ਸੁਖਾ ਬਨੇ ਤੇਰੈ ਓਲੑੈ ॥
ਭ੍ਰਮ ਕੇ ਪਰਦੇ ਸਤਿਗੁਰ ਖੋਲੑੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹੁਕਮੁ ਬੂਝਿ ਰੰਗ ਰਸ ਮਾਣੇ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵਾ ਮਹਾ ਨਿਰਬਾਣੇ ॥੨॥
ਜਿਨਿ ਤੂੰ ਜਾਤਾ ਸੋ ਗਿਰਸਤ ਉਦਾਸੀ ਪਰਵਾਣੁ ॥
ਨਾਮਿ ਰਤਾ ਸੋਈ ਨਿਰਬਾਣੁ ॥੩॥
ਜਾ ਕਉ ਮਿਲਿਓ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨਾ ॥
ਭਨਤਿ ਨਾਨਕ ਤਾ ਕਾ ਪੂਰ ਖਜਾਨਾ ॥੪॥੬॥੫੭॥
ਰਾਜ ਲੀਲਾ ਤੇਰੈ ਨਾਮਿ ਬਨਾਈ ॥
ਜੋਗੁ ਬਨਿਆ ਤੇਰਾ ਕੀਰਤਨੁ ਗਾਈ ॥੧॥
ਸਰਬ ਸੁਖਾ ਬਨੇ ਤੇਰੈ ਓਲੑੈ ॥
ਭ੍ਰਮ ਕੇ ਪਰਦੇ ਸਤਿਗੁਰ ਖੋਲੑੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹੁਕਮੁ ਬੂਝਿ ਰੰਗ ਰਸ ਮਾਣੇ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵਾ ਮਹਾ ਨਿਰਬਾਣੇ ॥੨॥
ਜਿਨਿ ਤੂੰ ਜਾਤਾ ਸੋ ਗਿਰਸਤ ਉਦਾਸੀ ਪਰਵਾਣੁ ॥
ਨਾਮਿ ਰਤਾ ਸੋਈ ਨਿਰਬਾਣੁ ॥੩॥
ਜਾ ਕਉ ਮਿਲਿਓ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨਾ ॥
ਭਨਤਿ ਨਾਨਕ ਤਾ ਕਾ ਪੂਰ ਖਜਾਨਾ ॥੪॥੬॥੫੭॥
आसा महला ५ ॥
राज लीला तेरै नामि बनाई ॥
जोगु बनिआ तेरा कीरतनु गाई ॥१॥
सरब सुखा बने तेरै ओल॑ै ॥
भ्रम के परदे सतिगुर खोल॑े ॥१॥ रहाउ ॥
हुकमु बूझि रंग रस माणे ॥
सतिगुर सेवा महा निरबाणे ॥२॥
जिनि तूं जाता सो गिरसत उदासी परवाणु ॥
नामि रता सोई निरबाणु ॥३॥
जा कउ मिलिओ नामु निधाना ॥
भनति नानक ता का पूर खजाना ॥४॥६॥५७॥
राज लीला तेरै नामि बनाई ॥
जोगु बनिआ तेरा कीरतनु गाई ॥१॥
सरब सुखा बने तेरै ओल॑ै ॥
भ्रम के परदे सतिगुर खोल॑े ॥१॥ रहाउ ॥
हुकमु बूझि रंग रस माणे ॥
सतिगुर सेवा महा निरबाणे ॥२॥
जिनि तूं जाता सो गिरसत उदासी परवाणु ॥
नामि रता सोई निरबाणु ॥३॥
जा कउ मिलिओ नामु निधाना ॥
भनति नानक ता का पूर खजाना ॥४॥६॥५७॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे प्रभू ! तेरे नाम ने मेरे वास्ते वह मौज बना दी है जो राजाओं को राज से मिलती प्रतीत होती है। जब मैं तेरी सिफत सालाह के गीत गाता हूँ तो मुझे जोगियों वाला जोग प्राप्त हो जाता है (दुनिया वाला सुख और फकीरी वाला सुख दोनों ही मुझे तेरी सिफत सालाह में से मिल रहे हैं)। हे प्रभू ! तेरे भरोसे रहने से मेरे वास्ते सारे सुख ही सुख बन गए हैं। (जब से) सतिगुरू ने (मेरे अंदर से माया की खातिर) भटकना पैदा करने वाले परदे खोल दिए हैं (और तेरे से मेरी दूरी समाप्त हो गई है। 1।रहाउ। हे प्रभू ! तेरी रजा को समझ के मैं सारे आत्मिक आनंद ले रहा हूँ। सतिगुरू की (बताई) सेवा की बरकति से मुझे बड़ी ऊँची वासना-रहित अवस्था प्राप्त हो गई है। 2। हे प्रभू ! जिस मनुष्य ने तेरे साथ गहरी सांझ डाल ली।वह चाहे गृहस्ती है चाहे त्यागी।तेरी नजरों में कबूल है। हे प्रभू ! तेरे नाम (-रंग) में रंगा हुआ है वही सदा दुनिया की वासना से बचा रहता है। 3। नानक कहता है, हे प्रभू ! जिस मनुष्य को तेरा नाम-खजाना मिल गया है उसका (उच्च आत्मिक जीवन के गुणों का) खजाना सदा भरा रहता है। 4। 6। 57।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਤੀਰਥਿ ਜਾਉ ਤ ਹਉ ਹਉ ਕਰਤੇ ॥
ਪੰਡਿਤ ਪੂਛਉ ਤ ਮਾਇਆ ਰਾਤੇ ॥੧॥
ਸੋ ਅਸਥਾਨੁ ਬਤਾਵਹੁ ਮੀਤਾ ॥
ਜਾ ਕੈ ਹਰਿ ਹਰਿ ਕੀਰਤਨੁ ਨੀਤਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਾਸਤ੍ਰ ਬੇਦ ਪਾਪ ਪੁੰਨ ਵੀਚਾਰ ॥
ਨਰਕਿ ਸੁਰਗਿ ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਅਉਤਾਰ ॥੨॥
ਗਿਰਸਤ ਮਹਿ ਚਿੰਤ ਉਦਾਸ ਅਹੰਕਾਰ ॥
ਕਰਮ ਕਰਤ ਜੀਅ ਕਉ ਜੰਜਾਰ ॥੩॥
ਪ੍ਰਭ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਮਨੁ ਵਸਿ ਆਇਆ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਤਰੀ ਤਿਨਿ ਮਾਇਆ ॥੪॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਹਰਿ ਕੀਰਤਨੁ ਗਾਈਐ ॥
ਇਹੁ ਅਸਥਾਨੁ ਗੁਰੂ ਤੇ ਪਾਈਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ਦੂਜਾ ॥੭॥੫੮॥
ਤੀਰਥਿ ਜਾਉ ਤ ਹਉ ਹਉ ਕਰਤੇ ॥
ਪੰਡਿਤ ਪੂਛਉ ਤ ਮਾਇਆ ਰਾਤੇ ॥੧॥
ਸੋ ਅਸਥਾਨੁ ਬਤਾਵਹੁ ਮੀਤਾ ॥
ਜਾ ਕੈ ਹਰਿ ਹਰਿ ਕੀਰਤਨੁ ਨੀਤਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਾਸਤ੍ਰ ਬੇਦ ਪਾਪ ਪੁੰਨ ਵੀਚਾਰ ॥
ਨਰਕਿ ਸੁਰਗਿ ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਅਉਤਾਰ ॥੨॥
ਗਿਰਸਤ ਮਹਿ ਚਿੰਤ ਉਦਾਸ ਅਹੰਕਾਰ ॥
ਕਰਮ ਕਰਤ ਜੀਅ ਕਉ ਜੰਜਾਰ ॥੩॥
ਪ੍ਰਭ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਮਨੁ ਵਸਿ ਆਇਆ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਤਰੀ ਤਿਨਿ ਮਾਇਆ ॥੪॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਹਰਿ ਕੀਰਤਨੁ ਗਾਈਐ ॥
ਇਹੁ ਅਸਥਾਨੁ ਗੁਰੂ ਤੇ ਪਾਈਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ਦੂਜਾ ॥੭॥੫੮॥
आसा महला ५ ॥
तीरथि जाउ त हउ हउ करते ॥
पंडित पूछउ त माइआ राते ॥१॥
सो असथानु बतावहु मीता ॥
जा कै हरि हरि कीरतनु नीता ॥१॥ रहाउ ॥
सासत्र बेद पाप पुंन वीचार ॥
नरकि सुरगि फिरि फिरि अउतार ॥२॥
गिरसत महि चिंत उदास अहंकार ॥
करम करत जीअ कउ जंजार ॥३॥
प्रभ किरपा ते मनु वसि आइआ ॥
नानक गुरमुखि तरी तिनि माइआ ॥४॥
साधसंगि हरि कीरतनु गाईऐ ॥
इहु असथानु गुरू ते पाईऐ ॥१॥ रहाउ दूजा ॥७॥५८॥
तीरथि जाउ त हउ हउ करते ॥
पंडित पूछउ त माइआ राते ॥१॥
सो असथानु बतावहु मीता ॥
जा कै हरि हरि कीरतनु नीता ॥१॥ रहाउ ॥
सासत्र बेद पाप पुंन वीचार ॥
नरकि सुरगि फिरि फिरि अउतार ॥२॥
गिरसत महि चिंत उदास अहंकार ॥
करम करत जीअ कउ जंजार ॥३॥
प्रभ किरपा ते मनु वसि आइआ ॥
नानक गुरमुखि तरी तिनि माइआ ॥४॥
साधसंगि हरि कीरतनु गाईऐ ॥
इहु असथानु गुरू ते पाईऐ ॥१॥ रहाउ दूजा ॥७॥५८॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे मित्र ! अगर मैं (किसी) तीर्थ पर जाता हूँ।तो वहां मैं लोगों को ‘मैं (धरमी) मैं (धरमी)’ कहते हुए देखता हूँ। यदि मैं (जा के) पण्डितों को पूछता हूँ तो वह भी माया के रंग में रंगे हुए हैं। 1। हे मित्र ! मुझे वह जगह बता जहां हर वक्त परमात्मा की सिफत सालाह होती हो। 1।रहाउ। (हे मित्र !) शास्त्र और वेद पुन्य और पाप के विचार ही बताते हैं (ये बताते हैं कि फलाणे काम पाप हैं फलाणे काम पुन्य हैं।जिनके करने से) बार बार (कभी) नर्क में (तो कभी) स्वर्ग में पड़ जाते हैं। 2। (हे मित्र !) गृहस्थ में रहने वालों को चिंता दबा रही है।(गृहस्त का) त्याग करने वाले अहंकार (से आफरे हुए हैं)। (निरे) कर्म-काण्ड करने वालों की जिंद को (माया के) जंजाल (पड़े हुए हैं)। 3। परमात्मा की कृपा से जिस मनुष्य का मन वश में आ जाता है हे नानक ! (कह,) उसने गुरू की शरण पड़ के माया (की फुंकार मारती नदी) पार कर ली है। 4। (हे मित्र !) साध-संगति में रह के (सदा) परमात्मा की सिफत सालाह करते रहना चाहिए (इसकी बरकति से अहंकार।माया का मोह।चिंता।अहम् के जंजाल आदि कोई भी छू नहीं सकता) पर ये जगह गुरू के द्वारा ही मिलती है। 1।रहाउ दूसरा। 7। 58।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਘਰ ਮਹਿ ਸੂਖ ਬਾਹਰਿ ਫੁਨਿ ਸੂਖਾ ॥
ਹਰਿ ਸਿਮਰਤ ਸਗਲ ਬਿਨਾਸੇ ਦੂਖਾ ॥੧॥
ਸਗਲ ਸੂਖ ਜਾਂ ਤੂੰ ਚਿਤਿ ਆਂਵੈਂ ॥
ਘਰ ਮਹਿ ਸੂਖ ਬਾਹਰਿ ਫੁਨਿ ਸੂਖਾ ॥
ਹਰਿ ਸਿਮਰਤ ਸਗਲ ਬਿਨਾਸੇ ਦੂਖਾ ॥੧॥
ਸਗਲ ਸੂਖ ਜਾਂ ਤੂੰ ਚਿਤਿ ਆਂਵੈਂ ॥
आसा महला ५ ॥
घर महि सूख बाहरि फुनि सूखा ॥
हरि सिमरत सगल बिनासे दूखा ॥१॥
सगल सूख जां तूं चिति आंवैं ॥
घर महि सूख बाहरि फुनि सूखा ॥
हरि सिमरत सगल बिनासे दूखा ॥१॥
सगल सूख जां तूं चिति आंवैं ॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई ! परमात्मा का नाम सिमरने वाले मनुष्य को अपने) हृदय-घर में आनंद प्रतीत होता रहता है।बाहर दुनिया के साथ बरताव-व्यवहार करते हुए भी उसका आत्मिक आनंद बना रहता है (क्योंकि। हे भाई !) परमात्मा का सिमरन करने से सारे दुख नाश हो जाते हैं। 1। हे प्रभू ! जिस मनुष्य के चित्त में तू आ बसता है उसे सारे सुख ही सुख प्रतीत होते हैं।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 385 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Karwa Chauth की रात, चाँद का इंतज़ार, और बीच में हाथों की मेहंदी।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 52 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 385” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 386 →, पीछे का: ← अंग 384।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।