अंग
433
राग आसा
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਛਛੈ ਛਾਇਆ ਵਰਤੀ ਸਭ ਅੰਤਰਿ ਤੇਰਾ ਕੀਆ ਭਰਮੁ ਹੋਆ ॥
ਭਰਮੁ ਉਪਾਇ ਭੁਲਾਈਅਨੁ ਆਪੇ ਤੇਰਾ ਕਰਮੁ ਹੋਆ ਤਿਨੑ ਗੁਰੂ ਮਿਲਿਆ ॥੧੦॥
ਜਜੈ ਜਾਨੁ ਮੰਗਤ ਜਨੁ ਜਾਚੈ ਲਖ ਚਉਰਾਸੀਹ ਭੀਖ ਭਵਿਆ ॥
ਏਕੋ ਲੇਵੈ ਏਕੋ ਦੇਵੈ ਅਵਰੁ ਨ ਦੂਜਾ ਮੈ ਸੁਣਿਆ ॥੧੧॥
ਝਝੈ ਝੂਰਿ ਮਰਹੁ ਕਿਆ ਪ੍ਰਾਣੀ ਜੋ ਕਿਛੁ ਦੇਣਾ ਸੁ ਦੇ ਰਹਿਆ ॥
ਦੇ ਦੇ ਵੇਖੈ ਹੁਕਮੁ ਚਲਾਏ ਜਿਉ ਜੀਆ ਕਾ ਰਿਜਕੁ ਪਇਆ ॥੧੨॥
ਞੰਞੈ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਜਾ ਦੇਖਾ ਦੂਜਾ ਕੋਈ ਨਾਹੀ ॥
ਏਕੋ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਸਭ ਥਾਈ ਏਕੁ ਵਸਿਆ ਮਨ ਮਾਹੀ ॥੧੩॥
ਟਟੈ ਟੰਚੁ ਕਰਹੁ ਕਿਆ ਪ੍ਰਾਣੀ ਘੜੀ ਕਿ ਮੁਹਤਿ ਕਿ ਉਠਿ ਚਲਣਾ ॥
ਜੂਐ ਜਨਮੁ ਨ ਹਾਰਹੁ ਅਪਣਾ ਭਾਜਿ ਪੜਹੁ ਤੁਮ ਹਰਿ ਸਰਣਾ ॥੧੪॥
ਠਠੈ ਠਾਢਿ ਵਰਤੀ ਤਿਨ ਅੰਤਰਿ ਹਰਿ ਚਰਣੀ ਜਿਨੑ ਕਾ ਚਿਤੁ ਲਾਗਾ ॥
ਚਿਤੁ ਲਾਗਾ ਸੇਈ ਜਨ ਨਿਸਤਰੇ ਤਉ ਪਰਸਾਦੀ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥੧੫॥
ਡਡੈ ਡੰਫੁ ਕਰਹੁ ਕਿਆ ਪ੍ਰਾਣੀ ਜੋ ਕਿਛੁ ਹੋਆ ਸੁ ਸਭੁ ਚਲਣਾ ॥
ਤਿਸੈ ਸਰੇਵਹੁ ਤਾ ਸੁਖੁ ਪਾਵਹੁ ਸਰਬ ਨਿਰੰਤਰਿ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ॥੧੬॥
ਢਢੈ ਢਾਹਿ ਉਸਾਰੈ ਆਪੇ ਜਿਉ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਿਵੈ ਕਰੇ ॥
ਕਰਿ ਕਰਿ ਵੇਖੈ ਹੁਕਮੁ ਚਲਾਏ ਤਿਸੁ ਨਿਸਤਾਰੇ ਜਾ ਕਉ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ॥੧੭॥
ਣਾਣੈ ਰਵਤੁ ਰਹੈ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਸੋਈ ॥
ਆਪੇ ਆਪਿ ਮਿਲਾਏ ਕਰਤਾ ਪੁਨਰਪਿ ਜਨਮੁ ਨ ਹੋਈ ॥੧੮॥
ਤਤੈ ਤਾਰੂ ਭਵਜਲੁ ਹੋਆ ਤਾ ਕਾ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਇਆ ॥
ਨਾ ਤਰ ਨਾ ਤੁਲਹਾ ਹਮ ਬੂਡਸਿ ਤਾਰਿ ਲੇਹਿ ਤਾਰਣ ਰਾਇਆ ॥੧੯॥
ਥਥੈ ਥਾਨਿ ਥਾਨੰਤਰਿ ਸੋਈ ਜਾ ਕਾ ਕੀਆ ਸਭੁ ਹੋਆ ॥
ਕਿਆ ਭਰਮੁ ਕਿਆ ਮਾਇਆ ਕਹੀਐ ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਸੋਈ ਭਲਾ ॥੨੦॥
ਦਦੈ ਦੋਸੁ ਨ ਦੇਊ ਕਿਸੈ ਦੋਸੁ ਕਰੰਮਾ ਆਪਣਿਆ ॥
ਜੋ ਮੈ ਕੀਆ ਸੋ ਮੈ ਪਾਇਆ ਦੋਸੁ ਨ ਦੀਜੈ ਅਵਰ ਜਨਾ ॥੨੧॥
ਧਧੈ ਧਾਰਿ ਕਲਾ ਜਿਨਿ ਛੋਡੀ ਹਰਿ ਚੀਜੀ ਜਿਨਿ ਰੰਗ ਕੀਆ ॥
ਤਿਸ ਦਾ ਦੀਆ ਸਭਨੀ ਲੀਆ ਕਰਮੀ ਕਰਮੀ ਹੁਕਮੁ ਪਇਆ ॥੨੨॥
ਨੰਨੈ ਨਾਹ ਭੋਗ ਨਿਤ ਭੋਗੈ ਨਾ ਡੀਠਾ ਨਾ ਸੰਮ੍ਹਲਿਆ ॥
ਗਲੀ ਹਉ ਸੋਹਾਗਣਿ ਭੈਣੇ ਕੰਤੁ ਨ ਕਬਹੂੰ ਮੈ ਮਿਲਿਆ ॥੨੩॥
ਪਪੈ ਪਾਤਿਸਾਹੁ ਪਰਮੇਸਰੁ ਵੇਖਣ ਕਉ ਪਰਪੰਚੁ ਕੀਆ ॥
ਦੇਖੈ ਬੂਝੈ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਜਾਣੈ ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ॥੨੪॥
ਫਫੈ ਫਾਹੀ ਸਭੁ ਜਗੁ ਫਾਸਾ ਜਮ ਕੈ ਸੰਗਲਿ ਬੰਧਿ ਲਇਆ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਸੇ ਨਰ ਉਬਰੇ ਜਿ ਹਰਿ ਸਰਣਾਗਤਿ ਭਜਿ ਪਇਆ ॥੨੫॥
ਬਬੈ ਬਾਜੀ ਖੇਲਣ ਲਾਗਾ ਚਉਪੜਿ ਕੀਤੇ ਚਾਰਿ ਜੁਗਾ ॥
ਭਰਮੁ ਉਪਾਇ ਭੁਲਾਈਅਨੁ ਆਪੇ ਤੇਰਾ ਕਰਮੁ ਹੋਆ ਤਿਨੑ ਗੁਰੂ ਮਿਲਿਆ ॥੧੦॥
ਜਜੈ ਜਾਨੁ ਮੰਗਤ ਜਨੁ ਜਾਚੈ ਲਖ ਚਉਰਾਸੀਹ ਭੀਖ ਭਵਿਆ ॥
ਏਕੋ ਲੇਵੈ ਏਕੋ ਦੇਵੈ ਅਵਰੁ ਨ ਦੂਜਾ ਮੈ ਸੁਣਿਆ ॥੧੧॥
ਝਝੈ ਝੂਰਿ ਮਰਹੁ ਕਿਆ ਪ੍ਰਾਣੀ ਜੋ ਕਿਛੁ ਦੇਣਾ ਸੁ ਦੇ ਰਹਿਆ ॥
ਦੇ ਦੇ ਵੇਖੈ ਹੁਕਮੁ ਚਲਾਏ ਜਿਉ ਜੀਆ ਕਾ ਰਿਜਕੁ ਪਇਆ ॥੧੨॥
ਞੰਞੈ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਜਾ ਦੇਖਾ ਦੂਜਾ ਕੋਈ ਨਾਹੀ ॥
ਏਕੋ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਸਭ ਥਾਈ ਏਕੁ ਵਸਿਆ ਮਨ ਮਾਹੀ ॥੧੩॥
ਟਟੈ ਟੰਚੁ ਕਰਹੁ ਕਿਆ ਪ੍ਰਾਣੀ ਘੜੀ ਕਿ ਮੁਹਤਿ ਕਿ ਉਠਿ ਚਲਣਾ ॥
ਜੂਐ ਜਨਮੁ ਨ ਹਾਰਹੁ ਅਪਣਾ ਭਾਜਿ ਪੜਹੁ ਤੁਮ ਹਰਿ ਸਰਣਾ ॥੧੪॥
ਠਠੈ ਠਾਢਿ ਵਰਤੀ ਤਿਨ ਅੰਤਰਿ ਹਰਿ ਚਰਣੀ ਜਿਨੑ ਕਾ ਚਿਤੁ ਲਾਗਾ ॥
ਚਿਤੁ ਲਾਗਾ ਸੇਈ ਜਨ ਨਿਸਤਰੇ ਤਉ ਪਰਸਾਦੀ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥੧੫॥
ਡਡੈ ਡੰਫੁ ਕਰਹੁ ਕਿਆ ਪ੍ਰਾਣੀ ਜੋ ਕਿਛੁ ਹੋਆ ਸੁ ਸਭੁ ਚਲਣਾ ॥
ਤਿਸੈ ਸਰੇਵਹੁ ਤਾ ਸੁਖੁ ਪਾਵਹੁ ਸਰਬ ਨਿਰੰਤਰਿ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ॥੧੬॥
ਢਢੈ ਢਾਹਿ ਉਸਾਰੈ ਆਪੇ ਜਿਉ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਿਵੈ ਕਰੇ ॥
ਕਰਿ ਕਰਿ ਵੇਖੈ ਹੁਕਮੁ ਚਲਾਏ ਤਿਸੁ ਨਿਸਤਾਰੇ ਜਾ ਕਉ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ॥੧੭॥
ਣਾਣੈ ਰਵਤੁ ਰਹੈ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਸੋਈ ॥
ਆਪੇ ਆਪਿ ਮਿਲਾਏ ਕਰਤਾ ਪੁਨਰਪਿ ਜਨਮੁ ਨ ਹੋਈ ॥੧੮॥
ਤਤੈ ਤਾਰੂ ਭਵਜਲੁ ਹੋਆ ਤਾ ਕਾ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਇਆ ॥
ਨਾ ਤਰ ਨਾ ਤੁਲਹਾ ਹਮ ਬੂਡਸਿ ਤਾਰਿ ਲੇਹਿ ਤਾਰਣ ਰਾਇਆ ॥੧੯॥
ਥਥੈ ਥਾਨਿ ਥਾਨੰਤਰਿ ਸੋਈ ਜਾ ਕਾ ਕੀਆ ਸਭੁ ਹੋਆ ॥
ਕਿਆ ਭਰਮੁ ਕਿਆ ਮਾਇਆ ਕਹੀਐ ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਸੋਈ ਭਲਾ ॥੨੦॥
ਦਦੈ ਦੋਸੁ ਨ ਦੇਊ ਕਿਸੈ ਦੋਸੁ ਕਰੰਮਾ ਆਪਣਿਆ ॥
ਜੋ ਮੈ ਕੀਆ ਸੋ ਮੈ ਪਾਇਆ ਦੋਸੁ ਨ ਦੀਜੈ ਅਵਰ ਜਨਾ ॥੨੧॥
ਧਧੈ ਧਾਰਿ ਕਲਾ ਜਿਨਿ ਛੋਡੀ ਹਰਿ ਚੀਜੀ ਜਿਨਿ ਰੰਗ ਕੀਆ ॥
ਤਿਸ ਦਾ ਦੀਆ ਸਭਨੀ ਲੀਆ ਕਰਮੀ ਕਰਮੀ ਹੁਕਮੁ ਪਇਆ ॥੨੨॥
ਨੰਨੈ ਨਾਹ ਭੋਗ ਨਿਤ ਭੋਗੈ ਨਾ ਡੀਠਾ ਨਾ ਸੰਮ੍ਹਲਿਆ ॥
ਗਲੀ ਹਉ ਸੋਹਾਗਣਿ ਭੈਣੇ ਕੰਤੁ ਨ ਕਬਹੂੰ ਮੈ ਮਿਲਿਆ ॥੨੩॥
ਪਪੈ ਪਾਤਿਸਾਹੁ ਪਰਮੇਸਰੁ ਵੇਖਣ ਕਉ ਪਰਪੰਚੁ ਕੀਆ ॥
ਦੇਖੈ ਬੂਝੈ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਜਾਣੈ ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ॥੨੪॥
ਫਫੈ ਫਾਹੀ ਸਭੁ ਜਗੁ ਫਾਸਾ ਜਮ ਕੈ ਸੰਗਲਿ ਬੰਧਿ ਲਇਆ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਸੇ ਨਰ ਉਬਰੇ ਜਿ ਹਰਿ ਸਰਣਾਗਤਿ ਭਜਿ ਪਇਆ ॥੨੫॥
ਬਬੈ ਬਾਜੀ ਖੇਲਣ ਲਾਗਾ ਚਉਪੜਿ ਕੀਤੇ ਚਾਰਿ ਜੁਗਾ ॥
छछै छाइआ वरती सभ अंतरि तेरा कीआ भरमु होआ ॥
भरमु उपाइ भुलाईअनु आपे तेरा करमु होआ तिन॑ गुरू मिलिआ ॥१०॥
जजै जानु मंगत जनु जाचै लख चउरासीह भीख भविआ ॥
एको लेवै एको देवै अवरु न दूजा मै सुणिआ ॥११॥
झझै झूरि मरहु किआ प्राणी जो किछु देणा सु दे रहिआ ॥
दे दे वेखै हुकमु चलाए जिउ जीआ का रिजकु पइआ ॥१२॥
ञंञै नदरि करे जा देखा दूजा कोई नाही ॥
एको रवि रहिआ सभ थाई एकु वसिआ मन माही ॥१३॥
टटै टंचु करहु किआ प्राणी घड़ी कि मुहति कि उठि चलणा ॥
जूऐ जनमु न हारहु अपणा भाजि पड़हु तुम हरि सरणा ॥१४॥
ठठै ठाढि वरती तिन अंतरि हरि चरणी जिन॑ का चितु लागा ॥
चितु लागा सेई जन निसतरे तउ परसादी सुखु पाइआ ॥१५॥
डडै डंफु करहु किआ प्राणी जो किछु होआ सु सभु चलणा ॥
तिसै सरेवहु ता सुखु पावहु सरब निरंतरि रवि रहिआ ॥१६॥
ढढै ढाहि उसारै आपे जिउ तिसु भावै तिवै करे ॥
करि करि वेखै हुकमु चलाए तिसु निसतारे जा कउ नदरि करे ॥१७॥
णाणै रवतु रहै घट अंतरि हरि गुण गावै सोई ॥
आपे आपि मिलाए करता पुनरपि जनमु न होई ॥१८॥
ततै तारू भवजलु होआ ता का अंतु न पाइआ ॥
ना तर ना तुलहा हम बूडसि तारि लेहि तारण राइआ ॥१९॥
थथै थानि थानंतरि सोई जा का कीआ सभु होआ ॥
किआ भरमु किआ माइआ कहीऐ जो तिसु भावै सोई भला ॥२०॥
ददै दोसु न देऊ किसै दोसु करंमा आपणिआ ॥
जो मै कीआ सो मै पाइआ दोसु न दीजै अवर जना ॥२१॥
धधै धारि कला जिनि छोडी हरि चीजी जिनि रंग कीआ ॥
तिस दा दीआ सभनी लीआ करमी करमी हुकमु पइआ ॥२२॥
नंनै नाह भोग नित भोगै ना डीठा ना संम्हलिआ ॥
गली हउ सोहागणि भैणे कंतु न कबहूं मै मिलिआ ॥२३॥
पपै पातिसाहु परमेसरु वेखण कउ परपंचु कीआ ॥
देखै बूझै सभु किछु जाणै अंतरि बाहरि रवि रहिआ ॥२४॥
फफै फाही सभु जगु फासा जम कै संगलि बंधि लइआ ॥
गुर परसादी से नर उबरे जि हरि सरणागति भजि पइआ ॥२५॥
बबै बाजी खेलण लागा चउपड़ि कीते चारि जुगा ॥
भरमु उपाइ भुलाईअनु आपे तेरा करमु होआ तिन॑ गुरू मिलिआ ॥१०॥
जजै जानु मंगत जनु जाचै लख चउरासीह भीख भविआ ॥
एको लेवै एको देवै अवरु न दूजा मै सुणिआ ॥११॥
झझै झूरि मरहु किआ प्राणी जो किछु देणा सु दे रहिआ ॥
दे दे वेखै हुकमु चलाए जिउ जीआ का रिजकु पइआ ॥१२॥
ञंञै नदरि करे जा देखा दूजा कोई नाही ॥
एको रवि रहिआ सभ थाई एकु वसिआ मन माही ॥१३॥
टटै टंचु करहु किआ प्राणी घड़ी कि मुहति कि उठि चलणा ॥
जूऐ जनमु न हारहु अपणा भाजि पड़हु तुम हरि सरणा ॥१४॥
ठठै ठाढि वरती तिन अंतरि हरि चरणी जिन॑ का चितु लागा ॥
चितु लागा सेई जन निसतरे तउ परसादी सुखु पाइआ ॥१५॥
डडै डंफु करहु किआ प्राणी जो किछु होआ सु सभु चलणा ॥
तिसै सरेवहु ता सुखु पावहु सरब निरंतरि रवि रहिआ ॥१६॥
ढढै ढाहि उसारै आपे जिउ तिसु भावै तिवै करे ॥
करि करि वेखै हुकमु चलाए तिसु निसतारे जा कउ नदरि करे ॥१७॥
णाणै रवतु रहै घट अंतरि हरि गुण गावै सोई ॥
आपे आपि मिलाए करता पुनरपि जनमु न होई ॥१८॥
ततै तारू भवजलु होआ ता का अंतु न पाइआ ॥
ना तर ना तुलहा हम बूडसि तारि लेहि तारण राइआ ॥१९॥
थथै थानि थानंतरि सोई जा का कीआ सभु होआ ॥
किआ भरमु किआ माइआ कहीऐ जो तिसु भावै सोई भला ॥२०॥
ददै दोसु न देऊ किसै दोसु करंमा आपणिआ ॥
जो मै कीआ सो मै पाइआ दोसु न दीजै अवर जना ॥२१॥
धधै धारि कला जिनि छोडी हरि चीजी जिनि रंग कीआ ॥
तिस दा दीआ सभनी लीआ करमी करमी हुकमु पइआ ॥२२॥
नंनै नाह भोग नित भोगै ना डीठा ना संम्हलिआ ॥
गली हउ सोहागणि भैणे कंतु न कबहूं मै मिलिआ ॥२३॥
पपै पातिसाहु परमेसरु वेखण कउ परपंचु कीआ ॥
देखै बूझै सभु किछु जाणै अंतरि बाहरि रवि रहिआ ॥२४॥
फफै फाही सभु जगु फासा जम कै संगलि बंधि लइआ ॥
गुर परसादी से नर उबरे जि हरि सरणागति भजि पइआ ॥२५॥
बबै बाजी खेलण लागा चउपड़ि कीते चारि जुगा ॥
हिन्दी अर्थ: (हे प्रभू ! जीव भी क्या करे।तेरी ही पैदा की हुई) अविद्या सब जीवों के अंदर प्रबल हो रही है। (जीवों के मन की) भटकना तेरी ही बनाई हुई है।(हे मन !) प्रभू ने खुद ही भटकना पैदा करके सृष्टि को गलत राह पर डाला हुआ है (अगर तूने बचना है तो अपनी विद्या का अहंकार त्याग के कह,) हे प्रभू ! जिन पर तेरी बख्शिश होती है उन्हें गुरू मिल जाता है (मेरे पर भी मेहर करके गुरू मिला)। 10। (हे मन ! अपने पण्डित होने का मान त्याग के) उस प्रभू के साथ सांझ डाल (जिसके दर से) हरेक जीव मंगता बन के दान मांगता है। वह प्रभू चौरासी लाख जूनियों में खुद ही मौजूद है।(सब जीवों में व्यापक हो के) वह खुद ही भिक्षा लेने वाला है।और वह खुद ही देता है। 11। हे प्राणी ! (रोटी की खातिर) चिंता कर-करके क्यूँ आत्मिक मौत सहेड़ता है।जो कुछ प्रभू ने तुझे देने का फैसला किया हुआ है।वह (तेरी चिंता-फिक्र के बिना भी) स्वयं ही दे रहा है। जैसे-जैसे जीवों का रिजक मुकरर (निहित) है।वह सब को दे रहा है।संभाल भी कर रहा है।और (रिजक बाँटने वाला अपना) हुकम चला रहा है (हे मन ! तेरा पण्डित होने के क्याअगर तुझे इतनी भी समझ नहीं। )। 12। (हे मन ! चिंता-फिक्र छोड़।क्योंकि) मैं जब भी ध्यान से देखता हूँ।मुझे प्रभू के बिना कोई और (कहीं भी) नहीं दिखता। प्रभू स्वयं ही हर जगह मौजूद है।हरेक के मन में प्रभू खुद ही बस रहा है। 13। (प्रभू की याद भुला के सिर्फ दुनियावी काम ही करने व्यर्थ के धंधे है।क्योंकि मौत आने से इनसे साथ समाप्त हो जाएगा) हे प्राणी ! व्यर्थ के धंधे करने का कोई लाभ नहीं।(क्योंकि इस जगत से) थोड़े ही समय में उठ के चले जाना है। हे प्राणी ! (प्रभू की याद भुला के) अपना मानस जनम जूए में क्यूँ हारते हो।हे भाई ! तू जल्दी ही परमात्मा की शरण पड़ जा। 14। जिन मनुष्यों का मन परमात्मा के चरणों में टिका रहता है।उनके मन में ठंढ शांति बनी रहती है। हे प्रभू ! दुनियां के टंटों में शांत-चिक्त रहके वहीपार गुजरते हैं जिनका मन (तेरे चरणों में) जुड़ा रहता है।तेरी मेहर से उनको आत्मिक सुख प्राप्त हुआ रहता है। 15। हे जीव ! जगत में जो कुछ पैदा हुआ है सब यहाँ से चले जाने वाला है (नाशवंत है)। किसी तरह का कोई दिखावा करने का कोई लाभ नहीं होगा (आत्मिक सुख विद्या आदि के दिखावे में नहीं है)।आत्मिक आनंद तभी मिलेगा अगर उस परमात्मा का सिमरन करोगे जो सब जीवों के अंदर एक-रस व्यापक है। 16। परमात्मा स्वयं ही जगत रचना को नाश करता है।स्वयं ही बनाता है।जैसे उसे अच्छा लगता है वैसे करता है। प्रभू जीव पैदा करके (सबकी) संभाल करता है।(हर जगह) अपना हुकम चला रहा है।(जीव सृजनहार को भुला के नाशवंत संसार में मगन रहता है।पर) जिस मनुष्य पर प्रभू मेहर की नजर करता है।उसे (नाशवंत संसार के मोह में से) पार लंघा लेता है। 17। जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा अपना आप प्रगट कर दे।वह मनुष्य उसकी सिफत सालाह करने लग पड़ता है। (उसकी प्रीति पे रीझ के) ईश्वर स्वयं ही उसे अपने साथ मिला लेता है (उसकी सुरति अपनी याद में जोड़े रखता है) उस मनुष्य को बार-बार जनम नहीं मिलता (वह दुबारा जनम-मरण के चक्कर में नहीं पड़ता।पर हे मन ! सिर्फ पढ़ लेने से।पण्डित बन जाने से ये दाति नसीब नहीं होती)। 18। ये संसार समुंद्र (जिसमें विकारों की बाढ़ जोर पकड़ती जा रही है) बहुत ही गहरा है।इसका दूसरा छोर नहीं मिलता। (इस में से पार लांघने के लिए) हमारे पास ना कोई बेड़ी है ना ही कोई तुलहा।बेड़ी तुलहे के बिना हम डूब जाएंगे।हे तैराने के समर्थ प्रभू ! हमें पार लंघा ले। 19। जिस परमात्मा का बनाया हुआ ये सारा जगत है।वही (इस जगत के) हरेक जगह में मौजूद है। (जीवों को मोहने वाली ये) माया और (माया का बिखरा हुआ) मोह भी सर्व-व्यापक प्रभू से अलग नहीं।जो उस प्रभू को अच्छा लगता है वही (जगत में हो रहा है।और जीवों के वास्ते) ठीक हो रहा है (सो।हे मन ! विद्या का मान करने की जगह उसकी रजा को समझ)। 20। ( हे मन ! ये याद रख कि) मैं किसी और के माथे दोष मढ़ूँ (अपनी विद्या के बल के आसरे किसी और को दोषी ठहराने की जगह।हे मन ! अपनी ही करनी को सुधारने की जरूरत है) (हे मन ! अगर तू पढ़ के सच-मुच पण्डित हो गया है।तो ये याद रख कि) जैसे काम मैं करता हूँ।वैसा ही फल मैं पा लेता हूँ। (अपने किये कर्मों के अनुसार अपने ऊपर आए दुख-कलेशों के बारे में) और लोगों को दोष नहीं देना चाहिए।बुराई अपने कर्मों में ही होती है । 21। जिस हरी ने (सारी सृष्टि में) अपनी सक्ता टिका रखी है।जिस चमत्कारी प्रभू ने इस रंगा-रंग की रचना की हुई है।सारे जीव उसी की बख्शिशों की दातें बरत रहे हैं। पर (इन दातों के बख्शने में) हरेक जीव के अपने-अपने किए कर्मों के अनुसार ही प्रभू का हुकम बरत रहा है (इस वास्ते हे मन ! सिर्फ विद्या वाली चोंच-ज्ञान चर्चा कुछ नहीं सँवारती।अपनी करणी ठीक करने की जरूरत है)। 22। हे सत्संगी सहेलीए ! (देख ! सिर्फ विद्या को ही असल मनुष्यता समझ रखने का नतीजा !) जिस परमात्मा के दिए हुए पदार्थ हरेक जीव बरत रहा है।उसके अभी तक मैंने कभी दर्शन नहीं किए।उसे कभी हृदय में नहीं टिकाया। (विद्या के आसरे) मैं सिर्फ बातों से ही अपने आपको सोहागनि कहती रही।पर कंत प्रभू मुझे अभी तक कहीं नहीं मिला। 23। परमेश्वर (इस बारे में संसार का) बादशाह है।उसने खुद यह संसार रचा है।कि जीव इसमें उसका दीदार करें। रचनहार प्रभू हरेक जीव की संभाल करता है।हरेक दिल की समझता जानता है।वह सारे संसार में हर जगह व्यापक है।(पर हे मन ! तू उस प्रभू के दर्शन करने की जगह अपनी विद्या में ही अहंकारी हुआ बैठा है। )। 24। (हे मन !) सारा संसार (माया की किसी ना किसी) बंधन में बँधा हुआ है।जम के रस्से ने बाँध रखा है (भाव।माया के प्रभाव में आ के संसार ऐसे कर्म करता जा रहा है कि जम के काबू में आता जाता है)। (हे मन ! पण्डित होने का गुमान करके तू भी उसी जंजीर में बँधा हुआ है)।इस रस्से से गुरू की कृपा से सिर्फ वही लोग बचे हैं।जो दौड़ के परमात्मा की शरण जा पड़े हैं। 25। हे मन ! (अगर तू पढ़ा-लिखा पंडित है तो संसार को चौपड़ की खेल समझ।विद्या पर गुमान करने की जगह एक सुचॅजी नर्द बन के प्रभू की रजा-रूपी हाथों में चल।ता कि पुग जाए सफल हो जाए।देख !) परमात्मा स्वयं (चौपड़ की) खेल खेल रहा है।चार युगों को उसने (चौपड़ के) चार पल्ले बनाया है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 433 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
Diwali की पहली रात, अकेले बालकनी में पटाख़ों के बीच एक specific shift।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 33 पंक्तियों का है, 1 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 433” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 434 →, पीछे का: ← अंग 432।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।