अंग 397

अंग
397
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸੋ ਛੂਟੈ ਮਹਾ ਜਾਲ ਤੇ ਜਿਸੁ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਨਿਰੰਤਰਿ ॥੨॥
ਗੁਰ ਕੀ ਮਹਿਮਾ ਕਿਆ ਕਹਾ ਗੁਰੁ ਬਿਬੇਕ ਸਤ ਸਰੁ ॥
ਓਹੁ ਆਦਿ ਜੁਗਾਦੀ ਜੁਗਹ ਜੁਗੁ ਪੂਰਾ ਪਰਮੇਸਰੁ ॥੩॥
ਨਾਮੁ ਧਿਆਵਹੁ ਸਦ ਸਦਾ ਹਰਿ ਹਰਿ ਮਨੁ ਰੰਗੇ ॥
ਜੀਉ ਪ੍ਰਾਣ ਧਨੁ ਗੁਰੂ ਹੈ ਨਾਨਕ ਕੈ ਸੰਗੇ ॥੪॥੨॥੧੦੪॥
सो छूटै महा जाल ते जिसु गुर सबदु निरंतरि ॥२॥
गुर की महिमा किआ कहा गुरु बिबेक सत सरु ॥
ओहु आदि जुगादी जुगह जुगु पूरा परमेसरु ॥३॥
नामु धिआवहु सद सदा हरि हरि मनु रंगे ॥
जीउ प्राण धनु गुरू है नानक कै संगे ॥४॥२॥१०४॥

हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य के अंदर गुरू का शबद एक-रस टिका रहे वह मनुष्य (माया के मोह के) बड़े जाल (में फंसने) से बचा रहता है। 2। हे भाई ! मैं ये बताने योग्य नहीं हूँ कि गुरू कितना बड़ा (कितना महान।कितनी उच्च आत्मा) है।गुरू विवेक का सरोवर है गुरू उच्च आचरण का सरोवर है। गुरू उस पूरन परमेश्वर (का रूप) है जो सबका आदि है जो जुगों के आदि से है जो हरेक युग में मौजूद है। 3। हे भाई ! सदा ही परमात्मा का नाम सिमरते रहो।अपने मन को परमात्मा के प्रेम रंग से रंगे रखो (ये नाम मिलना गुरू से ही है। वह गुरू) मुझ नानक के अंग-संग बसता है।गुरू ही मेरी जिंद है गुरू ही मेरे प्राण हैं।गुरू ही मेरा धन है। 4। 2। 104।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸਾਈ ਅਲਖੁ ਅਪਾਰੁ ਭੋਰੀ ਮਨਿ ਵਸੈ ॥
ਦੂਖੁ ਦਰਦੁ ਰੋਗੁ ਮਾਇ ਮੈਡਾ ਹਭੁ ਨਸੈ ॥੧॥
ਹਉ ਵੰਞਾ ਕੁਰਬਾਣੁ ਸਾਈ ਆਪਣੇ ॥
ਹੋਵੈ ਅਨਦੁ ਘਣਾ ਮਨਿ ਤਨਿ ਜਾਪਣੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬਿੰਦਕ ਗਾਲਿੑ ਸੁਣੀ ਸਚੇ ਤਿਸੁ ਧਣੀ ॥
ਸੂਖੀ ਹੂੰ ਸੁਖੁ ਪਾਇ ਮਾਇ ਨ ਕੀਮ ਗਣੀ ॥੨॥
ਨੈਣ ਪਸੰਦੋ ਸੋਇ ਪੇਖਿ ਮੁਸਤਾਕ ਭਈ ॥
ਮੈ ਨਿਰਗੁਣਿ ਮੇਰੀ ਮਾਇ ਆਪਿ ਲੜਿ ਲਾਇ ਲਈ ॥੩॥
ਬੇਦ ਕਤੇਬ ਸੰਸਾਰ ਹਭਾ ਹੂੰ ਬਾਹਰਾ ॥
ਨਾਨਕ ਕਾ ਪਾਤਿਸਾਹੁ ਦਿਸੈ ਜਾਹਰਾ ॥੪॥੩॥੧੦੫॥
आसा महला ५ ॥
साई अलखु अपारु भोरी मनि वसै ॥
दूखु दरदु रोगु माइ मैडा हभु नसै ॥१॥
हउ वंञा कुरबाणु साई आपणे ॥
होवै अनदु घणा मनि तनि जापणे ॥१॥ रहाउ ॥
बिंदक गालि॑ सुणी सचे तिसु धणी ॥
सूखी हूं सुखु पाइ माइ न कीम गणी ॥२॥
नैण पसंदो सोइ पेखि मुसताक भई ॥
मै निरगुणि मेरी माइ आपि लड़ि लाइ लई ॥३॥
बेद कतेब संसार हभा हूं बाहरा ॥
नानक का पातिसाहु दिसै जाहरा ॥४॥३॥१०५॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे माँ ! जब वह बेअंत अलख पति-प्रभू थोड़े से समय के लिए भी मेरे मन में आ बसता है मेरा हरेक दुख-दर्द मेरा हरेक रोग सब दूर हो जाता है। 1। हे माँ ! मैं अपने पति-प्रभू से कुर्बान जाती हूँ। उसका नाम जपने से मेरे मन में मेरे हृदय में आनंद पैदा हो जाता है। 1।रहाउ। हे माँ ! जब उस सदा कायम रहने वाले मालिक-प्रभू की मैं थोड़ी जितनी भी सिफत सालाह सुनती हूँ तो मैं इतना ऊँचा सुख अनुभव करती हूँ कि मैं उसका मूल्य नहीं बता सकती। 2। हे मेरी माँ ! मेरा वह साई मेरी आँखों को प्यारा लगता है उसे देख के मैं मस्त हो जाती हूँ। हे माँ ! मेरे में कोई गुण नहीं।फिर भी उसने स्वयं ही अपने पल्ले से लगा रखा है। 3। (हे माँ ! वह मेरा बादशाह निरा संसार में ही नहीं बस रहा वह तो) इस दिखते संसार से बाहर भी हर जगह है।बेद-कतेब आदि कोई धर्म-पुस्तक उसका स्वरूप बयान नहीं कर सकते।(वैसे। हे माँ !) मुझ नानक का बादशाह हर जगह प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा है। 4। 3। 105।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਲਾਖ ਭਗਤ ਆਰਾਧਹਿ ਜਪਤੇ ਪੀਉ ਪੀਉ ॥
ਕਵਨ ਜੁਗਤਿ ਮੇਲਾਵਉ ਨਿਰਗੁਣ ਬਿਖਈ ਜੀਉ ॥੧॥
ਤੇਰੀ ਟੇਕ ਗੋਵਿੰਦ ਗੁਪਾਲ ਦਇਆਲ ਪ੍ਰਭ ॥
ਤੂੰ ਸਭਨਾ ਕੇ ਨਾਥ ਤੇਰੀ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਸਭ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਦਾ ਸਹਾਈ ਸੰਤ ਪੇਖਹਿ ਸਦਾ ਹਜੂਰਿ ॥
ਨਾਮ ਬਿਹੂਨੜਿਆ ਸੇ ਮਰਨਿੑ ਵਿਸੂਰਿ ਵਿਸੂਰਿ ॥੨॥
ਦਾਸ ਦਾਸਤਣ ਭਾਇ ਮਿਟਿਆ ਤਿਨਾ ਗਉਣੁ ॥
ਵਿਸਰਿਆ ਜਿਨੑਾ ਨਾਮੁ ਤਿਨਾੜਾ ਹਾਲੁ ਕਉਣੁ ॥੩॥
ਜੈਸੇ ਪਸੁ ਹਰਿੑਆਉ ਤੈਸਾ ਸੰਸਾਰੁ ਸਭ ॥
ਨਾਨਕ ਬੰਧਨ ਕਾਟਿ ਮਿਲਾਵਹੁ ਆਪਿ ਪ੍ਰਭ ॥੪॥੪॥੧੦੬॥
आसा महला ५ ॥
लाख भगत आराधहि जपते पीउ पीउ ॥
कवन जुगति मेलावउ निरगुण बिखई जीउ ॥१॥
तेरी टेक गोविंद गुपाल दइआल प्रभ ॥
तूं सभना के नाथ तेरी स्रिसटि सभ ॥१॥ रहाउ ॥
सदा सहाई संत पेखहि सदा हजूरि ॥
नाम बिहूनड़िआ से मरनि॑ विसूरि विसूरि ॥२॥
दास दासतण भाइ मिटिआ तिना गउणु ॥
विसरिआ जिन॑ा नामु तिनाड़ा हालु कउणु ॥३॥
जैसे पसु हरि॑आउ तैसा संसारु सभ ॥
नानक बंधन काटि मिलावहु आपि प्रभ ॥४॥४॥१०६॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे प्रभू ! तेरे लाखों ही भक्त तुझे ‘प्यारा प्यारा’ कह के तेरा नाम जपते हैं तेरी आरधना करते हैं (उनके सामने मैं तो) गुणहीन विकारी जीव हूँ। (हे प्रभू !) मैं तुझे किस तरीके से मिलूँ। 1। हे गोविंद ! हे गोपाल ! हे दयालु प्रभू ! मुझे तेरा ही आसरा है। तू सब जीवों का पति है।सारी सृष्टि तेरी ही पैदा की हुई है। 1।रहाउ। हे प्रभू ! तू अपने संतों की सहायता करने वाला है तेरे संत तुझे सदा अपने अंग-संग बसता देखते हैं। पर जो (भाग्यहीन तेरे) नाम से वंचित रहते हैं वह (विकारों में ही) झुर-झुर के आत्मिक मौत सहेड़ी रखते हैं। 2। हे प्रभू ! जो मनुष्य तेरे दासों के दास होने के भाव में टिके रहते हैं उनका जन्म-मरण का चक्कर खत्म हो जाता है। पर जिन (दुर्भाग्यपूर्ण व्यक्तियों) को तेरा नाम भूला रहता है उनका हाल बुरा ही बना रहता है। 3। (हे भाई !) जैसे खुला रह के हरी खेती चरने वाला कोई पशु (अवारा भटकता फिरता) है वैसे ही सारा जगत (विकारों के पीछे भटक रहा है)। हे नानक ! (कह,) हे प्रभू ! (मेरे विकारों वाले) बंधन काट के मुझे तू अपने चरणों में जोड़े रख। 4। 4। 106।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਭੇ ਥੋਕ ਵਿਸਾਰਿ ਹਿਕੋ ਖਿਆਲੁ ਕਰਿ ॥
ਝੂਠਾ ਲਾਹਿ ਗੁਮਾਨੁ ਮਨੁ ਤਨੁ ਅਰਪਿ ਧਰਿ ॥੧॥
ਆਠ ਪਹਰ ਸਾਲਾਹਿ ਸਿਰਜਨਹਾਰ ਤੂੰ ॥
ਜੀਵਾਂ ਤੇਰੀ ਦਾਤਿ ਕਿਰਪਾ ਕਰਹੁ ਮੂੰ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੋਈ ਕੰਮੁ ਕਮਾਇ ਜਿਤੁ ਮੁਖੁ ਉਜਲਾ ॥
ਸੋਈ ਲਗੈ ਸਚਿ ਜਿਸੁ ਤੂੰ ਦੇਹਿ ਅਲਾ ॥੨॥
ਜੋ ਨ ਢਹੰਦੋ ਮੂਲਿ ਸੋ ਘਰੁ ਰਾਸਿ ਕਰਿ ॥
ਹਿਕੋ ਚਿਤਿ ਵਸਾਇ ਕਦੇ ਨ ਜਾਇ ਮਰਿ ॥੩॥
ਤਿਨੑਾ ਪਿਆਰਾ ਰਾਮੁ ਜੋ ਪ੍ਰਭ ਭਾਣਿਆ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦਿ ਅਕਥੁ ਨਾਨਕਿ ਵਖਾਣਿਆ ॥੪॥੫॥੧੦੭॥
आसा महला ५ ॥
हभे थोक विसारि हिको खिआलु करि ॥
झूठा लाहि गुमानु मनु तनु अरपि धरि ॥१॥
आठ पहर सालाहि सिरजनहार तूं ॥
जीवां तेरी दाति किरपा करहु मूं ॥१॥ रहाउ ॥
सोई कंमु कमाइ जितु मुखु उजला ॥
सोई लगै सचि जिसु तूं देहि अला ॥२॥
जो न ढहंदो मूलि सो घरु रासि करि ॥
हिको चिति वसाइ कदे न जाइ मरि ॥३॥
तिन॑ा पिआरा रामु जो प्रभ भाणिआ ॥
गुर परसादि अकथु नानकि वखाणिआ ॥४॥५॥१०७॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे भाई ! सारे (सांसारिक) पदार्थों (का मोह) भुला के सिर्फ एक परमात्मा का ध्यान धर (दुनिया की मल्कियतों का) झूठा गुमान (अपने मन में से) दूर कर दे। अपना मन (परमात्मा के आगे) भेटा कर दे।अपना हृदय (प्रभू चरणों में) भेट कर दे। 1। हे सृजनहार प्रभू ! आठों पहर तुझे सालाह के (तेरी सिफत सालाह करके) मेरे अंदर आत्मिक जीवन पैदा होता है।मेरे पर मेहर करके मुझे (तेरी सिफत सालाह की) दाति मिल जाए। 1।रहाउ। हे भाई ! वही काम करा कर जिस काम से (लोक-परलोक में) तेरा मुंह रौशन रहे।(पर।) हे प्रभू ! तेरे सदा कायम रहने वाले नाम में वही मनुष्य जुड़ता है जिसको तू स्वयं ये दाति देता है। 2। हे भाई ! (आत्मिक जीवन की रचना वाले) उस (हृदय-) घर को सुंदर बना जो फिर कभी गिर नहीं सकता। हे भाई ! एक परमात्मा को ही अपने चित्त में बसाए रख वह परमात्मा कभी भी नहीं मरता। 3। (हे भाई !) जो मनुष्य परमात्मा को अच्छे लगने लगते हैं उनको परमात्मा प्यारा लगने लग पड़ता है (पर।ये गुरू की मेहर से ही होता है)। नानक ने गुरू की कृपा से ही उस बेअंत गुणों के मालिक प्रभू की सिफत सालाह करनी शुरू की हुई है। 4। 5। 107।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜਿਨੑਾ ਨ ਵਿਸਰੈ ਨਾਮੁ ਸੇ ਕਿਨੇਹਿਆ ॥
ਭੇਦੁ ਨ ਜਾਣਹੁ ਮੂਲਿ ਸਾਂਈ ਜੇਹਿਆ ॥੧॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਹੋਇ ਨਿਹਾਲੁ ਤੁਮੑ ਸੰਗਿ ਭੇਟਿਆ ॥
ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਜਨ ਪਰਸਾਦਿ ਦੁਖੁ ਸਭੁ ਮੇਟਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੇਤੇ ਖੰਡ ਬ੍ਰਹਮੰਡ ਉਧਾਰੇ ਤਿੰਨੑ ਖੇ ॥
ਜਿਨੑ ਮਨਿ ਵੁਠਾ ਆਪਿ ਪੂਰੇ ਭਗਤ ਸੇ ॥੨॥
आसा महला ५ ॥
जिन॑ा न विसरै नामु से किनेहिआ ॥
भेदु न जाणहु मूलि सांई जेहिआ ॥१॥
मनु तनु होइ निहालु तुम॑ संगि भेटिआ ॥
सुखु पाइआ जन परसादि दुखु सभु मेटिआ ॥१॥ रहाउ ॥
जेते खंड ब्रहमंड उधारे तिंन॑ खे ॥
जिन॑ मनि वुठा आपि पूरे भगत से ॥२॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई !) जिन मनुष्यों को कभी भी परमात्मा का नाम नहीं भूलता (क्या तुम्हें पता है कि) वे कैसे होते हैं। (उनमें और पति-प्रभू में) रत्ती भी फर्क ना समझो।वे पति-प्रभू जैसे हो जाते हैं। 1। (हे प्रभू !) जिन मनुष्यों ने तेरे साथ संगति की उनका मन प्रसन्न रहता है। उन्होंने (तेरे) सेवक (-गुरू) की कृपा से आत्मिक आनंद प्राप्त कर लिया है और अपना सारा दुख मिटा लिया है। 1।रहाउ। उनमे सारे खंड-ब्रहमण्डों को भी (संसार-समुंद्र से) बचा लेने की समर्था प्राप्त कर ली होती है। (हे भाई !) जिन मनुष्यों के हृदय में परमात्मा आप आ बसता है वे पूरी तौर पर भगत बन जाते हैं। 2।

संदर्भ: यह अंग 397 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

सर्दी के पहले हफ़्ते का पहला rajai का आना, और मन का बदलना।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 45 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 397” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 398 →, पीछे का: ← अंग 396

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।