अंग 429

अंग
429
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਹਜੇ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈਐ ਗਿਆਨੁ ਪਰਗਟੁ ਹੋਇ ॥੧॥
ਏ ਮਨ ਮਤ ਜਾਣਹਿ ਹਰਿ ਦੂਰਿ ਹੈ ਸਦਾ ਵੇਖੁ ਹਦੂਰਿ ॥
ਸਦ ਸੁਣਦਾ ਸਦ ਵੇਖਦਾ ਸਬਦਿ ਰਹਿਆ ਭਰਪੂਰਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਪੁ ਪਛਾਣਿਆ ਤਿਨੑੀ ਇਕ ਮਨਿ ਧਿਆਇਆ ॥
ਸਦਾ ਰਵਹਿ ਪਿਰੁ ਆਪਣਾ ਸਚੈ ਨਾਮਿ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥੨॥
ਏ ਮਨ ਤੇਰਾ ਕੋ ਨਹੀ ਕਰਿ ਵੇਖੁ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰੁ ॥
ਹਰਿ ਸਰਣਾਈ ਭਜਿ ਪਉ ਪਾਇਹਿ ਮੋਖ ਦੁਆਰੁ ॥੩॥
ਸਬਦਿ ਸੁਣੀਐ ਸਬਦਿ ਬੁਝੀਐ ਸਚਿ ਰਹੈ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਸਬਦੇ ਹਉਮੈ ਮਾਰੀਐ ਸਚੈ ਮਹਲਿ ਸੁਖੁ ਪਾਇ ॥੪॥
ਇਸੁ ਜੁਗ ਮਹਿ ਸੋਭਾ ਨਾਮ ਕੀ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਸੋਭ ਨ ਹੋਇ ॥
ਇਹ ਮਾਇਆ ਕੀ ਸੋਭਾ ਚਾਰਿ ਦਿਹਾੜੇ ਜਾਦੀ ਬਿਲਮੁ ਨ ਹੋਇ ॥੫॥
ਜਿਨੀ ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਿਆ ਸੇ ਮੁਏ ਮਰਿ ਜਾਹਿ ॥
ਹਰਿ ਰਸ ਸਾਦੁ ਨ ਆਇਓ ਬਿਸਟਾ ਮਾਹਿ ਸਮਾਹਿ ॥੬॥
ਇਕਿ ਆਪੇ ਬਖਸਿ ਮਿਲਾਇਅਨੁ ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮੇ ਲਾਇ ॥
ਸਚੁ ਕਮਾਵਹਿ ਸਚਿ ਰਹਹਿ ਸਚੇ ਸਚਿ ਸਮਾਹਿ ॥੭॥
ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਸੁਣੀਐ ਨ ਦੇਖੀਐ ਜਗੁ ਬੋਲਾ ਅੰਨੑਾ ਭਰਮਾਇ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਦੁਖੁ ਪਾਇਸੀ ਨਾਮੁ ਮਿਲੈ ਤਿਸੈ ਰਜਾਇ ॥੮॥
ਜਿਨ ਬਾਣੀ ਸਿਉ ਚਿਤੁ ਲਾਇਆ ਸੇ ਜਨ ਨਿਰਮਲ ਪਰਵਾਣੁ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਤਿਨੑਾ ਕਦੇ ਨ ਵੀਸਰੈ ਸੇ ਦਰਿ ਸਚੇ ਜਾਣੁ ॥੯॥੧੩॥੩੫॥
सहजे नामु धिआईऐ गिआनु परगटु होइ ॥१॥
ए मन मत जाणहि हरि दूरि है सदा वेखु हदूरि ॥
सद सुणदा सद वेखदा सबदि रहिआ भरपूरि ॥१॥ रहाउ ॥
गुरमुखि आपु पछाणिआ तिन॑ी इक मनि धिआइआ ॥
सदा रवहि पिरु आपणा सचै नामि सुखु पाइआ ॥२॥
ए मन तेरा को नही करि वेखु सबदि वीचारु ॥
हरि सरणाई भजि पउ पाइहि मोख दुआरु ॥३॥
सबदि सुणीऐ सबदि बुझीऐ सचि रहै लिव लाइ ॥
सबदे हउमै मारीऐ सचै महलि सुखु पाइ ॥४॥
इसु जुग महि सोभा नाम की बिनु नावै सोभ न होइ ॥
इह माइआ की सोभा चारि दिहाड़े जादी बिलमु न होइ ॥५॥
जिनी नामु विसारिआ से मुए मरि जाहि ॥
हरि रस सादु न आइओ बिसटा माहि समाहि ॥६॥
इकि आपे बखसि मिलाइअनु अनदिनु नामे लाइ ॥
सचु कमावहि सचि रहहि सचे सचि समाहि ॥७॥
बिनु सबदै सुणीऐ न देखीऐ जगु बोला अंन॑ा भरमाइ ॥
बिनु नावै दुखु पाइसी नामु मिलै तिसै रजाइ ॥८॥
जिन बाणी सिउ चितु लाइआ से जन निरमल परवाणु ॥
नानक नामु तिन॑ा कदे न वीसरै से दरि सचे जाणु ॥९॥१३॥३५॥

हिन्दी अर्थ: जिसकी बरकति से आत्मिक अडोलता में टिक के हरि-नाम का सिमरन किया जा सकता है।और अंदर आत्मिक जीवन की समझ अंकुरित हो जाती है। 1। हे मेरे मन ! कहीं ये ना समझ लेना कि परमात्मा (तुझसे) दूर बसता है।उसे सदा अपने अंग-संग बसता देख। (जो कुछ तू बोलता है उसे वह) सदा सुन रहा है।(तेरे कामों को वह) सदा देख रहा है।गुरू के शबद में (जुड़।तुझे हर जगह) व्यापक दिख पड़ेगा। 1।रहाउ। गुरू के सन्मुख रहने वाली जीव-सि्त्रयां अपने आत्मिक जीवन को खोजती (आत्म चिंतन।स्वै-मंथन करती) रहती हैं।सुरति जोड़ के सिमरन करती हैं। सदा अपने प्रभू-पति का मिलाप पातीं हैं।और सदा-स्थिर प्रभू नाम में जुड़ के आत्मिक आनंद हासिल करती हैं। 2। हे मन ! गुरू के शबद के द्वारा विचार करके देख (प्रभू के बिना) तेरा कोई (सच्चा) साथी नहीं। दौड़ के प्रभू की शरण आ पड़।(इस तरह माया के मोह के बंधनों से) छुटकारे का रास्ता पा लेगा। 3। हे मन ! गुरू के शबद के द्वारा ही हरी-नाम सुना जा सकता है।शबद के द्वारा ही (सही जीवन राह) समझा जा सकता है।(जो मनुष्य गुरू-शबद में चित्त जोड़ता है वह) सदा-स्थिर हरी में सुरति जोड़े रखता है; शबद की बरकति से ही (अंदर से) अहंकार को खत्म किया जा सकता है (जो मनुष्य गुरू-शबद का आसरा लेता है वह) सदा-स्थिर रहने वाले हरी के चरणों में आनंद पाता है। 4। हे मन ! जगत में नाम की बरकति से ही शोभा मिलती है।हरी नाम के बिना मिली हुई शोभा असल शोभा नहीं। माया के प्रताप से मिली हुई शोभा चार दिन ही रहती है।इसके नाश होते हुए देर नहीं लगती। 5। जिन लोगों ने हरी-नाम भुला दिया उन्होंने आत्मिक मौत सहेड़ ली वे आत्मिक मौत मरे रहते हैं। जिन्हें हरी-नाम के रस का स्वाद ना आया वे विकारों के गंद में मस्त होते हैं।जैसे गंदगी के कीड़े गंदगी में। 6। कई ऐसे भाग्यशाली हैं जिन्हें परमात्मा ने हर समय अपने नाम में लगा के मेहर करके खुद ही अपने चरणों में जोड़ रखा है।वे सदा-स्थिर नाम-सिमरन की कमाई करते हैं। सदा-स्थिर नाम में टिके रहते हैं।हर वक्त सदा-स्थिर हरी में लीन रहते हैं। 7। हे भाई ! जगत माया के मोह में अंधा और बहरा हो रहा है (माया की खातिर) भटकता फिरता है।गुरू के शबद से वंचित रह के हरि-नाम सुना नहीं जा सकता।(सर्व-व्यापक प्रभू) देखा नहीं जा सकता। नाम से टूट के (माया में अंधा-बहरा हुआ) जगत दुख ही सहता रहता है।(जगत के भी क्या वश। ) हरी-नाम उस हरी की रजा से ही मिल सकता है। 8। जिन मनुष्यों ने गुरू की बाणी से अपना चित्त जोड़ा है वे मनुष्य पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं वे प्रभू की हजूरी में कबूल पड़ते हैं। हे नानक ! उन्हें परमात्मा का नाम कभी नहीं भूलता।सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के दर पे वह प्रमुख हैं। 9। 13। 35।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਸਬਦੌ ਹੀ ਭਗਤ ਜਾਪਦੇ ਜਿਨੑ ਕੀ ਬਾਣੀ ਸਚੀ ਹੋਇ ॥
ਵਿਚਹੁ ਆਪੁ ਗਇਆ ਨਾਉ ਮੰਨਿਆ ਸਚਿ ਮਿਲਾਵਾ ਹੋਇ ॥੧॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਜਨ ਕੀ ਪਤਿ ਹੋਇ ॥
ਸਫਲੁ ਤਿਨੑਾ ਕਾ ਜਨਮੁ ਹੈ ਤਿਨੑ ਮਾਨੈ ਸਭੁ ਕੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਉਮੈ ਮੇਰਾ ਜਾਤਿ ਹੈ ਅਤਿ ਕ੍ਰੋਧੁ ਅਭਿਮਾਨੁ ॥
ਸਬਦਿ ਮਰੈ ਤਾ ਜਾਤਿ ਜਾਇ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਮਿਲੈ ਭਗਵਾਨੁ ॥੨॥
ਪੂਰਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਭੇਟਿਆ ਸਫਲ ਜਨਮੁ ਹਮਾਰਾ ॥
ਨਾਮੁ ਨਵੈ ਨਿਧਿ ਪਾਇਆ ਭਰੇ ਅਖੁਟ ਭੰਡਾਰਾ ॥੩॥
ਆਵਹਿ ਇਸੁ ਰਾਸੀ ਕੇ ਵਾਪਾਰੀਏ ਜਿਨੑਾ ਨਾਮੁ ਪਿਆਰਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਸੋ ਧਨੁ ਪਾਏ ਤਿਨੑਾ ਅੰਤਰਿ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰਾ ॥੪॥
ਭਗਤੀ ਸਾਰ ਨ ਜਾਣਨੑੀ ਮਨਮੁਖ ਅਹੰਕਾਰੀ ॥
ਧੁਰਹੁ ਆਪਿ ਖੁਆਇਅਨੁ ਜੂਐ ਬਾਜੀ ਹਾਰੀ ॥੫॥
ਬਿਨੁ ਪਿਆਰੈ ਭਗਤਿ ਨ ਹੋਵਈ ਨਾ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ਸਰੀਰਿ ॥
ਪ੍ਰੇਮ ਪਦਾਰਥੁ ਪਾਈਐ ਗੁਰ ਭਗਤੀ ਮਨ ਧੀਰਿ ॥੬॥
ਜਿਸ ਨੋ ਭਗਤਿ ਕਰਾਏ ਸੋ ਕਰੇ ਗੁਰ ਸਬਦ ਵੀਚਾਰਿ ॥
ਹਿਰਦੈ ਏਕੋ ਨਾਮੁ ਵਸੈ ਹਉਮੈ ਦੁਬਿਧਾ ਮਾਰਿ ॥੭॥
ਭਗਤਾ ਕੀ ਜਤਿ ਪਤਿ ਏਕੋੁ ਨਾਮੁ ਹੈ ਆਪੇ ਲਏ ਸਵਾਰਿ ॥
ਸਦਾ ਸਰਣਾਈ ਤਿਸ ਕੀ ਜਿਉ ਭਾਵੈ ਤਿਉ ਕਾਰਜੁ ਸਾਰਿ ॥੮॥
आसा महला ३ ॥
सबदौ ही भगत जापदे जिन॑ की बाणी सची होइ ॥
विचहु आपु गइआ नाउ मंनिआ सचि मिलावा होइ ॥१॥
हरि हरि नामु जन की पति होइ ॥
सफलु तिन॑ा का जनमु है तिन॑ मानै सभु कोइ ॥१॥ रहाउ ॥
हउमै मेरा जाति है अति क्रोधु अभिमानु ॥
सबदि मरै ता जाति जाइ जोती जोति मिलै भगवानु ॥२॥
पूरा सतिगुरु भेटिआ सफल जनमु हमारा ॥
नामु नवै निधि पाइआ भरे अखुट भंडारा ॥३॥
आवहि इसु रासी के वापारीए जिन॑ा नामु पिआरा ॥
गुरमुखि होवै सो धनु पाए तिन॑ा अंतरि सबदु वीचारा ॥४॥
भगती सार न जाणन॑ी मनमुख अहंकारी ॥
धुरहु आपि खुआइअनु जूऐ बाजी हारी ॥५॥
बिनु पिआरै भगति न होवई ना सुखु होइ सरीरि ॥
प्रेम पदारथु पाईऐ गुर भगती मन धीरि ॥६॥
जिस नो भगति कराए सो करे गुर सबद वीचारि ॥
हिरदै एको नामु वसै हउमै दुबिधा मारि ॥७॥
भगता की जति पति एकोु नामु है आपे लए सवारि ॥
सदा सरणाई तिस की जिउ भावै तिउ कारजु सारि ॥८॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ३ ॥ गुरू के शबद की बरकति से ही भक्त (जगत में) उजागर हो जाते हैं।परमातमा की सिफत-सालाह ही उनका हर समय का बोल-चाल हो जाता है। (नाम की बरकति से) उनके अंदर से स्वै-भाव दूर हो जाता है।उनका मन नाम को कबूल कर लेता है।सदा-स्थिर हरी में उनका मिलाप हो जाता है। 1। (हे भाई !) परमात्मा के भक्तों के वास्ते परमात्मा का नाम ही इज्जत है (नाम जप के) उनकी जिंदगी सफल हो जाती है।हरेक जीव उनका आदर-मान करता है। 1।रहाउ। ‘मैं मैं। मेरी मेरी’ -ये ही परमात्मा से मनुष्य की दूरी पैदा कर देती है।इसी कारण मनुष्य के अंदर क्रोध और अहंकार पैदा हुए रहते हैं। जब गुरू के शबद के द्वारा ‘मैं मेरी’ मिट जाती है तब ये दूरी ये अभाव भी खत्म हो जाता है।हरी-ज्योति में सुरति लीन हो जाती है।रॅब मिल जाता है। 2। (जब हम जीवों को) पूरा गुरू मिल जाता है।हमारी जिंदगी कामयाब हो जाती है। हमें हरी-नाम मिल जाता है।जो जगत के नौ ही खजाने हैं।नाम-धन से हमारे (हृदय के) खजाने भर जाते हैं।ये खजाने कभी खाली नहीं हो सकते। 3। इस नाम-धन के वही वणजारे (गुरू के पास) आते हैं जिन्हें ये नाम- (धन) प्यारा लगता है। जो मनुष्य गुरू की शरण आ पड़ता है वह नाम-धन हासिल कर लेता है।ऐसे मनुष्यों के अंदर गुरू-शबद बस जाता है।प्रभू के गुणों की विचार आ बसती है। 4। (पर) अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य अहंकारी हो जाते हैं वे प्रभू की भक्ति की कद्र नहीं समझते। (उनके भी क्या वश। ) प्रभू ने स्वयं ही धुर से अपने हुकम से कुमार्ग पर डाल दिया है।वे जीवन-बाजी हार जाते हैं (जैसे कोई जुआरी) जूए में (हार खाता है)। 5। अगर हृदय में प्रभू के वास्ते प्यार ना हो तो उसकी भक्ति नहीं की जा सकती।(भक्ति के बिना) शरीर को आत्मिक आनंद नहीं मिलता। प्रेम की दाति (गुरू से ही) मिलती है।गुरू की बताई हुई भक्ति की बरकति से मन में शांति आ टिकती है। 6। (हे भाई !) गुरू के शबद की विचार करके वही मनुष्य प्रभू की भक्ति कर सकता है जिससे प्रभू स्वयं भक्ति करवाता है। (गुरू-शबद की बरकति से अपने अंदर से वह मनुष्य) अहंकार और मेर-तेर खत्म कर लेता है।उसके हृदय में एक परमात्मा का नाम आ बसता है। 7। परमात्मा का नाम भक्तों के लिए ऊँची जाति है नाम ही उनके वास्ते ऊँची कुल है।परमात्मा खुद ही उनके जीवन को सुंदर बना देता है। भगत सदा ही उस प्रभू की शरण पड़े रहते हैं।जैसे प्रभू को ठीक लगता है वैसे ही उनका हरेक काम सफल कर देता है। 8।

संदर्भ: यह अंग 429 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।

दिल्ली के Sunday-morning के bhajan-मण्डली, घर में dadiji सुन रहीं।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 38 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 429” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 430 →, पीछे का: ← अंग 428

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।